शनिवार, 15 अगस्त 2015

भारत निर्माण के लिए महापुरुषों के विचारों को समझना होगा –परम पूज्य डॉ. मोहन राव जी भागवत


महापुरुषों की संकल्पनानुसार भारत निर्माण के लिए उनके विचारों को समझना होगा – परम पूज्य डॉ. मोहन राव जी भागवत
दिल्ली में डॉ. आंबेडकर जी पर आधारित पुस्तकों का लोकार्पण समारोह

भारत निर्माण के लिए महापुरुषों विचारों को समझना होगा –परम पूज्य  डॉ. मोहन राव जी भागवत
नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक परम पूज्य  डॉ. मोहन राव जी भागवत जी ने कहा कि भारत निर्माण की कल्पना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को समझना अत्यंत आवश्यक है. निर्माताओं ने क्या सोचा था, उनकी दिशा दृष्टि, विचार क्या थे, उस पर विचार करना होगा. मेरा मत है कि अभी भारत निर्माण हुआ नहीं है, अभी भारत निर्माण करना बाकी है. महापुरुषों की संकल्पना के अनुसार भारत निर्माण करने के लिए उनके विचारों को समझना होगा. सरसंघचालक जी ने कहा कि वर्तमान में महापुरुषों को हमने अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर पिंजड़ों में बंद कर दिया है. महापुरुषों को बांटकर रख दिया, लेकिन सबकी दृष्टि समान थी, एक राष्ट्रीय धारा थी. सब इस पवित्र मिट्टी के जाये (जन्मे) भारत माता के सपूत थे. इसलिए हमें महापुरुषों के प्रति देखने की अपनी दृष्टि बदलनी होगी. यदि देशहित में काम करने वाली, सोचने वाली दो विचारधाराएं साथ आएं, तो दुख कैसा.
सरसंघचालक जी बाबा साहेब आंबेडकर जी पर अर्थशास्त्री डॉ. नरेंद्र जाधव द्वारा संपादित, संकलित पुस्तकों के लोकार्पण समारोह में संबोधित कर रहे थे. पुस्तकों में डॉ. आंबेडकर जी के विचारों, भाषणों को शामिल किया गया है. उन्होंने कहा कि हमारा मार्गदर्शक कौन है, इस परदिल्ली में डॉ. आंबेडकर जी पर आधारित पुस्तकों का लोकार्पण समारोह

विचार करने के लिए मनुष्य के व्यक्तित्व, उसके त्याग, निस्वार्थ भाव, लोगों के दुख को नष्ट करने की सोचता है या नहीं अथवा अपनी प्रसिद्धि के बारे में सोचता है…यह विचार करना होगा. देश के प्रत्येक घटक के प्रति जिनके मन में दर्द है, वह वास्तव में हमारे मार्गदर्शक हैं. डॉ. आंबेडकर जी का संघ से नाता काफी पुराना है, वर्ष 1939 में संघ शिक्षा वर्ग में डॉ. आंबेडकर जी अचानक आए थे, तो उस दौरान डॉ. हेडगेवार जी ने दोपहर बाद बौद्धिक वर्ग के स्थान पर भारत में दलित समस्या और दलितोद्धार विषय पर बाबा साहेब का भाषण करवाया था.
सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ महापुरुषों को व्यापार की वस्तु नहीं मानता, न ही संघ प्रसिद्धि, लोकप्रियता के लिए कार्य करता है, यह अपने स्वभाव में ही नहीं है. संघ महापुरुषों के विचारों को अपने आचरण में लाने का अभ्यास करता है. वास्तव में किसी महापुरुष का नाम धारण करने के लिए, अपने साथ जोड़ने के लिए शील, समर्पण, प्रामाणिकता चाहिए, यह सती के व्रत के समान कठिन है, आसान काम नहीं है. डॉ. आंबेडकर जी ने समाज से विषमता उन्मूलन के लिए कार्य करने के साथ ही पूरे राष्ट्र का चिंतन किया. उन्होंने अपने जीवन में घोर उत्पीड़न, प्रताड़ना, तिरस्कार, अपमान का सामना किया, लेकिन उनके मन में एक क्षण के लिए भी देश के प्रति विद्वेश नहीं हुआ.
दिल्ली में डॉ. आंबेडकर जी पर आधारित पुस्तकों का लोकार्पण समारोह

