शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

भूमि अधिग्रहण विधेयक खुली बहस को तैयार: नितिन गडकरी



भूमि  अधिग्रहण  विधेयक  पर किसी भी मंच पर
खुली बहस को तैयार: नितिन गडकरी

भूमि अध्ािग्रहण विध्ोयक खेतों, खलिहानों मंे काम करने वालों और किसानों को समृह् बनानेवाला
कानून है, इसलिए गांवों में विकास के लिए इस विध्ोयक का साथ देने को लेकर 19 मार्च को केंद्रीय परिवहन और राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी ने विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को पत्र लिखा। प्रस्तुत है पूरा पाठ:

बदलावों को करते हुए हमने मुआवजे और पुनर्वास से कोई समझौता नहीं किया है। जिन
विषयों को हमने इस सूची में शामिल किया है, उसमें से एक भी किसानों के विरोध में नहीं है,
बल्कि यह विषय उन्हें समृ(िशाली बनाने वाले हैं। इंडस्ट्रियल कोरीडोर दिल्ली या फिर किसी महानगर में नहीं बनेगा। यह ग्रामीण इलाकों से होकर गुजरेगा। इसके तहत अगर ग्रामीण इलाकों में उद्योग लगते हैं तो इसका सीधा फायदा किसानों को होगा।
बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा।

प्रध्ाानमंत्री श्री नरेनर््ी मोदी की सरकार ने ग्रामीण विकास और किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए वर्तमान भूमि अध्ािग्रहण कानून में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। लेकिन कुछ राजनीतिक दल और संगठन राजनीतिक कारणों से इसका विरोध्ा कर रहे हैं। हमारी सरकार गांव, गरीब, किसान और मजदूरों के हित में काम करने वाली सरकार है।
यूपीए सरकार ने जो भूमि अध्ािग्रहण, पुनर्वास और पुनरूस्थापन अध्ािनियम, 2013 बनाया था, उसमें 13 कानूनों को सोशल इंपैक्ट और कंसेंट क्लाज से बाहर रखा गया था। इनमें सबसे प्रमुख तो कोयला क्षेत्र अध्ािग्रहण और विकास कानून 1957 और भूमि अध्ािग्रहण ;खदानद्ध कानून 1885 और राष्टन्न्ीय राजमार्ग अध्ािनियम 1956 है। इसके अलावा एटमी ≈र्जा कानून 1962, इंडियन टन्न्ामवेज एक्ट 1886, रेलवे एक्ट 1989 जैसे कानून प्रमुख हैं। हमने इसमें कुछ और महत्वपूर्ण विषयों को जोड़ा है। जिससे आप सहमत नहीं हैं। यह आपका अध्ािकार है। लेकिन हम आपसे पूछना चाहते हैं, क्या किसानों के खेतों को पानी नहीं मिलना चाहिए? क्या गांवों में समृह् िनहीं आनी चाहिए? क्या देश की सुरक्षा महत्वपूर्ण नहीं है? हमने जो बदलाव किए हैं वो इन्ही विषयों से संबंध्ाित हैं। ग्रामीण विकास, सिंचाई परियोजनाओं और देश की सुरक्षा को
ध्यान में रखते हुए हमने बदलाव किए हैं। रक्षा, ग्रामीण बिजली, सिंचाई परियोजनाएं, गरीबों के लिए घर और औद्योगिक कारीडोर जैसी परियोजनाओं के लिए भूमि अध्ािग्रहण को सोशल इंपैक्ट और कंसेंट क्लाज से बाहर रखे गए कानूनों की सूची में जोड़ा है। बदलावों को करते हुए हमने मुआवजे और पुनर्वास से कोई समझौता नहीं किया है। जिन विषयों को हमने इस सूची में शामिल किया है, उसमें से एक भी किसानों के विरोध्ा में नहीं है, बल्कि यह विषय उन्हें समृह्शिाली बनाने वाले हैं। इंडस्टिन्न्यल कोरीडोर दिल्ली या फिर किसी महानगर में नहीं बनेगा। यह ग्रामीण इलाकों से होकर गुजरेगा। इसके तहत अगर ग्रामीण इलाकों में उद्योग
लगते हैं तो इसका सीध्ाा फायदा किसानों को होगा। बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा। किसानों के फसलों को उनकी फसलों का सही दाम मिलेगा। जहां कच्चा माल मिलेगा वहां उससे संबंध्ाित उद्योग आने की ज्यादा संभावना है। क्या हमारे ग्रामीण युवाओं को रोजगार देना ठीक
नहीं है?

