शनिवार, 27 जून 2015

शक्तिशाली संघ के रहते ‘आपातकाल’ कैसे टिक सकता था ?' - लखेश्वर चंद्रवंशी 'लखेश'




- लखेश्वर चंद्रवंशी 'लखेश'
25 जून, 1975 की काली रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘आपातकाल’ (Emergency) लगाकर देश को लगभग 21 माह के लिए अराजकता और अत्याचार के घोर अंधकार में धकेल दिया। 21 मार्च, 1977 तक भारतीय लोकतंत्र ‘इंदिरा निरंकुश तंत्र’ बनकर रह गया। उस समय जिन्होंने आपातकाल की यातनाओं को सहा, उनकी वेदनाओं और अनुभवों को जब हम पढ़ते हैं या सुनते हैं तो बड़ी हैरत होती है। आपातकाल के दौरान समाचार-पत्रों पर तालाबंदी, मनमानी ढंग से जिसे चाहें उसे कैद कर लेना और उन्हें तरह-तरह की यातनाएं देना, न्यायालयों पर नियंत्रण, ‘न वकील न दलील’ जैसी स्थिति लगभग 21 माह तक बनी रही। आज की पीढ़ी ‘आपातकाल की स्थिति’ से अनभिज्ञ है, वह ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं कर सकती। क्योंकि हम लोग जो 80 के दशक के बाद पैदा हुए, हमें ‘इंदिरा के निरंकुश शासन’ के तथ्यों से दूर रखा गया। यही कारण है कि हमारी पीढ़ी ‘आपातकाल’ की जानकारी से सरोकार नहीं रख सके।
हम तो बचपन से एक ही बात सुनते आए हैं कि इंदिरा गांधी बहुत सक्षम और सुदृढ़ प्रधानमंत्री थीं। वे बहुत गरीब हितैषी,राष्ट्रीय सुरक्षा और बल इच्छाशक्ति वाली नारी थीं। ऐसे अनेक प्रशंसा के बोल अक्सर सुनने को मिलते रहे हैं। पर आज देश में भाजपानीत ‘एनडीए’ की मोदी सरकार का शासन है। यही कारण है तथ्यों से परदा उठना शुरू हो गया है। अब पता चल रहा है कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं ने किस तरह इंदिरा का महिमामंडन कर ‘आपातकाल’ के निरंकुश शासन के तथ्यों से देश को वंचित रखा।



आपातकाल लगाना जरुरी था या मज़बूरी?  
कांग्रेस के नेता यह दलील देते हैं कि उस समय ‘आपातकाल’ लगाना बहुत जरुरी था, इसके आभाव में शासन करना कठिन हो गया था। पर तथ्य कुछ और है? कांग्रेस के कुशासन और भ्रष्टाचार से तंग आकर जनता ने भूराजस्व भी देना बंद कर दिया था। जनता ने अवैध सरकार के आदेशों की अवहेलना शुरू कर दी थी। पूरे देश में इन्दिरा सरकार इतनी अलोकप्रिय हो चुकी थी कि चारों ओर से बस एक ही आवाज़ आ रही थी - इन्दिरा गद्दी छोड़ो। इधर लोकनायक जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन अपने चरम पर था। बिहार में प्रत्येक कस्बे, तहसील, जिला और राजधानी में भी जनता सरकारों का गठन हो चुका था। जनता सरकार के प्रतिनिधियों की बात मानने के लिए ज़िला प्रशासन भी विवश था। ऐसे में इंदिरा गांधी के लिए शासन करना कठिन हो गया।
दूसरी ओर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जब इन्दिरा गांधी के रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से चुनाव को अवैध ठहराने तथा उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया तो इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता से बेदखल होने का दर सताने लगा। न्यायालय के इस निर्णय के बाद नैतिकता के आधार पर इंदिरा गांधी को इस्तीफा देना चाहिए था, लेकिन सत्ता के मोह ने उन्हें जकड लिया। सभी को किसी अनहोनी की आशंका तो थी ही, लेकिन  इंदिरा ऐसी निरंकुश हो जाएंगी, इसका किसी को अंदाजा नहीं था। उन्होंने इस्तीफ़ा नहीं दिया, बल्कि लोकतंत्र का गला घोंटना ही उचित समझा। 



