बुधवार, 22 जुलाई 2015

Patwon ki Magnificent Haveli : Jaisalmer Rajasthan





Location: Jaisalmer Rajasthan 
Founded In: About 300 years ago

Rajasthan is home to some of the most magnificent havelis (mansions) in the whole of India. One such haveli is the Patwon ki Haveli, or Salim Singh ki Haveli, situated in the city of Jaisalmer. Infact, it is considered to be the one of the largest as well as the finest haveli of Rajasthan. The haveli has been named after Salim Singh, the prime minister of the erstwhile state of Jaisalmer. Patwon ki Haveli is beautifully constructed and stands covered with an arched roof. Exquisitely carved brackets, in the shape of peacocks, adorn its roof. Salim Singh ki Haveli comprises of five stories presently. However, it is said that initially, the haveli was seven stories high. The two additional wooden stories made the haveli as high as the palace of the Maharaja of Jaisalmer. Upset by this fact, the Maharaja ordered the demolition of the two topmost stories. Located just below the hill, Patwon ki haveli has been separated into six apartments that are decorated with wonderful carvings. Two of these have been converted into the office of the Archaeological Survey of India (ASI). The owners of the Patwon ki haveli still occupy some of its apartments. Beautiful paintings and dazzling mirror work festoon some of the inner walls of the haveli. Then, we have the delicately carved pillars that add to the magnificence of the haveli. One of the apartments also has gorgeous friezes painted on its walls. The corridors of Salim Singh ki Haveli are huge, its rooms massive and its hallways fascinating. Its gateways are guarded by real-looking tuskers, which have been made of sand stones. There are a large number of balconies in the Patwon ki haveli, numbering somewhere around thirty-eight. The most interesting feature is that all the thirty-eight balconies have different designs. The frontal facade of the haveli looks very much ship-stern, which has resulted in it being referred to as the Jahaz Mahal (Ship Palace) also. The spectacular blue cupola roof dazzling with exquisite stone carvings, screen windows and magnificent murals of the Patwon ki haveli definitely make it a place worth visiting 
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Jaisalmer portrays itself as a mysterious story amidst the gorgeous Thar Desert. And Patwon ki Haweli complements the grace and valor of this city. A cluster of five small havelis, Patwon ki Haveli is also the first Haveli that was ever constructed in Jaisalmer.Every inch of yellow sandstone used in the Heveli’s construction has been ostentatiously chiseled to impress, captivate and influence all. Beautiful frescoes, murals, mirror-works and paintings on every section of the Haveli speak of elegance and grace. Even the latticed arches and gateways are ornamented and designed beautifully. Large, breezy corridors, grand pillars and intricately detailed walls showcase the Haveli as an exquisite example of art and creativity. Every wing or section of Patwon ki Haveli is perfectly symmetrical and is owned by the Government and localities for accommodation and commercial purposes in parts.You may consider Patwon ki Haveli on your itinerary for your visit to the golden Jaisalmer.


धारा ३७० मात्र एक अंतरिम व्यवस्था : अरुणकुमार



धारा ३७० मात्र एक अंतरिम व्यवस्था, कोई विशेष दर्जा या शक्ति नहीं : अरुणकुमार


नागपुर, दि. ३० जून.धारा ३७० द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा या शक्ति प्राप्त है, यह मात्र एक भ्रम है. वास्तव में धारा ३७० उस समय की राज्य की स्थिति को देखते हुए की गई अंतरिम व्यवस्था है, ऐेसा प्रतिपादन जम्मू-कश्मीर स्टडी सेंटर के निदेशक अरुणकुमार ने किया. वे आर. एस. मुंडले धरमपेठ कला-वाणिज्य महाविद्यालय एवं जम्मू-कश्मीर स्टडी सेंटर नागपुर द्वारा महाविद्यालय के वेलणकर सभागृह में ‘जम्मू-कश्मीर : तथ्य और विपर्यास’ इस विषय पर आयोजित कार्यशाला में बोल रहे थे.

अपना मुद्दा स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि, जम्मू-कश्मीर का जब भारत में विलय हुआ, तब वहॉं युद्ध चल रहा था. उस समय की व्यवस्था के अनुसार वहॉं  संविधान सभा बन नहीं सकती थी. १९५१ में वहॉं संविधान सभा का निर्वाचन हुआ और इस संविधान सभा ने ६ फरवरी १९५४ को राज्य के भारत में विलय की पुष्टी की. १४ मई १९५४ को भारत के राष्ट्रपति ने संविधान के अस्थायी अनुच्छेद (धारा) ३७० के अंतर्गत संविधान आदेश जारी किया और वहॉं कुछ अपवादों और सुधारों के साथ भारत का संविधान लागू हुआ.