डॉ. भागवत जी ने कहा कि हमें संपूर्ण समाज को एक साथ आगे बढ़ाना है, समाज से विषमता को दूर करना है तो डॉ. आंबेडकर जी के विचारों को पढ़ना होगा, उन्हें समझना होगा. उन्हें समझे बिना, जाने बिना, पढ़े बिना पूर्णता नहीं आ पाएगी. समाज के प्रत्येक क्षेत्र राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र में समरसता लानी होगी. सबका लक्ष्य राष्ट्र को आगे ले जाना है, इसके लिए वैचारिक मतभेद होने के बाद भी संवाद करने की वृत्ति की आवश्यकता है.
अर्थशस्त्री, योजना आयोग के पूर्व सदस्य व पुस्तकों के संपादन व संकलनकर्ता डॉ. नरेंद्र जाधव ने कहा कि वह किसी राजनीतिक दल से संबंधित नहीं हैं, लेकिन वे अंबेडकरवादी थे, अंबेडकरवादी हैं तथा हमेशा रहेंगे. बाबा साहेब उनके लिए अखंड प्रेरणा स्रोत हैं. पुस्तकों में बाबा साहेब के विचार और सारगर्भित भाषण शामिल हैं. उन्होंने कहा कि भारतीय समाज ने बाबा साहेब को न ठीक से समझा और न ही जाना. वह केवल दलित नेता नहीं थे, उन्होंने सारा जीवन राष्ट्र निर्माण, समाज की चेतना जगाने में लगाया. वह देश के पहले प्रशिक्षित अर्थशास्त्री थे. डॉ. जाधव ने डॉ. आंबेडकर जी के विचारों पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि सरसंघचालक जी द्वारा पुस्तकों के लोकार्पण पर प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं. पर, उनके कुछ मित्र कार्यक्रम का पता चलने पर आपत्ति जता रहे हैं, सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना हो रही है, टीवी पर चर्चा हो रही है, कुछ को राजनीति भी नजर आ रही है. कुछ ने तो यह भी पूछना शुरू कर दिया है कि आप बीजेपी में कब जा रहे हैं. पर, उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है.
कार्यक्रम में डॉ. भीमराव आंबेडकर जी पर लोकार्पित पुस्तकें – आत्मकथा एवं जनसंवाद, सामाजिक विचार एवं दर्शन, आर्थिक विचार एवं दर्शन, राजनीति, धर्म और संविधान विचार ….पुस्तकों का प्रकाशन प्रभात प्रकाशन ने किया है.

स्वतंत्रता दिवस,संकल्प का दिन : पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत

स्वतंत्रता दिवस पर पू. सरसंघचालक जी ने सूरत में फहराया ध्वज
आज का दिन देश के लिए संकल्पबद्ध होने का दिन है – डॉ. मोहन जी भागवत


गुजरात (विसंकें). डॉ. आंबेडकर वनवासी कल्याण ट्रस्ट, सूरत, गुजरात द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित ध्वजवंदन के कार्यक्रम में पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत द्वारा ध्वजवंदन किया गया. डॉ. मोहनजी भागवत ने कहा कि अपने देश को 1947 में स्वतंत्रता मिलने के पश्चात प्रतिवर्ष 15 अगस्त को हम सब देशवासी ध्वजवंदन करते हैं. यह संकल्प का दिन है, जैसे अपनी स्वतंत्रता प्राप्ति के दिन का हम स्मरण करते हैं, वैसे ही उसके लिए संकल्पबद्ध होने का भी यही क्षण है. और जिस प्रकार हम इस उत्सव को मानते हैं, वही हमारा मार्गदर्शन भी करता है कि हमको क्या संकल्प लेना है. पहले तो एकदम ध्यान में आता है कि आज का दिवस पूरा देश मना रहा है. अपने देश में अनेक पंथ संप्रदाय हैं. सब लोग सब त्यौहार नहीं मनाते, कुछ त्यौहार संप्रदाय विशेष के होते हैं. अपने देश में अलग-अलग जाति है, उनके भी अपने कुछ विशिष्ट दिवस होते हैं वो सब नहीं मानते, केवल वो जाति ही मानती है. लेकिन आज का दिवस यहां जाति, पंथ, प्रांत, राजनीतिक पार्टी सब भूलकर लोग इस ध्वज को वंदन करते हैं. एक राष्ट्रगीत-राष्ट्रगान गाते हैं और केवल भारत माता की जय, वन्देमातरम, जय हिन्द कहते हैं. संघ का सरसंघचालक आया है, इसलिए केशव की जय जय, माधव की जय जय ऐसा कहने की प्रवृति नहीं है, होनी भी नहीं चाहिए.

