रविवार, 1 नवंबर 2015

समान जनसंख्या नीति का पुनर्निधारण हो - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

कार्यकारी मंडल की बैठक में जनसंख्या वृद्धि दर में असंतुलन की चुनौती पर प्रस्ताव पारित
प्रस्ताव क्रमांक – एक

रांची. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रांची  में चल रही अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक के दूसरे दिन जनसंख्या असंतुलन को लेकर अहम प्रस्ताव पारित किया. बैठक में चर्चा के पश्चात जनसंख्या वृद्धि दर में असंतुलन की चुनौती पर प्रस्ताव पारित किया गया तथा सरकार से आग्रह किया कि जनसंख्या नीति का पुनर्निधारण कर सब पर समान रूप से लागू किया  जाए.

जनसंख्या वृद्धि दर में असंतुलन की चुनौती

देश में जनसंख्या नियंत्रण हेतु किए विविध उपायों से पिछले दशक में जनसंख्या वृद्धि दर में पर्याप्त कमी आयी है. लेकिन, इस सम्बन्ध में अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल का मानना है कि 2011 की जनगणना के पांथिक आधार पर किये गये विश्लेषण से विविध संप्रदायों की जनसंख्या के अनुपात में जो परिवर्तन सामने आया है, उसे देखते हुए जनसंख्या नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता प्रतीत होती है. विविध सम्प्रदायों की जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अन्तर, अनवरत विदेशी घुसपैठ व मतांतरण के कारण देश की समग्र जनसंख्या विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों की जनसंख्या के अनुपात में बढ़ रहा असंतुलन देश की एकता, अखंडता व सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर संकट का कारण बन सकता है.

विश्व में भारत उन अग्रणी देशों में से था, जिसने वर्ष 1952 में ही जनसंख्या नियंत्रण के उपायों की घोषणा की थी, परन्तु सन् 2000 में जाकर ही वह एक समग्र जनसंख्या नीति का निर्माण और जनसंख्या आयोग का गठन कर सका. इस नीति का उद्देश्य 2.1 की ‘सकल प्रजनन-दर’ की आदर्श स्थिति को 2045 तक प्राप्त कर स्थिर व स्वस्थ जनसंख्या के लक्ष्य को प्राप्त करना था. ऐसी अपेक्षा थी कि अपने राष्ट्रीय संसाधनों और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्रजनन-दर का यह लक्ष्य समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से लागू होगा. परन्तु 2005-06 का राष्ट्रीय प्रजनन एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण और सन् 2011 की जनगणना के 0-6 आयु वर्ग के पांथिक आधार पर प्राप्त आंकड़ों से ‘असमान’ सकल प्रजनन दर एवं बाल जनसंख्या अनुपात का संकेत मिलता है. यह इस तथ्य में से भी प्रकट होता है कि वर्ष 1951 से 2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अन्तर के कारण देश की जनसंख्या में जहां भारत में उत्पन्न मतपंथों के अनुयायिओं का अनुपात 88 प्रतिशत से घटकर 83.8 प्रतिशत रह गया है, वहीं मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात 9.8 प्रतिशत से बढ़ कर 14.23 प्रतिशत हो गया है.

इसके अतिरिक्त, देश के सीमावर्ती प्रदेशों यथा असम, पश्चिम बंगाल व बिहार के सीमावर्ती जिलों में तो मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, जो स्पष्ट रूप से बंगलादेश से अनवरत घुसपैठ का संकेत देता है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त उपमन्यु हजारिका आयोग के प्रतिवेदन एवं समय-समय पर आये न्यायिक निर्णयों में भी इन तथ्यों की पुष्टि की गयी है. यह भी एक सत्य है कि अवैध घुसपैठिये राज्य के नागरिकों के अधिकार हड़प रहे हैं तथा इन राज्यों के सीमित संसाधनों पर भारी बोझ बन सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनैतिक तथा आर्थिक तनावों का कारण बन रहे हैं.

