सोमवार, 4 मई 2015

फोर्ड फाउंडेशन फंसा : गैर कानूनी हरकतों से



भारत में धर्मांतरण , आराजकता और साम्प्रदायिकता को अपनी फंडिंग से सपोर्ट देने वाली संस्थाओं पर सिकंजा कस जा रहा हे। इसी क्रम में यह कार्यवाही हुई है !


राजनीतिक फंडिंग में फंसा फोर्ड फाउंडेशन

Publish Date:Mon, 04 May 2015

नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। पूरी दुनिया में स्वयंसेवी संस्थाओं (एनजीओ) को सहायता देने वाला फोर्ड फाउंडेशन भारत में राजनीतिक दलों को धन देने के आरोपों में घिर गया है। गृह मंत्रालय की माने तो एनजीओ को फोर्ड फाउंडेशन से मिला फंड राजनीतिक दल के खाते में जाने के सुबूत मिले हैं। वैसे फोर्ड फाउंडेशन इससे साफ इंकार कर रहा है, लेकिन उसने यह स्वीकार किया है कि कुछ लाभ में चल रही संस्थाओं को उसने फंडिंग की है, जो तय नियमों के खिलाफ है।
गृह मंत्रालय पहले ही फोर्ड फाउंडेशन की सहायता के लिए पूर्व अनुमति की शर्त लगा चुका है। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जांच में फोर्ड फाउंडेशन की ओर से एक एनजीओ को आवंटित धन एक राजनीतिक दल को मिलने के सुबूत मिले हैं। वैसे अधिकारी ने राजनीतिक दल का नाम बताने से इंकार कर दिया, लेकिन माना जा रहा है कि यह दल अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) है। उन्होंने कहा कि जल्द ही इस संबंध में फोर्ड फाउंडेशन से सफाई मांगी जाएगी।
राजनीतिक फंडिंग ही नहीं, फोर्ड फाउंडेशन पर लाभ कमाने वाली संस्थाओं को वित्तीय मदद देने के आरोप हैं। वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि फाउंडेशन ने ऐसी कई संस्थाओं का वित्त पोषण किया है, जो लाभ में चलती हैं। नियम के मुताबिक, ऐसी संस्थाएं एनजीओ को मिलने वाली वित्तीय मदद के हकदार नहीं हैं। फोर्ड ने ऐसे संस्थाओं को वित्तीय मदद की बात स्वीकार कर ली है।
विदेशी सहायता नियमन कानून (एफसीआरए) के तहत कोई भी दाता किसी राजनीतिक दल या लाभ प्राप्त करने वाली संस्था को दान नहीं दे सकता है। गृह मंत्रालय पहले ही फोर्ड फाउंडेशन को निगरानी सूची में डाल चुका है। साथ ही आरबीआइ से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि फोर्ड फाउंडेशन से किसी व्यक्ति, एनजीओ या भारत में किसी संगठन को मिलने वाली वित्तीय मदद की पूर्व जानकारी गृह मंत्रालय को दी जाए।

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फोर्ड फाउंडेशन के भविष्य पर अनिश्चितता बरकरार
साहिल मक्कड़ /  April 29, 2015

गृह मंत्रालय ने 23 अप्रैल को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के जरिये सभी बैंकों को यह निर्देश दिया कि वे सरकार की अनुमति के बगैर फोर्ड फाउंडेशन के खाते से किसी व्यक्ति या संस्था को पूंजी न दें। ऐसा पहली बार हो रहा है जब फोर्ड फाउंडेशन पर निगरानी रखी जा रही है। अमेरिका के इस परोपकारी संगठन का इतिहास पुराना है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1952 में दिल्ली में कार्यालय खोलने के लिए इस संगठन को आमंत्रित किया। उस वक्त से लेकर अब तक फाउंडेशन ने 3,500 से ज्यादा अनुदान दिया है। फाउंडेशन ने करीब 1.250 संस्थानों को 50.8 करोड़ डॉलर से ज्यादा रकम दी है। भारत में इस संगठन ने ज्यादातर पूंजी गैर-लाभकारी संगठनों को दी है लेकिन नेपाल और श्रीलंका के समूहों को भी इसके दिल्ली के कार्यालय से रकम दी गई हैं।