प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी से 25 जून, 1975 की रात को ‘आपातकाल (इमर्जेन्सी) की घोषणा कर दी और भोर होने से पूर्व ही सीपीआई को छोड़कर सभी विरोधी दलों के नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया। इस अराजक कार्रवाई में न किसी की उम्र का लिहाज किया गया और न किसी के स्वास्थ्य की फ़िक्र ही की गई, बस जिसे चाहा उसे कारावास में डाल दिया गया। आपातकाल के दौरान लोकनायक जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जार्ज फर्नांडिस जैसे नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के तत्कालीन सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस सहित हजारों स्वयंसेवकों को कैद कर लिया गया। देश के इन राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को मीसा (Maintenance of Internal Security Act) के तहत अनजाने स्थान पर कैद कर रखा गया। मीसा वह काला कानून था जिसके तहत कैदी को कोर्ट में पेश करना आवश्यक नहीं था। इसमें ज़मानत का भी प्राविधान नहीं था।

सरकार ने जिनपर थोड़ी रियायत की उन्हें डीआईआर (Defence of India Rule) के तहत गिरफ़्तार किया गया। यह थोड़ा नरम कानून था। इसके तहत गिरफ़्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश किया जाता था।


आपातकाल और मीडिया
उस समय शहरों को छोड़कर दूरदर्शन की सुविधा कहीं थी नहीं। समाचारों के लिए सभी को आकाशवाणी तथा समाचार पत्रों पर ही निर्भर रहना पड़ता था। 25 जून, 1975 को आकाशवाणी ने रात के अपने समाचार बुलेटिन में यह समाचार प्रसारित किया कि अनियंत्रित आन्तरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपातकाल (Emergency) की घोषणा कर दी है।

बुलेटिन में कहा गया कि आपातकाल के दौरान जनता के मौलिक अधिकार स्थगित रहेंगे और सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। समाचार पत्र विशेष आचार संहिता का पालन करेंगे जिसके तहत प्रकाशन के पूर्व सभी समाचारों और लेखों को सरकारी सेन्सर से गुजरना होगा।
आपातकाल के दौरान 250 भारतीय पत्रकारों को बंदी बनाया गया, वहीं 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता ही रद्द कर दी गई। इंदिरा गांधी के इस तानाशाही के आगे अधिकांश पत्रकारों ने घुटने ही टेक दिए, इतना ही नहीं तो पत्रकारों ने ‘आप जैसा कहें, वैसा लिखेंगे’ की तर्ज पर काम करने को राजी हो गए। उस दौरान ‘दी इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपना सम्पादकीय कॉलम कोरा प्रकाशित किया और ‘जनसत्ता’ ने प्रथम पृष्ठ पर कोई समाचार न छापकर पूरे पृष्ठ को काली स्याही से रंग कर ‘आपातकाल’ के खिलाफ अपना विरोध जताया था।



आपातकाल का उद्देश्य
- कांग्रेस विरोधी दलों को समाप्त करना।
- देश में भय का वातावरण निर्माण करना।
- प्रसार माध्यमों पर नियंत्रण रखना।
- ‘इंदिरा विरोधी शक्तियों को विदेशी शक्तियों के साथ सम्बन्ध’ की झूठी अफवाहों से जनता को भ्रमित करना, तथा इस आधार पर उन्हें कारागार में डालना। 
- लोक लुभावन घोषणा देकर जनमत को अपनी ओर खींचना।
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समाप्त कर संगठित विरोध को पूरी तरह समाप्त करने का षड़यंत्र।

आपातकाल की समाप्ति में संघ की भूमिका 


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने ‘आपातकाल’ के विरुद्ध देश में भूमिगत आन्दोलन, सत्याग्रह और सत्याग्रहियों के निर्माण के लिए एक व्यापक योजना बनाई। संघ की प्रेरणा से चलाया गया भूमिगत आन्दोलन अहिंसक था। जिसका उद्देश्य देश में लोकतंत्र को बहाल करना था, जिसका आधार मानवीय सभ्यता की रक्षा, लोकतंत्र की विजय, पूंजीवाद व अधिनायकवाद का पराभव, गुलामी और शोषण का नाश, वैश्विक बंधुभाव जैसे उदात्त भाव समाहित था। आपातकाल के दौरान संघ ने भूमिगत संगठन और प्रचार की यंत्रणा स्थापित की, जिसके अंतर्गत सही जानकारी और समाचार गुप्त रूप से जनता तक पहुंचाने के लिए सम्पादन, प्रकाशन और वितरण की प्रभावी व्यवस्था बनाई गई।