पूर्वोत्तर के राज्यों में पांथिक आधार पर हो रहा जनसांख्यिकीय असंतुलन और भी गंभीर रूप ले चुका है. अरुणाचल प्रदेश में भारत में उत्पन्न मत-पंथों को मानने वाले जहां 1951 में 99.21 प्रतिशत थे, वे 2001 में 81.3 प्रतिशत व 2011 में 67 प्रतिशत ही रह गये हैं. केवल एक दशक में ही अरूणाचल प्रदेश में ईसाई जनसंख्या में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इसी प्रकार मणिपुर की जनसंख्या में इनका अनुपात 1951 में जहां 80 प्रतिशत से अधिक था, वह 2011 की जनगणना में 50 प्रतिशत ही रह गया है. उपरोक्त उदाहरण तथा देश के अनेक जिलों में ईसाईयों की अस्वाभाविक वृद्धि दर कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा एक संगठित एवं लक्षित मतांतरण की गतिविधि का ही संकेत देती है.

अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल इन सभी जनसांख्यिकीय असंतुलनों पर गम्भीर चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से आग्रह करता है कि -

देश में उपलब्ध संसाधनों, भविष्य की आवश्यकताओं एवं जनसांख्यिकीय असंतुलन की समस्या को ध्यान में रखते हुए देश की जनसंख्या नीति का पुनर्निर्धारण कर उसे सब पर समान रूप से लागू किया जाए.
सीमा पार से हो रही अवैध घुसपैठ पर पूर्ण रूप से अंकुश लगाया जाए. राष्ट्रीय नागरिक पंजिका का निर्माण कर इन घुसपैठियों को नागरिकता के अधिकारों से तथा भूमि खरीद के अधिकार से वंचित किया जाए.
अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल सभी स्वयंसेवकों सहित देशवासियों का आवाहन करता है कि वे अपना राष्ट्रीय कर्तव्य मानकर जनसंख्या में असंतुलन उत्पन्न कर रहे सभी कारणों की पहचान करते हुए जन-जागरण द्वारा देश को जनसांख्यिकीय असंतुलन से बचाने के सभी विधि सम्मत प्रयास करें

1984 : सिख नरसंहार : कांग्रेसी अन्याय की पराकाष्ठा

शर्म? माफी? शर्म से झुका सर, मगर किसका?
कांग्रेस की ओर से सोनिया गांधी परिवार को माफी मांगनी चाहिए थी,
पर बेचारे मनमोहन सिंह को सामने कर दिया

- तरुण विजय

अगर लीपापोती की कोशिश नहीं होती तो नानावती आयोग की लचर और बेजान रपट पर इतनी बहस नहीं छिड़ती। 8 मई, 2000 को गठित नानावती आयोग ने 4 साल 9 महीने की कसरत के बाद 9 फरवरी, 2005 को केन्द्र सरकार को अपनी रपट सौंपी थी। पर नानावती रपट पर सरकार ने जो "कार्रवाई की गई" वाला काला अध्याय जोड़ा उसने सोनिया, सुरजीत, मनमोहन सिंह सरकार के समर्थकों को भी हिला दिया। सन् 1984 में 3000 सिखों का दिल्ली में कत्लेआम हुआ था। उस समय के तमाम कांग्रेसी नेता बेगुनाह सिख स्त्री-पुरुषों और बच्चों को मारने के वहशियाना उन्माद में सबसे आगे थे। दिल्ली की जनता ने सिखों पर हमला नहीं किया, यह बात ध्यान देने योग्य है। केवल और केवल कांग्रेसी नेताओं और उनके पिछलग्गुओं ने सिखों को मारा। और इतनी बेदर्दी से मारा कि इतिहास में उसकी मिसाल केवल औरंगजेब और अब्दाली के समय में ही मिल सकती है। लेकिन रोचक बात यह है कि राजीव गांधी जैसे प्रधानमंत्री और नरसिंहराव जैसे गृहमंत्री होते हुए भी अपराधी पकड़े नहीं गए। राजीव गांधी ने तो बयान भी दिया था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है। उनकी तरफ से तो ऐसा लगा जैसे कोई भूचाल आया था, जिसमें सिख समा गए। हरकिशनलाल भगत, जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार और धर्मदास शास्त्री तो मानो "खुदाई फरिश्ते" थे, जो सिखों के घावों पर मरहम लगाने के लिए बड़ा कष्ट और बलिदान सहते हुए किसी बाहरी लोक से दिल्ली की धरती पर उतरे। इनको सजा देने की बात सोची ही कैसे जा सकती है?

