रविवार, 12 अप्रैल 2015

इंटरनेशनल हिन्दी केन्द्र अमेरिका में स्थापित होगा



अमेरिका में स्थापित होगा इंटरनेशनल हिन्दी केन्द्र
sanjeevnitoday.com
Sunday, April 12, 2015

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न्यूयॉर्क। हिंदी को एक वैश्विक भाषा के रूप में बढ़ावा देने के लिए यहां पास में एक 'हिंदी केंद्र खोलने की योजना बनाई गई है। यह केंद्र एक अकादमिक एवं सांस्कृतिक केंद्र के रूप में कार्य करेगा और भारतीय एवं अमेरिकी यूनिवर्सिटीज के बीच आदान-प्रदान कार्यक्रमों को सुगम बनाएगा।

महावाणिज्य दूत ज्ञानेश्वर मुले ने गत सप्ताह न्यू जर्सी स्थित रगर्स विश्वविद्यालय के भवन में आयोजित दूसरे इंटरनेशनल हिंदी समिट  में जुटे शिक्षाविदों, कारोबारियों, जन अधिकारियों और सामुदायिक नेताओं को भारत सरकार की ओर से इंटरनेशनल हिंदी केंद्र के लिए समर्थन का विश्वास दिया है।

सम्मेलन आयोजित करने वाले हिंदी संगम फाउंडेशन के प्रबंधक ट्रस्टी अशोक ओझा ने कहा कि यह केंद्र हिंदी को एक वैश्विक भाषा के रूप में प्रोत्साहित करने पर आधारित शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के जीवंत केंद्र के रूप में काम करेगा। केंद्र के लिए धन एकत्रित करने के काम में अपने सहयोग का विश्वास दिलाते हुए मुले ने बोला है कि हिंदी सेंटर जल्दी ही एक हकीकत बनेगा, जहां आदान-प्रदान कार्यक्रमम समेत हिंदी सीखने से जुड़ी सभी शैक्षणिक गतिविधियां और भारत के साथ साझा स्कीमों को एक ही छत के नीचे कामयाबी दी गई है। इस केंद्र से जुड़ा खाका पेश करते हुए हिंदी संगम फाउंडेशन के अधिकारी वेद चौधरी ने बोला है कि मध्य न्यू जर्सी में इस केंद्र को एक स्वतंत्र यूनिट की तरह शुरू करने में करीब 40 लाख डॉलर की आवश्यकता होगी। रगर्स भी यहीं स्थित है।

हिंदी संगम बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ द्वारा इस केंद्र के सलाहाकार बोर्ड में अमेरिका, कैरेबियाई द्वीपों और दक्षिण अमेरिकी देशों से हिंदी के समर्थकों को नामित किया जाएगा। इस सम्मेलन में 250 से ज्यादा प्रतिनिधि आए थे और रगर्स के डिपार्टमेंट ऑफ अफ्रीकन, मिडल ईस्टर्न एंड साउथ एशियन लैंग्वेजेज एंड लिटरेचर्स और साउथ एशिया स्टडीज प्रोग्राम इस सम्मेलन के सह-मेजबान थे।

इस सम्मेलन की थीम थी- हिंदी की विस्तृत होती दुनिया: संभावनाएं और चुनौतियां। यह थीम भारत के भीतर और बाहर हिंदी भाषा और साहित्य शिक्षा की गुणवत्ता को विस्तार देने के लिए निजी एवं सार्वजनिक भाषाई शिक्षा और सरकार के बीच समन्वित प्रयासों की बढ़ती जरूरत की बानगी पेश करती है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही हमारा मूल विचार



सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही हमारा मूल विचार है

लेखक- हृदयनारायण दीक्षित
http://sumansourabh.blogspot.in/2009/01/blog-post_15.html
हिन्दुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर राष्ट्रीय अन्तर्मंथन जारी है। भारत के राष्ट्रजीवन के लिए यह देवासुर संग्राम जैसा सागरमंथन है। भारत सनातन काल से तत्तव खोजी, सत्य अभीप्सु राष्ट्र है। तर्क, प्रतितर्क, विचार विमर्श हमारे राष्ट्रजीवन की सनातन परम्परा है। तर्क-प्रतितर्क की लोकतंत्री व्यवस्था को जन्म देने का स्वयंभू दावा करने वाला पश्चिमी जगत भी जानता है कि लोकतंत्र भारत का सहज स्वभाव है। पश्चिम का जनतंत्र राजतंत्र की प्रतिक्रिया से आया। भारतीय लोकतंत्र भारत का सहज स्वभाव है और स्वभाव हिन्दुत्व का प्राण है।

आज हिन्दुत्व के आयामों पर मजेदार बहस जारी है। मसलन अटल बिहारी वाजपेयी का हिन्दुत्व क्या है? लालकृष्ण आडवाणी और वाजपेयी के हिन्दुत्व में फर्क क्या है? नरेन्द्र मोदी और विनय कटियार के हिन्दुत्व की दिशा क्या है? क्या अशोक सिंहल और प्रवीण तोगड़िया का हिन्दुत्व किसी और तरह का है? यो प्रागदर्शन में बहस के ये आयाम राजनीतिक हैं। पर हमारे राष्ट्रजीवन में ऐसी बहसें सनातन काल से जारी हैं। महात्मा गांधी, वीर सावरकर, योगी अरविन्द और लोकमान्य तिलक के भी हिन्दुत्व दृष्टिकोण अपने समय अलग-अलग दिखाई पड़े रहे थे। हिन्दुत्व पर डॉ। राममनोहर लोहिया और पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय के भी दृष्टिकोण राष्ट्रीय बहस का विषय बने।

भारतीय दर्शन के इसके भी पहले के सम्मानित कालखण्ड में उपनिषद प्रतीतियों और ऋग्वैदिक मंत्र अभिव्यक्तियों के बीच भी इसी किस्म की इन्द्रधानुषी रंग वाली भिन्नताएं रही। द्वैत, विशिष्ट द्वैत और अद्वैत जैसी प्रतीतियां उगीं। वर्ण व्यवस्था से देखें तो अब्राह्मण ऋषि ऐतरेय ने ऐतरेय ब्राह्मण गाया। अब्राह्मण ऋषि विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र रचा। अब्राह्मण ऋषि व्यास ने महाभारत गीता की सर्जना की। अब्राह्मण ऋषि वाल्मीकी ने रामायण की रचना की। यों ब्राह्मण कभी जाति नहीं थे। समग्रता/टोटेलिटी/सत्य के पर्याय ''ब्रह्म'' नामक तत्व के अध्‍ययन की एक शाखा का नाम ब्राह्मण था। इसी शाखा के ग्रंथ ''ब्राह्मण'' कहलाये। सो हिन्दू प्रतीति की दृष्टि से ऐतरेय, विश्वामित्र व्यास और रविदास ब्राह्मण थे।

भारतीय समाज व्यवस्था के विकार के चलते इन्हें शूद्र कहने की हाहाहूती गलती हुई। सो हिन्दुत्व का सीधा मतलब है तर्क-प्रतितर्क सोच-विचार और सतत् प्रवाही बहस का अनुसंधानपरक अधिष्ठान। डॉ। अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म पर बेशक उत्तेजक सवाल उठाये। उनके सवाल हिन्दू समाज की जाति-वर्ण आधारित व्यवस्था की सहज पीड़ा से आये। लेकिन यह हिन्दुत्व का कमाल है कि उसकी ही कोख से डॉ. अम्बेडकर जैसा अग्निधर्मा विद्रोही पैदा हुआ। उसी की कोख से बुध्द जैसा परिपूर्ण ज्ञानी। बुध्द ने भी हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज की तमाम मान्यताओं को काटा। स्वामी दयानन्द ने भी। लेकिन सारा कमाल हिन्दुत्व का है। यहां ज्ञान की यात्रा लगातार जारी ही रहती है। विश्व ज्ञान का प्राचीनतम एनसाइक्लोपीडिया, ऋग्वेद कहता है ''हे परमात्मा, श्रेष्ठ विचार सभी दिशाओं से हमारे पास आयें।'' एतदर्थ हिन्दुत्व की सनातन धारा में सद्विचारों के स्वागत की परम्परा है। हिन्दू आदिकाल से सत्य, शिव और सुन्दर की शोधा यात्रा पर है।

इस्लाम में तर्क असंभव है। सांस्कृतिक धारा के कारण भारत तर्क की धरती है। इस्लाम अव्वल से आखिर तक सब कुछ जान लेने और अपनी ही जानकारियों को श्रेष्ठ मानने का दावा करता है। इस्लाम असहमति पर आक्रमक रहा है। हिन्दुत्व की इस धरती पर ज्ञान की यात्रा और नित्य नई उपलब्धियों के वसंतोत्सव खिलते ही रहते हैं। इस्लाम में डॉ। अम्बेडकर जैसा आग्नेय व्यक्तित्व पैदा नहीं हो सका। चार्वाक जैसा मनमौजी ऋषि समूह भी इस्लाम नहीं पैदा कर सका। स्वामी दयानन्द जैसा रूढ़ि विरोधी महान संत भी इस्लाम नहीं दे सका। ऐसे तमाम सात्विक क्रांतिकारी इस्लाम दे भी नहीं सकता। क्योंकि इस्लाम में तर्क, विचार, शोध, मनन और सतत् चिंतन की परम्परा नहीं है। इस्लाम में तर्क परम्परा होती तो निश्चित ही सलमान रूश्दी, तसलीमा नसरीन, पाकिस्तान लेखिका तहमीना दुर्रानी जैसे प्रख्यात विद्वानों के तर्क भी आदरपूर्वक सुने जाते। तब मौलाना बुखारी हमीद दलवाइ, शाहवल्लीउल्ला, शाहनवाज हुसैन और मुख्तार अब्बास नकवी के इस्लामी दृष्टिकोण का मूल्यांकन होता। जिन्ना और अब्दुल कलाम आजाद के इस्लाम को भी अलग-अलग व्याख्या का विषय बनाया जाता।

