सोमवार, 10 अगस्त 2015

हमारा देश : जम्बू दीपे भरत खण्डे आर्याव्रत देशांतर्गते

जम्बू दीपे भरत खण्डे 

Acharya Bal Krishna

क्या आप जानते हैं कि....... ....... हमारे प्राचीन महादेश का नाम “भारतवर्ष” कैसे पड़ा....?????

साथ ही क्या आप जानते हैं कि....... हमारे प्राचीन हमारे महादेश का नाम ....."जम्बूदीप" था....?????

परन्तु..... क्या आप सच में जानते हैं जानते हैं कि..... हमारे महादेश को ""जम्बूदीप"" क्यों कहा जाता है ... और, इसका मतलब क्या होता है .....??????

दरअसल..... हमारे लिए यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि ...... भारतवर्ष का नाम भारतवर्ष कैसे पड़ा.........????

क्योंकि.... एक सामान्य जनधारणा है कि ........महाभारत एक कुरूवंश में राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के प्रतापी पुत्र ......... भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारतवर्ष" पड़ा...... परन्तु इसका साक्ष्य उपलब्ध नहीं है...!

लेकिन........ वहीँ हमारे पुराण इससे अलग कुछ अलग बात...... पूरे साक्ष्य के साथ प्रस्तुत करता है......।

आश्चर्यजनक रूप से......... इस ओर कभी हमारा ध्यान नही गया..........जबकि पुराणों में इतिहास ढूंढ़कर........ अपने इतिहास के साथ और अपने आगत के साथ न्याय करना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक था....।

परन्तु , क्या आपने कभी इस बात को सोचा है कि...... जब आज के वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि........ प्राचीन काल में साथ भूभागों में अर्थात .......महाद्वीपों में भूमण्डल को बांटा गया था....।

लेकिन ये सात महाद्वीप किसने और क्यों तथा कब बनाए गये.... इस पर कभी, किसी ने कुछ भी नहीं कहा ....।

अथवा .....दूसरे शब्दों में कह सकता हूँ कि...... जान बूझकर .... इस से सम्बंधित अनुसंधान की दिशा मोड़ दी गयी......।

परन्तु ... हमारा ""जम्बूदीप नाम "" खुद में ही सारी कहानी कह जाता है ..... जिसका अर्थ होता है ..... समग्र द्वीप .

इसीलिए.... हमारे प्राचीनतम धर्म ग्रंथों तथा... विभिन्न अवतारों में.... सिर्फ "जम्बूद्वीप" का ही उल्लेख है.... क्योंकि.... उस समय सिर्फ एक ही द्वीप था...
साथ ही हमारा वायु पुराण ........ इस से सम्बंधित पूरी बात एवं उसका साक्ष्य हमारे सामने पेश करता है.....।

वायु पुराण के अनुसार........ त्रेता युग के प्रारंभ में ....... स्वयम्भुव मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने........ इस भरत खंड को बसाया था.....।

चूँकि महाराज प्रियव्रत को अपना कोई पुत्र नही था......... इसलिए , उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद ले लिया था....... जिसका लड़का नाभि था.....!

नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम........ ऋषभ था..... और, इसी ऋषभ के पुत्र भरत थे ...... तथा .. इन्ही भरत के नाम पर इस देश का नाम...... "भारतवर्ष" पड़ा....।

उस समय के राजा प्रियव्रत ने ....... अपनी कन्या के दस पुत्रों में से सात पुत्रों को......... संपूर्ण पृथ्वी के सातों महाद्वीपों के अलग-अलग राजा नियुक्त किया था....।
राजा का अर्थ उस समय........ धर्म, और न्यायशील राज्य के संस्थापक से लिया जाता था.......।

इस तरह ......राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप का शासक .....अग्नीन्ध्र को बनाया था।
इसके बाद ....... राजा भरत ने जो अपना राज्य अपने पुत्र को दिया..... और, वही " भारतवर्ष" कहलाया.........।

ध्यान रखें कि..... भारतवर्ष का अर्थ है....... राजा भरत का क्षेत्र...... और इन्ही राजा भरत के पुत्र का नाम ......सुमति था....।

इस विषय में हमारा वायु पुराण कहता है....—

सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु 31-37, 38)

मैं अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए..... रोजमर्रा के कामों की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहूँगा कि.....