इसके बाद यह धारा समाप्त कर जम्मू-कश्मीर में भी भारत का सामान्य संविधान लागू होना अपेक्षित था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्योंकि, धारा ३७० के कुछ प्रावधान अन्य राज्यों के नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का हनन करनेवाले है लेकिन जम्मू-कश्मीर के राजनेताओं के राजनितिक लाभ लिए लाभकारी है. अत: उनका धारा ३७० कायम रखने का आग्रह है.

लेकिन इस धारा ३७० के कारण, १९४७ में पाकिस्तान से राज्य में आए हिंदू शरणार्थी तथा भारत के अन्य राज्यों से वहॉं जाकर वर्षों से रहनेवाले लाखों नागरिक राजनितिक, आर्थिक और शिक्षा से संबंधि अधिकारों से वंचित है. वहॉं अनुसूचित जनजाति के नागरिकों को भी राजनितिक आरक्षण नहीं मिलता. आज भी वहॉं भारतीय संविधान की १३५ धाराऐं लागू नहीं है.

जम्मू-कश्मीर स्टडी सेंटर के सचिव आषुतोष भटनागर ने राज्य के स्थिति की जानकारी देते हुए बताया कि, ८० के दशक के अंत में जम्मू-कश्मीर में शुरु हुआ हिंसाचार अब बहुत कम हुआ है. राज्य का करगिल, लेह, लद्दाख, जम्मू यह बहुत बड़ा क्षेत्र अलगाववाद से दूर और शांत है. श्रीनगर और घाटी के कुछ क्षेत्र में अलगाववादी कुछ सक्रिय है. लेकिन उनकी गतिविधियों को मीडिया में अतिरंजित प्रसिद्धि मिलती है, इस कारण पूरे राज्य में अशांति है, ऐसा गलत चित्र निर्माण होता है, यह वहॉं के वास्तव के विपरित है.

दोनों ही वक्ताओं ने नागरिकों से आवाहन किया है कि, लोग जम्मू-कश्मीर की वास्तविक स्थिति को जाने और वहॉं संपूर्ण सामान्य स्थिति निर्माण करने में सहयोग दे.

धरमपेठ शिक्षण संस्था के उपाध्यक्ष रत्नाकर केकतपुरे की अध्यक्षता में हुई इस कार्यशाला में अतिथियों का स्वागत प्रा. संध्या नायर और मीरा खडक्कार इन्होंने किया, कार्यक्रम का संचालन पत्रकार चारुदत्त कहू ने और आभार प्रदर्शन डॉ. अवतार कृशन रैना ने किया. इस कार्यशाला में शहर के गणमान्य पत्रकार, शिक्षाविध, राज्यशास्त्र के अभ्यासक और विधि शाखा के जानकार उपस्थित थे

दिशा संकेतक, बोध कराने वाला गुरु : जे. कृष्णमूर्ति



दिशा संकेतक, बोध कराने वाला गुरु : जे. कृष्णमूर्ति


सबसे पहली बात तो यह है कि हम गुरु चाहते ही क्यों हैं? हम कहते हैं कि हमें एक गुरु की आवश्यकता है। क्योंकि हम भ्रांति में हैं और गुरु मददगार होता है। वह बताएगा कि सत्य क्या है। वह समझने में हमारी सहायता करेगा। वह जीवन के बारे में हमसे कहीं अधिक जानता है। वह एक पिता की तरह, एक अध्यापक की तरह जीवन में हमारा मार्गदर्शन करेगा। उसका अनुभव व्यापक है और हमारा बहुत कम है। वह अपने अधिक अनुभव के द्वारा हमारी सहायता करेगा आदि-आदि।

