सोमवार, 15 जून 2015

राष्ट्र सेवा के व्रती गढ़ने का उपक्रम: संघ शिक्षा वर्ग

राष्ट्र सेवा के व्रती गढ़ने का उपक्रम: संघ शिक्षा वर्ग


नागपुर की भयंकर गर्मी की तपिश को सहते हुए कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक और गुजरात से मणिपुर तक के ये युवा सुबह ५ बजे से रात्रि १० बजे तक अविरत कार्यमग्न रहते हैं. नागपुर के रेशिमबाग में यह दृश्य पिछले लगभग तीन सप्ताह से लोगों के परिचय का हो चूका हैं. शुरू में लगनेवाले आश्चर्य का स्थान अब इस युवकों के प्रति स्नेह और प्यार में परिवर्तित हो चूका हैं.

जी हाँ, ये दृश्य है नागपुर में प्रतिवर्ष होने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का. हर वर्ष देश के विभिन्न प्रान्तों से स्वयंसेवक नागपुर आते हैं. संघ संस्थापक आद्य सरसंघचालक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार और द्वीतीय सरसंघचालक पूजनीय माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरूजी के कर्मस्थली में उनकी समाधी की छत्रछाया में संघकार्य का प्रशिक्षण ग्रहण करते हैं और अपने-अपने कार्यक्षेत्र में जाकर संघ का हिन्दू समाज के संघटन का काम करने हेतु स्वयं को तैयार करते हैं.
पिछले लगभग ८५ वर्षीं से यह साधना अखंड चल रही हैं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या आर एस एस यह नाम आज देश-विदेशों में नया नहीं रहा. जहाँ एक ओर संघ के बढ़ते प्रभाव ने सामान्य नागरिक को आश्वस्त किया हैं वहीँ दूसरी ओर हिंदुत्व के विरोधियों के दिल में धडकने बढ़ दी हैं. २०१४ के चुनाव के बाद जब से नरेन्द्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के पश्चात अनेकों विवादों में संघ को घेरने का प्रयास हो रहा हैं, हालांकि संघ के विरोधक उसमे सफल नहीं हो रहे. उनके अनेक प्रयासों के बावजूद संघ की शक्ति दिन दुनी रात चौगुनी बढती ही चली जा रही हैं और अब तो विदेशों में भी ३५ देशों में ६०० से अधिक शाखाएं चल रही हैं.
संघ का यह जो विस्तार हुआ उस के रीढ़ की हड्डी अगर कोई हैं तो संघ के स्वयंसेवक हैं यह सब जानते हैं. डॉक्टर हेडगेवारजी ने जब हिन्दू समाज को संगठित करने का संकल्प किया तो उस संकल्प की पूर्ति के लिए उन्होंने किशोर एवं बालकों को चुना. उन्हें संस्कारित करने दैनंदिन शाखा का सरल परन्तु प्रभावी तंत्र दिया और संगठन को देश भर पहुँचाया.
प्रारंभ में संघ का काम नागपुर में १९२५ के विजयादशमी को शुरू हुआ. पर जैसे-जैसे अन्य प्रान्तों में संघ शुरू करने की आवश्यकता अनुभव हुई तो संघ के तंत्र में और कार्यपद्धति में प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता भी महसूस हुई. इसी आवश्यकता ने संघ शिक्षा वर्ग की संकल्पना को जन्म दिया.
संघ के एक ज्येष्ठ्य कार्यकर्ता एवं जानकार रहे स्व.बापुरावजी वराडपांडे के अनुसार प्रथम संघ शिक्षा वर्ग की योजना १९२९ में बनी. विद्यार्थी स्वयंसेवकों की संख्या अधिक होने के कारण छुट्टियों का ध्यान रखते हुए यह वर्ग १ मई से १० जून इस कालावधि में होगा ऐसा तय किया गया. इस वर्ग में प्रतिभागी स्वयंसेवकों के शारीरिक-मानसिक-बौद्धिक-आत्मिक उन्नति के साथ-साथ संघकार्य करने की क्षमता का विकास करना यह प्राथमिक उद्देश्य इस संघ शिक्षा वर्ग का रखा गया.
इस वर्ग का नाम क्या हो इस पर भी विचार-विमर्श हुआ और Officers’ Training Camp (OTC) ऐसा अंग्रेजी में नाम तय हुआ. संघ के प्रारंभिक काल में सभी आज्ञाएँ अंग्रेजी में हुआ करती थी. इसलिए शायद वर्ग का नाम भी अंग्रेजी में सोचा गया.

