रविवार, 27 दिसंबर 2015

कर्म करने की प्रेरणा देती है भगवद्गीता ::: जे. नंदकुमार

कर्म करने की प्रेरणा देती है भगवद्गीता
Posted by: December 03, 2015 I
(21 दिसंबर, गीता जयन्ती पर विशेष)
लेखक – जे. नंदकुमार, अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

“जब शंकाएं मुझ पर हावी होती हैं, और निराशाएं मुझे घूरती हैं, जब दिगंत में कोई आशा की किरण मुझे नजर नहीं आती, तब मैं गीता की ओर देखता हूं.” – महात्मा गांधी.

संसार का सबसे पुराना दर्शन ग्रन्थ है भगवद्गीता. साथ ही साथ विवेक, ज्ञान एवं प्रबोधन के क्षेत्र में गीता का स्थान सबसे आगे है. यह केवल एक धार्मिक ग्रन्थ नहीं है, अपितु एक महानतम प्रयोग शास्त्र भी है. केवल पूजा घर में रखकर श्रद्धाभाव से आराधना करने का नहीं, अपितु हाथ में लेकर युद्धभूमि में लड़कर जीत हासिल करने का सहायक ग्रन्थ है. महाभारत युद्ध के प्रारम्भ में कर्ममूढ़ होकर युद्ध से निवृत होने की इच्छा व्यक्त करने वाले अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने गीतोपदेश के द्वारा ही कर्म पूर्ण करने की प्रेरणा दी. अर्जुन ऐसा कहते हैं कि युद्ध करने से भी अच्छा अर्थात विहित कर्म करने से भी श्रेष्ठ युद्ध भूमि छोड़कर जाना है. वह तर्क देते हैं कि युद्ध के कारण बहने वाले खून की नदी पार करके विजयी बनने से भी अच्छा भिखारी बनना है. भगवान श्रीकृष्ण उनको पुरुषार्थ का महत्व बताते हैं. अपना कर्म छोड़ने की प्रवृति नीच और अनार्य है, ऐसा ज्ञान गीता देती है. द्वितीय अध्याय के दूसरे एवं तीसरे श्लोकों में भगवान पूछते हैं –

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितं

अनार्यजुष्टमस्वगर्यमकीर्तिकरमर्जुन

हे अर्जुन, तुझे इस दुःखदाई समय में मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ. क्योंकि यह अश्रेष्ठ पुरुषों का चरित है. यह स्वर्ग को देने वाला नहीं है और अपकीर्ति को करने वाला ही है. उतना मात्र नहीं, अगले श्लोक में और जोर से भगवान प्रहार करते है -

कलैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैनत्वय्युपपद्यते.

क्षुद्रं ह्रदयदौर्बल्यं त्यक्तोत्तिष्ठ परन्तप.

भगवान का मत ऐसा है कि धर्म छोड़ना यानि कलीवता अथवा नपुंसकता है. उसको मत प्राप्त हो. क्योंकि तुम्हारे में यह उचित नहीं है. इसलिए हृदय की दुर्बलता को त्यागकर अपना कर्तव्य निभाने के लिए (युद्ध के लिए) खड़े हो जाओ.

यह भगवदगीता के महत्वपूर्ण उपदेश हैं. यह बात केवल युद्ध सम्बंधित नहीं है. जीवन के सब क्षेत्रों में यह लागू होती है. प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपना धर्म होगा. चाहे वह अध्यापक होगा या विद्यार्थी, मजदूर या अधिकारी कुछ भी हो अपने लिए मिले हुए धर्म को अवश्य मनःपूर्वक सफलतापूर्वक पूर्ण करना चाहिए. उसको ध्यानपूर्वक निपुणता के साथ करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है. उसके प्रति अनदेखी करके व्यवहार करना हीनता है.

आज के युग में यह सन्देश सर्वदा प्रासंगिक है. अपने निजी धर्म, संस्कृति को छोड़कर बाकि चमकने वाले अन्य आदर्शों के पीछे दौड़ने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है. स्वदेशी का सन्देश रखते हुए महात्मा गांधीजी ने इसी बात का विस्तार से प्रतिपादन किया है. उन्होंने बताया है कि स्वदेशी याने स्वधर्म और उसके साथ स्वभाषा और स्वभूषा भी है. स्वदेशी कल्पना को गांधीजी ने व्यापक अर्थ में दिया है. वह ‘स्व’ से जुड़े हुए सब है. धर्म (Religion) के बारे में गांधीजी कहते हैं. हमारी  परम्परा एवं परिसर में विद्यमान धर्म छोड़ना महापाप है. इसी प्रकार हमारी मातृभाषा एवं अपनी संस्कृति एवं सदाचार मूल्यों के साथ मेल खाने वाली नागरिक जीवन शैली भी होनी चाहिए.