सबसे पहले हम इस विचार की परीक्षा करें कि क्या कोई गुरु हमारी अस्त-व्यस्तता को, भीतरी गड़बड़ी को समाप्त कर सकता है? क्या कोई भी दूसरा व्यक्ति हमारी दुविधा को दूर कर सकता है? दुविधा, जो कि हमारी ही क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं का फल है। हम ने ही उसे रचा है। अंदर और बाहर, अस्तित्व के सभी स्तरों पर होने वाले इस क्लेश को, इस संघर्ष को, आप क्या समझते हैं कि इसे किसी और ने उत्पन्न किया है? यह हमारे ही अपने आपको न जानने का नतीजा है। हम अपने को गहराई से नहीं समझते। अपने द्वंद्व, अपनी प्रतिक्रियाएं, अपनी पीड़ाएं इन सब को नहीं समझ पाते। और इसलिए हम किसी गुरु के पास जाते हैं, यह सोचकर कि वह इस दुविधा, इस अस्त-व्यस्तता से बाहर निकलने में हमारी सहायता करेगा। वर्तमान से अपने संबंध में ही हम स्वयं को समझ सकते हैं और संबंध ही गुरु है, न कि बाहर कोई व्यक्ति। यदि हम संबंध को नहीं समझते, तो गुरु चाहे जो भी कहता रहे व्यर्थ है। क्योंकि यदि मैं इस संबंध को नहीं समझ पाता हूं, संपत्ति के साथ अपने संबंध को, व्यक्तियों और विचारों के साथ अपने संबंध को, तो मेरे भीतर के द्वंद्व को दूसरा और कौन सुलझा सकता है? इस द्वंद्व को, इस अस्पष्टता को दूर करने के लिए आवश्यक है कि मैं स्वयं इसे जानूं-समझूं, जिसका अर्थ है कि संबंधों में स्वयं के प्रति जागरूक रहूं और जागरूक रहने के लिए किसी गुरु की आवश्यकता नहीं है।

यदि मैं स्वयं को नहीं जानता, तो गुरु किस काम का! जिस तरह एक राजनीतिक नेता का चुनाव उन लोगों के द्वारा किया जाता है जो भ्रांत हैं और इसीलिए उनका चुनाव भी भ्रांतिपूर्ण होता है। उसी तरह मैं गुरु चुन लिया करता हूं। मैं केवल अपने विभ्रम के तहत उसका चयन करता हूं। अत: राजनीतिक नेता की तरह, गुरु भी भ्रांत    होता है। क्या सत्य दूसरे के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है? कुछ कहते हैं कि किया जा सकता है और कुछ कहते हैं कि नहीं किया जा सकता। हम इसकी सच्चाई को जानना चाहते हैं, यह नहीं कि किसी दूसरे की तुलना में मेरा मत क्या है। इस विषय में मेरा कोई मत नहीं है। या तो गुरु आवश्यक है, या फिर नहीं है। अत: आपके लिए गुरु स्वीकार करना आवश्यक है या नहीं, यह कोई आपकी या मेरी राय का प्रश्न नहीं है। किसी भी बात की सच्चाई किसी की राय पर निर्भर नहीं करती, चाहे वह राय कितनी भी गंभीर, विद्वत्तापूर्ण, लोकप्रिय और सार्वभौमिक क्यों न हो।

सच्चाई को तो वास्तव में ढूंढ निकालना होता है। महत्त्व इस बात का नहीं कि सही कौन है। मैं ठीक हूं या वे व्यक्ति जो कहते हैं कि गुरु आवश्यक हैं। महत्त्वपूर्ण यह पता लगाना है कि आपको गुरु की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है। तमाम तरह के शोषण के लिए गुरु हुआ करते हैं, लेकिन यहां वह मुद्दा अप्रासंगिक है। यदि आपको कोई बताए कि आप उन्नति कर रहे हैं, तो आपको बड़ा संतोष होता है। परंतु यह पता लगाना कि आपको गुरु की दरकार क्यों होती है, वही असली बात है। कोई आपको दिशा-संकेत दे सकता है, पर काम तो सारा आपको खुद ही करना होता है, भले ही आपका कोई गुरु भी हो। चूंकि आप यह सब नहीं करना चाहते, आप इसकी जिम्मेदारी गुरु पर छोड़ देते हैं। जब स्व का अंशमात्र भी बोध होने लगे, गुरु का उपयोग नहीं रह जाता। कोई गुरु, कोई पुस्तक अथवा शास्त्र आपको स्वबोध नहीं दे सकता। यह तभी आता है जब आप संबंधों के बीच स्वयं के प्रति सजग होते हैं। होने का अर्थ ही है संबंधित होना। संबंध को न समझना क्लेश है, कलह है। अपनी संपत्ति के साथ अपने संबंध के प्रति जागरूक न होना विभ्रम के, दुविधा के अनेक कारणों में से एक है। यदि आप संपत्ति के साथ अपने सही संबंध को नहीं जानते, तो द्वंद्व अनिवार्य है, जो कि समाज के द्वंद्व को भी बढ़ाएगा। यदि आप अपने और अपनी पत्नी के बीच, अपने और अपने पुत्र के बीच संबंध को नहीं समझते, तो उस संबंध से पैदा होने वाले द्वंद्व का निराकरण कोई दूसरा कैसे कर सकता है? यही बात विचारों, विश्वासों आदि पर लागू होती है।