आगे चल कर किसी ने इसका हिंदी में अनुवाद कर “अधिकारी शिक्षण वर्ग” (अशिव) ऐसा कर दिया. पर बाद में पूजनीय श्री गुरूजी के सुझाव के साथ इस का नाम १९५० के बाद संघ शिक्षा वर्ग (सशिव) ऐसा रूढ़ हुआ. पर आज भी पुराने स्वयंसेवकों से हम ‘ओटीसी’ ही सुनते हैं.
शुरू में संघ शिक्षा वर्गों का आयोजन नागपुर में ही होता था क्यों की संघ का विस्तार नागपुर और आस-पास  के क्षेत्र में था. १९३७ तक इस संघ शिक्षा वर्ग में प्रत्येक शनिवार को रात्रि को मनोरंजन के कार्यक्रम होते थे और अगले दिन रविवार को साप्ताहिक छुट्टी रहती थी. लेकिन १९३८ में यह साप्ताहिक अवकाश बंद कर दिया और वर्ग के कार्यक्रम अन्य दिनों की तरह रविवार को भी होने लगे. बाद में ४० दिन की अवधि घटाकर ३० दिन की की गई.
१९३४ तक संघ शिक्षा वर्ग नागपुर में ही होते थे. १९३५ से पुणे में ऐसा ही एक वर्ग शुरू हुआ. पुणे का वर्ग २२ अप्रैल से २ जून तक और नागपुर का १ मई से १० जून तक होता था और पूजनीय डॉक्टर हेडगेवार पुणे में १५ मई तक और बाद में नागपुर के वर्ग में रहते थे. वर्ग में सम्मिलित प्रत्येक स्वयंसेवक से व्यक्तिशः मिलना, उसके बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त करना और उससे आत्मीय सम्बन्ध बना कर उसे संघ कार्य के लिए प्रेरित करना यही उनका उद्देश्य रहता था.
१९३८ में लाहोर में प्रथम और द्वितीय वर्ष के वर्ग का आयोजन किया गया था. लाहोर का वर्ग वहां के कॉलेज के छात्रों के ग्रीष्म अवकाश के अनुसार तय किया गया. उसके बाद अन्य प्रान्तों में बढ़ते संघकार्य को देखते हुए संघ शिक्षा वर्गों का आयोजन किया जाने लगा.
नागपुर के पास सिंदी में संघ के प्रमुख कार्यकर्ताओं की एक चिंतन बैठक १९३९ में हुई. इस बैठक में डॉक्टर हेडगेवार, श्री गुरूजी, बालासाहेब देवरस, अप्पाजी जोशी, जैसे मूर्धन्य कार्यकर्ता थे. उस बैठक में संघ शिक्षा वर्गों के विषय में श्री बालासाहेब देवरस ने जो विचार रखे वे सभी को मान्य हुए. श्री बालासाहेबने कहा: “१९३५ से हम पुणे में ग्रीष्म कालीन वर्ग आयोजित कर रहे हैं. अभी पिछले वर्ष (१९३८) में लाहोर में भी वर्ग हुआ. कार्य के विस्तार के साथ अन्य प्रान्तों में भी ऐसे वर्ग होंगे. पर नागपुर का अपना एक वैशिष्ट्यपूर्ण महत्त्व हैं. सभी प्रान्तों से स्वयंसेवक वर्ग में एकसाथ रहे इसका संस्कार अधिक परिणामकारक होगा. संघ का प्रशिक्षण तीन वर्षों में विभाजित करने का हम विचार कर रहे हैं. मुझे ऐसा लगता हैं की प्रथम और द्वितीय वर्ष का संघ शिक्षा वर्ग उस-उस प्रान्त का हो. पर तृतीय वर्ष का वर्ग केवल नागपुर में ही होना चाहिए. इस वर्ग के लिए देश के सभी प्रान्तों से स्वयंसेवक नागपुर आये यह जरुरी हैं. हम इस विषय में आग्रही रहे.”.
श्री बालासाहेबजी का यह विचार सर्वमान्य हुआ और तब से संघ के तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण वर्ग नागपुर में रेशमबाग़ में डॉक्टर हेडगेवार की कर्मस्थली एवं श्री गुरूजी के समाधी के सान्निध्य में संपन्न होता हैं. संघ के ९० साल के इतिहास में आपातकाल के दो वर्षों का कालखंड और १९४८ के प्रतिबन्ध का काल छोड़ कर यह परंपरा चल रही हैं.