पिछले तीन सालों में ही फाउंडेशन ने करीब 2.39 करोड़ डॉलर का अनुदान दिया है जिसमें से 1.37 करोड़ डॉलर वर्ष 2013 में दिए गए। वर्ष 2012 में अनुदान के तौर पर 46 लाख डॉलर दिए गए। वर्ष 2014 में जब भारत में आम चुनाव हुए और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का नेतृत्व कर रहे नरेंद्र मोदी ने सरकार बनाई उस वक्त इस संस्था ने 56 लाख डॉलर का योगदान दिया। अब इसी भाजपा सरकार ने विदेशी योगदान (नियमन) कानून, 2010 (एफसीआरए) के प्रावधानों के तहत फाउंडेशन की गतिविधियों पर निगाह रखने का फैसला किया ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों से कोई समझौता किए बगैर अनुदानों का इस्तेमाल वास्तविक कल्याणकारी गतिविधियों में किया जा सके। एफसीआरए के प्रावधानों के मुताबिक अनुदान का इस्तेमाल राजनीतिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता है।

गुजरात सरकार की एक रिपोर्ट के आधार पर फाउंडेशन के खिलाफ गृह मंत्रालय ने कार्रवाई करने का फैसला किया। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने उस रिपोर्ट की समीक्षा की थी जिसमें कथित तौर पर यह आरोप है कि सबरंग ट्रस्ट और सबरंग कम्युनिकेशंस ऐंड पब्लिशिंग प्राइवेट लिमिटेड (एससीपीपीएल) फोर्ड फाउंडेशन के प्रतिनिधि कार्यालय हैं और फोर्ड फाउंडेशन लंबी अवधि की अपनी किसी योजना की वजह से इन्हें स्थापित करने के साथ ही इसका इस्तेमाल कर रहा है। फाउंडेशन ने सबरंग ट्रस्ट को 2,50,000 डॉलर और एससीपीपीएल को 2,90,000 डॉलर दिए हैं। इस ट्रस्ट को 2002 के गुजरात दंगा पीडि़तों की आर्थिक और कानूनी मदद मुहैया कराने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फंड भी मिलता रहा है। गुजरात सरकार की रिपोर्ट में कहा गया है, 'फोर्ड फाउंडेशन ने भारत में एक ऐसे संस्थान को समर्थन दिया है जो सामाजिक पक्षपाती रवैये के साथ सांप्रदायिक तनाव भड़काने की रणनीति पर काम करता है। फोर्ड फाउंडेशन ने सबरंग ट्रस्ट को एक धर्म और मुसलमानों का समर्थन करने वाले आपराधिक नियमों की वकालत करने के लिए प्रोत्साहित किया है और 2002 के दंगे की बात बरकरार रखी है।' वर्ष 2002 में गुजरात में अब तक की सबसे भयानक सांप्रदायिक हिंसा देखी गई जिसमें करीब 1,000 लोग मारे गए। उस वक्त मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे।

फाउंडेशन की भारतीय प्रतिनिधि कविता एन रामदास से मुलाकात के लिए भेजे गए मेल का कोई जवाब नहीं मिला। भारत में इस फाउंडेशन की चार सदस्यों वाली टीम है। इस फाउंडेशन ने ईमेल के जरिये आरोपों के जवाब में अपनी प्रतिक्रिया दी है। इसमें कहा गया है, 'हम इस देश के कानून का सम्मान करते हैं और करते रहेंगे और यह प्रक्रिया अब जारी है। हम इस बात की पुष्टि करना चाहते हैं कि फाउंडेशन राजनीतिक दलों की फंडिंग नहीं करता है।' इसमें कहा गया है, 'हालांकि फाउंडेशन दूसरी कई संस्थाओं के साथ भी काम करता है जिसमें गैर लाभकारी संस्थाएं, सरकारी और अर्ध सरकारी संस्थाएं और विश्वविद्यालय के अलावा लाभकारी संस्थाओं की मदद भी किसी खास काम की जरूरतों के आधार पर करते हैं। इसमें लाभ के लिए काम करने वाली संस्थाओं को फाउंडेशन और इसकी अनुदान पाने वाली संस्थाओं को सेवाएं देने के लिए जोड़ा जाता है। मसलन वर्षा पर निर्भर रहने वाले राज्यों के किसानों और उत्पादनकर्ताओं को पेशेवर सेवाएं मुहैया कराने का एक अनुबंध शामिल है ताकि उनके कृषि उत्पादों की बिक्री और मार्केटिंग में सुधार लाया जाए और ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्र के गरीबों के लिए इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ाने में उनकी सेवाएं ली जाती हैं।'