हिन्दू जीवन रचना और हिन्दुत्व की अवधारणा का कमाल है कि हिन्दुत्व की सनातन बहस में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी हिस्सा लिया। सुप्रीम कोर्ट ने बाकायदा सुनवाई की। दुनिया के इतिहास में किसी पंथ, मजहब, रिलीजन या सेक्ट को किसी भी देश के न्यायालय में कभी प्रश्नगत नहीं किया गया। क्या विश्व के किसी भी देश की अदालत ''इस्लाम क्या है'' जैसे आस्था भरा प्रश्न पर कड़वी दलीलें सुन सकती है? हिन्दू बहुसंख्यक इस हिन्दुस्थान की सबसे बड़ी अदालत ने हिन्दुत्व के पक्ष और प्रतिपक्ष में तीखे पैने तर्क सुने। सर्वोच्च न्यायालय ने 11 दिसम्बर 1995 को तिरसठ पेजी फैसले में कहा कि हिन्दुत्व का अर्थ है ''भारतीय जन की जीवन शैली।'' यही जीवन शैली हमारी संस्कृति है और हमारे सांस्कृतिक राष्ट्र की मुख्यधारा।

भारतीय लोगों की इस तार्किक जीवन शैली का विकास अचानक नहीं हुआ। हिन्दू संस्कृति की सदा प्रवाहित गंगा से ही इस परिवर्तनकामी, सदा गतिशील और प्रगतिशील राष्ट्रीय राष्ट्रजीवन का विकास हुआ। यूरोप में राष्ट्र की कोई जन्मतिथि नहीं है। सृष्टि की पहली किरण के साथ प्रज्ञा रूपी मन (मनन-सोच विचार) जन्मा। यही प्रज्ञा प्राण ही हिन्दुत्व है। पवित्र हिन्दू भूमि इस प्रज्ञा की धारक है। हिन्दुत्व गंगोत्तरी है। इसी का गंगा-प्रवाह हिन्दू संस्कृति है। हिन्दू संस्कृति की यह गंगा कूड़ा करकट किनारे करती रहती है, पर अमृत जल का प्रवाह जारी रहता है। सो संस्कृति ही इस राष्ट्र का प्राण है। संस्कृति ही इस राष्ट्र की धारक है। संस्कृति ही इसकी नियामक है। सो यही भारतीय राष्ट्रीयता है। भारत राष्ट्र सदा से एक भू-सांस्कृतिक अवधाारणा है। राजनीतिक इकाई नहीं।

सवाल यह है कि भारत का प्राण हिन्दू संस्कृति नहीं तो आखिरकार है क्या? सेकुलरिज्म हमारी राष्ट्रीयता नहीं है। यह हमारी संस्कृति का एक आयाम है। हिन्दू संस्कृति स्वभाव से ही ''आध्‍यात्मिक पंथनिरपेक्ष'' है। राजनीति और राज्य व्यवस्था में पंथनिरपेक्षता की वकालत करना आसान है। हिन्दू दर्शन अध्‍यात्म में भी पंथनिरपेक्ष और तार्किक है। वैदिक काल के ऋषि तर्क करते थे और उपनिषद काल तर्क काल है ही। फिर तो बहस का ही वातायन बना। सूत-शौनक, शंकर-पार्वती, यम-नचिकेता, अष्टावक-जनक, अर्जुन-कृष्ण और तुलसी की रामकथा में काक भुसुण्डी और गरूड़ जैसे पक्षी भी बहस करते हैं। इसी पंथनिरपेक्षी-आध्‍यात्मिकता और सदा लोकतंत्री जन-गण-मन व्यवस्था वाली सनातन संस्कृति से यह राष्ट्र है। इसलिए सांस्कृतिक राष्ट्र भाव ही भारत का मूल विचार है।

पं। दीनदयाल उपाध्‍याय लिखते हैं, ''राष्ट्र केवल भौतिक निकाय नहीं हुआ करता। राष्ट्र में रहने वाले लोगों के अंत:करण में अपनी भूमि के प्रति श्रध्दा की भावना का होना राष्ट्रीयता की पहली आवश्यकता है।''स्वराष्ट्र के प्रति पुलक स्वाभाविक है। क्योंकि स्व हमारा स्वभाव है। हमारे स्व का आदर्श हमारी संस्कृति है। स्वदेश और विदेश में आधारभूत फर्क है। स्वदेश में आत्मीयता है। विदेश में परायापन है। यह तत्व राष्ट्रजीवन के अंतस् में सहज प्रवाहित रहते हैं। त्याग, प्रेम, बंधुत्व हमारा स्वभाव है। यह स्वसंस्कृति से आया। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चार पुरूषार्थ हमारे राष्ट्रजीवन में रचे बसे हैं। भारत ने भोग की जगह त्याग अपनाया। भोग रोग है। त्याग योग है। भारत उपयोग पर धयान देता है। पश्चिम उपभोग पर।साधारण सा प्रतीत होने वाला एक असाधारण प्रश्न भारत के लोकजीवन में अक्सर उठता है, किसी भी अनुष्ठान की शुरूआत का उत्सव कैसे प्रारम्भ करे? दारू के गिलासों को टकराकर चियर्स बोलते हुए या एक नारियल फोड़कर? समष्टि/भगवत्ता के प्रति अनुग्राही होते हुए हाथ जोड़कर या सीना तानकर? उत्सव धर्म ज्योति प्रतीक दीपक को जलाकर अपना कोई अनुष्ठान प्रारम्भ करे? या कैंची से फीता काटकर? दीपक प्रज्ज्वलन और नारियल का समर्पण भारत के सनातन मन को आह्लाद देता है। यह भारत के सनातन चित्त की सत्य, शिव और सुंदरतम सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां है। श्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपने एक आलेख (जेन्टिलमैन 13 जनवरी- 97) में उक्त सवाल उठाते हुए ''सेकुलरिज्म'' की अच्छी खबर ली थी। आलेख में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के बाद होने वाले जलसे में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद की उपस्थिति का विवरण देते हुए श्री आडवाणी ने लिखा सेकुलरिज्म से अभिभूत पं. नेहरू को राष्ट्रपति का ऐसे कार्यक्रम के लिए समय देना नागवार लगा। इस्लामी आक्रांताओं ने भारत के हजारों मंदिर हिन्दू संस्कृति को नष्ट करने की खातिर ही ढहाये थे। मंदिर भारतीय संस्कृति की शिखर अभिव्यक्तियां ही तो हैं। मंदिर और मस्जिद एक नहीं है। दोनों के अलग-अलग मतलब है। अलग-अलग मकसद। लेकिन हिन्दुत्व के अधिष्ठान में बहस है। बाकी में नहीं। हिन्दुत्व को हिन्दुज्म कहने वाले गलती पर है। इज्म विचार होता है। हिन्दुत्व विचार नहीं है। यह समग्रता का स्वीकार है। अंग्रेजी अनुवाद की त्रुटिवश हिन्दुत्व को हिन्दुज्म कहा जाता है। साजिशन इसे उग्र या फंडामैंटलिस्ट जैसी संज्ञाएं दी जा रही है। इसे हिन्दूनेस कहना ठीक होगा। इसी राष्ट्रीय अधिष्ठान के दृष्टिकोण से हिन्दुत्व पर जारी बहस का स्वागत है। ध्‍यान रहे इस बहस में सबका आदर है। तर्क चलें। विचार और विमर्श चले। अब कुतर्क नहीं चल सकते। क्योंकि हिन्दुत्व के उपासक जाग गये हैं। बेशक बहस जारी रहे। इसी में से अपने इस सांस्कृतिक राष्ट्र का भविष्य खिलेगा।(लेखक प्रसिध्द विचारक हैं)
Posted 15th January 2009 by डॉ. सौरभ मालवीय

इस्लाम के सम्बन्ध में स्वयं बाबा साहब अम्बेडकर के विचार



इस्लाम के सम्बन्ध में स्वयं बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के विचार

Aug 21 Posted by Fan of Agniveer

(सभी उद्धरण बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्‌मय, खंड १५-‘पाकिस्तान और भारत के विभाजन, २००० से लिए गए हैं)

Posted by डॉ. जय प्रकाश गुप्त
https://agniveerfan.wordpress.com/2011/08/21/muslim-dalit/

मुस्लिमों के कथित दलित-प्रेम का भंडाफोड ..इस्लाम के सम्बन्ध में स्वयं बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के विचार —

१. हिन्दू काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं-”मुसलमानों के लिए हिन्दू काफ़िर हैं, और एक काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जन्मा होता है, और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नहीं होती। इसलिए जिस देश में क़ाफिरों का शासनहो, वह मुसलमानों के लिए दार-उल-हर्ब है ऐसी सति में यह साबित करने के लिए और सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिन्दू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे।” (पृ. ३०४)

२. मुस्लिम भ्रातृभाव केवल मुसलमानों के लिए-”इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है, जो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच जो भेद यह करता है, वह बिल्कुल मूर्त और स्पष्ट है। इस्लाम का भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृत्व है। यह बंधुत्व है, परन्तु इसका लाभ अपने ही निकाय के लोगों तक सीमित है और जो इस निकाय से बाहर हैं, उनके लिए इसमें सिर्फ घृणा ओर शत्रुता ही है। इस्लाम का दूसरा अवगुण यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है और स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाता, क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा, जिस देश में वे रहते हैं, उसके प्रति नहीं होती, बल्कि वह उस धार्मिक विश्वास पर निर्भर करती है, जिसका कि वे एक हिस्सा है। एक मुसलमान के लिए इसके विपरीत या उल्टे सोचना अत्यन्त दुष्कर है। जहाँ कहीं इस्लाम का शासन हैं, वहीं उसका अपना विश्वासहै। दूसरे शब्दों में, इस्लाम एक सच्चे मुसलमानों को भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट सम्बन्धी मानने की इज़ाजत नहीं देता। सम्भवतः यही वजह थी कि मौलाना मुहम्मद अली जैसे एक महान भारतीय, परन्तु सच्चे मुसलमान ने, अपने, शरीर को हिन्दुस्तान की बजाए येरूसलम में दफनाया जाना अधिक पसंद किया।”