हमने सिंचाई परियोजनाओं के लिए कानून में बदलाव किए हैं। हम सिंचाई के लिए व्यवस्था करना चाहते हैं। यह बदलाव खेतों को पानी उपलब्ध्ा कराने के लिए हैं। जब तक किसानों को पानी नहीं मिलेगा तब तक हम उन्हें आत्मनिर्भर नहीं बना पाएंगे। 2000 एकड़ में अगर हम एरिगेशन प्रोजेक्ट लगाते हैं तो 3 लाख हेक्टेअर खेतों को हम पानी उपलब्ध्ा करा सकते हैं। यह कहां से किसान विरोध्ाी है? 80 फीसदी भूमि सिंचाई के लिए अध्ािग्रहीत की जाती है। इस पूरे कानून में कोई भी ऐसी बात नहीं है जो किसानों के विरोध्ा में हो। यही नहीं, जमीन मालिक के अलावा भी उस पर निर्भर लोग मुआवजे के हकदार होंगे। पूरा मुआवजा मिलने के बाद ही जमीन से विस्थापन होगा। इन बदलावों में न्यायसंगत मुआवजे के अध्ािकार और पारदर्शिता पर खास जोर दिया गया है। इसी के आसपास भूमिध्ाारी समुदाय के हक-हकूक के मसलों को
कानून में रेखांकित किया गया है। अब मुआवजा एक निधर््ाारित खाते में ही जमा होगा। मुकम्मल पुनर्वास इस कानून का मूल आध्ाार है। बिना उसके कोई भी जमीन किसी भी किसान से देश के किसी भी हिस्से में किसी भी कीमत पर नहीं ली जा सकेगी। इसके अलावा अब दोषी अफसरों पर अदालत में कार्रवाई हो सकेगी। इसके साथ ही किसानों को अपने जिले में ही शिकायत या अपील का अध्ािकार होगा। देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भी हमने कुछ बदलाव किए। आज देश के लोगों की गाढ़ी कमाई विदेशों से हथियार मंगाने पर खर्च होती है। क्या हमें इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं होना चाहिए? क्या ये देशहित में नहीं है?

आपके मन में अध्यादेश लाने को लेकर भी सवाल हैं। हम कहना चाहते हैं,किसानों के हित में अध्यादेश लाना जरूरी था। यदि हम अध्यादेश नहीं लाते तो किसानों को उनकी जमीन का बाजार भाव से चार गुना मुआवजा नहीं दे सकते थे।

इस अध्यादेश की बदौलत ही हम किसानों को उनकी जमीन का चार गुना मुआवजा दे पाए। केवल राजमार्ग मंत्रालय और उर्जा मंत्रालय ने किसानों को 2000 करोड़ का मुआवजा दिया। यह इसलिए हो सका क्योंकि हम अध्यादेश लेकर आए।

विपक्षी दलों से बातचीत के बगैर कानून में बदलाव का आरोप आप लगा रहे हैं, यह भी ठीक नहीं है। हमने विज्ञान भवन में सभी राज्य सरकारों के मंत्रियों की बैठक बुलाई थी। जिस बैठक में करीब सभी राज्य सरकारों के प्रतिनिध्ाि मंत्री शामिल हुए। इस विषय में उन राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों के पत्र भी हमारे पास हैं। हमने जो बदलाव किए उन्ही सरकारों के सुझाव पर किए। इसमें आपकी राज्य सरकारें भी शामिल हैं।

यह कानून खेतों, खलिहानों में काम करने वालों और किसानों को समृह् िबनाने वाला कानून है, गावों में विकास के लिए इस विध्ोयक का साथ दें। हम इस विध्ोयक पर आपसे किसी भी मंच पर खुली बहस को तैयार हैं।




भाजपा के 35 वर्ष : 2 से 282 तक की यात्रा...


                                         भाजपा स्थापना दिवस 6 अप्रैल पर विशेष

                             भाजपा के 35 वर्ष : 2 से 282 तक की यात्रा...