हम अपने घरों में अब भी कोई याज्ञिक कार्य कराते हैं ....... तो, उसमें सबसे पहले पंडित जी.... संकल्प करवाते हैं...।

हालाँकि..... हम सभी उस संकल्प मंत्र को बहुत हल्के में लेते हैं... और, उसे पंडित जी की एक धार्मिक अनुष्ठान की एक क्रिया मात्र ...... मानकर छोड़ देते हैं......।

परन्तु.... यदि आप संकल्प के उस मंत्र को ध्यान से सुनेंगे तो.....उस संकल्प मंत्र में हमें वायु पुराण की इस साक्षी के समर्थन में बहुत कुछ मिल जाता है......।

संकल्प मंत्र में यह स्पष्ट उल्लेख आता है कि........ -जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते….।

संकल्प के ये शब्द ध्यान देने योग्य हैं..... क्योंकि, इनमें जम्बूद्वीप आज के यूरेशिया के लिए प्रयुक्त किया गया है.....।

इस जम्बू द्वीप में....... भारत खण्ड अर्थात भरत का क्षेत्र अर्थात..... ‘भारतवर्ष’ स्थित है......जो कि आर्याव्रत कहलाता है....।

इस संकल्प के छोटे से मंत्र के द्वारा....... हम अपने गौरवमयी अतीत के गौरवमयी इतिहास का व्याख्यान कर डालते हैं......।

परन्तु ....अब एक बड़ा प्रश्न आता है कि ...... जब सच्चाई ऐसी है तो..... फिर शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र भरत से.... इस देश का नाम क्यों जोड़ा जाता है....?

इस सम्बन्ध में ज्यादा कुछ कहने के स्थान पर सिर्फ इतना ही कहना उचित होगा कि ...... शकुंतला, दुष्यंत के पुत्र भरत से ......इस देश के नाम की उत्पत्ति का प्रकरण जोडऩा ....... शायद नामों के समानता का परिणाम हो सकता है.... अथवा , हम हिन्दुओं में अपने धार्मिक ग्रंथों के प्रति उदासीनता के कारण ऐसा हो गया होगा... ।

परन्तु..... जब हमारे पास ... वायु पुराण और मन्त्रों के रूप में लाखों साल पुराने साक्ष्य मौजूद है .........और, आज का आधुनिक विज्ञान भी यह मान रहा है कि..... धरती पर मनुष्य का आगमन करोड़ों साल पूर्व हो चुका था, तो हम पांच हजार साल पुरानी किसी कहानी पर क्यों विश्वास करें....?????

सिर्फ इतना ही नहीं...... हमारे संकल्प मंत्र में.... पंडित जी हमें सृष्टि सम्वत के विषय में भी बताते हैं कि........ अभी एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरहवां वर्ष चल रहा है......।

फिर यह बात तो खुद में ही हास्यास्पद है कि.... एक तरफ तो हम बात ........एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरह पुरानी करते हैं ......... परन्तु, अपना इतिहास पश्चिम के लेखकों की कलम से केवल पांच हजार साल पुराना पढ़ते और मानते हैं....!

आप खुद ही सोचें कि....यह आत्मप्रवंचना के अतिरिक्त और क्या है........?????