विडम्बना यह है कि जिस समय भारत का राष्ट्रपति एक सिख था उस समय सिखों का नरसंहार हुआ और अब जिस समय भारत का प्रधानमंत्री एक सिख है, उस समय उसी के माध्यम से सिखों के कातिलों को बचाने का काम किया जा रहा है। 1984 के दंगों के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने कांग्रेसी वहशीपन और पुलिस संलिप्तता की परवाह न करते हुए सिख परिवारों को बचाया था, जिसके बारे में उस समय खुशवंत सिंह ने भी लिखा था। अब वक्त आ गया है देशभक्ति के साथ खड़े होते हुए अपने ही भाइयों के संहार पर खुशी मनाने वाले नेताओं और उन्हें बचाने में जुटे कथित सेकुलर तत्वों के विरुद्ध संघर्ष का।

नानावती आयोग की रपट पर भी राजनीति खेली जा रही है। कांग्रेसी कहते घूम रहे हैं कि आज नानावती ने 84 के दंगों पर रपट दी है, कल वे गुजरात के दंगों पर रपट देने वाले हैं। अगर इस बार जगदीश टाइटलर का इस्तीफा मांगा गया है तो गुजरात के बारे में नानावती की रपट ऐसी होगी कि नरेन्द्र मोदी को भी इस्तीफा देना ही पड़ेगा। अगर इस तरह का कोई तालमेल है तो हमें नहीं मालूम। यह अफवाह भी हो सकती है। लेकिन यह अंतर ध्यान में रखना होगा कि दिल्ली में सिख विरोधी दंगा एक पार्टी के नेताओं की अगुवाई में किया गया, योजनाबद्ध नरसंहार था।

नानावती आयोग की रपट पर विपक्ष द्वारा काम रोको प्रस्ताव लाए जाने के बाद राज्यसभा में चर्चा में भाग लेते हुए प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने कहा कि इस घटना के लिए उनका सर न केवल सिख समुदाय बल्कि पूरे राष्ट्र के सामने शर्म से झुक गया है। प्रधानमंत्री ने श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या को शर्मनाक राष्ट्रीय हादसा बताते हुए उसके बाद देश में हुए घटनाक्रम को भी उतना ही शर्मनाक बताया। उन्होंने सिखविरोधी दंगों के लिए क्षमायाचना की। प्रधानमंत्री ने सदन को भरोसा दिलाया कि जिन नेताओं और पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर रपट में प्रतिकूल टिप्पणी की गई है, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। डा. सिंह ने कहा कि रपट में नाम आने पर एक मंत्री ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने कहा कि हम सभी को आत्मनिरीक्षण करके ऐसे कदम उठाने चाहिए कि इस तरह के हादसे दोबारा न हों। प्रधानमंत्री ने पीड़ितों के पुनर्वास के लिए हरसंभव सहायता देने की घोषणा करते हुए कहा कि इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना उचित नहीं होगा।