साथ ही जेलों में बंद व्यक्तियों के परिवारजनों की सहायता के लिए भी व्यवस्थाएं विकसित की। संघ ने जनता के मनोधैर्य बना रहे, इसके लिए व्यापक कार्य किया। इस दौरान आपातकाल की सही जानकारी विदेशों में प्रसारित करने की भी योजना बनाई गई, इस कार्य के लिए सुब्रह्मण्यम स्वामी, मकरंद देसाई जैसे सक्षम लोग प्रयासरत थे।



आपातकाल के विरुद्ध सत्याग्रह 
आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जन आन्दोलन को सफल बनाने के लिए बहुत बहुत बड़ी भूमिका निभाई। 14 नवम्बर, 1975 से 14 जनवरी, 1976 तक पूरे देश में हजारों स्थानों पर सत्याग्रह हुए। तथ्यों के अनुसार देश में कुल 5349 स्थानों पर सत्याग्रह हुए, जिसमें 1,54,860 सत्याग्रही शामिल हुए। इन सत्याग्रहियों में 80 हजार
संघ के स्वयंसेवकों का समावेश था। सत्याग्रह के दौरान कुल 44,965 संघ से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 35,310 स्वयंसेवक थे तथा 9,655 संघ प्रेरित अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं का समावेश था।
संघ ने सत्याग्रहियों के निर्माण के लिए व्यापक अभियान चलाया। संघ समर्थक शक्तियों से सम्पर्क की यंत्रणा बनाई और सांकेतिक भाषा का उपयोग किया। देशभर में मनोधैर्य बनाए रखने तथा जागरूकता बहाल करने के लिए अनेक पत्रक बांटे गए। सारे देश में जन चेतना जाग्रत होने लगी। इसका ही परिणाम था कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मन में जन विरोध का भय सताने लगा। अचानक तानाशाही बंद  हो गईं, गिरफ़्तारियां थम गईं। पर लोकतंत्र को कुचलने के वे काले दिन इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया, पर ‘आपातकाल’ का इतिहास विद्यार्थियों तक पहुंच न सका। ऐसी आपातकाल देश में दुबारा न आए, पर पाठ्यक्रम में जरुर आना चाहिए जिससे इस पीढ़ी को जानकारी मिल सके।

आपातकाल के संघर्ष को याद रखना नई पीढ़ी के लिए जरूरी है : अमित शाह



भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह जी
द्वारा आपातकाल के ४० वर्ष - लोकतंत्र का काला अध्याय विषय
पर आयोजित संगोष्ठी पर दिये गये भाषण के प्रमुख अंश

आपातकाल ना तो अध्यादेशों से आता है और ना ही अध्यादेशों को लाने के विचारों से आता है, आपातकाल कुत्सित मानसिकता से आता है: अमित शाह

आपातकाल के संघर्ष को याद रखना नई पीढ़ी के लिए जरूरी है: अमित शाह

इतना संघर्षऔर दमन होने के बावजूद न कोई टूटा और न ही कोई झुका। वास्तव में भारत के मिटटी में लोकतंत्र की खुशबू बहुत गहरी है: अमित शाह

आज जो हमारा लोकतंत्र इतना मजबूत है, जो मीडिया की स्वतंत्रता बची है और लोगों की अभिव्यक्ति की जो स्वतंत्रता व्यापक हुई है वह आपातकाल के दौरान उन हज़ारों लोगों के बलिदान के फलस्वरूप ही संभव हो पाया है: अमित शाह

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह ने आज दिल्ली के मावलंकर हॉल में आपातकाल के ४० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी "लोकतंत्र का काला दिवस" को सम्बोधित किया।

उन्होंने अपने उद्बोधन की शुरुआत करते हुये सर्वप्रथम उनलोगों को श्रद्धा-सुमन अर्पित किया जिन्होंने आपातकाल की मानसिकता के खिलाफ संघर्ष किया था और १९७५-१९७७ के दौरान यातनाएं झेलीं थी। उन्होंने कहा कि इन्हीं लोगों ने उस नाजुक मोड़ पर देश के लोकतंत्र को न केवल बचाया वरन लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत किया तथा यह सुनिश्चित किया कि सालों साल तक किसी की हिम्मत न हो सके फिर से ऐसा दुस्साहस करने की। श्री शाह ने कहा की उनका बलिदान आनेवाली कई पीढ़ियों के लिए वंदनीय है।