३. एक साम्प्रदायिक और राष्ट्रीय मुसलमान में अन्तर देख पाना मुश्किल-”लीग को बनाने वाले साम्प्रदायिक मुसलमानों और राष्ट्रवादी मुसलमानों के अन्तर को समझना कठिन है। यह अत्यन्त संदिग्ध है कि राष्ट्रवादी मुसलमान किसी वास्तविक जातीय भावना, लक्ष्य तथा नीति से कांग्रेस के साथ रहते हैं, जिसके फलस्वरूप वे मुस्लिम लीग् से पृथक पहचाने जाते हैं। यह कहा जाता है कि वास्तव में अधिकांश कांग्रेसजनों की धारण है कि इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है, और कांग्रेस के अन्दर राष्ट्रवादी मुसलमानों की स्थिति साम्प्रदायिक मुसलमानों की सेना की एक चौकी की तरह है। यह धारणा असत्य प्रतीत नहीं होती। जब कोई व्यक्ति इस बात को याद करता है कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के नेता स्वर्गीय डॉ. अंसारी ने साम्प्रदायिक निर्णय का विरोध करने से इंकार किया था, यद्यपिकांग्रेस और राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा पारित प्रस्ताव का घोर विरोध होने पर भी मुसलमानों को पृथक निर्वाचन उपलब्ध हुआ।” (पृ. ४१४-४१५)

४. भारत में इस्लाम के बीज मुस्लिम आक्रांताओं ने बोए-”मुस्लिम आक्रांता निस्संदेह हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा के गीत गाते हुए आए थे। परन्तु वे घृणा का वह गीत गाकर और मार्ग में कुछ मंदिरों को आग लगा कर ही वापस नहीं लौटे। ऐसा होता तो यह वरदान माना जाता। वे ऐसे नकारात्मक परिणाम मात्र से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इस्लाम का पौधा लगाते हुए एक सकारात्मक कार्य भी किया। इस पौधे का विकास भी उल्लेखनीय है। यह ग्रीष्म में रोपा गया कोई पौधा नहीं है। यह तो ओक (बांज) वृक्ष की तरह विशाल और सुदृढ़ है। उत्तरी भारत में इसका सर्वाधिक सघन विकास हुआ है। एक के बाद हुए दूसरे हमले ने इसे अन्यत्र कहीं को भी अपेक्षा अपनी ‘गाद’ से अधिक भरा है और उन्होंने निष्ठावान मालियों के तुल्य इसमें पानी देने का कार्य किया है। उत्तरी भारत में इसका विकास इतना सघन है कि हिन्दू और बौद्ध अवशेष झाड़ियों के समान होकर रह गए हैं; यहाँ तक कि सिखों की कुल्हाड़ी भी इस ओक (बांज) वृक्ष को काट कर नहीं गिरा सकी।” (पृ. ४९)

५. मुसलमानों की राजनीतिक दाँव-पेंच में गुंडागर्दी-”तीसरी बात, मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया जाना है। दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागिर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है।” (पृ. २६७)

६. हत्यारे धार्मिक शहीद-”महत्व की बात यह है कि धर्मांध मुसलमानों द्वारा कितने प्रमुख हिन्दुओं की हत्या की गई। मूल प्रश्न है उन लोगों के दृष्टिकोण का, जिन्होंने यह कत्ल किये। जहाँ कानून लागू किया जा सका, वहाँ हत्यारों को कानून के अनुसार सज़ा मिली; तथापि प्रमुख मुसलमानों ने इन अपराधियों की कभी निंदा नहीं की। इसके वपिरीत उन्हें ‘गाजी’ बताकर उनका स्वागत किया गया और उनके क्षमादान के लिए आन्दोलन शुरू कर दिए गए। इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण है लाहौर के बैरिस्टर मि. बरकत अली का, जिसने अब्दुल कयूम की ओर से अपील दायर की। वह तो यहाँ तक कह गया कि कयूम नाथूराम की हत्या का दोषी नहीं है, क्योंकि कुरान के कानून के अनुसार यह न्यायोचित है। मुसलमानों का यह दृष्टिकोण तो समझ में आता है, परन्तु जो बात समझ में नहीं आती, वह है श्री गांधी का दृष्टिकोण।”(पृ. १४७-१४८)

७. हिन्दू और मुसलमान दो विभिन्न प्रजातियां-”आध्याम्कि दृष्टि से हिन्दू और मुसलमान केवल ऐसे दो वर्ग या सम्प्रदाय नहीं हैं जैसे प्रोटेस्टेंट्‌स और कैथोलिक या शैव और वैष्णव, बल्कि वे तो दो अलग-अलग प्रजातियां हैं।” (पृ. १८५)

८. इस्लाम और जातिप्रथा-”जाति प्रथा को लीजिए। इस्लाम भ्रातृ-भाव की बात कहता है। हर व्यक्ति यही अनुमान लगाता है कि इस्लाम दास प्रथा और जाति प्रथा से मुक्त होगा। गुलामी के बारे में तो कहने की आवश्यकता ही नहीं। अब कानून यह समाप्त हो चुकी है। परन्तु जब यह विद्यमान थी, तो ज्यादातर समर्थन इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से ही मिलता था। कुरान में पैंगबर ने गुलामों के साथ उचित इस्लाम में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस अभिषाप के उन्मूलन के समर्थन में हो। जैसाकि सर डब्ल्यू. म्यूर ने स्पष्ट कहा है-

”….गुलाम या दासप्रथा समाप्त हो जाने में मुसलमानों का कोई हाथ नहीं है, क्योंकि जब इस प्रथा के बंधन ढीले करने का अवसर था, तब मुसलमानों ने उसको मजबूती से पकड़ लिया….. किसी मुसलमान पर यह दायित्व नहीं है कि वह अपने गुलामों को मुक्त कर दें…..”

”परन्तु गुलामी भले विदा हो गईहो, जाति तो मुसलमानों में क़ायम है। उदाहरण के लिए बंगाल के मुसलमानों की स्थिति को लिया जा सकता है। १९०१ के लिए बंगाल प्रांत के जनगणना अधीक्षक ने बंगाल के मुसलमानों के बारे में यह रोचक तथ्य दर्ज किए हैं :

”मुसलमानों का चार वर्गों-शेख, सैयद, मुग़ल और पठान-में परम्परागत विभाजन इस पांत (बंगाल) में प्रायः लागू नहीं है। मुसलमान दो मुखय सामाजिक विभाग मानते हैं-१. अशरफ अथवा शरु और २. अज़लफ। अशरफ से तात्पर्य है ‘कुलीन’, और इसमें विदेशियों के वंशज तथा ऊँची जाति के अधर्मांतरित हिन्दू शामिल हैं। शेष अन्य मुसलमान जिनमें व्यावसायिक वर्ग और निचली जातियों के धर्मांतरित शामिल हैं, उन्हें अज़लफ अर्थात्‌ नीचा अथवा निकृष्ट व्यक्ति माना जाता है। उन्हें कमीना अथवा इतर कमीन या रासिल, जो रिजाल का भ्रष्ट रूप है, ‘बेकार’ कहा जाता है। कुछ स्थानों पर एक तीसरा वर्ग ‘अरज़ल’ भी है, जिसमें आने वाले व्यक्ति सबसे नीच समझे जाते हैं। उनके साथ कोई भी अन्य मुसलमान मिलेगा-जुलेगा नहीं और न उन्हें मस्जिद और सार्वजनिक कब्रिस्तानों में प्रवेश करने दिया जाता है।

इन वर्गों में भी हिन्दुओं में प्रचलित जैसी सामाजिक वरीयताऔर जातियां हैं।

१. ‘अशरफ’ अथवा उच्च वर्ग के मुसलमान (प) सैयद, (पप) शेख, (पपप) पठान, (पअ) मुगल, (अ) मलिक और (अप) मिर्ज़ा।

२. ‘अज़लफ’ अथवा निम्न वर्ग के मुसलमान

(i) खेती करने वाले शेख और अन्य वे लोग जो मूलतः हिन्दू थे, किन्तु किसी बुद्धिजीवी वर्ग से सम्बन्धित नहीं हैं और जिन्हें अशरफ समुदाय, अर्थात्‌ पिराली और ठकराई आदि में प्रवेश नहीं मिला है।

( ii) दर्जी, जुलाहा, फकीर और रंगरेज।

(iii) बाढ़ी, भटियारा, चिक, चूड़ीहार, दाई, धावा, धुनिया, गड्‌डी, कलाल, कसाई, कुला, कुंजरा, लहेरी, माहीफरोश, मल्लाह, नालिया, निकारी।

(iv) अब्दाल, बाको, बेडिया, भाट, चंबा, डफाली, धोबी, हज्जाम, मुचो, नगारची, नट, पनवाड़िया, मदारिया, तुन्तिया।

३. ‘अरजल’ अथवा निकृष्ट वर्ग

भानार, हलालखोदर, हिजड़ा, कसंबी, लालबेगी, मोगता, मेहतर।

जनगणना अधीक्षक ने मुस्लिम सामाजिक व्यवस्था के एक और पक्ष का भी उल्लेख किया है। वह है ‘पंचायत प्रणाली’ का प्रचलन। वह बताते हैं :

”पंचायत का प्राधिकार सामाजिक तथा व्यापार सम्बन्धी मामलों तक व्याप्त है और……..अन्य समुदायों के लोगों से विवाह एक ऐसा अपराध है, जिस पर शासी निकायकार्यवाही करता है। परिणामत: ये वर्ग भी हिन्दू जातियों के समान ही प्रायः कठोर संगोती हैं, अंतर-विवाह पर रोक ऊंची जातियों से लेकर नीची जातियों तक लागू है। उदाहरणतः कोई घूमा अपनी ही जाति अर्थात्‌ घूमा में ही विवाह कर सकता है। यदि इस नियम की अवहेलना की जाती है तो ऐसा करने वाले को तत्काल पंचायत के समक्ष पेश किया जाता है। एक जाति का कोई भी व्यक्ति आसानी से किसी दूसरी जाति में प्रवेश नहीं ले पाता और उसे अपनी उसी जाति का नाम कायम रखना पड़ता है, जिसमें उसने जन्म लिया है। यदि वह अपना लेता है, तब भी उसे उसी समुदाय का माना जाता है, जिसमें कि उसने जन्म लिया था….. हजारों जुलाहे कसाई का धंधा अपना चुके हैं, किन्तु वे अब भी जुलाहे ही कहे जाते हैं।”

