रविवार, 6 दिसंबर 2015

असहिष्णुता केवल सियासी मुद्दा : चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर


असहिष्णुता केवल सियासी मुद्दा : चीफ जस्टिस

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नईदिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने कहा है कि देश में असहिष्णुता नहीं है.यह केवल सियासी मुद्दा है। उन्होंने कहा कि जब तक देश में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट है, किसी को भी घबराने की जरूरत नहीं है.

उन्होंने कहा कि इस देश में कई धर्मों के लोग रहते हैं. दूसरे धर्मों के लोग यहां आए और फले-फूले. यह हमारी विरासत है. बाकी सब धारणा की बात है.

सीजेआई ठाकुर ने कहा कि मैं एक ऐसे संस्थान का नेतृत्व कर रहा हूं जो कानून का शासन सुनिश्चित करता है. जब तक कानून है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता है, तब तक मुझे लगता है कि हम समाज के हर तबके के हर शख्स के अधिकारों की रक्षा करने में सक्षम हैं.

सीजेआई ने लोगों से एक अपील भी की. कहा- ‘मैं आप लोगों से अपील करता हूं कि आपस में एक-दूसरे के लिए प्रेम रखें.‘ उन्होंने समाज में वैर भाव कम करने और हर समय सबको मिलजुल रहने का संदेश दिया.

जस्टिस ठाकुर ने केजरीवाल सरकार के प्रदूषण कम करने के नए फार्मूले पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जजों को कार पूलिंग सिस्टम से चलना चाहिए. इससे लोगों में सही संदेश जाएगा. यह कोई त्याग नहीं है, बल्कि लोगों को प्रोत्साहित करने का एक प्रयास है.
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असहिष्णुता राजनीतिक दलों के लिए

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर ने आज कहा कि असहिष्णुता राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण विषय हो सकता है, लेकिन लोगों को डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि शीर्ष अदालत कानून के शासन के लिए मौजूद है।  

न्यायमूर्ति ठाकुर ने यहां मीडियाकर्मियों के साथ चाय पर चर्चा के दौरान कहा कि देश में असहिष्णुता को लेकर राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है, लेकिन इसे लेकर देशवासियों को तब तक डरने की कोई जरूरत नहीं है, जब तक उच्चतम न्यायालय मौजूद है और कानून के शासन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता भी।  

उन्होंने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट का काम संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना है और देश में जब तक यह कोर्ट है तब तक कानून का शासन मौजूद रहेगा और देशवासियों को डरने की कोई जरूरत नहीं है।’ गत तीन दिसंबर को मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ लेने के बाद न्यायमूर्ति ठाकुर की मीडियाकर्मियों से यह पहली बातचीत थी।  

गौरतलब है कि पिछले कई महीनों से असहिष्णुता को लेकर देशभर में बहस छिड़ी हुई है और इसके मद्देनजर 50 से अधिक साहित्यकारों, कलाकारों, वैज्ञानिकों और फिल्मकारों ने अपने पुरस्कार लौटाये हैं। इन सभी का आरोप है कि केन्द्र सरकार जानबूझकर दक्षिणपंथी ताकतों को बढ़ावा दे रही है। हालांकि केन्द्र सरकार ने इन आरोपों का खंडन किया है।
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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने असहिष्णुता को बताया सियासी मुद्दा,- बोले, 'किसी को डरने की जरूरत नहीं'
नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस  टीएस ठाकुर ने असहिष्णुता को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि देश में असहिष्णुता नहीं है और ये केवल एक सियासी मुद्दा है। देश में कानून का राज है इसलिए किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चीफ जस्टिस ने कहा कि इस देश में कई धर्मों के लोग रहते हैं। कई संस्कृतियां यहां विकसित हुई है, यही हमारी विरासत है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि असहिष्णुता सियासी बहस के आयाम हो सकते हैं, लेकिन देश में जब तक कानून व्यवस्था बनाए रखने  के लिए सुप्रीम कोर्ट है जब तक किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है।