श्री शाह ने सम्मलेन में द्वारिका में श्रीकृष्ण की शासन प्रणाली व मगध साम्राज्य के शासन व्यवस्था की चर्चा करते हुये कहा कि विश्व में सबसे पहले संवैधानिक शासन प्रणाली की शुरुआत भारत से ही हुई थी। भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा, सबसे मज़बूत और सबसे परिवर्तनशील लोकतंत्र है।

श्री शाह ने कहा कि २५ जून १९७५ से लेकर मार्च १९७७ तक का समय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय है। आपातकाल के संघर्ष को याद रखना नई पीढ़ी के लिए जरूरी है। आपातकाल ना तो अध्यादेशों से आता है और ना ही अध्यादेशों को लाने के विचारों से आता है, आपातकाल कुत्सित मानसिकता से आता है जब शासनतंत्र दूसरे के विचारों को सुनना ही नहीं चाहती, स्वतंत्र विचारों का दमन करने लगती है और लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को सीखचों के पीछे डाल देती है तो यह तानाशाही की ही मानसिकता होती है।

श्री शाह ने आपातकाल की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुये कहा कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही कांग्रेस में सिंडिकेट युग की शुरुआत हो गई और अंततः कांग्रेस के दो टुकड़े हो गये। उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि उस वक्त कांग्रेस के असंतुष्टों को पार्टी नहीं छोड़नी चाहिये थी, उन्हें पार्टी के अंदर रहते हुये संघर्ष करना चाहिए था ताकि लोकतंत्र की जड़ें मजबूत बनी रहती। उन लोगों के पार्टी छोड़ने से सत्ता और संगठन की सारी बागडोर इंदिरा गांधी के हाथों में आ गई और वह निरंकुश और तानाशाह हो गई और उसका ही परिणाम था कि देश को आपातकाल जैसी वीभत्स परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

श्री शाह ने कहा कि उस वक्त चापलूस और चाटुकारों का बोलबाला था, मुद्रास्फीति काफी बढ़ गई थी, शासन व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई थी और भ्रष्टाचार अपने चरम पर था। आपातकाल देश की शान्ति, सुरक्षा और संविधान की रक्षा के लिए नहीं लाया गया था जैसा कि प्रचारित किया गया वरन इसे अपनी सत्ता को बचाने के लिये लाया गया जो कि निश्चित रूप से एक असंवैधानिक कदम था।

उन्होंने एक घटना का ज़िक्र करते हुये कहा कि पटना में देवकांत बरूआ की गाड़ी ने एक ९ वर्ष के बच्चे को कुचल दिया। पूरा काफिला उस बच्चे के ऊपर से गुजर गया पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। जब यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में अगले दिन प्रकाशित हुई तो पूरे देश में आक्रोश के लहर दौड़ गई।

श्री शाह ने सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन का विस्तृत रूप से उल्लेख करते हुये कहा कि जयप्रकाश जी के आंदोलन ने पूरे देश में क्रांति की एक नई अलख जगाई थी। पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का आहवान किया था।

३ जनवरी १९७५ को तत्कालीन रेल मंत्री श्री ललित नारायण मिश्रा की हत्या कर दी गई। १२ जून १९७५ को इलाहबाद हाई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर इसे असंवैधानिक करार कर दिया। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर हालांकि रोक लगा दी और एक ऐसा फैसला दिया जिससे इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री पद पर बने रहना बिलकुल असंवैधानिक हो गया। इंदिरा गांधी और उनके पूरे शासन तंत्र ने यह प्रचारित करने की पूरी कोशिश की कि यह इंदिरा गांधी की जीत हो गयी है। इतने अपमानित तरीके से प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाई गई कि पूरा लोकतंत्र शर्मसार हो गया और अंततः २५ जून की आधी रात को पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया गया और फिर शुरू हुआ दमन चक्र। विरोधी पक्ष के लोग जो जहाँ थे उन्हें वहीं गिरफ्तार कर लिया गया, उन्हें नज़रबंद कर दिया गया। सुबह ६ बजे कैबिनेट की बैठक बुलाई गई तब कैबिनेट को पता चला कि देश में आपातकाल लगा दिया गया है। एक आंकड़े के अनुसार सुबह ६ बजे तक लगभग ९ हज़ार से ज्यादा लोगों को एक रात में ही गिरफ्तार कर लिया गया था। श्री अटल बिहारी वाजपेयी एवम श्री आडवाणी जी को बंगलोर में ही गिरफ्तार कर लिया गया।