महात्माजी को इस तरीके का मार्ग एवं सिद्धांत अपनाने की प्रेरणा भगवदगीता से मिली. उन्होंने कई बार यह बात प्रस्तुत भी की थी. भगवदगीता को मन जैसा मानकर अनुसरण करने से संकटों से पार पा सकते हैं. गांधी जी को भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व करने की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन भगवद्गीता ने दी. अंततोगत्वा गीता प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म सम्बंधित ज्ञान देती है. और  किसी भी स्थिति में धर्म पालन का अनुसरण और आवश्यकता पड़ने पर रक्षा करने के लिए रणभूमि में उतरने की ताकत भी देती है. इस बात को गहराई से समझकर उसका क्रियान्वयन करने वालों में केवल गांधीजी ही नहीं थे. सही अर्थ में स्वातंतत्र्य का सामान्य समाज में भाव बनाने वाले लोकमान्य तिलक जी के पूरे क्रियाकलापों का सैद्धांतिक अधिष्ठान भी गीता दर्शन से ही बना. महर्षि अरबिंदो ने समाज के प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर राष्ट्रबोध की आग लगाने के लिए भगवद्गीता का भाष्य लिखा. ‘जय हिन्द’ का नारा लगाकर भारत मुक्ति के लिए अथक परिश्रम करने वाले महान देशभक्त नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिन्द फ़ौज के सदस्यों को पढ़ने के लिए भगवद्गीता दी थी. लाखों करोड़ों देशवासियों के अन्दर देशभक्ति का ज्वार इसलिए जला और स्वातंत्र्य आन्दोलन के कठिनतम मार्ग में वे कूद पड़े. यह सब इसलिए संभव हो पाया क्योंकि भगवदगीता अपने इस देश के स्वत्व को ही प्रगटित करती है. स्वाभाविक है, सच्चे देशभक्तों को उससे प्रेरणा मिली. स्वधर्म पालन के रास्ते में चलने पर यदि मृत्यु भी प्राप्त हो गई तो भी परवाह नहीं. ऐसी सुव्यक्त जीवन दिशा भी उस निमित उन्हें मिली. गीता के तीसरे अध्याय का 35वां श्लोक इस दृष्टि पर उल्लेखनीय है –

“श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः पर धर्मात्स्व नुष्ठितात.

स्वधर्मे निधनं श्रेयःपरधर्मो भयावह.”

अपना स्वधर्म चाहे परधर्मों के साथ तुलना करने के समय थोडा बहुत कम होगा, कम चमकने वाला  होगा, लेकिन उसको छोड़ना नहीं. परधर्म अपनाना नहीं. वह भयावह है. इसलिए स्वधर्म में तो मरना भी श्रेयस्कर है. भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारियों द्वारा सूली पर चढ़ने के समय भी भगवद्गीता हाथ में रखने का कारण और दूसरा कुछ भी नहीं था.

आज भी स्थिति एक प्रकार से समान है. परधर्म अभी भी चमकने वाली वेशभूषा पहनकर देश में अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूद है. स्वत्व बोध के आभाव के कारण बहुत सारे लोग भ्रमित होकर परधर्म के पीछे जाते हैं. शिक्षा से लेकर आर्थिक क्षेत्र तक, संस्कृति से लेकर धार्मिक मोर्चा तक सब दूर स्थिति गंभीर है. यह बात ठीक है कि राष्ट्रीय आदर्शों का प्रभाव भी बढ़ रहा है, लेकिन उसकी गति बढ़ाने की जरूरत है. इस बीच हमको प्रेरणा देने की ताकत अपने राष्ट्र ग्रन्थ भगवद्गीता में है. फिर से एक बार गीता मां के पीछे चलकर स्वधर्म रक्षा के लिए सबको तैयार होना चाहिए –

अंब त्वामनुसंदधामी भगवद्गीते भवद्वेशीनीं.