इसीलिए ...... जब इतिहास के लिए हमारे पास एक से एक बढ़कर साक्षी हो और प्रमाण ..... पूर्ण तर्क के साथ उपलब्ध हों ..........तो फिर , उन साक्षियों, प्रमाणों और तर्कों केआधार पर अपना अतीत अपने आप खंगालना हमारी जिम्मेदारी बनती है.........।

हमारे देश के बारे में .........वायु पुराण का ये श्लोक उल्लेखित है.....—-हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्।तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा:.....।।

यहाँ हमारा वायु पुराण साफ साफ कह रहा है कि ......... हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है.....।

इसीलिए हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि......हमने शकुंतला और दुष्यंत पुत्र भरत के साथ अपने देश के नाम की उत्पत्ति को जोड़कर अपने इतिहास को पश्चिमी इतिहासकारों की दृष्टि से पांच हजार साल के अंतराल में समेटने का प्रयास किया है....।

ऐसा इसीलिए होता है कि..... आज भी हम गुलामी भरी मानसिकता से आजादी नहीं पा सके हैं ..... और, यदि किसी पश्चिमी इतिहास कार को हम अपने बोलने में या लिखने में उद्घ्रत कर दें तो यह हमारे लिये शान की बात समझी जाती है........... परन्तु, यदि हम अपने विषय में अपने ही किसी लेखक कवि या प्राचीन ग्रंथ का संदर्भ दें..... तो, रूढि़वादिता का प्रमाण माना जाता है ।

और.....यह सोच सिरे से ही गलत है....।

इसे आप ठीक से ऐसे समझें कि.... राजस्थान के इतिहास के लिए सबसे प्रमाणित ग्रंथ कर्नल टाड का इतिहास माना जाता है.....।

परन्तु.... आश्चर्य जनक रूप से .......हमने यह नही सोचा कि..... एक विदेशी व्यक्ति इतने पुराने समय में भारत में ......आकर साल, डेढ़ साल रहे और यहां का इतिहास तैयार कर दे, यह कैसे संभव है.....?

विशेषत: तब....... जबकि उसके आने के समय यहां यातायात के अधिक साधन नही थे.... और , वह राजस्थानी भाषा से भी परिचित नही था....।

फिर उसने ऐसी परिस्थिति में .......सिर्फ इतना काम किया कि ........जो विभिन्न रजवाड़ों के संबंध में इतिहास संबंधी पुस्तकें उपलब्ध थीं ....उन सबको संहिताबद्घ कर दिया...।

इसके बाद राजकीय संरक्षण में करनल टाड की पुस्तक को प्रमाणिक माना जाने लगा.......और, यह धारणा बलवती हो गयीं कि.... राजस्थान के इतिहास पर कर्नल टाड का एकाधिकार है...।

और.... ऐसी ही धारणाएं हमें अन्य क्षेत्रों में भी परेशान करती हैं....... इसीलिए.... अपने देश के इतिहास के बारे में व्याप्त भ्रांतियों का निवारण करना हमारा ध्येय होना चाहिए....।

क्योंकि..... इतिहास मरे गिरे लोगों का लेखाजोखा नही है...... जैसा कि इसके विषय में माना जाता है........ बल्कि, इतिहास अतीत के गौरवमयी पृष्ठों और हमारे न्यायशील और धर्मशील राजाओं के कृत्यों का वर्णन करता है.....।

इसीलिए हिन्दुओं जागो..... और , अपने गौरवशाली इतिहास को पहचानो.....!

हम गौरवशाली हिन्दू सनातन धर्म का हिस्सा हैं.... और, हमें गर्व होना चाहिए कि .... हम हिन्दू हैं...!