सरकार ने अध्यादेश पर अध्यादेश जारी करके न्यायपालिका को मजबूर कर दिया, मीडिया पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया और मीसा को और अधिक मजबूत बना दिया ताकि लोगों की आवाजें पूर्णतया खामोश हो जाये। कांग्रेस सरकार ने लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को कुचलने की भरपूर कोशिश की गई। लगभग १ लाख ४० हज़ार लोगों को अमानवीय तरीके से लगातार १९ महीनों तक जेल के सलाखों के पीछे रखा गया और उन्हें कठोरतम यातनाएं दी गई लेकिन इतना संघर्ष और दमन होने के बावजूद न कोई टूटा और न ही कोई झुका। वास्तव में भारत के मिटटी में लोकतंत्र की खुशबू बहुत गहरी है।

इन संघर्षों के परिणामस्वरूप १९७७ में जनसंघ ने नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिये और लोकतंत्र को और मजबूत करने के लिए जनता पार्टी में अपना पूर्ण विलय कर दिया। श्री मोरारजी के नेतृत्व में सरकार बनते ही आपातकाल के दौरान जारी किये गए सारे अध्यादेशों को निरस्त कर दिया गया और संविधान संशोधन द्वारा यह सुनिश्चित किया गया कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सके।

आज जो हमारा लोकतंत्र इतना मजबूत है, जो मीडिया की स्वतंत्रता बची है और लोगों की अभिव्यक्ति की जो स्वतंत्रता व्यापक हुई है वह आपातकाल के दौरान उन हज़ारों लोगों के बलिदान के फलस्वरूप ही संभव हो पाया है।

श्री शाह ने संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा कि क्यों कांग्रेस पार्टी को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की जासूसी करानी पडी, क्यों सरदार पटेल को भारत रत्न देने में सालों लग जाते हैं, संविधान निर्माता बाबासाहब अंबेडकर के चित्र को संसद में लगाने में वर्षों लग जाते हैं वहीँ भारतीय जनता पार्टी की सरकार नेहरू जी के जन्मशती मनाने के लिए समिति का तुरंत गठन कर देती है और लौह पुरुष सरदार पटेल की सबसे ऊंची प्रतिमा लगाने का कार्य गुजरात में शुरू करती है।

कांग्रेस के आतंरिक लोकतंत्र पर हमला करते हुए श्री शाह ने कहा कि जिस पार्टी का कभी भी आतंरिक लोकतंत्र में विश्वास नहीं रहा, जिसकी सोच ही तानाशाही है, जहाँ किसी भी फैसले में आम कार्यकर्ताओं की सुनी ही नहीं जाती उसके हाथ में सबसे बड़े और सबसे मजबूत लोकतंत्र की चाभी कैसे दी जा सकती है। कांग्रेस का पूरा अतीत इस बात की गवाही देता है कि शुरू से लेकर अबतक केवल एक परिवार के हाथ में ही पार्टी की पूरी कुंजी रही है।

उन्होंने सम्मलेन में उपस्थित लोगों से अपील करते हुए कहा कि आप व्यक्ति को वोट ना दें। देश की जनता का विचार बदलने का वक्त आ गया है। आप पार्टी की विचारधार व विचारों में अपनी आस्था व्यक्त करें, आप एक ऐसी पार्टी को चुनें जहाँ आपकी बातों व हितों को महत्व दिया जाए, जिस पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र की जड़ें गहरी हो। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर ऐसा होता है तो देश में कभी भी आपातकाल नहीं आयेगा।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में १६५० पार्टियों के जंगल में दो-तीन पार्टियां ही ऐसी हैं जिसमे आतंरिक लोकतंत्र है। उन्होंने आश्वासन दिया कि भारतीय जनता पार्टी राजनीति को उन्हीं दिशाओं में ले जाने का सतत प्रयास करेगी जिसका सपना स्वर्गीय श्री जय प्रकाश नारायण ने की थी और जिसकी रक्षा के लिए हज़ारों लोगों ने संघर्ष किया और यातनाएं झेलीं।

उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा बिहार के छपरा में जन आंदोलन के नायक स्वर्गीय श्री जय प्रकाश नारायण जी की स्मृति में स्मारक बनाये जाने की घोषणा पर अपना आभार व्यक्त करते हुये कहा कि हम लोग सदैव जय प्रकाश जी के जीवन से प्रेरणा लेते रहेंगे।