कांग्रेस के अजीब ढंग हैं। सिख नरसंहार के समय ज्ञानी जैल सिंह का मुखौटा तैयार कर दिया था और अब जब माफी मांगने की बात आई तो सरदार मनमोहन सिंह को सामने खड़ा कर दिया, जबकि उनकी इस पूरे कांड में कोई भूमिका भी नहीं थी। वे तो वैसे ही गांधी परिवार की रणनीतियों से एकदम अलग-थलग हैं और पिछले दिनों समाचार पत्रों में छपा भी था कि उनके और सोनिया गांधी के मध्य मतभेद बढ़ते जा रहे हैं। कांग्रेस ने डा. मनमोहन सिंह को सामने खड़ा करके उनसे क्षमायाचना के कृत्य द्वारा फिर एक बार सिखों के घावों पर नमक छिड़का है। राज्यसभा में मनमोहन सिंह की क्षमायाचना और वक्तव्य से उनका अपना कद बड़ा हुआ है इसमें कोई संदेह नहीं। सिखों के नरसंहार संबंधी उस घटना से सभी आहत हैं और यह मामला क्षुद्र राजनीति से ऊपर ले जाना चाहिए, लेकिन कांग्रेस इसे अपना घरेलू दरबारी राजनीति का एक घृणित उपकरण बनाने पर तुली है। वास्तव में अगर मनमोहन सिंह को माफी मांगनी ही है तो देश की जनता, विशेषकर सिखों के साथ रा.स्व.संघ से भी माफी मांगनी चाहिए, क्योंकि डा. सिंह ने 1999 में रा. स्व.संघ पर सिख विरोधी दंगे भड़काने का आरोप लगाया था और आरोप के बाद मनमोहन सिंह चुनाव हार गए थे।

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सिखों का नरसंहार 1984
यदि आप ८४ के नरसंहार को भूलते है,
........ तो भारत विरोधी राक्षसी प्रवृत्ति को भूलते हैं
- जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा
३१ अक्टूबर १९८४
९.२० बजे प्रातः         प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को उसके दो सिख अंगरक्षकों ने निवास स्थान पर मार डाला गया। उन्हें ऑल इण्डिया मेडिकल हॉस्पीटल ले जाया गया।
११.०० बजे प्रातः      ऑल इण्डिया रेडियों की घोषणा।
                                 प्रधानमंत्री को घायल बताया।
२.०० बजे दोपहर        अधिकारिक रूप से मृत्यु की पुष्टि नहीं। बी.बी.सी. ने मृत्यु की बात कही।
४.०० बजे दोपहर        राजीव गांधी पश्चिम बंगाल से वापस आए। एयरपोर्ट से सीधे ऑल इण्डिया मेडिकल हास्पीटल गए। सिखों के विरुद्ध कुछ छुटपुट घटनाओं के समाचार।
५.३० बजे शाम      ऑल इण्डिया मेडिकल हॉस्पीटल पहुंचते ही राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के काफिले पर पत्थर फैंके गए।
७.०० बजे शाम      दंगाइयों की संगठित भीड़ ने सिखों के विरुद्ध हिंसा की। कांग्रेस  पार्षद अर्जुनदास के क्षेत्र में बड़ी संख्या में भीड़ जुटी। सिखों के विरुद्ध भड़काऊ भाषण दिए गए। पृथ्वीराज रोड पर सिखों के स्कूटर व कारों को आग के हवाले कर दिया गया। एक दर्जन सिखों का कत्ल।