अखंड भारत का परिदृश्य संभव हैं : प्रोफेसर सदानंद सप्रे

 



परिस्तिथि निर्माण से परिवर्तन सम्भव - प्रोफेसर सदानंद सप्रे

प्रोफेसर सदानंद सप्रे उध्बोधन देते हुए 
 
जोधपुर ८ अगस्त २०१५। १५ अगस्त को विभाजन के प्रति वेदना मन में है। राष्ट्र स्वाधीन हुआ किन्तु दुर्भाग्यवश विभाजन भी हुआ , विभाजन मजहब आधारित हुआ जो षड्यंत्र का परिणाम था।  मुस्लिम मूलतः राष्ट्रवादी थे मजहब के नाम पर षड्यंत्र पूर्वक अलगाव पैदा कर अलगाववादी बनाया गया।  क्या 1857 का वृह्द भारत या कहे अखंड भारत का परिदृश्य पुनः  है ? संभव है सम्भावना  है। उक्त विचारो को प्रकट करते हुए प्रोफेसर सदानंद सप्रे ने कहा कि परिस्थिति निर्माण से विचार व् भाव पैदा कर अखंड भारत का परिदृश्य संभव हैं। 

इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीनियर्स के सभागार में मरू विचार मंच द्वारा आयोजित "अखंड भारत : संकल्पना एवं चिंतन" विषयक संगोष्ठी एवं व्याख्यान में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ के विश्व विभाग के सह संयोजक प्रोफेसर सदानंद सप्रे ने कहा कि १८५७ के परिदृश्य के समक्ष आज का मानचित्र रखेंगे तो पता चलेगा कि केवल एक भाग ही स्वाधीन हुआ है।  

1857 के स्वाधीनता संग्राम का दृश्य व् इतिहास उकेरते हुए प्रो. सप्रे ने अंग्रेजों  की मानसिकता व भारतीय समाज के आंदोलन का विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि 1857 का संग्राम कुचलने के बाद ऐसा लगता था की अब स्वाधीन नहीं होंगे लेकिन 90 वर्षों  में यह हो गया। यहूदियों को विपरीत परिस्तिथियों में रहते हुए भी 1700 -1800  वर्षो के संघर्ष व् संकल्पशक्ति से पुनः राष्ट्र प्राप्ति व् स्वाधीनता मिली, यह असम्भव  से सम्भव  का बहुत बड़ा उदाहरण  व मिसाल है.

राष्ट्र के जीवन में 100 -200 या 400 -500 अथवा 1700 -1800 वर्ष कोई मायने नहीं रखते , भाव व विचार तथा संकल्प मौजूद व् जीवित रहना चाहिए। भारत व् नेपाल राष्ट्र पृथक है राजनैतिक दृष्टि से किन्तु आम भारतीय व नेपाली इसे अलग नहीं मानता, अपनत्व भाव है।   क्या पाकिस्तान पृथक राजनीतिक  राष्ट्र रहते हुए नेपाल जैसे  भाव वाला नहीं हो सकता क्या ? 

प्रो. सप्रे ने राष्ट्र की स्वाधीनता का इतिहास व् विचार समाज के समक्ष सही तरीके से रखने व् पुनः विचार करने पर बल दिया।  1857 का संग्राम , 1905 का बंग -भंग आंदोलन व 1937 में हुए चुनाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने मुस्लिम समाज की राष्ट्रीय  मानसिकता का दृश्य रखा और स्पष्ट किया कि मुस्लिम पूर्व में कभी भी मज़हब  आधार पर अलग महसुस नहीं करता न ही उनके मन , मस्तिष्क  में मज़हब आधारित अलग राष्ट्र का विचार था। 1857 व् 1905 के आंदोलन में सभी मुस्लिम साथ थे।  यही नहीं 1937 में अंग्रेजों   पहली बार समुदाय की सीटे  आरक्षित कर अलगाववाद पैदा करने की नाकाम कोशिश की।  उस वक्त भी मुस्लिम लीग को आरक्षित सीटों  पर 20 % वोट मिले थे, क्योंकि भारतीय समाज मज़हब  आधारित था ही नहीं, वो संस्कृति आधारित था. 