इसी तरह के तथ्य अन्य भारतीय प्रान्तों के बारे में भी वहाँ की जनगणना रिपोर्टों से वे लोग एकत्रित कर सकते हैं, जो उनका उल्लेख करना चाहते हों। परन्तु बंगाल के तयि ही यह दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं कि मुसलमानों में जाति प्राणी ही नहीं, छुआछूत भी प्रचलित है।” (पृ. २२१-२२३)

९. इस्लामी कानून समाज-सुधार के विरोधी-”मुसलमानों में इन बुराइयों का होना दुखदहैं। किन्तु उससे भी अधिक दुखद तथ्य यह है कि भारत के मुसलमानों में समाज सुधार का ऐसा कोई संगठित आन्दोलन नहीं उभरा जो इन बुराईयों का सफलतापूर्वक उन्मूलन कर सके। हिन्दुओं में भी अनेक सामाजिक बुराईयां हैं। परन्तु सन्तोषजनक बात यह है कि उनमें से अनेक इनकी विद्यमानता के प्रति सजग हैं और उनमें से कुछ उन बुराईयों के उन्मूलन हेतु सक्रिय तौर पर आन्दोलन भी चला रहे हैं। दूसरी ओर, मुसलमान यह महसूस ही नहीं करते कि ये बुराईयां हैं। परिणामतः वे उनके निवारण हेतु सक्रियता भी नहीं दर्शाते। इसके विपरीत, वे अपनी मौजूदा प्रथाओं में किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं। यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों ने केन्द्रीय असेंबली में १९३० में पेश किए गए बाल विवाह विरोधी विधेयक का भी विरोध किया था, जिसमें लड़की की विवाह-योग्य आयु १४ वर्ष् और लड़के की १८ वर्ष करने का प्रावधान था। मुसलमानों ने इस विधेयक का विरोध इस आधार पर किया कि ऐसा किया जाना मुस्लिम धर्मग्रन्थ द्वारा निर्धारित कानून के विरुद्ध होगा। उन्होंने इस विधेयक का हर चरण पर विरोध ही नहीं किया, बल्कि जब यह कानून बन गया तो उसके खिलाफ सविनय अवज्ञाअभियान भी छेड़ा। सौभाग्य से उक्त अधिनियम के विरुद्ध मुसलमानों द्वारा छोड़ा गया वह अभ्यिान फेल नहीं हो पाया, और उन्हीं दिनों कांग्रेस द्वारा चलाए गए सविनय अवज्ञा आन्दोलन में समा गया। परन्तु उस अभियान से यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि मुसलमान समाज सुधार के कितने प्रबल विरोधी हैं।” (पृ. २२६)

१०. मुस्लिम राजनीतिज्ञों द्वारा धर्मनिरपेक्षता का विरोध-”मुस्लिम राजनीतिज्ञ जीवन के धर्मनिरपेक्ष पहलुओं को अपनी राजनीति का आधार नहीं मानते, क्योंकि उने लिए इसका अर्थ हिन्दुओं के विरुद्ध अपने संघर्ष में अपने समुदाय को कमजोर करना ही है। गरीब मुसलमान धनियों से इंसाु पाने के लिए गरीब हिन्दुओं के साथ नहीं मिलेंगे। मुस्लिम जोतदार जमींदारों के अन्याय को रोकने के लिए अपनी ही श्रेणी के हिन्दुओं के साथ एकजुट नहीं होंगे। पूंजीवाद के खिलाफ श्रमिक के संघर्ष में मुस्लिम श्रमिक हिन्दू श्रमिकों के साथ शामिल नहीं होंगे। क्यों ? उत्तर बड़ा सरल है। गरीब मुसलमान यह सोचता है कि यदि वह धनी के खिलाफ गरीबों के संघर्ष में शामिल होता है तो उसे एक धनी मुसलमान से भी टकराना पड़ेगा। मुस्लिम जोतदार यह महसूस करते हैं कि यदि वे जमींदारों के खिलाफ अभियान में योगदान करते हैं तो उन्हें एक मुस्लिम जमींदार के खिलाफ भी संघर्ष करना पड़ सकता है। मुसलमान मजदूर यह सोचता है कि यदि वह पूंजीपति के खिलाफ श्रमिक के संघर्ष में सहभागी बना तो वह मुस्लिम मिल-मालिक की भावाओं को आघात पहुंचाएगा। वह इस बारे में सजग हैं कि किसी धनी मुस्लिम, मुस्लिम ज़मींदार अथवा मुस्लिम मिल-मालिक को आघात पहुंचाना मुस्लिम समुदाय को हानि पहुंचाना है और ऐसा करने का तात्पर्य हिन्दू समुदाय के विरुद्ध मुसलमानों के संघर्ष को कमजोर करना ही होगा।” (पृ. २२९-२३०)

११. मुस्लिम कानूनों के अनुसार भरत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती-”मुस्लिम धर्म के सिद्धान्तों के अनुसार, विश्व दो हिस्सो में विभाजित है-दार-उल-इस्लाम तथा दार-उल-हर्ब। मुस्लिम शासित देश दार-उल-इस्लाम हैं। वह देश जिसमें मुसलमान सिर्फ रहते हैं, न कि उस पर शासन करते हैं, दार-उल-हर्ब है। मुस्लिम धार्मिक कानून का ऐसा होने के कारण भारत हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों की मातृभूमि नहीं हो सकती है। यह मुसलमानों की धरती हो सकती है-किन्तु यह हिन्दुओं और मुसलमानों की धरती, जिसमें दोनोंसमानता से रहें, नहीं हो सकती। फिर, जब इस पर मुसलमानों का शासन होगा तो यह मुसलमानों की धरती हो सकती है। इस समय यह देश गैर-मुस्लिम सत्ता के प्राधिकार के अन्तर्गत हैं, इसलिए मुसलमानों की धरती नहीं हो सकती। यह देश दार-उल-इस्लाम होने की बजाय दार-उल-हर्ब बन जाताप है। हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि यह दृष्टिकोण केवल शास्त्रीय है। यह सिद्धान्त मुसलमानों को प्रभावित करने में बहुत कारगर कारण हो सकता है।” (पृ. २९६-२९७)

१२. दार-उल-हर्व भारत को दार-उल-इस्लाम बनाने के लिए जिहाद-”यह उल्लेखनीय है कि जो मुसलमान अपने आपको दार-उल-हर्ब में पाते हैं, उनके बचाव के लिए हिजरत ही उपाय नहीं हैं मुस्लिम धार्मिक कानून की दूसरी आज्ञा जिहाद (धर्म युद्ध) है, जिसके तहत हर मुसलमान शासक का यह कर्त्तव्य हो जाता है कि इस्लाम के शासन का तब तक विस्तार करता रहे, जब तक सारी दुनिया मुसलमानों के नियंत्रण में नहीं आ जाती। संसार के दो खेमों में बंटने की वजह से सारे देश या दो दार-उल-इस्लाम (इस्लाम का घर) या दार-उल-हर्ब (युद्ध का घर) की श्रेणी में आते हैं। तकनीकी तौर पर हर मुस्लिम शासक का, जो इसके लिए सक्षम है, कर्त्तव्य है कि वह दार-उल-हब्र कोदार-उल-इस्लाम में बदल दे; और भारत में जिस तरह मुसलमानों के हिज़रत का मार्ग अपनाने के उदाहरण हैं, वहाँ ऐसेस भी उदाहरण हैं कि उन्होंने जिहाद की घोषणा करने में संकोच नहीं किया।”

”तथ्य यह है कि भारत, चाहे एक मात्र मुस्लिम शासन के अधीन न हो, दार-उल-हर्ब है, और इस्लामी सिद्धान्तों के अनुसार मुसलमानों द्वारा जिहाद की घोषणा करना न्यायसंगत है। वे जिहाद की घोषणा ही नहीं कर सकते, बल्कि उसकी सफलता के लिए विदेशी मुस्लिम शक्ति की मदद भी ले सकते हैं, और यदि विदेशी मुस्लिम शक्ति जिहाद की घोषणा करना चाहती है तो उसकी सफलता के लिए सहायता दे सकते हैं।” (पृ. २९७-२९८)

१३. हिन्दू-मुस्लिम एकता असफल क्यों रही ?-”हिन्दू-मुस्लिम एकता की विफलता का मुखय कारण इस अहसास का न होना है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जो भिन्नताएं हैं, वे मात्र भिन्नताएं ही नहीं हैं, और उनके बीच मनमुटाव की भावना सिर्फ भौतिक कारणों से ही नहीं हैं इस विभिन्नता का स्रोत ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक दुर्भावना है, और राजनीतिक दुर्भावना तो मात्र प्रतिबिंब है। ये सारी बातें असंतोष का दरिया बना लेती हैं जिसका पोषण उन तमाम बातों से होता है जो बढ़ते-बढ़ते सामान्य धाराओं को आप्लावित करता चला जाता हैं दूसरे स्रोत से पानी की कोई भी धारा, चाहे वह कितनी भी पवित्र क्यों न हो, जब स्वयं उसमें आ मिलती है तो उसका रंग बदलने के बजाय वह स्वयं उस जैसी हो जाती हैं दुर्भावना का यह अवसाद, जो धारा में जमा हो गया हैं, अब बहुत पक्का और गहरा बन गया है। जब तक ये दुर्भावनाएं विद्यमान रहती हैं, तब तक हिन्दू और मुसलमानों के बीच एकता की अपेक्षा करना अस्वाभाविक है।” (पृ. ३३६)

१४. हिन्दू-मुस्लिम एकता असम्भव कार्य-”हिन्दू-मुस्लिम एकता की निरर्थकता को प्रगट करने के लिए मैं इन शब्दों से और कोई शबदावली नहीं रख सकता। अब तक हिन्दू-मुस्लिम एकता कम-से-कम दिखती तो थी, भले ही वह मृग मरीचिका ही क्यों न हो। आज तो न वह दिखती हे, और न ही मन में है। यहाँ तक कि अब तो गाांी ने भी इसकी आशा छोड़ दी है और शायद अब वह समझने लगे हैं कि यह एक असम्भव कार्य है।” (पृ. १७८)