जनसंघ के बाद भाजपा गठन को 6 अप्रैल 2015 को 35 वर्ष हो जाएंगे। 2 से चले थे और
आज लोकसभा में 282 तक पहुंचे हैं। भाजपा का यह राजनीतिक सफर संगठन की जीवंतता
का एक अनुपम उदाहरण है। यह अवसर है उन अनाम कार्यकर्ताओं को प्रणाम करने का, जो बिना
लाग-लपेट, बिना लोभ-लालच के, अहर्निश बिना कहे, संगठन के काम में लगे रहते हैं। भारतीय
राजनीति में भाजपा ही एक ऐसा दल है जिसे सामाजिक और आध्यात्मिक राजनैतिक दल कहा जा
सकता है। दर्शनहीन राजनीतिक दलों के बीच दर्शन से पूर्ण एक दल है, जिसका नाम भारतीय जनता
पार्टी है।
दोहरी सदस्यता के नाम पर जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष चन्द्रशेखर ने जनसंघ को जनता पार्टी
से अलग कर दिया। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, डाॅ. मुरली मनोहर जोशी, सुंदर
सिंह भंडारी, कुशाभा≈ ठाकरे, जगन्नाथ राव जोशी, राजमाता विजयाराजे सिंध्ािया, भैरो सिंह शेखावत,
जना कृष्णमूर्ति, के.एल. शर्मा, यज्ञदत्त शर्मा, जे.पी. माथुर सहित अनेक लोग तनिक भी घबराएं नहीं।
वे जानते थे कि संगठन ही शक्ति है। संगठन सिर्फ जनसंघ के पास है, सबने इसे माना।
दिल्ली में एकत्रित हुए और 6 अप्रैल 1980 को भाजपा का गठन किया। जनसंघ के सबसे लाडले
नेता अटल बिहारी वाजपेयी को पहला अध्यक्ष बनाया गया। मुम्बई में पहला महाध्ािवेशन हुआ। इसमें
अटलजी ने समुद्र के किनारे प्रतिनिध्ाियों का आह्वान करते हुए कहा- ‘‘सूरज निकलेगा, अंध्ोरा छंटेगा
और कमल खिलेगा।’’ कारवां बढ़ता गया। कार्यकर्ता एड़ी-चोटी का जोर लगाते रहे। एक स्थिति यहां
तक आई कि इंदिरा गांध्ाी के देहावसान के बाद हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा मात्र 2 सीटों पर सिमटकर
रह गई। भाजपा के महानायक अटलजी तक चुनाव हार गए। क्षणभर के लिए निराश हुए। पर संगठन
शक्ति भाजपा के पास थी। गांव-गांव में कार्यकर्ता थे। इसलिए निराशा की काई बहुत जल्दी दूर हुई।
अटलजी, आडवाणीजी और डाॅ. जोशीजी ने कमान संभाली। भारत का भ्रमण किया। देश में यात्राओं
का दौर शुरू हुआ। डाॅ. जोशी ने जहां एकात्मता यात्रा से भारत को जोड़ने का काम किया, वहीं गुजरात
के सोमनाथ से भगवान श्री रामजन्मभूमि अयोध्या तक की यात्रा पर स्वयं लालकृष्ण आडवाणी निकले।
जन-मानस में एकात्मता का विचार जन्म लेना शुरू हुआ। देश के हर कोने में सांस्कृतिक राष्टन्न्वाद
को समर्थन मिला। ध्ार्मनिरपेक्षता की कांग्रेसी नकाब को लोगों ने पंथनिरपेक्षता से परास्त किया।
सर्वध्ार्मसमभाव की ओर देश बढ़ने लगा। आरोप-प्रत्यारोप के दौर चले लेकिन भारतीय जनता पार्टी
का उत्तरोत्तर विस्तार होने लगा। देश में राजनैतिक परिवर्तन का यह अद्भुत दौर था। दक्षिण से लेकर
उत्तर तक, पूरब से लेकर पश्चिम तक भाजपा का जबरदस्त विस्तार हुआ। जहां हम 2 पर रुक गए,
वहां हम 85 पर पहुंचे। फिर निरंतर बढ़ते गए।