इसी परंपरा में संघ में जो वरिष्ठ स्वयंसेवक हैं और जिन के द्वारा कठोर शारीरिक परिश्रम करना संभव नहीं पर संघ के माध्यम से चलाये जा रहे विविध क्षेत्रों में कामों में जो सहयोग कर सकते हैं ऐसे स्वयंसेवकों के लिए विशेष संघ शिक्षा वर्ग का आयोजन पिछले ७-८ वर्षों से शुरू किया गया हैं. इस वर्ग में प्रतिभागी स्वयंसेवकों की आयु मर्यादा ४० से ६०-६५ तक की हैं और उनके लिए सेवा, ग्रामविकास, गोरक्षा, जैविक कृषि, प्रचार जैसे विषय रखे गए हैं. साथ ही योगासन, और कुछ शारीरिक भी होता हैं.
किन्तु ग्रीष्म काल में आयोजित वर्गों में १८-४० तक आयु के स्वयंसेवक हिस्सा लेते हैं और प्रातः ५ बजे से रात्रि १० बजे तक शारीरिक, बौद्धिक, चर्चा, घोष आदि का प्रशिक्षण पाते हैं. संघ के कोई वरिष्ठ अधिकारी वर्ग के पालक अधिकारी होते हैं और पूर्ण समय वर्ग में रहकर सभी स्वयंसेवकों से आत्मीय संपर्क बनाते हैं. इस वर्ष नागपुर के तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग में अखिल भारतीय सहसंपर्क प्रमुख श्री अरुण कुमारजी पालक अधिकारी हैं. चित्तोड़ प्रान्त के श्री गोविन्द जी टांक सर्वाधिकारी और गुजरात के श्री यशवंतभाई चौधरी वर्ग के कार्यवाह हैं.
सरसंघचालक डॉक्टर मोहनराव भागवत, सरकार्यवाह श्री भय्याजी जोशी, सह सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबले, डॉक्टर कृष्ण गोपाल, सुरेशजी सोनी, भागय्याजी, और संघ हे अखिल भारतीय अधिकारी तथा वरिष्ठ नेता वर्ग में आकर स्वयंसेवकों का बौद्धिक स्तर उन्नत करनेका प्रयास करते हैं. देश, समाज और विश्व की समस्याएं और उनके समाधान का हिन्दू तत्वज्ञान के प्रकाश में रास्ता और उसमे संघ का कार्य कैसे सहायक सिद्ध हो सकता हैं इस की चर्चा होती विभिन्न आयामों से होती हैं.
नागपुर के संघ शिक्षा वर्ग का एक और वैशिष्ट्य हैं. यहाँ भारत के सभी प्रान्तों से स्वयंसेवक आते हैं. प्रवास का खर्चा, वर्ग का २५ दिन का व्यय, संघ के गणवेश का खर्चा स्वयम उठाते हैं और नागपुर की भीषण गर्मी में बड़े उत्साह से रहते हैं. इस बार के वर्ग में १६ भाषाएँ बोलनेवाले स्वयंसेवक हैं. एक प्रकार से विविधताओं से भरपूर भारत का यह एक लघु रूप दिखाई देता हैं. सभी भाषाये अपने हैं यह आत्मीयता का भाव निर्माण होता हैं और उसका कारण हैं गणशः रचना. अलग-अलग भाषा बोलनेवाले स्वयंसेवक एक गण में होते हैं और परस्पर टूटी-फूटी हिंदी में बात करते हैं साथ में एक दुसरे के भाषा के कुछ शब्द सीख भी लेते हैं.