१५. साम्प्रदायिक शान्ति के लिए अलपसंखयकों की अदला-बदली ही एक मात्र हल-”यह बात निश्चित है कि साम्प्रदायिक शांति स्थापित करने का टिकाऊ तरीका अल्पसंखयकों की अदला-बदली ही हैं।यदि यही बात है तो फिर वह व्यर्थ होगा कि हिन्दू और मुसलमान संरक्षण के ऐसे उपाय खोजने में लगे रहें जो इतने असुरक्षित पाए गए हैं। यदि यूनान, तुकी और बुल्गारिया जैसे सीमित साधनों वाले छोटे-छोटे देश भी यह काम पूरा कर सके तो यह मानने का कोई कारण नहीं है कि हिन्दुस्तानी ऐसा नहीं कर सकते। फिर यहाँ तो बहुत कम जनता को अदला-बदली करने की आवश्यकता पड़ेगी ओर चूंकि कुछ ही बाधाओं को दूर करना है। इसलिए साम्प्रदायिक शांति स्थापित करने के लिए एक निश्चित उपाय को न अपनाना अत्यन्त उपहासास्पद होगा।” (पृ. १०१)

१६. विभाजन के बाद भी अल्पसंखयक-बहुसंखयक की समस्या बनी ही रहेगी-”यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि पाकिस्तान बनने से हिन्दुस्तान साम्प्रदायिक समस्यासे मुक्त नहीं हो जाएगा। सीमाओं का पुनर्निर्धारण करके पाकिस्तान को तो एक सजातीय देश बनाया जा सकता हे, परन्तु हिन्दुस्तान तो एक मिश्रित देश बना ही रहेगा। मुसलमान समूचे हिन्दुस्तान में छितरे हुए हैं-यद्यपि वे मुखयतः शहरों और कस्बों में केंद्रित हैं। चाहे किसी भी ढंग से सीमांकन की कोशिश की जाए, उसे सजातीय देश नहीं बनायाजा सकता। हिन्दुस्तान को सजातीय देश बनाने काएकमात्र तरीका है, जनसंखया की अदला-बदली की व्यवस्था करना। यह अवश्य विचार कर लेना चाहिए कि जब तक ऐसा नहीं कियाजाएगा, हिन्दुस्तान में बहुसंखयक बनाम अल्पसंखयक की समस्या और हिन्दुस्तान की राजनीति में असंगति पहले की तरह बनी ही रहेगी।” (पृ. १०३)

१७. अल्पसंखयकों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक उपाय-”अब मैं अल्पसंखयकों की उस समस्या की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ जो सीमाओं के पुनः निर्धारण के उपरान्त भी पाकिस्तान में बनी रहेंगी। उनके हितों की रक्षा करने के दो तरीके हैं। सबसे पहले, अल्पसंखयकों के राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान में सुरक्षा उपाय प्रदान करने हैं। भारतीय के लिए यह एक सुपरिचित मामला है और इस बात पर विस्तार से विचार करना आवश्यक है।” (पृ. ३८५)

१८. अल्पसंखयकों की अदला-बदली-एक संभावित हल-”दूसरा तरीका है पाकिस्तान से हिन्दुस्तान में उनका स्थानान्तरणकरने की स्थिति पैदा करना। अधिकांश जनता इस समाधान को अधिक पसंद करती हे और वह पाकिस्तान की स्वीकृति के लिए तैयार और इच्छुक हो जाएगी, यदि यह प्रदर्शित किया जा से कि जनसंखया का आदान-प्रदान सम्भव है। परन्तु इसे वे होश उड़ा देने वालीऔर दुरूह समस्या समझते हैं। निस्संदेह यह एक आतंकित दिमाग की निशनी है। यदि मामले पर ठंडे और शांतिपूर्ण एंग से विचार किया जाए तो पता लग जाएगा कि यह समस्या न तो होश उड़ाने वाली है, और न दुरूह।” (पृ. ३८५)


प्रबल राष्ट्रवादी : भीमराव अम्बेडकर


प्रबल राष्ट्रवादी : भीमराव अम्बेडकर

प्रभात कुमार रॉय
(पूर्व प्रशासनिक अधिकारी)

बाबासाहेब डा.अम्बेडकर एक अत्यंत प्रखर देशभक्त और प्रबल राष्ट्रवादी थे। 23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने भारत का विभाजन करके पाकिस्तान निर्मित करने कै प्रस्ताव पारित किया था। इस प्रस्ताव के पश्चात बाबासाहेब डा.अम्बेडकर की एक पुस्तक ऑन पार्टिशन प्रकाशित हुई। इस प्रभावशाली और विचार उत्तेजक पुस्तक को पढ़कर ज्ञात होता है कि डा.अम्बेडकर कितने जबरदस्त राष्ट्रवादी थे। ऑन पार्टिशन के बाद डा.अम्बेडकर की पुस्तक थाट्स ऑन पाकिस्तान प्रकाशित हुई जिसने कि एक बार पुनः प्रखर देशभक्त के विचारों से अवगत कराया।  भारत की राजनीतिक एकता को मूर्तरुप देने का जैसा शानदार कार्य सरदार पटेल ने अंजाम दिया, उसी कोटि का अप्रतिम कार्य राष्ट्र की सामाजिक एकता को शक्तिशाली बनाने की खातिर डा.अम्बेडकर द्वारा किया गया। अपनी चेतना के उदय से अपनी जिंदगी के आखिरी पल तक इंसान-इंसान के मध्य भाईचारे का सूत्रपात करने और समानता की लहर प्रवाहित करने में डा.अम्बेडकर जुटे रहे। प्रजातंत्र और समानता उनके लिए पर्यायवाची शब्द कदाचित नहीं रहे। उनके अनुसार पूँजीवादी व्यवस्था के तहत मताधिकार का अधिकार उत्पीड़कों में से एक को चुन लेने का अधिकार मात्र है। वास्तविक आवश्यकता एक ऐसे समाज की संरचना करने की है, जिसके अंतर्गत शोषक और शोषित, उत्पीड़क और उत्पीड़ित वर्ग का फर्क स्वतः समाप्त हो जाए। ऐसे आर्थिक सामाजिक समत्व से परिपूर्ण समाज में प्रजातंत्र अपने वास्तविक रंग-रुप में प्रकट होगा। डा.अम्बेडकर ने व्यक्ति को समाज की वास्तविक इकाई माना और किसी धर्म-मजहब अथवा जाति को समाज की इकाई तसलीम नहीं किया।

     राष्ट्रवाद की उनकी अवधारणा में किसी तरह की संकीर्णता के लिए कदाचित कोई स्थान नहीं रहा। बाबासाहेब डा.अम्बेडकर ने कहा था कि मैं ब्राहम्णवाद का कट्टर विरोधी हूँ। किंतु मैं व्यक्तिगत तौर पर किसी ब्राहम्ण का विरोधी कदाचित नहीं हूँ। मानवता के समर्थक अनेक ब्राहम्ण मेरे व्यक्तिगत मित्र रहे। मेरी मान्यता है कि इंसान अपने गुणों ,ज्ञान, चिंतन-मनन और कर्मों से बड़ा अथवा छोटा होता है, न कि अपने कुल, जाति और जन्म के कारण से। डा.अम्बेडकर ने शिक्षित बनो का प्रबल उदघोष किया और सामाजिक एवं आर्थिक दासता के बरखिलाफ जोरदार जंग करने की पैरोकारी की। बाबासाहेब अम्बेडकर का नाम लेकर जातिवादी राजनीति करने कथित अम्बेडकरवादी, वस्तुतः डा.अम्बेडकर के विचारों के साथ विश्वासघात करने में जुटे हुए हैं। जो तत्व दलित राजनीति को संकीर्ण जातिवाद में उलझा देने पर आमादा रहे हैं, उनका बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों से कोई वास्ता नहीं है।

बाबासाहेब डा.अम्बेडकर ने हिंदू धर्म के अंदर विद्यमान जातिवाद का और सांप्रदायिकता का जितना प्रबल विरोध किया, वैसा प्रबल विरोध जंग ए आजादी के बहुत ही कम नेताओं ने किया। डा.अम्बेडकर राष्ट्रीय काँग्रेस की विचारधारा और कार्यशैली से सदैव असहमत बने रहे। उनके अनुसार काँग्रेस द्वारा बहुत ही कम कार्य अछूतों के लिए किया। महात्मा गाँधी और काँग्रेस के द्वारा अकारण ही राष्ट्र को खिलाफत आंदोलन में झोंक दिया गया। डा.अम्बेडकर का मानना था कि काँग्रेस के सांप्रदायिक तुष्टीकरण की नीति के कारण देश के बहुत नुकसान हुआ। डा.अम्बेडकर के अनुसार अंततोगत्वा देश का साम्प्रदायिक आधार पर घटित हुआ विभाजन, वस्तुतः काँग्रेस की साम्प्रदायिक तुष्टीकरण की कुनीति का तार्किक परिणाम था। थॉटस ऑन पाकिस्तान शीर्षक से एक पुस्तक डा.अम्बेडकर द्वारा 1945 में लिखी गई। इस पुस्तक में पुस्तक डा.अम्बेडकर ने मुस्लिम सांप्रदायिकता पर अत्यंत करारी चोट की। महात्मी गाँधी द्वारा स्वयं इस पुस्तक को एक श्रेष्ठ पुस्तक क़रार दिया गया। यह पुस्तक सामायिक होते हुए भी एक सार्वभौमिक महत्व की मानी गई।

डा.अम्बेडकर ने हिंदू जातिवादी व्यवस्था को ब्राहम्णवाद की गहन विकृति करार दिया। डा.अम्बेडकर ने कहा कि हमारे लिए रोटी–पानी का सवाल ईश्वर की आराधना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है। हम हिंदू धर्म में मानवीय समानता के पक्षधर है और चतुर्वणीय व्यवस्था को समूल नष्ट करना चाहते हैं। इस सबके बावजूद राष्ट्र की मूल सांस्कृतिक धारा से कदाचित पृथक नहीं होना चाहते। अपने जीवन के अंतिम काल में डा.अम्बेडकर ने हिंदू धर्म का परित्याग करके बौद्ध धर्म को अंगीकार किया तो उन्होने कहा था कि मैं तथागत को उनकी धरा पर पुनः स्थापित कर रहा हूं। घोर अपमान बर्दाश्त करते हुए भी डा.अम्बेडकर जीवन पर्यन्त भारतीय धर्म-संस्कृति में ही बने रहे और इसके अंदर सुधार के लिए प्रयत्नशील रहे।