१०.०० बजे रात   राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वरिष्ठ वकील व प्रतिपक्ष के एक नेता राम जेठमलानी ने गृहमंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव से शांति बनाने की अपील की। दिल्ली के गवर्नर पी.जी. गावल और पुलिस  कमीश्नर एस.सी. टंडन ने नरसंहार के स्थलों का मुआईना किया। इस सबके बावजूद, ३१ अक्टूबर और एक नवम्बर के बीच की रात सिखों के नरसंहार की वारदातें चालू रही। प्रशासन मौन था।1 नवम्बर १९८४  ३१ अक्टूबर व 1 नवम्बर के बीच की रात को कांग्रेंस के शीर्ष नेताओं की बैठकों के दौर चलते रहे। समर्थकों को बडे+ पैमाने पर इस बात के लिए प्रेरित किया गया। कि वे इस नरसंहार को अंजाम दें। सुबह पूर्वी दिल्ली में पहले सिख को मारा गया। ९ बजे तक भीड़ सड़कों पर थी। भीड़ के प्रथम निशाने गुरद्वारे थे। भीड़ के पास लोहे की रॉड़ थी। सभी रॉड़ो का साइज एक समान था। भीड़ के पास प्रर्याप्त मात्रा में पेट्रोल और मिट्टी का तेल था। एक कांग्रेसी कार्यकर्ता ब्रह्‌मानन्द गुप्ता का नाम उभर कर आया, जो मिट्टी के तेल का व्यापारी था और सुलतानपुरी के नरसंहार में भाग ले रहा था। प्रत्येक थाने में पुलिस कर्मियों की काफी संख्या थी। फिर भी शरारती तत्वों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हुई। ÷÷नानावती  कमीशन'' के अनुसार प्रतिरोध दिखाने वाले सिखों को   गिरफ्तार किया गया। उनके हथियार जब्त करके मुकदमें दर्ज किए गए। त्रिलोकपुरी, मंगोलपुरी, सुलतानपुरी कांग्रेसी नरसंहार का कहर। नरसंहार के पीड़ितों ने कत्लेआम की रचना करने वाले  कांग्रेसी नेताओं एच.के.एल. भगत, सज्जन कुमार, धर्मदास शास्त्री, टाइटलर के साथ १० पार्षदों के नाम लिए।२ नवम्बर १९८४ पुलिस ने ऊपरी तौर पर कर्फ्यू लगा दिया। लेकिन यह सब ढ़कोसला था। अहिंसा के तथाकथित पुजारी नेहरूवादियों ने जकरिया खान और लखपत राय की याद दिला दी। जिस दिल्ली के सिख पंजाब की समस्या के सामने राष्ट्रीय पक्ष में खड़े नजर आ रहे थे। उसी पर एकतरफा प्रहार हुआ था।    अति गरीब सिखों पर विशेष अत्याचार किए गए। पंजाब में सियासी प्रतिक्रिया करने के लिए कांग्रेस कहां थी? ३ नवम्बर १९८४ पूरी दिल्ली में नरसंहार करने वाले भीड़ की प्रकृति समान    थी। पुलिस ने एफ.आई.आर. नहीं लिखी। पीड़ित हताश थे। सारा दिल्ली हिटलर का गैस चैम्बर बन चुका था। वेद मारवा की एक कमेटी का नाटक हुआ। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक २७३३ सिखों का नरसंहार हो गया था। धर्मनिरपेक्ष  नेताओं ने अधर्म का काम किया था।
राजीव गांधी ÷÷जब एक बड़ा पेड़ गिरता है,
एतिहासिक बयान तो धरती हिलती ही है।''

नरसंहार के बाद         

२७ दिसम्बर १९८४       राजीव गांधी की कांग्रेस पार्टी को ४०० से अधिक सीटें प्राप्त हुई। चुनाव के बाद कांग्रेस सरकार का काम था-कानून के शिंकजे से बचना। जांच कमेटी   दो एन.जी.ओ. ÷सिटीजन फॉर डेमोक्रेसी' के जस्टिस वी.एम. तारकुण्डे और ÷सिटीजन कमीशन' के पूर्व चीफ जस्टिस एस. एम. सीकरी ने सरकार और कांग्रेस पार्टी को दोषी माना।
रिट पैटीशन                    एक पत्रकार राहुल कुलदीप बेदी ने दिल्ली उच्च न्यायालय में  १९८४ के नरसंहार में पुलिस की भूमिका पर जांच की मांग की।  पी.यू.डी.आर. ने दिल्ली उच्च न्यायालय में ÷कमीशन ऑफ  इंक्वारी' की मांग की।
रंगनाथ मिश्रा कमीशन       १६ अप्रैल १९८५ को सरकार ने जांच कमीशन की घोषणा की।
सिटीजन जस्टिस कमेटी       सभी मानवाधिकार संगठनों ने इस बैनर के नीचे आकर सत्य को सामने लाने का प्रयास किया।सी.जे.सी. का हाथ खींचना   मिश्रा कमीशन की कार्रवाई कैमरे के सामने होनी थी। सिटीजन जस्टिस कमेटी को कैमरे से दूर रखने से पारदर्शिता की हत्या हो रही थी।   

