रविवार, 19 अप्रैल 2015

कांग्रेस की संधियों के कारण देश में 3500 से कुछ अधिक विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाें की लूट जारी है





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बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भारत में प्रवेश

भारत में विदेशी कम्पनियाँ तीन तरीके से कम कर रही है। पहला, सीधे अपनी शाखायें स्थापित करके, दूसरा अपनी सहायक कम्पनियों के माध्यम से, तीसरा देश की अन्य कम्पनियों के साथ साझेदार कम्पनी के रूप में।
जून 1995 तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 3500 से कुछ अधिक विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, अपनी शाखाओं या सहायक कम्पनियों के रूप में देश में घुसकर व्यापार कर रही हैं। 20,000 से अधिक विदेशी समझौते देश में चल रहे हैं। औसतन 1000 से अधिक नये विदेशी समझौते प्रतिवर्ष देश में होते हैं।
सन् 1972 के अन्त तक देश में कुल 740 विदेशी कम्पनियाँ थीं। जिनमें से 538 अपनी शाखायें खोलकर व 202 अपनी सहायक कम्पनियों के रूप में काम कर रही थीं। इनमें सबसे अधिक कम्पनियाँ ब्रिटेन की थीं। लेकिन आज सबसे अधिक कम्पनियाँ अमेरिका की हैं। समझौते के अन्तर्गत काम करने वाली सबसे अधिक कम्पनियाँ जर्मनी की हैं। 1977 में विदेशी कम्पनियों की संख्या 1136 हो गयी।
आजादी के पूर्व सन् 1940 में 55 विदेशी कम्पनियाँ देश में सीधे कार्यरत थीं। आजादी के बाद सन् 1952 में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन की 8 विशालकाय कम्पनियों के सीधे नियन्त्रण में 701 कम्पनियाँ भारत में व्यापार कर रही थीं। ब्रिटेन की अन्य 32 कम्पनियाँ, भारतीय कम्पनियों के साथ किये गये समझौतों के तहत कार्यरत थीं। ये 8 विशालकाय ब्रिटिश कम्पनियाँ सन् 1853 से ही भारत में घुसना शुरू हो गयी थीं। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा सोची समझी रणनीति के तहत लायी गयी ये कम्पनियाँ सन् 1860 तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भारतीय उपमहाद्वीप के शोषण के लिये धारदार हथियार बन चुकी थी। भारतीय उपमहाद्वीप में स्थापित हो जाने के बाद ये कम्पनियाँ दुनिया के अन्य दूसरे देशों में शोषण करने चली गयीं।
ये 8 ब्रिटिश कम्पनियाँ निम्न थीं:-
1.            एन्ड्रयूल एण्ड कम्पनी
2.            मेक्लाइड एण्ड कम्पनी
3.            मार्टिन एण्ड कम्पनी
4.            बर्न एण्ड कम्पनी
5.            डंकन ब्रदर्स एण्ड कम्पनी
6.            आक्टेवियस स्टील एण्ड कम्पनी
7.            गिलैण्डर अर्बुदनाट एण्ड कम्पनी
8.            शा वालेस एण्ड कम्पनी

भारत में जैसे-जैसे विदेशी पूँजी का निवेश बढ़ता गया वैसे-वैसे विदेशी कम्पनियों की संख्या बढ़ती गयी। इसके साथ जुड़ा हुआ एक आश्चर्यजनक सत्य यह है कि जिन विदेशी कम्पनियों ने भारत में पूँजी निवेश किया उनमें से अधिकांश कम्पनियों ने अपने निवेश करने के अगले वर्षों में ही अपनी निवेश की हुयी पूँजी के बराबर या उससे अधिक पूँजी कमा ली। बाकी अन्य कम्पनियों ने अधिकतम 5 वर्षों में अपनी निवेश की हुई पूँजी को कमा लिया। हर क्षेत्र में घुसी हैं बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ
आज देश का छोटा-बड़ा प्रत्येक क्षेत्र इन विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का गुलाम है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में आने वाली कोई भी चीज ऐसी नहीं हैं, जिसे ये कम्पनियाँ न बनाती हों। दैनिक उपयोग के सामानों का उत्पादन करके ये विदेशी कम्पनियाँ घर-घर में घुसी हुयी हैं। खेती के काम में आने वाले जहरीले कीटनाशकों, खादों अन्य उपकरणों का उत्पादन करके इन विदेशी कम्पनियों ने हमारी आत्मनिर्भर खेती को अपना गुलाम बना लिया है। उद्योगों के क्षेत्र में रद्दी तकनीकी का इस्तेमाल करके वातावरण को विषैला कर दिया है। हवा, पानी और मिट्टी भी अब प्रदूषण से मुक्त नहीं हैं।
नीचे उन क्षेत्रों की सूची दी गयी है जिनमें घुसकर इन विदेशी कम्पनियों में हमारी आर्थिक व्यवस्था को पंगु बना दिया है-
कुछ प्रमुख उत्पादन के क्षेत्र, जिनमें विदेशी कम्पनियाँ घुसी हुई हैं।
1.            दैनिक उपभोग की सामग्री के क्षेत्र में
2.            दवा उद्योग के क्षेत्र में
3.            खाद, कीटनाशक, दवायें व खेती उपकरणों के क्षेत्र में
4.            रासायनिक पदार्थों के उत्पादन में
5.            मोटर-गाड़ियों के उपकरणों के उत्पादन के क्षेत्र में
6.            भारी इंजीनियरिंग सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में
7.            इलेक्ट्रानिकी व इलैक्ट्रीकल सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में
8.            सैनिक रक्षा सामग्री के क्षेत्र में
9.            फूड प्रोसेसिंग व प्लांटेशन (चाय, कॉफी, डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थ, चॉकलेट)
10.          वैज्ञानिक रक्षा अनुसंधान में
11.          सीमेन्ट उद्योग में
12.          तेल शोधन व उत्पादन के क्षेत्र में
13.          धातुओं के खनन तथा निष्कर्षण क्षेत्र में
14.          जूट उद्योग में
15.          सिले हुये (रेडीमेड) कपड़ों के उत्पादन क्षेत्र में
16.          जूते व अन्य खेल सामानों के उत्पादन क्षेत्र में
17.          रबर इन्डस्ट्रीज के क्षेत्र में
18.          बच्चों के खिलौने व अन्य प्लास्टिक सामानों के उत्पादन में