मानवीय गरिमा-गौरव और आत्म सम्मान का प्रश्न डा.अम्बेडकर के लिए सर्वोपरि प्रश्न बना रहा। उन्होने कहा कि हमारा संघर्ष केवल सत्ता और धन-दौलत हासिल करने के लिए कदाचित नहीं है, वरन् मानवीय गुलामी को धवस्त करके संपूर्ण आज़ादी प्राप्त करने के लिए है। भारत के भविष्य को लेकर डा.अम्बेडकर सदैव चिंतित बने रहे। वह प्रयासरत रहे कि भारत विश्व पटल पर एकता, अखंडता और समता का प्रतीक बनकर उभरे। उन्होने बारम्बार कहा कि भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता और प्रजातंत्र की हिफ़ाजत करने के लिए अति-आवश्यक है कि सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में यथाशीघ्र समता और बराबरी को समुचित तौर पर समाहित किया जाए। भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि डा.अम्बेडकर के सपनों के भारत का निर्माण नहीं हो पाया। डा.अम्बेडकर की विरासत के दावेदारों को न तो भारत की एकता और अखंडता की कोई फिक्र नहीं  रही और नाहि  सामाजिक- आर्थिक समानता के ज्वलंत प्रश्न उनके ऐजेंडे में विद्यमान हैं। कथित अम्बेडकरवादी जातिय समीकरणों को भुनाकर येन-केन प्रकारेण सत्ता हासिल करने में जुटे रहते हैं। डा.अम्बेडकर की शानदार वैचारिक विरासत की तभी हिफाज़त हो सकती है, जबकि अम्बेडकरवादी भारतीय समाज के सबसे बदनुमा दाग़ जातिवाद को समूल नष्ट करने के संकल्प को कदाचित विस्मृत न करके भारतीय समाज को सामाजिक और आर्थिक तौर पर समतावादी बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो जाए। डा.अम्बेडकर ने कहा था कि दलितों तुम्हें अपनी दासता स्वयं ही समाप्त करनी है। दासता के खात्मे के  लिए दलितों को किसी ईश्वरीय शक्ति अथवा किसी महामानव पर निर्भर नहीं रहना है। आगामी दौर में दलित आंदोलन को नई ऐतिहासिक उचाईयों को छूना है और बाबासाहेब डा.अम्बेडकर के सपनों के भारत का निर्माण करना है, जिसमें जाँत-पांत, ऊंच-नीच, गरीबी-अमीरी के फर्क पूर्णतः समाप्त हो जाएगें। सांप्रदायिकता और धार्मिक-मजहबी संकीर्णता से पूरी तरह मुक्त अत्यंत शक्तिशाली भारत का निर्माण संभव हो सकेगा।