ठाकुन ने कहा कि जब तक कानून है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता है, तब तक मुझे लगता है कि हम समाज के हर तबके के हर शख्स के अधिकारों की रक्षा करने में सक्षम हैं।

चीफ जस्टिस लोगों ने अपील करते हुए कहा कि आपस में एक-दूसरे के लिए प्रेम रखें, उन्होंने समाज में वैर भाव कम करने और हर समय सबको मिलजुलकर रहने का संदेश दिया।

मजहबी आतंक के विरूद्ध अमरीका में बढ़ रहा है गुस्सा

अमरीका में बढ़ रहा है गुस्सा

तारीख: 30 Nov 2015 12:13:21

 9/11 हमला करने वाले मुस्लिम आतंकियों ने 90 बार अल्लाह के नारे लगाये थे। कोई मुझे बताये यह इस्लामिक कैसे नहीं है। रेडिकल इस्लाम-ये शब्द मुसलमानों को चुभते हैं? आखिर मुसलमानों को सच चुभता क्यों है? मुसलमानों को कुरान की आयत 3: 151 की वह आयत क्यों नहीं चुभती जिसमें कहा गया है कि 'जल्दी ही हम गैर मजहबियों के दिलों में खौफ बरपा देंगे'?     — पामेला जैलर,  ब्लॉगर, अमरीका



हम रेडिकल इस्लाम से लड़ रहे हैं। कुरान में ऐसा कुछ नहीं है जो 'रूहानी जिहाद' की बात करता हो।
— हिलेरी क्लिंटन, पूर्व विदेश मंत्री, अमरीका