आपातकाल के मीसा, डीआईआर बंदियों का जेलों में रिकॉर्ड नहीं



आपातकाल के मीसा, डीआईआर बंदियों का जेलों में रिकॉर्ड नहीं
आनंद चौधरी|  May 13, 2014,
जयपुर. आपातकाल (1975 -77) के दौरान जेलों में यातना सहने वाले आधे से ज्यादा मीसा और डीआईआर बंदियों को नियम के फेर में पेंशन से महरूम रहना पड़ सकता है। दरअसल, पेंशन के लिए उन्हीं को पात्र माना गया है जो प्रदेश के मूल निवासी हैं और यहां की जेलों में बंद रहे। आवेदन के साथ जेल में बंद रहने का सर्टिफिकेट मांगा है, लेकिन कई जेलों में रिकॉर्ड नहीं है। जेल प्रशासन का कहना है कि 40 साल पुराना मामला होने से रिकॉर्ड जर्जर हैं। फटे-पुराने कागजों को जोड़कर सर्टिफिकेट दिए गए हैं। पूर्व सांसद रघुवीर सिंह कौशल, सवाई माधोपुर के नेता गिर्राज किशोर शर्मा का रिकॉर्ड भी नहीं है। कौशल को तो आरटीआई के तहत भी रिकॉर्ड हासिल नहीं हो पाया।  आपातकाल में सैकड़ों नेताओं की प्रदेश में गिरफ्तारी हुई थी। नियमों के तहत ये पेंशन से वंचित हो सकते हैं। यूपी, उत्तराखंड और एमपी में मीसा बंदियों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा देकर 15 हजार पेंशन दी जा रही है, लेकिन राजस्थान के नेताओं की पेंशन में नियम रुकावट बने हैं।

शुरुआत में 850 को पेंशन
2222 नेता राज्य के आपातकाल के दौरान मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा), डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स (डीआईआर), धारा 151 और 107 के तहत विभिन्न जेलों में बंद रहे 850 को ही पेंशन मिल पाएगी शुरू में। ये वो नेता हैं, जिन्होंने प्रदेश की जेलों में बंद रहने का रिकॉर्ड दे दिया है | 40 साल में आधे से ज्यादा नेताओं की मौत हो चुकी है, तो कुछ नेता रिकॉर्ड नहीं मिल पाने के कारण आवेदन नहीं कर पाए।

इन जेलों में रिकॉर्ड नहीं
टोंक, झालावाड़, बाड़मेर, चित्तौडग़ढ़, जैसलमेर, कोटा, उदयपुर बांसवाड़ा आदि। कौशल किशोर जैन बताते हैं कि जेल प्रशासन की दलील है कि 10-15 साल पुराना रिकॉर्ड नहीं है, तो 40 साल पुराना रिकॉर्ड कहां से लाएं?

सरकार गई, योजना बंद
पूर्ववर्ती वसुंधरा सरकार ने 1 अप्रैल  2008 को मीसा बंदियों के लिए पेंशन करने की घोषणा की थी, दिसंबर 2008 में सरकार बदलते ही योजना पर रोक लगा दी गई। वसुंधरा ने फिर सत्ता में आते ही इसे लागू करने का मानस बनाया है। बंदियों को प्रति माह 12 हजार रु. पेंशन,1200 रु. चिकित्सा भत्ता दिया जाएगा। जिन बंदियों की मृत्यु हो चुकी है उनकी पत्नी पेंशन की हकदार होगी।

॥राजस्थान के मूल निवासी और प्रदेश की जेल में बंद रहने वाले ही पेंशन के दायरे में आएंगे। 30 अप्रैल तक बंदियों के आवेदन मांगे हैं। 
- राकेश श्रीवास्तव, अतिरिक्त मुख्य सचिव सामान्य प्रशासन विभाग 


॥मीसा बंदियों का रिकॉर्ड जर्जर हो गया है। फटे-पुराने कागजों को जोड़कर सर्टिफिकेट दिए गए हैं। कागज इतने पुराने हैं कि रिकॉर्ड खंगालने में पांच दिन लग गया। 
- राकेश भार्गव, अधीक्षक, अजमेर कारागार 

॥ सरकार चाहे तो आपातकाल में बंद रहे कैलाश मेघवाल, घनश्याम तिवाड़ी और गुलाबचंद कटारिया की कमेटी बनाकर फैसला कर ले कि कौन लोग जेलों में रहे।
- कौशल किशोर जैन, मीसा बंदी, पूर्व एमएलए और लोकतंत्र रक्षा मंच राजस्थान के संस्थापक अध्यक्ष