भीमराव अंम्बेडकर : राष्ट्रवादी चरित्र


राष्ट्रवादी चरित्र  डॉ भीमराव अंम्बेडकर

Manak Chand Maloo की Facebook से
तुम चाहते हो कि भारत कश्मीर की सीमाओं की रक्षा करे, सड़कें बनाए, अन्न की आपूर्ति करे और कश्मीर का दर्जा भारत के ही बराबर हो। और भारत सरकार के पास सीमित ताकत हो। भारतीयों के कश्मीर में कोई अधिकार न हों। मैं भारत का विधिमंत्री हूं। मुझे भारत के हितों की रक्षा करनी है। मैं तुम्हारे प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकता।' डॉ़ आंबेडकर के ये ठोस शब्द सुनकर शेख अब्दुल्ला का दिल बैठ गया। पंडित नेहरू ने अब्दुल्ला को तत्कालीन विधिमंत्री डॉ़ आंबेडकर के पास भेजा था ताकि धारा 370 के प्रस्ताव को हकीकत में बदला जा सके। शेख अब्दुल्ला ने बातचीत की विफलता की सूचना पं. नेहरू को दी तो नेहरू ने शेख को गोपाल स्वामी आयंगर के पास भेजा। आयंगर ने सरदार पटेल से सहायता की याचना की क्योंकि धारा 370 को नेहरू ने अपनी नाक का सवाल बना लिया था। आखिरकार नेहरू की जिद को रखते हुए धारा 370 के प्रस्ताव को पारित करा लिया गया। अपनी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद को आधार बना कर देश के महत्वपूर्ण फैसले करने वाले और नीतियों से ज्यादा व्यक्तित्वों को मान्यता देने वाले नेहरू लार्ड माउंटबेटन और शेख अब्दुल्ला के हाथों में खेल रहे थे। नेहरू की ये मित्रता कश्मीर पर बहुत भारी पड़ी। माउंटबेटन एक असफल कमांडर के रूप में ब्रिटेन लौटे जबकि अगस्त 1953 में शेख अब्दुल्ला की देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तारी हुई। राष्ट्रहित से जुड़े मामलांे पर नेहरू और डॉ़ आंबेडकर अक्सर विरोधी खेमों में दिखते रहे। हालांकि आने वाले समय ने बार-बार आंबेडकर को सही ठहराया। ऐसा क्यों हुआ? दरअसल वे नेहरू की तरह रूमानी नहीं थे। आंबेडकर व्यावहारिकता के कठोर धरातल पर तर्कशील मस्तिष्क के साथ सतर्क कदम बढ़ाने वाले व्यक्ति थे। साथ ही धुर राष्ट्रवादी थे। वे छवि के बंदी नहीं थे। वे तो ध्येय का परछांई की तरह पीछा करने वाले व्यक्ति थे।
स्वतंत्र भारत के साथ दुनिया के बहुत से देशों की सहानुभूति और शुभकामनाएं थीं। परंतु नेहरू जी के नेतृृत्व में भारत की विदेश नीति पर समाजवाद का ठप्पा और अव्यावहारिकता का ग्रहण लग गया। गुट निरपेक्षता के नाम पर हम हितनिरपेक्षता की राह पर बढ़ गए। नेहरू अपने समाजवादी और कम्युनिस्ट राष्ट्राध्यक्ष मित्रों की खुशामद के चक्कर में सदा पश्चिम विरोधी भंगिमा में दिखाई दे़ने लगे। जब भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता थाल में सजाकर भेंट की गई, तब घोर अव्यावहारिकता दिखाते हुए उन्होंने उसे चीन की ओर सरका दिया। डॉ़ आंबेडकर के लिए यह असहनीय था। उनके जीवनी लेखक खैरमोड़े ने उनकी वेदना को उन्हीं के शब्दों में बयान किया है 'भारत को आजादी मिली उस दिन विश्व के देशों से दोस्ती के संबंध थे और वे देश भारत का शुभ चाहते थे। लेकिन आज की स्थिति बिल्कुल विपरीत है। आज भारत का कोई सच्चा दोस्त नहीं है। सभी देश भारत के दुश्मन नहीं हैं, फिर भी भारत से बहुत नाराज हैं। भारत के हितों को वे नहीं देखते। इसका कारण है भारत की लचर विदेश नीति। भारत की कश्मीर के बारे में नीति, राष्ट्रसंघ में चीन के प्रवेश के बारे में जल्दबाजी और कोरियाई युद्घ के बारे में अनास्था के प्रति पिछले तीन वषोंर् में बचकानी नीति के कारण अन्य राष्ट्रों ने भारत की ओर ध्यान देना बंद कर दिया है।' नेहरू चीन के प्रेम में अंधे हो रहे थे। सरदार पटेल की लिखित चेतावनी (1950) पर उन्होंने कान देना भी जरूरी नहीं समझा। पहले उन्होंने तिब्बत पर चीन के स्वामित्व को स्वीकार कर तिब्बत राष्ट्र और भारत के सुरक्षा हितों दोनों की हत्या कर डाली। उसके बाद वे दुनिया में चीन के पोस्टर ब्वॉय बनकर घूमते रहे। इस पर बाबासाहेब ने सवाल उठाया-''चीन का प्रश्न लेकर हमारे संघर्ष करने का क्या कारण है? चीन अपनी लड़ाई लड़ने के लिए समर्थ है। कम्युनिस्ट चीन का समर्थन कर हम अमरीका को क्यों अपना दुश्मन बना रहे हैं?'' उन्होंने नेहरू से प्रश्न किया कि पंूजीवाद का विरोध करते हुए तानाशाही के समर्थन तक जाने की क्या आवश्यकता है? प्रश्न अत्यंत मार्मिक है। क्योंकि जिन नेहरू के सिर पर नेहरूवादी विचारक और वामपंथी लोकतंत्र को मजबूती देने का ताज सजाते आए है, उन्हीं नेहरू को न कभी चीन की बर्बर तानाशाही दिखाई पड़ी, न ही तिब्बतवासियों के मानवाधिकारों की चिंता हुई। वे माओ और चाउ एन लाइ के साथ कबूतर उड़ाते रहे, और माओ करोड़ों चीनियों और तिब्बतियों के खून से होली खेलता रहा। उन्हें चीन पर रत्ती भर विश्वास नहीं था जबकि नेहरू चीन के प्यार में दीवाने हुए जा रहे थे। पंचशील समझौते को लेकर उन्होंने नेहरू पर कटाक्ष किया- ''माओ का पंचशील नेहरू ने गंभीरता से लिया यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। पंचशील बौद्घ धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। माओ का पंचशील पर विश्वास होता तो उसके अपने देश के बौद्घ बंधुओं से उसका अलग बर्ताव होता। राजनीति में पंचशील का कोई काम नहीं है और कम्युनिस्ट राजनीति में तो बिल्कुल नहीं। सभी कम्युनिस्ट देश दो तत्वों को प्रमाण मानते हैं। पहला तत्व यह कि नैतिकता अस्थिर होती है, और दुनिया में नैतिकता कुछ नहीं होती। आज की नैतिकता कल की नैतिकता नहीं होती।'' नेहरू के दिवास्वप्नों का जवाब चीन ने भारत की पीठ में खंजर उतारकर दिया।
भारतीय विदेशनीति के कदम बहकते रहे, और आंबेडकर सावधान करते रहे। स्वेज नहर के निर्माण से भारत और यूरोप के बीच हजारों मील की दूरी घट गई। नेहरू के परम मित्र और मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने अंतर्राष्ट्रीय समुद्री परिवहन के इस मार्ग का राष्ट्रीयकरण कर दिया। विवाद बढ़ने पर अमरीका, इंग्लैण्ड और फ्रांस ने मिस्र पर हमला बोल दिया। नेहरू नासिर के साथ जा खड़े हुए। बाबासाहेब ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि भारत के विदेश व्यापार में इतना महत्व रखने वाली स्वेज नहर, किसी एक देश की नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण में होनी चाहिए। उनका कहना था कि कल यदि मिस्र और भारत में शत्रुता हो जाती है तब भारत के व्यापार हितों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। कम्युनिज्म के अर्थशास्त्र को उन्होंने कभी गंभीरता से नहीं लिया परन्तु वामपंथियों की समाज विभाजनकारी और राष्ट्रघाती नीतियों के कारण बाबासाहेब उस ओर विशेष सतर्कता के हिमायती थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि वंचित वर्ग की समस्याओं को सुलझाने के नाम पर वामपंथी उन्हें अपनी हिंसक क्रांति का चारा बना सकते हैं। इस बारे में उनकी सावधानी का पता उनके इस वाक्य से चलता है कि 'वंचित हिन्दू समाज और कम्युनिज्म के बीच में आंबेडकर बाधा हैं।' संभवत: यह भी एक कारण था कि बौद्घ धम्म की शरण गहकर उन्होंने सामाजिक न्याय की लड़ाई को आध्यात्मिकता की शक्ति प्रदान की और उसके पदार्थवादी कम्युनिस्ट सोच की ओर जाने की संभावना ही समाप्त कर दी।
1948 से 1951 और 1951 से 1954 तक चले सत्रों में भारतीय संसद में हिंदू लॉ कमेटी की रपट पर चर्चा हुई। हिन्दू कोड बिल लागू हुआ जिसमें पुराने समय से चले आ रहे तथा पूर्ववर्ती ब्रिटिश शासन द्वारा मान्यता प्राप्त हिंदू परिवार कानून में मूलभूत परिवर्तन किए गए। लेकिन जब शरीयत आधारित और ब्रिटिश शासन द्वारा गढ़े गए मुस्लिम पर्सनल लॉ में भी ऐसे ही बदलावों का विषय उठा तो मुस्लिम प्रतिनिधियों ने आसमान सिर पर उठा लिया। एक देश में दो कानून, एक के लिए एक छड़ी और दूसरे के लिए दूसरी, इस व्यवस्था का डॉ़ श्यामाप्रसाद मुखर्जी, आचार्य कृपलानी और डॉ़ आंबेडकर जैसे राष्ट्रवादियों ने कड़ा विरोध किया। मुस्लिम तुष्टिकरण की इस नेहरूवादी नीति पर सवाल खड़ा करते हुए आंबेडकर ने कहा- 'मैं व्यक्तिगत रूप से यह समझने में असमर्थ हूं कि मज़हब को इतनी विस्तृत अमलदारी क्यों दी जानी चाहिए कि वह सारे जीवन को ही ढक ले और विधायिका को धरातल पर क्रियान्वित होने से रोक दे। आखिरकार हमें (तत्कालीन संसद) यह (कानून बनाने की) छूट क्यों मिली है? हमें यह छूट मिली है अपने सामाजिक तंत्र की असमानताओं और भेद-भावों को दूर करने के लिए, जो हमारे मूलभूत अधिकारों की राह में रोड़ा बने हुए हैं।' समानता का आह्वान करती ये आवाज अनसुनी रह गई। समानता और पंथ निरपेक्षता की संवैधानिक घोषणा के बाद सामाजिक असमानता और मूलभूत अधिकारों के हनन को कानूनी मान्यता देते हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ को यथावत् रखा गया और समान नागरिक संहिता के संकल्प को खंडित कर दिया गया। आने वाले दशकों में लाखों शाहबानो और इमरानाओं ने इस पीड़ा को भुगता। आज भी भुगत रही हैं।
जीवनभर डॉ़ आंबेडकर विशुद्घ राष्ट्रवादी एवं अंत:करण से पूर्ण मानवतावादी रहे। देशहित के लिए उन्हें अप्रिय बात बोलने से भी कभी परहेज नहीं रहा। समान नागरिक संहिता की पैरवी के पीछे जहां एक ओर समाज के दोषों के निवारण की आकांक्षा थी, वहीं इस्लामी कट्टरपंथ की रोकथाम और अल्पसंख्यकवाद की विषबेल को प्रारंभ में ही खत्म कर देने की उनकी मंशा छिपी थी। उनकी इस सोच की झलक देती 'बहिष्कृत भारत' के लिए लिखी गई ये पंक्तियां हैं- 'स्वतंत्र हिंदुस्थान पर यदि तुर्की, परशिया अथवा अफगानिस्तान इन तीन मुस्लिम राष्ट्रों में से कोई हमला करता है, तो उस स्थिति में सभी लोग एकजुट होकर इसका मुकाबला करेंगे, इसकी क्या कोई गारंटी दे सकता है? हम तो नहीं दे सकते। हिंदुस्थान के मुस्लिमों का इस्लामी राष्ट्रों के प्रति आकर्षण होना स्वाभाविक है। यह आकर्षण इतना बेशुमार बढ़ चुका है कि इस्लामी संस्कृति का प्रसार कर मुस्लिम राष्ट्रों का संघ बनाकर अधिकाधिक काफिर देशों को उसके शासन में लाने का उनका लक्ष्य बन चुका है। इन विचारों से प्रभावित होने के कारण उनके पैर हिंदुस्थान में और आंखें तुर्कस्थान या अफगानिस्तान की ओर होती हैं। हिंदुस्थान अपना देश है, इसका उन्हें गर्व नहीं हंै और उनके निकटवर्ती हिंदू बंधुओं के प्रति उनका बिल्कुल भी अपनापन नहीं है।' इन पंक्तियों से पता चलता है कि उस समय देश में किस प्रकार का वातावरण बन रहा था।