मोहम्मद करीम छागला  जी की आत्मकथा को उद्धत करते हुए कहा कि मुस्लिम सोच वैसी थी जिसमे उन्होंने कहा था कि "Ï am muslim by religion but hindu by race" हिन्दू एक संस्कृति है मज़हब नहीं।  हिन्दू  को धर्म  के नाम पर तथाकथित साम्प्रदायिक  मानसिकता वाले, बौद्धिक आतंक फ़ैलाने वालो की साजिश बताया। 

प्रो. सप्रे ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि क्या इतने बड़े राष्ट्र में मज़हब  विभाजन  सम्भव है क्या ? यह नेतृत्व के कमजोरी थी कि उस वक्त राष्ट्रवादी मुस्लिमो की भावनाओं  व् विचारों  का सरंक्षण नहीं किया व् अंग्रेजो की चाल का शिकार हुए।  यह आज भी संभव नहीं है। 

हिन्दू संस्कृति है, जीवन पद्धति  है जो हज़ारों  वर्षों  से पल्लवित होती आ रही है जिसका ऐतिहासिक प्रमाण है।  

क्या हम अलगाववाद के विचारों के साथ जीते हुए मज़हब के आधार पर पूर्ण पृथक राज्य की कल्पना अब भी साकार होने की सोच सकते है क्या ? सम्भवतः  नहीं। 

प्रो. सप्रे ने अपने उध्बोधन में आगे कहा कि पाकिस्तान के निर्माण की पृष्टभूमि को ध्यान से देखना होगा।  जिस मुस्लिम लीग को 1937 में आरक्षित सीटों पर जो मुस्लिम समुदाय के लिए ही थी पर केवल 20 % सफलता ही मिली थी ,उसी मुस्लिम लीग को 9 वर्ष बाद 1946 में 90% वोट के साथ 40% सीटों  पर सफलता मिलि. २० फ़रवरी १९४७ को अंग्रेजों  ने घोषणा की थी कि जून १९४८ तक स्वतन्त्र  कर देंगे लेकिन फिर ३ जून १९४७ को कहा कि १५ अगस्त १९४७ को ही स्वतंत्र कर देंगे यह परिवर्तन कबीले गौर है इस पर शोधार्थियों को चिंतन कर सही तस्वीर समाज राष्ट्र के समक्ष रखनी चाहिए।  यह आश्चर्यजनक परिवर्तन षड्यंत्र कारक थे। 

भारत-पाक के रिश्ते ठीक वैसे हो जैसे भारत-नेपाल  यही अखण्ड  भारत के संकल्पना है।  यह संभव है परिस्थिति निर्माण से।  हमें सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय को अलगाववादी नहीं मानना  चाहिये  न ही पुरे समुदाय को राष्ट्रविरोधी कहना चाहिए।  राष्ट्रवादी मुस्लिम भाईयो  को सरंक्षण व् प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है वो ही परिस्तिथि निर्माण करेंगे।  पूर्व में भी राष्ट्रवादी मुस्लिम के प्रति समाज व् नेतृत्व उदासीन रहा जिसका परिणाम पाकिस्तान है।  यह त्रुटि हमें  दोहराना नहीं चाहिए। १९३७ तक बहुत कम मुस्लिम अलगाववादी थे। 

अलगाववादी मुस्लिमो को आज भी राष्ट्र में शक्ति प्राप्त नहीं होती उनका शक्ति स्त्रोत -धन आज भी बाहरी है।  हमें उस स्त्रोत को कमजोर करने का भी चिंतन करना चाहिए।  परिस्तिथि निर्माण से परिवर्तन सम्भव केवल कुछ प्रतिशत परिवर्तन से ही समाज का परिदृश्य तुरंत बदलता है। 

अपने उध्बोधन को विराम देते हुए प्रो सप्रे ने समाज से सकारात्मक चिंतन व् समग्र दृष्टि से विचार करते हुए अखण्ड भारत की संकल्पना को साकार करने का आव्हान किया। 

अध्यक्षता इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीनियर्स जोधपुर के अध्यक्ष श्री आर के विश्नोई ने की एवं धन्यवाद ज्ञापन महानगर संयोजक डॉ. जी. एन. पुरोहित ने किया।