मिश्रा कमीशन              फरवरी १९८७ में मिश्रा कमीशन का नतीजा एक धोखा साबित हुआ। लोकतंत्र का एक स्तम्भ ढ़ह गया, ऐसा लगता है।जैन बनर्जी कमीशन    मिश्रा कमीशन के निर्देश पर एक और जांच कमेटी।
                                      कपूर मित्तल कमेटी दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई के लिए जांच या  प्रशासनिक ढ़कोसला ?
आहूजा कमेटी                 दिल्ली नरसंहार ने मृत सिखों की संख्या निर्धारण के लिए बनाई गई कमेटी।
स्टे ऑर्डर                    जैन बनर्जी कमीशन की पहली सिफारिश सज्जन कुमार के विरुद्ध मुकदमें के बाद एक अन्य अभियुक्त ब्रह्‌मानन्द गुप्ता ने   दिल्ली उच्च न्यायालय स्टे ऑर्डर प्राप्त किया। उच्च न्यायालय का निर्णय    दिल्ली उच्च न्यायालय ने जैन बनर्जी कमीशन की अधिसूचना को खारिज किया। (अक्टूबर १९८९) कपूर मित्तल कमेटी कमेटी के दोनों सदस्यों ने अलग-अलग रिपोर्ट दी। जस्टिस दिलीप कपूर के अनुसार कमेटी के पास पुलिस अधिकारियों को   सम्मन करने के प्रर्याप्त अधिकार नहीं। दूसरी सदस्या कुसुम लता मित्तल के अनुसार ७२ पुलिस कर्मी दोषी चिन्हित थे। पोटी पोषा कमेटी       वी.पी. सिंह सरकार ने उच्च न्यायालय के बताए बिन्दुओं को ठीक करते हुए जैन बनर्जी कमीशन के स्थान पर नई कमेटी बनाई।
सज्जन कुमार का          १९९० में पोटी पोशा कमेटी ने सज्जन कुमार पर मुकदमा चलाने एंटीस्पेट्री बेल  और गिरफ्तार करने की बात कही। सी.बी.आई.टीम को तब तक सज्जन कुमार समर्थकों ने कैद किए रखा, जब तक उनका वकील आर.के.आनन्द एंटीस्पेट्री बेल लेकर नहीं आ जाता।
एक नई कमेटी                   १९९० में जे.डी.जैन और डी.के. अग्रवाल ने पोटी पोशा कमेटी का स्थान लिया।
जैन अग्रवाल कमेटी             विस्तृत रिपोर्ट में एच.के.एल. भगत, सज्जन कुमार दोषी। का निर्णय जस्टिस आर.एस. नरूला           १९९४ में आई कमेटी ने पुनः कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं कमेटी  को दोषी ठहराया।

नानावती कमीशन           २००० में जस्टिस नानावती को कई सौ शपथ पत्र प्राप्त हुए। प्रमुख व्यक्तियों में आई.के. गुजराल, खुशवंत सिंह, कुलदीप नैयर और जगजीत सिंह अरोड़ा ने भी शपथ पत्र दिए। नानावती कमीशन का निर्णय कांग्रेसी नेती दोषी व कांग्रेस पार्टी दोषी। 
 पहले धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले नेहरूवादियों ने मजहब के आधार पर भारत का विभाजन करवाया। फिर अहिंसा की बात करने वाले नेहरूवादियों ने दिल्ली में नरसंहार करवाए।
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शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

1984 दंगे नहीं नरसंहार

31 अक्टूबर 1984 को 2 सिख बॉड़ीगार्ड द्वारा इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी गई । हत्या ऑपरेशन ब्लु स्टार के जवाब में 153 वें दिन हुई । हत्या का कारण केवल एक था - श्री हरमिंदर साहेब स्वर्ण मंदिर जैसे पवित्र स्थान पर तोप और बंदूको के साथ प्रवेश । ऑपरेशन ब्लू स्टार का उद्देश्य भिंड़रवाला का खात्मा था । भिंड़रवाला को खुद इंदिरा गाँधी ने अपनी राजनैतिक महत्वाकांशाओ के चलते खड़ा किया था इंदिरा गाँधी अकालियो के नेतृत्व को समाप्त करना चाहती थी । पर पाकिस्तानी ताकतो से मिल रही हवाओ के चलते भिंड़रवाला के नेतृत्व में अलगाववादी ताकते जन्म लेने लगी और ऑपरेशन ब्लु स्टार को अंजाम देना पड़ा ।