विश्वभर में घट रही घटनाओं का डॉ़ आंबेडकर निकटता से अध्ययन कर रहे थे। यह वह काल था जब ब्रिटिश शासक अफगानिस्तान और तुर्की में मुस्लिम खलीफाओं और सुल्तानों के विरुद्ध लड़ रहे थे। प्रथम विश्वयुद्घ के पूर्वार्द्ध में तुर्की की इस्लामी खिलाफत ने 15 लाख आर्मेनियाई ईसाइयों को गैर-मुस्लिम होने के अपराध में मौत के घाट उतार दिया था। इस क्रूर और निरंकुश खिलाफत का जब तुर्की के ही प्रगतिशील युवकों ने तख्ता उलट दिया तो इस तख्तापलट के विरोध में भारत में खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ। साम्राज्यवाद के विरोध के नाम पर अखिल इस्लामवाद और अल्पसंख्यकवाद बनाम बहुसंख्यकवाद की नींव डाली गई। और देश में सामाजिक सद्भाव की जमीन पर स्थायी दरारें पैदा कर दी गईं। उपनिवेशवाद से लड़ाई के नाम पर मजहबी कट्टरवाद की खेती के घातक परिणामों के बारे में डॉ़ आंबेडकर ने कहा- 'सामाजिक क्रांति करने वाले तुर्कस्थान के कमाल पाशा के बारे में मुझे बहुत आदर व अपनापन लगता है, परंतु हिन्दी मुसलमानों मोहम्मद शौकत अली जैसे देशभक्त व राष्ट्रीय मुसलमानों को कमाल पाशा व अमानुल्ला पसंद नहीं हैं; क्योंकि वे समाज सुधारक हैं, और भारतीय मुसलमानों की मजहबी दृष्टि को समाज सुधार महापाप लगते हैं।' मुस्लिम लीग व अंग्रेजों द्वारा भारतीय मुस्लिमों को 'अजेय वैश्विक इस्लामिक खिलाफत कायम' करने के लिए फुसलाया जा रहा था। कांग्रेस भी दिन पर दिन इस जाल में फंसती जा रही थी। डॉ़ आंबेडकर ने चेताते हुए कहा था- 'इस्लामी भाईचारा विश्वव्यापी भाईचारा नहीं है। वह मुसलमानों का, मुसलमानों को लेकर ही है। उनमें एक बंधुत्व है, लेकिन उसका उपयोग उनकी एकता तक ही सीमित है। जो उसके बाहर हैं उनके लिए उनमें घृणा व शत्रुत्व के अलावा अन्य कुछ नहीं है। इस्लाम एक सच्चे मुसलमान को कभी भारत को अपनी मातृभूमि तथा हिंदू को अपने सगे के रूप में मान्यता नहीं दे सकता। मौलाना मोहम्मद अली एक महान भारतीय व सच्चे मुसलमान थे। इसीलिए संभवत: उन्होंने स्वयं को भारत की अपेक्षा यरुशलम की भूमि में गाड़ा जाना पसंद किया।' चेतावनी अनसुनी रह गईं। वषोंर् पहले से विभाजन की जो खाई दिखाई दे रही थी, तत्कालीन नेतृत्व चाहे अनचाहे उसी ओर खिंचता चला गया। बंटवारा अपरिहार्य हो गया। तो बाबासाहेब ने हिंदू समाज को एक बार फिर चेताया- 'मैं पाकिस्तान में फंसे वंचित समाज से कहना चाहता हूं कि उन्हें जो मिले उस मार्ग व साधन से हिन्दुस्थान आ जाना चाहिए। दूसरी एक बात और कहना है कि पाकिस्तान व हैदराबाद की निजामी रियासत के मुसलमानों अथवा मुस्लिम लीग पर विश्वास रखने से वंचित समाज का नाश होगा। वंचित समाज में एक बुरी बात घर कर गई है कि वह यह मानने लगा है कि हिन्दू समाज अपना तिरस्कार करता है, इस कारण मुसलमान अपना मित्र है। पर यह आदत अत्यंत घातक है। जिन्हें जोर जबरदस्ती से पाकिस्तान अथवा हैदराबाद में इस्लाम की दीक्षा दी गई है, उन्हें मैं यह आश्वासन देता हूं कि कन्वर्जन करने के पूर्व उन्हें जो व्यवहार मिलता था। उसी प्रकार की बंधुत्च की भावना का व्यवहार अपने धर्म में वापस लौटने पर मिलेगा। हिन्दुओं ने उन्हें कितना भी कष्ट दिया तब भी अपना मन कलुषित नहीं करना चाहिए। हैदराबाद के वंचित वर्ग ने निजाम, जो प्रत्यक्ष में हिन्दुस्थान का शत्रु है, का पक्ष लेकर अपने समाज के मुंह पर कालिख नहीं पोतनी चाहिए।' विभाजन के पश्चात् लाखों वंचित हिंदू परिवार पाकिस्तान में ही रह गए। तब से लेकर आज तक उनका नस्लीय संहार जारी है। वे मुस्लिम जमीनदारों के यहां बंधुआ मजदूरी कर रहे हैं। पाकिस्तान में लगभग रोज किसी न किसी हिन्दू लड़की का अपहरण, बलात्कार और जबरन निकाह की घटनाएं घट रही हैं।
अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में डॉ़ आंबेडकर व्यग्र थे। देह छोड़ने के पहले वे वंचित हिंदू समाज को एक दिशा देना चाहते थे। आखिरकार उन्होंने नई उपासना पद्घति अपनाने का निश्चय किया। उनके पीछे आने वाले लाखों अनुयायियों का अनुमान कर ईसाई और मुस्लिम मिशनरियों की कन्वर्जन की भूख भड़क उठी। ईसाई मिशनरी सदियों से भारतीय समाज की देहरी पर सिर पटककर भी कुछ खास हासिल न कर सके थे। दूसरी तरफ इस्लाम के ठेकेदारों को भी इस संभावित पुरस्कार से बड़ी आशाएं लग गई थीं। बाबासाहेब के जीवनी लेखकों धनंजय कीर और खैरमोड़े ने विस्तार से बताया है कि कैसे उस समय हैदराबाद के निज़ाम, आगा खां से लेकर ईसाई मिशनरी तक सभी बाबासाहेब की राह में पलक पांवड़े बिछाने को तैयार थे लेकिन इस बारे में बाबासाहेब की सोच बिल्कुल साफ थी। उन्होंने कहा- 'अस्पृश्यों के कन्वर्जन के कारण सर्वसाधारण से देश पर क्या परिणाम होगा, यह ध्यान में रखना चाहिए। यदि ये लोग मुसलमान अथवा ईसाई पंथ में जाते हैं तो अस्पृश्य लोग अराष्ट्रीय हो जाएंगे। यदि वे मुसलमान होते हैं तो मुसलमानों की संख्या दुगुनी हो जाएगी व तब मुसलमानों का वर्चस्व बढ़ जाएगा। यदि ये लोग ईसाई होते हैं तो ईसाइयों की संख्या 5-6 करोड़ हो जाएगी और उससे इस देश पर ब्रिटिश सत्ता की पकड़ मजबूत होने में सहायता होगी।'
ईसाई मिशनरियों द्वारा किए जा रहे सामाजिक न्याय के आसमानी दावों की कलई खोलते हुए उन्होंने कहा ईसाइयत ग्रहण करने से उनके आंदोलन का उद्देश्य साध्य नहीं होगा। अस्पृश्य समाज को भेद-भाव की मनोवृत्ति नष्ट करनी है। ईसाई हो जाने से यह पद्घति एवं मनोवृत्ति नष्ट नहीं होती। हिंदू समाज की तरह ईसाई समाज भी जाति ग्रस्त है।
बौद्घ धम्म को स्वीकार करने के पीछे का कारण बताते हुए वे कहते हैं-'एक बार मैं अस्पृश्यों के बारे में गांधीजी से चर्चा कर रहा था। तब मैंने कहा था कि 'अस्पृश्यता के सवाल पर मेरे आप से भेद हैं, फिर भी जब अवसर आएगा, तब मैं उस मार्ग को स्वीकार करूंगा जिससे इस देश को कम से कम धक्का लगे। इसलिए बौद्घ धर्म स्वीकार कर इस देश का अधिकतम हित साध रहा हूं, क्योंकि बौद्घ धर्म भारतीय संस्कृति का ही एक भाग है, मैंने इस बात की सावधानी रखी है कि इस देश की संस्कृति व इतिहास की परंपरा को धक्का न लगे।'
बुद्घ के चरणों में बैठने के पश्चात् उन्होंने जो भाषण दिया उसमें हिंदू संस्कृति के प्रति उनकी संकल्पना के दर्शन होते हैं। उन्होंने कहा- 'अंतत: सारी जिम्मेदारी आपकी ही है। मैंने धर्मान्तरण करने का निश्चय किया है। मैं आपके धर्म से बाहर हो गया हूं। फिर भी आपकी सारी हलचलों का सक्रिय सहानुभूति से निरीक्षण करता रहूंगा व आवश्यकता पड़ने पर सहायता भी करता रहूंगा। हिन्दू संगठन राष्ट्रीय कार्य है, वह स्वराज्य से भी अधिक महत्व का है। स्वराज्य का संरक्षण नहीं किया तो क्या उपयोग? स्वराज्य के रक्षण से भी स्वराज्य के हिन्दुओं का संरक्षण करना अधिक महत्व का है। हिन्दुओं में सामर्थ्य नहीं होगा तो स्वराज्य का रूपांतर दासता में हो जाएगा। तब मेरी राम राम! आपको यश प्राप्त हो, इस निमित्त मेरी शुभेच्छा।'
डॉ. आंबेडकर की लेखनी सदा देश की समस्याओं के समाधान ढूंढती रही। जो अखबार उन्होंने निकाले वे सब समाज केंद्रित थे। जो पुस्तकें उन्होंने लिखीं वह प्राय: राष्ट्रीय प्रश्नों पर उनके मंथन का निचोड़ हैं। देश विभाजन पर लिखी उनकी किताब उस समय के राष्ट्रीय परिदृश्य का चित्रण करती है साथ ही अतीत में गोता लगाकर इतिहास की सीख को भी सामने रखती है। वहीं दूसरी ओर उनकी रचना 'शूद्र कौन थे' हिन्दू समाज को उसकी जड़ांें की गहराई तक ले जाकर वहां से बह रही समरसता की धारा से परिचित करवाती है। इस पुस्तक में बाबासाहेब ने ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा फैलाये गए इस झूठ कि 'आर्य भारत में बाहर से आए हुए हमलावर थे' का मुंहतोड़ उत्तर दिया है और शास्त्र प्रमाण से ये सिद्घ किया है कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे। आर्य गुणसूचक शब्द है जाति सूचक कदापि नहीं है। और वेदों में जिन्हें शूद्र कहा गया है वे तत्कालीन समाज का अत्यंत महत्वपूर्ण, सम्माननीय और समृद्घ घटक थे।
इन सारी बातों पर निगाह डालते हैं तो ध्यान में आता है कि बाबासाहेब आंबेडकर का सारा जीवन राष्ट्रवाद की अनथक गाथा है। सारा जीवन वे राष्ट्र के लिए लड़ते रहे। उन्होंने राष्ट्र की ये लड़ाई सामाजिक स्तर पर, राजनीतिक स्तर पर, वैचारिक स्तर पर और सांस्कृतिक स्तर पर लड़ी। इस मंथन में से जो विष निकला उसे वे चुपचाप पी गए, और जो अमृत निकला उसे समाज में बांट दिया। किसी अवसर पर उन्होंने कहा था कि 'मेरी आलोचना में यह कहा जाता है कि मैं हिन्दू धर्म का शत्रु हूं, विध्वंसक हूं। लेकिन एक दिन ऐसा आयेगा, जब लोग यह अनुभव करेंगे कि मैं हिन्दू समाज का उपकारकर्ता हूं और तब वे मुझे धन्यवाद देंगे।' वह दिन आ गया है।
'सिफारिश नहीं करूंगा'
बाबासाहेब उन दिनों भारत के कानून मंत्री थे। उनका बेटा यशवंत, जिन्हें भैयासाहब के नाम से स्मरण किया जाता है, मुंबई से दो उद्योगपतियों को लेकर दिल्ली उनसे मिलने पहुंचा। उद्योगपतियों के निजी कार्य के लिए यशवंत अपने पिता की सिफारिश चाहता था। उसकी बात सुनकर बाबासाहेब फट पड़े। सबके सामने ही निर्ममता के साथ फटकारते हुए उन्होंने कहा -'मूर्ख!तूने सोचा भी कैसे कि मैं तेरे कहने से किसी के लिए सिफारिश करूंगा? मैं यहां तेरा बाप नहीं, भारत का विधिमंत्री हूं। बाप हूं बम्बई के राजगृह (बाबासाहेब के निवास का नाम) में। बिना देर किये निकल जा मेरे कमरे से।' यशवंत को काटो तो खून नहीं। वह अपना सा मुंह लेकर उद्योगपतियों के साथ वापस लौट गया। इस घटना के बाद बाप-बेटे के रिश्ते सदा के लिए ठंडे पड़ गए। यहां यह स्मरण रहे कि यशवंत बाबासाहेब की पांच संतानों में से एकमात्र जीवित बचा पुत्र था। डॉ. आंबेडकर के तीन पुत्र और एक पुत्री छुटपन में ही काल-कवलित हो गए थे। स्वाभाविक ही बाबासाहेब में उसके प्रति पर्याप्त मोह रहा होगा। पर उनकी कर्तव्य-परायणता अधिक कठोर थी।
'गुरुता का वंदन'
यह सब लोग जानते हैं कि भीमराव को बाल्यकाल में आंबेडकर उपनाम उनके एक ब्राह्मण अध्यापक ने दिया था ताकि बालक को सामाजिक भेदभाव अधिक न झेलना पड़े। इसीलिए काफी लोग उन्हें बहुत समय तक ब्राह्मण ही समझते रहे। बाबासाहेब ने जब बड़े होकर अत्यधिक सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल कर ली, उसके बाद की घटना है। बाबासाहेब मुंबई में दामोदर हॉल के निकट स्थित अपने कार्यालय में काफी अनुयाइयों के साथ बैठे थे। तभी उन आंबेडकर गुरूजी का वहां आगमन हो गया। वे वयोवृद्घ हो चुके थे। पर बाबासाहेब उनको देखते ही पहचान गए। भाव-विह्वल होकर उन्होंने भूमि पर लेटकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। यही नहीं, वस्त्र आदि देकर उनका सम्मान भी किया। आंबेडकर गुरूजी अपने इस दिग्विजयी शिष्य की शिष्टता देखकर भाव-विभोर हो गए।