जहां हमें लोगों ने अलग करके रखा था, वहीं ध्ाीरे-ध्ाीरे राजनीति का ध्ा्रुवीकरण हुआ। एक तरफ
लोग कांग्रेस के साथ जुड़े तो दूसरी तरफ लोग भाजपा के साथ जुड़े। आडवाणीजी ने अटलजी को
भावी प्रध्ाानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया। लोगों में आशा की किरण जगी। विपक्ष के सबसे चहेते
नेता अटलजी को प्रध्ाानमंत्री बनने का सपना देश देख रहा था। भाजपा के सहयोगी दलों की संख्या
बढ़ती गई। 1 से 2, 2 से 5 और 5 से 24 दलों का साथ उसे मिला। इसी तरह 1984 में 2 थे तो
महज 12 साल बाद ही 1996 में 161 सीट पाकर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी और पहली बार अटलजी
के नेतृत्व में केंद्र में 13 दिन की सरकार बनी। अटलजी ने जोड़-तोड़ से सरकार बनाने में विश्वास नहीं जताया। सरकार गिर गई। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि एक नहीं, सौ-सौ सरकार न्योछावर कर दूंगा पर जोड़-तोड़ से प्रध्ाानमंत्री बनना मुझे स्वीकार्य नहीं होगा। 1998 में वह अवसर आया जब भाजपा ने 182 प्राप्त कर अटलजी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनाई। यह सरकार 13 महीने चली, फिर गिरी। 1999 में आम चुनाव हुए। भाजपा को फिर 182 सीटें मिलीं। अटलजी ने 24 दलों के नेता के रूप में 5 वर्ष तक कुशलतापूर्वक सरकार चलाई।
भारतीय राजनीति में गठबंध्ान का वह अद्भुत दौर था। संघर्ष की एक नई गाथा लिखी गई थी। कार्यकर्ताओं ने परिश्रम की पराकाष्ठा दिखाई थी। मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्टन्न्, गुजरात, छत्तीसगढ़, पंजाब, झारखण्ड, बिहार, उत्तर प्रदेश सहित अनेक राज्यों में भाजपा गठबंध्ान की सरकारें चलने लगी। देश में विकास ने र∂तार पकड़ी। परमाणु विस्फोट जैसे एतिहासिक कदम अटलजी के नेतृत्व में लिए गए। कारगिल के समर को पाकिस्तान के विरुह् भारत ने जीता। स्वर्णिम चतुर्भुज योजना,नदी जोड़ने का फैसला इन्हीं दिनों लिया गया। अंत्योदय को साकार करने का सपना पूरा हुआ। महंगाई पर लगाम लगी।
किसान क्रेडिट कार्ड और फसल बीमा योजना ने देश के किसानों को संबल प्रदान किया। एक नहीं अनेक ऐसे फैसले हुए जो भारतीय राजनीतिक इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया।
दक्षिण भारत में संगठन का विस्तार हुआ। दक्षिण भारत के जना कृष्णमूर्तिजी, बंगारूजी, वेंकैयाजी भाजपा के राष्टन्न्ीय अध्यक्ष बने। आडवाणीजी ने अध्यक्ष के नाते एक नहीं, अनेक यात्राएं निकालकर भारत को जोड़ने और भाजपा को बढ़ाने हेतु जबरदस्त प्रयास किए। वे वैचारिक योह्ा के रूप में उभरे।
गुजरात की भाजपा सरकार, जो नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चल रही थी, ने भारत में अमिट छाप छोड़ी। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ ने विशिष्ट पहचान बनाई। राजस्थान के रेगिस्तान में वैचारिकता की फसलें बोई र्गइं, जो ध्ाीरे-ध्ाीरे लहलहाने लगीं।
देश में द्वितीय पंक्ति के नेताओं की कतार खड़ी हुई। अटलजी, आडवाणीजी और राजमाताजी ने पूरे देश में प्रत्येक राज्यों में नेताओं की ९ाृंखलाएं खड़ी कीं।
भाजपा ने सदैव अपने को जीवंत बनाए रखा। अच्छा काम करने के बाद भी 2004 के चुनाव में निराशा हाथ लगी। परंतु भाजपा के पग रुके नहीं, थके नहीं। पग बढ़ते गए। जहां-जहां भाजपा राज्यों में सरकार में थी, वहां-वहां की सरकार ने अपनी राष्टन्न्ीय छवि बनाई। ध्ाीरे-ध्ाीरे जनता में यह विश्वास होने लगा कि भाजपा को पुनः देश में लाना चाहिए।