लेखक – जे. नंदकुमार, अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

संगठन में धन से अधिक महत्व महापुरुषों के जीवन का अनुसरण है – परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. भागवत जी



संगठन में धन से अधिक महत्व महापुरुषों के जीवन का अनुसरण है – डॉ. मोहन भागवत जी

Posted by: December 20, 2015


नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने संघ के ज्येष्ठ प्रचारक सरदार चिरंजीव सिंह जी का अभिनंदन करते हुए कहा कि दीपक की तरह संघ के प्रचारक दूसरों के लिए जल कर राह दिखाते हैं. सम्मान आदि से प्रचारक दूर रहना ही पसंद करते हैं. संघ में व्यक्ति के सम्मान की परंपरा नहीं है, किंतु संगठन के लाभ के लिए न चाहते हुए भी सम्मान अर्जित करना पड़ता है. सरसंघचालक जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय सिख संगत के मुख्य संरक्षक सरदार चिरंजीव सिंह जी के  85 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर नई दिल्ली स्थित मावलंकर सभागार में आयोजित सत्कार समारोह में सिख संगत के कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे.

सरसंघचालक जी ने कहा कि जीवन का आदर्श अपने जीवन से खड़ा करना यह सतत तपस्या संघ के प्रचारक करते हैं. इसके लिए वह स्वयं को ठीक रखने की कोशिश जीवन पर्यन्त करते है. महापुरुषों के जीवन का अनुसरण करते रहने वाले साथी मिलते रहें, यह अधिक महत्त्वपूर्ण है. धन से ज्यादा,  संगठन का फायदा इसमें है कि जो रास्ता संगठन दिखाता है, उस रास्ते पर चलने की हिम्मत समाज में बने. संघ में प्रचारक निकाले नहीं जाते वह अपने मन से बनते हैं. जिसको परपीड़ा नहीं मालूम होती, वह कैसे मनुष्य हो सकता है. मनुष्य को मनुष्य होने का साहस करना होता है, संघ स्वयंसेवकों को ऐसा वातावरण देता है. सरदार चिरंजीव सिंह जी के जीवन से ऐसा उदाहरण देख लिया है. अब हम लोगों के ऊपर है कि हम कैसे उनके जीवन के अनुसार चल सकते हैं. अपनी शक्ति बढ़ाते चलो, अपना संगठन मजबूत करते चलो, सरदार चिरंजीव सिंह जी ने ऐसा कर के दिखाया. अगर यह परंपरा आगे चलाने की कोशिश हम सभी करें तो किसी भी धन प्राप्ति से ज्यादा खुशी उनको होगी.
राष्ट्रीय सिख संगत के संरक्षक सरदार चिरंजीव सिंह जी ने कहा कि संघ में प्रचारक बनने के लिए किसी घटना की आवश्यकता नहीं होती, जैसे परिवार का काम करते हो वैसे समाज का काम करो. सहज और स्वभाविक रूप से आप समाज के लिए काम करो. उन्होंने डॉ. हेडगेवार जी का संदर्भ दिया कि उन्होंने केवल 5 बच्चों को साथ लेकर संघ की स्थापना की. यही एक घटना हो सकती है, हम सभी के संघ में आने के लिए. संघ का काम यही है कि देश के प्रति एक आग उत्पन्न कर देना, अब उस व्यक्ति के ऊपर निर्भर करता है कि वह प्रचारक जीवन अपनाता है या फिर अन्य मार्ग से देश की सेवा करता है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एकमात्र संगठन है, जिसमें व्यक्ति सिर्फ देने ही आता है, अपने लिए कुछ नहीं मांगता. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सिख गुरुओं का हृदय से बहुत आदर करता है. गुरु गोविंद सिंह जी ने जिन लोगों के लिए सब कुछ किया, जब उन लोगों ने कुछ नहीं किया तो उन्होंने उनके लिए कुछ बुरा नहीं कहा.  आज हम अपनी कमजोरियों की जिम्मेदारी दूसरों पर डालना चाहते हैं, भारतवर्ष के पतन का यह बहुत बड़ा कारण है, क्योंकि हम दूसरों को ही बुरा ठहराने की कोशिश करते हैं. उन्होंने गुरुवाणी के आधार पर सारे समाज को जागृत करने को कहा कि सिख धर्म वास्तव में क्या है. गुरुओं के उपदेश के अनुसार सिखों से  आचरण करने को कहा.