इस वर्ग में प्रवेश के लिए कुछ निर्धारित मानक तय किये गए हैं. तृतीय वर्ष का वर्ग संघ का दीक्षांत वर्ग होता हैं. प्रथम और द्वितीय वर्ष के वर्गों में अपने-अपने प्रान्तों में स्वयंसेवक जो शिक्षा पाते हैं उससे उन्नत इस वर्ग का पाठ्यक्रम होता हैं. साथ में इस वर्ग के उपरांत संघ कार्य के लिए अपने जीवन के कुछ वर्ष देने का संकल्प करनेवाले स्वयंसेवक प्रचारक के रूप में निकलते हैं. इस वर्ग में आनेवाले स्वयंसेवक अपने-अपने प्रान्त में जाकर संघ के काम को अधिक मजबूती से करेंगे ऐसी अपेक्षा भी रहती हैं. यह सब पूर्ण करने की क्षमता रखनेवाले अनुभवी, मंजे हुए और प्रत्यक्ष संघ के कार्य में हैं ऐसे ही स्वयंसेवकों का चयन इस वर्ग के लिए होता हैं.
संघ का एक घोषित उद्देश्य हैं, एक मिशन हैं. वह हैं ‘परम वैभवं नेतुमेतत स्वराष्ट्रं’. याने इस देश को परमवैभव तक ले जाना. इस उद्देश्य पूर्ति के लिए स्वयंसेवक एक उपकरण हैं और शाखा इसका साधन हैं. अतः यह उपकरण अधिक प्रभावी हो सके इस हेतु से संघ शिक्षा वर्गों का आयोजन होता हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस उद्देश्य की बड़ी सरल भाषा में व्याख्या की हैं ‘सब का साथ सब का विकास’. संघ के शाखा के अलावा देश भर में पिछड़े, दुर्बल, वनवासी, बंधुओं के लिये लाखो सेवा कार्य चलते हैं. इस सभी कार्यों को सुचारू रुप से चला कर अपनी ध्येय पूर्ति की ओर अग्रेसर होने के लिए इन संघ शिक्षा वर्गों में सम्मिलित स्वयंसेवक अपना महति योगदान दे सके इसीलिए यह संघ शिक्षा वर्ग की साधना में संघ निरंतर लगा हुआ हैं

समतायुक्त, शोषणमुक्त समाज निर्माण संघ कर रहा है – प.पू. डॉ. मोहनजी भागवत

समतायुक्त, समतायुक्त,शोषणमुक्त समाज निर्माण संघ कर रहा है – डॉ. मोहनजी भागवत

सरसंघचालक प.पू. डॉ मोहन जी भागवत समारोप कार्यक्रम में संबोधित करते हुए


नागपुर. सरसंघचालक प.पू. डॉ मोहन जी भागवत ने कहा कि भारत में, हर क्षेत्र में आज बदलाव का अनुभव हो रहा है. दुनिया में भारत की मान-प्रतिष्ठा बढ रही है, भारत के प्रति दुनिया की आशा-आकांक्षा बढ़ रही है. सरसंघचालक जी रेशिमबाग परिसर में तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग के समारोप कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे.