फाउंडेशन का कहना है कि अभी इसे गृह मंत्रालय से संपर्क करना है। उनका कहना है, 'अगर सरकार हमें कुछ तरीके सुझाती है जिससे हम अनुदान देने की प्रक्रिया को मजबूत बना सकें या उसमें सुधार ला सकें तो हम उनका सहयोग करने के लिए जरूर ऐसा करेंगे।' इससे पहले भी इस संगठन पर अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के लिए काम करने का आरोप लगता रहा है। सेंटर फॉर दि स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) की सीनियर फेलो मधु किश्वर का कहना है कि फोर्ड फाउंडेशन विभिन्न संगठनों को अपने अनुदान के जरिये भारत सरकार की नीतियों को प्रभावित करते रहे हैं। उनका कहना है, 'भाजपा की आलोचना करने के लिए कांग्रेस और वाम दलों के आदेश पर ऐसा किया गया था। हम ऐसे संगठनों को अल्पसंख्यकों के लोकतांत्रिक अधिकारों के नाम पर और उसकी आड़ में समाज को बांटने नहीं दे सकते हैं।' किश्वर देश में विदेशी अनुदान को पूरी तरह बंद कराने के अभियान में सक्रिय रही हैं।

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तीस्ता समर्थक फोर्ड फाउंडेशन निशाने पर