इस कृत्य के 153 वें दिन इंदिरा गाँधी की मृत्यु निश्चित थी । फिर चाहे इंदिरा को उसके अंगरक्षक मारते या कोई और । अब तक स्वर्ण मंदिर पर 5 बार आक्रमण हुए और हर आक्रमणकारी 153 वें दिन मृत्यु को प्राप्त हुआ । मस्सा रंगड़ फिर जकरिया खान फिर जहान खान फिर अहमद शाह अब्दाली और अंत में इंदिरा गाँधी सिखो ने हर उस इंसान का खात्मा किया जिसने उनकी आस्था से खिलवाड़ किया ।

यह फोटो ग्वालियर के एक गुरूद्वारे से ली गई है, इसे देखकर आप इस तथ्य को समझ जाऐंगे ।



ये तो बात हुई इंदिरा गाँधी की मृत्यु की परंतु इसके पश्चात जो हुआ वो भारत माँ की छाती पर एक कलंक छोड़ गया । भारत माँ के वो बच्चे जिन्होने उसकी आजादी के लिए सबसे अधिक बलिदान दिए, जिनकी आबादी 2 % होकर भी भारतीय सेना में ये 11 % हैं ऐसे वीरो का कत्लेआम हुआ ।

इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद -
सुबह 9.20 बजे दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कों उनके 2 सिक्ख बॉडीगार्ड सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने गोलियों से छलनी कर दिया। उन्हें तुरंत एम्स (AIIMS) अस्पताल में भरती कराया गया।सुबह 10.50 बजे इंदिरा गाँधी का एम्स अस्पताल में निधन हो जाता है ।सुबह 11.00 बजे ऑल इंडिया रेडियो पर यह खबर प्रसारित हुई की इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही दो सिख बॉडीगार्डो ने की और पुरे भारत में मातम छा जाता है ।

इस तनावपुर्ण माहौल में राजीव गाँधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी जाती है । वंशवाद की एक और मिसाल कायम होती है । देश में सिखो पर छोटे - मोटे हमले होते दिखते हैं । इस हिंसा पर जब दुरदर्शन पर राजीव गाँधी से सवाल पुछा जाता है तो वो जवाब देते हैं - "जब जंगल मे कोई बड़ा पेड गिरता है तो आसपास की जमीन हिलने लगती है और छोटे मोटे पेड उखड जाते है " । इससे दंगो के पक्ष में उनका मत स्पष्ट हो जाता है ।

इन दंगो के समय भारत के राष्ट्रपती एक सिख "ज्ञानी जैलसिंह" ही थे ।सिख दंगो की जाँच कमेटी के सामने राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिह ने कहा कि उनके फ़ोन की लाईने काट दी गई थी... ताकि दिल्ली के सिख दंगों का समाचार उन तक नहीं पहुँच सके । इससे पहले उन्होने राजिव गाँधी से कई बार बात की और उन्हे सेना की सहायता लेने को कहा पर राजीव ने उनकी बात को टाल दिया।


रात में कांग्रेसी नेता सज्जन कुमार, ललित माकन, H.K.L.भगत ने दंगाईयो कों संगठित कर उन्हें पैसे, तलवार, लाठियाँ, सलाखे मुहैया करवाई। जो कांग्रेसी नेता पेट्रोल पम्प के मालिक थे, उन्होंने दंगाईयो कों केरोसिन और पेट्रोल के कैन की आपूर्ति की। सिखो के घरों का पता जानने के लिये कांग्रेस नेताओं ने दंगाईयो कों वोटर कार्ड और राशन कार्ड दिए। कांग्रेसी कार्यकर्ताओ ने रात में सिक्खो के घरों पर “s” के निशान बना दिए। ताकि दूसरे दिन दंगाई जल्द से जल्द सिखो के घरों की पहचान कर, घरों में घुसकर सिखो का कत्लेआम कर सके।