भारत के प्रति दुनिया के इस बदले हुए दृष्टिकोण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि, भारत के प्रधानमंत्री द्वारा ‘योग दिवस’ के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव रखते ही, यह प्रस्ताव चर्चा के बिना ही तीन चौथाई से मतों पारित हो गया. दुनिया भारत द्वारा पहल करने की राह देख रही  थी.
उन्होंने कहा कि शक्ति के क्षेत्र में जिसकी शक्ति बढ़ती है, उसकी प्रतिष्ठा बढती है. आर्थिक-सामरिक क्षमता के आधार पर ऐसा होता है. लेकिन समयचक्र बदलने पर उस देश की मान और प्रतिष्ठा भी कम हो जाती है.

किंतु भारत के संदर्भ में ऐसा नहीं है. भारत अपने अस्तित्व के समय से आज तक भले ही भौतिक दृष्टि से दुर्बल रहा हो, लेकिन दुनिया में विश्‍वास के संदर्भ में भारत सदैव अग्रसर रहा है. यही हमारी परंपरा है. किसी भी बात की आड़ लेकर भारत ने स्वार्थ का अजेंडा नहीं अपनाया है. विश्‍व को परिवार माना है. यह भारतीय समाज का स्वभाव है, इसे ही संस्कृति कहते है. दुनिया में बलवान बहुत होंगे, लेकिन विश्‍वासपात्र केवल एक भारत ही है, ऐसी दुनिया की भावना है.

एकात्म में आत्मसाधना और लोगों के बीच सेवा और परोपकार यह सनातन हिंदू संस्कृति है, इसने ही देश को जोड़कर रखा है. लेकिन गत हजार-पंद्रह सौ वर्षों से जो चला आ रहा है, वह सब हिंदू धर्म नहीं है, ऐसा बताते हुए मोहनजी ने कहा कि, अयोग्य बातें त्यागनी होंगी. हिंदू धर्म कोई जाति-भेद नहीं मानता, हम सब भाई-भाई हैं, ऐसी घोषणा विश्‍व हिंदू सम्मेलन में संतों और मठाधीशों ने की, इसे व्यवहार में भी उतारना होगा, संघ यही काम कर रहा है. भेदों के आधार पर व्यवहार, यह विकृति है. समाज को एकसूत्र में बांधने के लिए डॉ आंबेडकर जी के बंधुभाव का दृष्टिकोण अपनाना होगा. अंत में सरसंघचालक जी ने कहा कि, समतायुक्त, शोषण-मुक्त समाज निर्माण करने का काम संघ कर रहा है. लेकिन यह काम केवल अकेले संघ का नहीं है, सारे समाज ने इसमें हाथ बंटाना है.

कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि धर्मस्थल कर्नाटक के धर्माधिकारी पद्मविभूषण डॉ. विरेन्द्रजी हेगडे जी ने कहा कि संघ ने ‘हिंदू राष्ट्र सहोदर सर्वे’ की भावना समाज में दृढ की है. राजनितिक और आर्थिक विचार भिन्न रखनेवालों को भी देशहित की दृष्टि से हिंदुत्व की भावना अपनानी चाहिए.

भारतीय समाज में जाति-संप्रदाय के भेद थे. इन भेदों को मिटाने के लिए विश्‍व हिंदू परिषद ने देश के संत और मठाधिपीतयों को एक मंच पर लाने का उल्लेखनीय काम किया है. इसी प्रकार अस्पृश्यता और असमानता मिटाने के लिए डॉ. आंबेडकरजी ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हम सभी को इस दिशा में काम करना चाहिए.

कार्यक्रम के आरंभ में शिक्षा वर्ग में आये स्वयंसेवकों ने व्यायाम और योग के प्रात्यक्षिक प्रस्तुत किये. इस वर्ग में देश भर से 875 स्वयंसेवकों ने भाग लिया. अतिथियों का स्वागत वर्ग के सर्वाधिकारी, चित्तौड़ प्रान्त संघचालक गोविंद सिंह जी टांक ने किया. मंच पर नागपुर महानगर के संघचालक राजेश जी लोया उपस्थित थे.  कार्यक्रम का संचालन गुजरात के कार्यवाह यशवंत भाई चौधरी ने किया.