व्यक्तियों के साथ, संपत्ति के साथ, विचारों के साथ अपने संबंध के बारे में स्पष्टता न होने के कारण आप गुरु खोजते हैं। यदि वह वस्तुत: गुरु है, तो वह आपको स्वयं को समझने के लिए कहेगा। सारी गलतफहमी तथा उलझन की वजह आप ही हैं, और आप इस द्वंद्व का समाधान तभी कर पाएंगे जब  आप स्वयं को पारस्परिक संबंध के बीच समझ लें।

आप किसी दूसरे के माध्यम से सत्य को नहीं पा सकते। ऐसा आप कैसे कर सकते हैं? सत्य कोई स्थैतिक तत्व,
जड़ चीज नहीं है। उसका कोई निश्चित स्थान नहीं है। वह कोई साध्य, कोई लक्ष्य नहीं है, बल्कि वह तो सजीव, गतिशील, सतर्क, जीवंत है। वह कोई साध्य कैसे हो सकता है? यदि सत्य कोई निश्चित बिंदु है, तो वह सत्य नहीं है, तब वह मात्र एक विचार या मत है। सत्य अज्ञात है और सत्य को खोजने वाला मन उसे कभी न पा सकेगा, क्योंकि मन ज्ञात से बना है। यह अतीत का, समय का परिणाम है। इसका आप स्वयं निरीक्षण कर सकते हैं। मन ज्ञात का उपकरण है। अत: वह अज्ञात को प्राप्त नहीं कर सकता। उसकी गति केवल ज्ञात से ज्ञात की ओर है।
जब मन सत्य को खोजता है, वह सत्य, जिसके विषय में उसने पुस्तकों में पढ़ा है, तो वह 'सत्य' आत्म-प्रक्षिप्त होता है। क्योंकि तब मन किसी ज्ञात का, पहले की अपेक्षा अधिक संतोषजनक ज्ञात का अनुसरण मात्र करता है। जब मन सत्य खोजता है, तो वह अपने ही प्रक्षेपण खोज रहा होता है, सत्य नहीं। अंतत: आदर्श हमारा ही प्रक्षेपण होता है, वह काल्पनिक, अयथार्थ होता है। 'जो है' वही यथार्थ है, उसका विपरीत नहीं। परंतु वह मन जो यथार्थ को खोज रहा है, ईश्वर को खोज रहा है, वह ज्ञात को ही खोज रहा है। जब आप ईश्वर के बारे में सोचते हैं, आपका ईश्वर आपके अपने विचार का प्रक्षेपण होता है। सामाजिक प्रभावों का परिणाम होता है। आप केवल ज्ञात के विषय में ही सोच सकते हैं।

अज्ञात के विषय में नहीं, आप सत्य पर एकाग्रता नहीं साध सकते। जैसे ही आप अज्ञात के बारे में सोचते हैं, वह केवल आत्म-प्रक्षिप्त ज्ञात ही होता है। ईश्वर या सत्य के बारे में सोचा नहीं जा सकता। यदि आप उसके बारे में सोच लेते हैं, तो वह सत्य नहीं है। सत्य को खोजा नहीं जा सकता। वह आप तक आता है। आप केवल उसी के पीछे दौड़ सकते हैं, जो ज्ञात है। जब मन ज्ञात के परिणामों से उत्पीडि़त नहीं होता, केवल तभी सत्य स्वयं को प्रकट कर सकता है। सत्य तो हर पत्ते में, हर आंसू में है। उसे क्षण-क्षण में जाना जाता है। सत्य तक आपको कोई नहीं ले जा सकता, और यदि कोई आपको ले भी जाए, तो वह यात्रा केवल ज्ञात की ओर ही होगी।
सत्य का आगमन केवल उसी मन में होता है, जो ज्ञात से रिक्त है। वह उस अवस्था में आता है, जब ज्ञात अनुपस्थित है, कार्यरत नहीं है। मन ज्ञात का भंडार है, वह ज्ञात का अवशेष है। उस अवस्था में होने के लिए, जिसमें अज्ञात अस्तित्व में आता है, मन को अपने प्रति, अपने चेतन तथा अचेतन अतीत के अनुभवों के प्रति, अपने प्रत्युत्तरों, अपनी प्रतिक्रियाओं एवं संरचना के प्रति जागरूक होना होगा। स्वयं को पूरी तरह से जान लेने पर ज्ञात का अंत हो जाता है, मन ज्ञात से पूर्णतया रिक्त हो जाता है। केवल तभी, अनामंत्रित ही, सत्य आप तक आ सकता है। सत्य न तो आपका है, न मेरा। आप इसकी उपासना नहीं कर सकते। जिस क्षण यह ज्ञात होता है, अयथार्थ ही होता है। प्रतीक यथार्थ नहीं है, छवि या प्रतिमा यथार्थ नहीं है; किंतु जब स्व की समझ होती है, स्व का अंत होता है, तब शाश्वत का आविर्भाव होता है।