1 नवम्बर 1984, दंगो का दूसरा दिन
सुबह सुबह कांग्रेस के सांसद सज्जन कुमार ने कांग्रेसी कार्यकर्ता, गुंडे और दंगाइयो को लेकर रैली निकाली, और सरेआम मासूम सिखो का क़त्ल करने के लिये नारे लगाये। सज्जन कुमार ने सिक्खो की हत्या करने वालों कों इनाम घोषित किये, कहा एक भी सिख जिन्दा ना बच पाए । प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने दंगाईयो से वादा किया कि उन्हे कांग्रेस में उच्च पद दिए जाऐंगे ।
इस नरसंहार में सबसे आगे पुलिस थी, पुलिस सिखो को मारने दंगाईयो की मदद करती थी ।
रैलगाड़ी, बसे रोक कर उनमे सवार सिक्खो कों जिन्दा जलाया गया । त्रिलोकपुरी, मंगोलपुरी, सुल्तानपुरी इलाको में सबसे ज्यादा सिख मारे गए ।




2 नवम्बर 1984, दंगो का तीसरा दिन
दिल्ली के कुछ इलाको में कर्फ्यू लगाया गया, लेकिन इसका कोई प्रभाव नहीं था। क्योकि पुलिस दंगाईयो पर कारवाई करने के बजाय उल्टा उन्हे मदद करने के आदेश दिए गये थे। आर्मी बुलाई गई पर उन्हे सख्त आदेश थे कि वो दंगाईयो पर फाइरिंग ना करे । सिखो का नरसंहार जारी रहा।


3 नवम्बर 1984, दंगो का चौथा दिन
जब दंगाई अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेती है, तब सेना और पुलिस स्थिति पर नियंत्रण करना शुरू कर देती है। छिट पुट घटनाओ कों छोड़कर शाम तक दंगे थम जाते है। दिल्ली में सिख की लाशो का अम्बार लग जाता है। 3 नवम्बर तक 2,700 से 20,000 सिख मारे गये। उन लाशो कों एम्स अस्पताल ले जाया जाता है।




दंगो की जाँच
दंगो की जांच के लिये मारवाह कमीशन, मिश्रा कमीशन, मित्तल कमिटी, नानावटी आयोग और कई अन्य आयोगों का गठन किया गया। आयोग और कोर्ट ने वरिष्ठ कांग्रेस नेता सज्जन कुमार, R.K.आनंद, ललित माकन, H.K.L.भगत और कांग्रेस पार्टी कों दंगे भडकाने और दंगाईयो कों मदद करने के आरोप में सीधा सीधा दोषी ठहराया। लेकिन पुलिस और कांग्रेसी सरकारों ने कोई कारवाई नहीं की। कांग्रेस नेता जगदीश टायटलर के खिलाफ चल रहे सभी केस कोर्ट ने 2007 में पुख्ता सबूतों के अभाव में बंद कर दिए और उन्हें बरी कर दिया।
दंगो के बाद लगभग 250 FIR दर्ज की गई पर सरकार के कहने पर इन्हे रिकार्ड से हटा दिया गया ।



कांग्रेस ने इन दंगो के लिए कभी ना खेद जताया ना किसी प्रकार की हमदर्दी । सिख आज भी न्याय की आस में भटक रहे हैं । हिन्दू और सिख हमेशा भाई भाई की तरह रहा है । दोनो ने इस मातृभूमि के लिए रक्त बहाया है .. यह एक षड़यंत्र ही था भाई को भाई के हाथ मरवाने का । अपनी सियासी रोटियाँ सेकने का ।

खुद को अल्पसंख्यको की सबसे बड़ी हमदर्द बताने वाली इस पार्टी की नज़र में क्या केवल मूसलमान अल्पसंख्यक हैं । गुजरात दंगो पर नरेन्द्र मोदी को घेरने वाली ये कांग्रेस कभी अपने गिरेबान में क्यो नहीं झाकती । दंगो में सिखो की हत्या करने वाले लोग आज कांग्रेस में उच्च पदो पर बैठे हैं । क्या कांग्रेस के पास इसका जवाब है ?