By khaskhabar, 15 Apr 2015

(15 Apr) नई दिल्ली/अहमदाबाद। गुजरात दंगा पीडितों के लिए जमा किए गए फंड में गबन के आरोपों से घिरी सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड के फाइनैंसर अमेरिकी एनजीओ फोर्ड फाउंडेशन भी अब गुजरात सरकार निशाने पर आ गया है। गुजरात सरकार का आरोप है कि फोर्ड फाउंडेशन भारत के आंतरिक मामलों में सीधे दखल दे रहा है और देश में सांप्रदायिक सौहार्द को खराब करने के लिए काम कर रहा है। गुजरात सरकार ने इस संबंध केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को लिखी चिटी में सीतलवाड के एनजीओ सबरंग ट्रस्ट और सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस के खिलाफ फेमा के उल्लंघन के आरोपों की जांच की अपील की गई है। चिट्ठी में इन एनजीओ को फोर्ड फाउंडेशन का प्रॉक्सी ऑफिस करार दिया गया है। चिटी में यह भी कहा गया है कि तीस्ता और उनके पति जावेद आनंद ने विदेश में देश की छवि को नुकसान पहुंचाया। गुजरात सरकार की चिटी पर कार्रवाई करते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले सप्ताह सीतलवाड के एनजीओ के खातों की जांच के लिए अपनी टीम भेजी थी। टीम ने जांच पूरी कर ली है और वह जल्द ही अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। गुजरात के गृह विभाग ने फोर्ड फाउंडेशन पर यह आरोप भी लगाया है कि उसने भारतीय न्यायिक व्यवस्था में दखल देने और भारतीय सेना को बदनाम करने की कोशिश की। उसने सांप्रदायिक सौहार्द को बढावा देने के राज्य सरकार के घोषित उद्देश्य के खिलाफ काम किया। इसमें यह आरोप भी लगाया गया है कि फाउंडेशन ने सीतलवाड के एनजीओ को एक धर्म आधारित और मुस्लिम समर्थक अपराध संहिता की पैरवी के लिए उकसाया। गुजरात सरकार ने फोर्ड फाउंडेशन पर यह आरोप लगाया कि उसने बेबाक तरीके से एक धर्म (इस्लाम) का इस तर्क के साथ समर्थन किया कि इससे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को मदद मिलेगी। गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव जीआर आलोरिया ने कहा कि हमने केंद्रीय गृह मंत्रालय को एक महीना पहले पत्र लिखा था और अब उसके जवाब का इंतजार कर रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा, इस मामले में फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट, 2010 का उल्लंघन पाया गया तो कार्रवाई शुरू करने से पहले एनजीओ से सफाई मांगेंगे। ये हैं गुजरात सरकार की ओर से लगाए गए प्रमुख आरोप.... सबरंग ट्रस्ट और सबरंग कम्युनिकेशन एंड पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड (एससीपीपीएल) को फोर्ड फाउंडेशन से 5.4 लाख अमेरिकी डॉलर यानी करीब साढे तीन करोड रूपये मिले। सवाल इस बात को लेकर है कि एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी (एससीपीपीएल) को कैसे भारत में सांप्रदायिकता और जातीय भेदभाव से निपटने के लिए 2.9 लाख डॉलर अनुदान के रूप में मिले। एक प्रॉजेक्ट के लिए मिले ढाई लाख अमेरिकी डॉलर में से 80 फीसदी ऑफिस के खर्चों पर खर्च किए गए। एससीपीपीएल को मिले 2.9 लाख डॉलर में से भी 75 फीसदी ऑफिस पर खर्च किए गए। अपने अनुदान से पाकिस्तानी मानवाधिकार संगठन के लोगों की भारत यात्रा करवाकर फोर्ड फाउंडेशन ने अपनी सीमा का उल्लंघन किया। इसके अलावा देश की सांप्रदायिक स्थिति पर अतिरेकपूर्ण विचारों को प्रसारित करवाया। एससीपीपीएल को यह कहने की इजाजत देना कि सेना और नौसेना में कार्यरत और रिटायर हो चुके अधिकारी आतंक को बढावा दे रहे हैं, भारतीय सेना के लिए मानहानि को बढावा देना है। तीस्ता सीतलवाड ने खुद कहा था कि सबरंग ने गुजरात दंगों के दौरान के 5 लाख कॉल रिकॉर्ड्स का विश्लेषण किया था। फोर्ड फाउंडेशन ने ऎसी गैरकानूनी और अनधिकृत गतिविधि पर आपत्ति क्यों नहीं जताई!
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आगे केजरीवाल, पीछे ‘सीआईए’ ‘फोर्ड’
अरविंद केजरीवाल की शुरुआत ऐसे रास्तों से हो रही है, जिससे एक जमाने में मर्यादित राजनैतिक दल अपने शुरुआती समय में बचत थे। ‘इंडिया अंगेस्ट करप्शन’ अभियान से आंदोलन बनता, इसे पहले ही राजनैतिक महत्वाकांक्षा ने उससे बिखेर दिया। अन्ना और अरविंद में मतभेद वैचारिक नहीं, बल्कि इस मतभेद का आधार अविश्वास और राजनैतिक महत्वकांक्षा रही।
जब तक अरविंद केजरावाल को लगा कि अन्ना को अपने अनुसार चला सकते हैं, तबतक उनके पीछे रहे। लेकिन जैसे ही अन्ना हजारे ने पैसे और पारदर्शिता का सवाल उठाया, तब से मतभेद शुरू हुए। अब अरविंद केजरीवाल संसदीय राजनीति के रास्ते पर निकल चुके हैं। उन वादों के साथ, जो कभी आजादी के बाद सत्ता में आने वाले नेताओं ने किए और बाद में जेपी आंदोलन से निकले हुए राजनेताओं ने किए। अब उन्हीं नेताओं के खिलाफ उन्हीं की ही तरह के वादों के साथ केजरीवाल आए हैं। फैसला देश की जनता को करना है। वह इतिहास दोहराती है या फिर नया लिखती है।
फोर्ड फाउंडेशन से रिश्ता
अमेरिकी खुफिया एंजेसी सीआईए और फोर्ड फाउंडेशन के दस्तावेजों पर आधारित एक किताब 1999 में आई थी। किताब का नाम है ‘हू पेड द पाइपर? सीआईए एंड द कल्चरल कोल्ड वार’। फ्रांसेस स्टोनर सांडर्स ने अपनी इस किताब में दुनियाभर में सीआईए के काम करने के तरीके को समझाया है। दस्तावेजों के आधार पर लेखक सान्डर्स ने सीआईए और कई नामचीन संगठनों के संबंधों को उजागर किया है। किताब के मुताबिक फोर्ड फाउंडेशन और अमेरिका के मित्र देशों के कई संगठनों के जरिए सीआईए दूसरे देशों में अपने लोगों को धन मुहैया करवाता है।
केजरीवाल की भ्रष्टाचार भगाने की मुहिम फोर्ड फाउंडेशन के पैसे से चल रही है, फोर्ड फाउंडेशन अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का फ्रंटल ऑर्गेनाइजेशन है जो दुनिया के कुछ देशों में सिविल सोसाइटी नाम से मुहिम चला रहा है।” शर्मा के मुताबिक फोर्ड फाउंडेशन कई देशों में सरकार विरोधी आंदोलनों को समर्थन देता रहा है। साथ ही आर्थिक सहयोग भी मुहैया कराता है। इसी रास्ते उन देशों में अपना एजेंडा चलाता है। केजरीवाल और उनकी टीम के अन्य सदस्य संयुक्त रूप से फोर्ड फाउंडेशन से आर्थिक मदद लेते रहे हैं।
ये सवाल भी लोग पूछ रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल आखिर 20 सालों तक दिल्ली में ही कैसे नौकरी करते रहे? जबकि राजस्व अधिकारी को एक निश्चित स्थान व पद पर तीन वर्ष के लिए ही तैनात किया जा सकता है। अरविंद की पत्नी पर भी उनके महकमें की कृपा रही। ऐसे में सवाल तो उठेंगे ही, क्योंकि अशोक खेमका, नीरज कुमार और अशोक भाटिया जैसे अधिकारियों की हालत जनता देख रही है। अशोक खेमका को 19 साल की नौकरी में 43 तबादलों का सामना करना पड़ा है। नीरज कुमार को 15 साल के कैरियर में 15 बार इधर-उधर किया गया है।
source
http://thepatrika.com/NewsPortal/h?cID=FmTPgyfdHMs%3D