अत: मूल बात यह है कि आप किसी गुरु के निकट जाते ही इसलिए हैं क्योंकि आप भ्रांत होते हैं। अगर आप अपने आप में स्पष्ट होते, तो आप किसी गुरु के पास न जाते। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि आप अपने रोम-रोम में खुश होते, यदि समस्याएं न होतीं, यदि आपने जीवन को पूर्णतया समझ लिया होता, तो आप किसी गुरु के पास न जाते। मुझे उम्मीद है कि आप इसके तात्पर्य को देख पा रहे हैं। चूंकि आप भ्रांत हैं, आप गुरु की खोज में हैं। आप उसके पास जाते हैं, इस उम्मीद के साथ कि वह आपको जीने की राह बताएगा, आपकी उलझनों को दूर कर देगा और आपको सत्य की पहचान कराएगा। आप किसी गुरु का चयन करते हैं क्योंकि आप भ्रांत हैं और आस लगाते हैं कि आप जो चाहते हैं वह गुरु आपको देगा। आप एक ऐसे गुरु को स्वीकार करते हैं जो आपकी मांग को पूरा करे। गुरु से मिलने वाली परितुष्टि के आधार पर ही आप गुरु को चुनते हैं और आपका यह चुनाव आप की तुष्टि पर ही आधारित होता है। आप ऐसे गुरु को नहीं स्वीकार करते जो कहता है, 'आत्म-निर्भर बनें'। अपने पूर्वग्रहों के अनुसार ही आप उसे चुनते हैं। चूंकि आप गुरु का चयन उस परितुष्टि के आधार पर करते हैं जो वह आपको प्रदान करता है, तो आप सत्य की खोज नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपनी दुविधा से बाहर निकलने का उपाय ढूंढ रहे हैं, और दुविधा से बाहर निकलने के उस उपाय को ही गलती से सत्य कह दिया जाता है।

संघ की स्वीकार्यता बढ़ी : मनमोहन वैद्य




संघ के प्रति समाज की स्वीकार्यता बढ़ी : मनमोहन वैद्य


नैनीताल/देहरादून 22 जुलाई (विसंके)। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रति देश में समर्थन बढ़ने के साथ ही संगठन की स्वीकार्यता में इजाफा हुआ है। संघ हर तीन साल में संघ शिक्षा वर्ग के पाठ्यक्रम की समीक्षा करेगा। परम पूजनीय सर संघचालक मोहन जी भागवत की मौजूदगी में शीर्षस्थ पदाधिकारियों की  संघ के विस्तार के लिए प्रचारकों के साथ बैठक चल रही है। बुधवार को संघ प्रमुख प्रांत प्रचारकों के साथ तीन दिनी बैठक करेंगे। इस अहम बैठक में आनुषांगिक संगठनों के क्रियाकलापों की समीक्षा करने के साथ ही भावी कार्यक्रम तय किए जाएंगे।
मंगलवार को पार्वती प्रेमा जगाती विद्यालय में पत्रकारों से बातचीत में संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन जी वैद्य ने कहा कि संघ के प्राथमिक शिक्षा वर्ग में पिछले साल 80 हजार लोग शामिल हुए थे, यह संख्या इस बार बढ़कर सवा लाख तक पहुंचने की पूरी उम्मीद है, जबकि संघ शिक्षा वर्ग में पिछली संख्या 17 हजार से बढ़कर 19 हजार हो जाएगी। उन्होंने कहा कि हर तीन साल में संघ शिक्षा वर्ग के पाठ्यक्रम की समीक्षा की जाती रही है।