स्वतंत्रता दिवस पर पू. सरसंघचालक जी ने सूरत में फहराया ध्वज
आज के दिन हम स्मरण करते हैं कि हमारे देश में ये सारी विविधताएं हैं, भेद नहीं हैं. अतः विविधता में जो एकता है, उसके स्मरण का आज का दिन है. उस विविधता में एकता साधकर हम देश के नाते बहुत प्राचीन समय में खड़े हुए और बहुत उतार-चढ़ाव देखे. अभी आधुनिक उतार-चढ़ाव में हमने विजय पायी अपने देश को स्वतंत्र किया, यह आज का दिन है. उस सारे संघर्ष का उतार-चढ़ाव देखकर परिस्थिति पर विजयी होने का कारण क्या है? उसका स्मरण अपना यह तिरंगा राष्ट्र ध्वज हमको करवाता है. इसके तीन रंग हैं और उसके उपर धर्मचक्र है. यह जो धर्मचक्र है यह बताता है कि हमसब लोगों को अपने देश में धर्म के प्रवर्तन के लिए जीना है और संपूर्ण दुनिया को खोया हुआ धर्म उनको वापस देना है. धर्म के आधार पर सब लोग जुड़ते हैं, उन्नत होते है. धर्म यानि पूजा नहीं, पूजा तो धर्म का एक छोटा सा हिस्सा होता है जो धर्म है व्यापक धर्म, मानव धर्म जिसको हिन्दू धर्म भी कहा जाता है. उसमें सब प्रकार की विविधताओं की, पूजा पद्धतियों की अनुमति है. परन्तु अपनी अपनी विविधता का गौरव मन में रखते हुए सब लोग एक हो कर जियें और देश का, दुनिया का, मानवता का गौरव बढ़ायें. इसका संदेश देने वाला यह धर्मचक्र है. धर्म संकल्पना यह केवल भारत की विशेषता है. भारत का व्यक्ति पूरी दुनिया के लिए जीता है.

हमारे राष्ट्र ध्वज का पहला रंग सबसे उपर केसरिया भगवा रंग है. यह त्याग का रंग है, यह कर्मशीलता का रंग है, यह ज्ञान का रंग है. मैं कौन हूँ, दुनिया क्या है और इसमें मेरा संबंध क्या है ? यह आत्म ज्ञान प्राप्त कर उसके आधार पर सबको अपना मानकर, सबको आगे बढ़ाना. सर्वेपि सुखिनः सन्तु, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, माकश्चिद्दुःखभाग्भवेत्. इस प्रकार का मनुष्य जीवन सृष्टि में उत्पन्न करना. इसके लिए प्राचीन समय से हमारे पूर्वजों ने, ऋषि मुनियों ने, योद्धाओं ने, राजाओं ने, भक्तों ने त्याग किया. उस त्याग का रंग भगवा है. त्याग करने वालों के वस्त्रों का रंग भगवा है. सुबह उठते है.. सूर्योदय होता है तो आसमान में जो रंग दिखता है, अंधकार समाप्त कर प्रकाश बढ़ाने वाला वही यह रंग है. उठने के बाद लोग काम में लग जाते है, रात को सो जाते है, फिर उठकर काम में लग जाते हैं. यह कर्मशीलता का रंग है और यह कर्मशीलता किनकी है, त्याग किनका है ? जिनका जीवन विशुद्ध है, निर्मल है. उस निर्मलता का, पवित्रता का प्रतीक सफेद रंग है. और ऐसा करने से होता क्या है? तो संपूर्ण विश्व में सबके लिए समृद्धि मिलती है, उसी समृद्धि का प्रतीक हरा रंग
देश को स्वतंत्रता मिली, लेकिन इस स्वतंत्रता का प्रयोजन क्या था ? क्यों हम स्वतंत्र होना चाहते थे ? तो हम एक ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं, जिसमें भारतवासियों के त्याग, कर्मशीलता और ज्ञान के आधार पर और उनके हृदय की निर्मलता, शांतिपूर्णता के आधार पर संपूर्ण विश्व समृद्ध होकर श्रेयस की ओर आगे कूच जारी रखें. यह कर्तव्य पूरा करने के लिए भारत को स्वतंत्र होना, भारत को समर्थ होना, भारत को सुरक्षित होना और भारत को परम वैभव संपन्न होना आवश्यक है. वो करने के लिए मेरा जीवन है, मेरे जीवन की सारी शक्तियां, अपने इस कर्तव्य को पूरा करने में लगा दूंगा. यह संकल्प प्रतिवर्ष अपने स्वतंत्रता दिवस पर हमको लेना चाहिए. वैसा आप संकल्प धारण करेंगे और उस संकल्प की पूर्ति के लिए प्रयास करेंगे, उस संकल्प की पूर्ति के लिए अपने जीवन में आवश्यक जीवन परिवर्तन आप स्वयं करेंगे, इस आशा और विश्वास के साथ आपको धन्यवाद देता हुआ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ.

कार्यक्रम में मंच पर हिमांशु भाई भट्ट ( अध्यक्ष,डॉ. आंबेडकर वनवासी कल्याण ट्रस्ट), डॉ. जयंतीभाई भाड़ेसिया (मा. संघचालक, पश्चिम क्षेत्र), सुरेशभाई मास्टर (विभाग संघचालक, सूरत) उपस्थित रहे.