2004 से 2014 तक 10 वर्षों तक भाजपा ने बहुत ध्ौर्य और ध्ार्म से काम किया। अपने विचारों से टस से मस नहीं हुई। ध्ाीरे-ध्ाीरे गुजरात एक माॅडल के रूप में उभरने लगा। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी आशा की किरण बनकर उभरने लगे। यूपीए की सरकार गत वर्षों में देश को रसातल में ले गई। घनघोर निराशा के बीच से भारत गुजरने लगा। हर दिन घोटालों के पर्दाफाश का दिन हुआ करता था। भारत ने अपनी साख और ध्ााक दोनों खो दी थी। तत्कालीन प्रध्ाानमंत्री मनमोहन सिंह मौन थे, पर सोनियाजी और राहुलजी के इशारे पर कांग्रेसी और उनके सहयोगी दल देश लूट रहे थे। घोटालों के काले कारनामे जनता के सामने आने शुरू हुए। स्थिति इतनी भयावह हो गई कि तिरंगे की अस्मिता का सवाल खड़ा हो गया। संसद लजाने लगा। संविध्ाान सिहरने लगा। सेना और सीमाएं सिकुड़ती र्गइं। सेना का मनोबल टूटने
लगा। संसद की गरिमा तार-तार होने लगी। संवैध्ाानिक ढांचा चरमराना लगा। देश का प्रत्येक नागरिक छटपटाने लगा।
परिवर्तन की आहट भाजपा ने सुनी। गोवा में भाजपा कार्यकारिणी में ऐतिहासिक फैसला हुआ। राजनाथ सिंहजी की अध्यक्षता में नरेन्द्र मोदीजी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फैसला किया गया। इन निर्णयों में भाजपा को कुछ खट्टे-मीठे अनुभव भी आए। लेकिन सबने मिल-जुलकर देश को सामने रखकर दल के फैसले को स्वीकार किया। देश परिवर्तन और नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व चाह रहा था। फिर भाजपा ने फैसला लिया कि हमारे प्रध्ाानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदीजी होंगे। देश उमंग से झूम उठा। नेतृत्व के प्रति आस्था बढ़ी। परिवर्तन की इस आहट को राजनीतिक पुरोध्ाा नरेंद्र मोदीजी ने भी भांप लिया। उन्होंने अनथक परिश्रम शुरू किया। गुजरात को नापा ही था अब भारत को नापने में लग गए। 500 के करीब आम सभाएं कर पूरा संगठन जागृत कर दिया। देश में व्याप्त हताशा-निराशा दूर हुई। अपने अनथक परिश्रम से नरेंद्र मोदीजी ने विश्वास की टमटमाती लौ को अखंड ज्योति में बदल दिया। वे विरोध्ाियों पर टूट पड़े। इतना ही नहीं गुजरात
में उपजे जन-विश्वास का फैलाव भारत में होने लगा। भाजपा संगठन और भारत के नागरिकों ने गुजरात के नायक को भारत का महानायक बनाने में अग्रणी भूमिका निभाना शुरू कर दिया।
चुनाव समाप्त हुआ। 16 मई परिणाम का दिन था। भाजपा ने 30 वर्ष का रिकाॅर्ड तोड़ा। जनसंघ से लेकर भाजपा तक की यात्रा में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत की सरकार कभी नहीं बनाई थी। सूर्यास्त होने तक चुनाव परिणाम 282 के आंकड़े तक पहुंच गया था। भारतीय राजनीतिक क्षितिज पर 282 सिर्फ आंकड़ा नहीं था, बल्कि एक विचारध्ाारा का बहुमतीय उदय हो रहा था। विनम्रता से भाजपा ने भारत के इस जनादेश को स्वीकार किया और कहा कि लोकतंत्र में ध्ौर्य ही ध्ार्म है और कर्म ही पूजनीय है।
संगठन की शक्ति से, नेतृत्व के बल से जनमानस के सपने को साकार किया जा सकता है। गत 35 वर्षों की यात्रा के पश्चात् आज हम देश में स्पष्ट बहुमत की सरकार चला रहे हैं, वहीं देश के अनेक राज्यों में हमारी गठबंध्ान की सरकारें चल रही हैं। देश से मिला यह अटूट विश्वास कायम रखने के लिए हमें आराम से नहीं बैठना होगा। सरकार के अच्छे फैसले को संगठन के माध्यम से गांव-गांव तक ले जाना होगा। अभी यात्रा अध्ाूरी है। पूरी होना बाकी है। सांस्कृतिक राष्टन्न्वाद की विचारध्ाारा से युक्त भारत के लिए निरंतर मेहनत करनी होगी। हमें अपने नेतृत्व पर, कुशल कार्यकर्ताओं पर, अपनी नीति पर और नीयत पर कोई शंका नहीं है। हमने राजनीतिक कार्य को ईश्वरीय कार्य माना है। अतः ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमें सबल बनाते हुए सफलता की ओर ले जाएं। „