विशेष प्रतिनिधि
अमरीका की जानी-मानी ब्लॉगर और लेखिका पामेला जैलर अपने देश में बढ़ रहे मजहबी आतंक को लेकर हमेशा की तरह मुखर हैं। दुनियाभर की जिहादी गतिविधियों पर नजर रखते हुए वे अमरीका के संदर्भ में वैश्विक आतंक की बारीकियों को समझने, खंगालने और विश्लेषण करने में जुटी हुई हैं। अपने एक लेख में पामेला ने अमरीका के वाममार्गियों की इस्लामी आतंक और इस्लामिक स्टेट को इस्लाम से पृथक करने की चाल पर उनको आड़े हाथों लिया है। वे कहती हैं,'आज जॉर्ज बुश उनके नए चहीते बनकर उभरे हैं। ये वहीं जॉर्ज बुश हैं जिन्होंने इस्लाम को 'शान्ति का मजहब' बताया था।' पामेला कहती हैं,'असल में  इस्लामिक जगत में शान्ति तभी और केवल तभी हो सकती है जब दुनिया में दारुल इस्लाम कायम हो जाये।'
वे आगे लिखती हैं, 'यही लक्ष्य था,14 सौ साल पहले और यही लक्ष्य है आज भी। 9/11 की घटना हममें से ज्यादातर के लिए एक गहरा झटका थी। बुश ने मन में गलत बात बैठा रखी थी कि उदारवादी मुस्लिम जगत कट्टरवादी मुस्लिम जगत को पछाड़ देगा। बुश को यह बात समझ नहीं आई कि उदारवादी मुसलमानों के पास कोई सैद्धांतिक धरातल नहीं है। आईएसआईएस, अल कायदा, अल शबाब और बाकी सारे जिहादी गुट विशुद्ध इस्लामी भावना के अनुसार चलते हैं। वही असली इस्लाम है। जब कोई जिहादी पेरिस (या लंदन, न्यूयार्क, मुंबई, इस्रायल आदि) में खुद को बम से उड़ा लेता है तो लोग नासमझ बने यही कहते मिलते हैं, 'समझ नहीं आया उसे क्या हुआ, वह तो इतना अच्छा लड़का था, बड़ा अच्छा पड़ोसी था।' होता यह है कि जब कोई मुस्लिम मजहबी हो जाता है और उसी के जुनून की खुमारी में फिदायीन बन जाता है और लोगों की जान ले लेता है। बुश के बरअक्स हिलेरी क्लिंटन ने रेडिकल इस्लाम की चर्चा की थी और कहा था कि हम रेडिकल इस्लाम से लड़ रहे हैं। कुरान में ऐसा कुछ नहीं है जो 'रूहानी जिहाद' की बात करता हो।'
पामेला लिखती हैं,' जिहादी हिंसा बढ़ रही है। अभी पेरिस में ही आस्थावान' मुसलमानों ने पेरिस में करीब 150 लोगों की जान ले ली। इसके बाद इस्रायल में एक मुस्लिम ने एक अमरीकी किशोर को मार दिया। हत्यारे को उसके इमाम और उसकी मजहबी किताब ने हत्या के लिए उकसाया था। उधर माली में इस्लामी जिहादियों ने एक अमरीकी नागरिक को मार डाला, जबकि 'आस्थावान' मुसलमानों के एक समूह ने एक महंगे होटल पर हमला करके 170 बंधकों में से मुसलमानों को चुनकर रिहा कर दिया था। बचे बंधकों को उन्होंने अपनी कुख्यात इस्लामी परीक्षा से गुजारते हुए कहा कि जो कुरान की आयतंे सुना दें, वे जा सकते हैं। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। केन्या में हुआ है। सितम्बर, 2013 में नैरोबी के एक मॉल में मुसलमानों ने उन लोगों को मार डाला था जो कुरान की आयतें नहीं सुना पाए थे। नवम्बर, 2014 में भी इसी वजह से 28 गैर मुसलमानों को मार डाला गया था। अप्रैल, 2015 में 'अल्लाहू अकबर' के नारे लगाते हुए गरीसा विश्वविद्यालय पर हमला किया और कुरान की आयतें न दोहरा पाने वालों को हलाक कर दिया। नवम्बर, 2008 में मुंबई पर हमला बोला गया था।'
      वे आगे लिखती हैं, '9/11 हमला करने वाले मुस्लिम आतंकियों ने 90 बार अल्लाह के नारे लगाये थे। कोई मुझे बताये यह इस्लामिक कैसे नहीं है। रेडिकल इस्लाम-ये शब्द मुसलमानों को चुभते हैं? आखिर मुसलमानों को सच चुभता क्यों है? मुसलमानों को कुरान की आयत 3: 151 की वह आयत क्यों नहीं चुभती जिसमें कहा गया है कि 'जल्दी ही हम गैर मजहबियों के दिलों में खौफ बरपा देंगे'? हमारे खिलाफ जिहाद की यह लड़ाई वैसी ही जगजाहिर है जैसा कि आसमान का रंग। इजिप्ट के राष्ट्रपति सीसी ने कहा था, हम उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं जहां मुसलमानों ने पूरी दुनिया को खतरे में डाल दिया है।
क्या यह बात हजम हो सकती है 1.6 अरब मुसलमान शेष दुनिया की 7 अरब आबादी को मार डालें ताकि मुसलमान फल-फूल सकें? यह संभव नहीं है।' पामेला के अनुसार, 'अगर आप मुसलमान नहीं हैं तो इस्लामी कानून के तहत आपके सामने तीन रास्ते हैं- इस्लाम में कन्वर्ट हो जाओ, मुस्लिम झंडे तले रहो और लंबे-चौड़े कर चुकाओ, अपने मुस्लिम आकाओं की गुलामी में रहो जहां आपके कोई बुनियादी अधिकार न हों, या फिर मरो। अमरीकी नागरिकों का कत्ल हो रहा है और अमरीका के वाममार्गी इस उम्मीद में खून सनी जमीन को झाड़-पोंछ रहे हैं कि अमरीका को ये सब नहीं दिखेगा।'