सरदार चिरंजीव सिंह जी का सिख संगत के कार्य को आगे बढ़ाने में अभूतपूर्व योगदान है. उन्होंने वर्ष 1953 में स्नातक शिक्षा पूर्ण कर 62 वर्ष से संघ के प्रचारक के रूप में विभिन्न संगठनों, विहिप, पंजाब कल्याण फोरम, संघ के विभिन्न दायित्व व राष्ट्रीय सिख संगत के 12 वर्ष तक राष्ट्रीय अध्यक्ष रहकर और वर्तमान में मुख्य संरक्षक, अपना सम्पूर्ण जीवन माँ भारती को समर्पित किया हुआ है.

3-राष्ट्रीय सिख संगत के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार गुरचरन सिंह गिल जी द्वारा कार्यक्रम की भूमिका प्रस्तुत की गई. उन्होंने कहा कि सरदार चिरंजीव सिंह का जन्म माता जोगेन्दर कौर व पिता सरदार हरकरण सिंह के गृह शहर पटियाला में अश्विन शुक्ल नवमी, वि.सं. 1987 ई. तद्नुसार 1 अक्टूबर 1930 को हुआ. उनकी प्रारम्भिक शिक्षा सनातन धर्म इंग्लिश हाई स्कूल पटियाला में हुई. वे सातवीं कक्षा से संघ के सम्पर्क में आये तथा तब से सदा के लिए संघ के होकर रह गये. वर्ष 1948 में मैट्रिक करने के बाद उन्होंने अंग्रेजी, राजनीति शास्त्र व दर्शनशास्त्र से स्नातक की उपाधि प्राप्त की. इसी बीच जब संघ पर प्रतिबंध लगा तो वे सत्याग्रह कर जेल गए. परिवार के स्वप्न थे कि चिरंजीव सिंह जी किसी बड़ी नौकरी में जा कर धन व यश कमायें, पर संघ शाखा से मिले संस्कार उन्हें अपना जीवन, अपनी पवित्र मातृभूमि व देश पर बलिदान करने की ओर ले जा रहे थे. वह 14 जून 1953 को आजीवन देश सेवा के लिए संघ के प्रचारक हो गए. वह विभिन्न जिलों के प्रचारक, बाद में लुधियाना के विभाग प्रचारक व पंजाब के सह-प्रचारक रहे. आपात्काल में लोकशाही की पुनः प्रस्थापना के जनसंघर्ष में सक्रिय रहे. भूमिगत रहकर सैंकड़ों बंधुओं को संघर्ष में सहभागी होने की प्रेरणा दी.

पंजाब में उग्रवाद के दिनों में जब सामाजिक समरसता की बात कहना दुस्साहस ही था, तब उन्होंने पंजाब कल्याण फोरम बनाकर इसके संयोजक का महत्वपूर्ण दायित्व निभाया. वे जान हथेली पर रखकर सांझीवालता की सोच रखने वाले सिख विद्वानों, गुरुसिख संतों व प्रमुख हस्तियों से निरंतर संवाद बनाये रहे तथा उग्रवाद से पीड़ित परिवारों को संवेदना व सहयोग प्राप्त करवाते रहे. उन्होंने गुरुसिख व सनातन परम्परा के संतों से संवाद बनाकर, समाज में आत्मीयता, प्रेम, सौहार्द व सांझीवालता का सन्देश सब जगह पहुंचाने के लिए “ब्रह्मकुण्ड से अमृतकुंड” नाम से, एक विशाल यात्रा हरिद्वार से अमृतसर तक निकाली, जिसमें लगभग एक हजार संतों की भागीदारी रही.

1970 व 80 के दशक में पंजाब के तनावपूर्ण वातावरण तथा 1984 में इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुए दिल्ली, कानपुर, बोकारो इत्यादि में सिखों के नरसंहार के कारण जब भाईचारे की परम्परागत कड़ियां तनाव महसूस करने लगीं, तब चिरंजीव सिंह जी ने सिख नेताओं और संतों के साथ मिलकर राष्ट्रीय सिख संगत की स्थापना की. वर्ष 1990 में वह इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. खालसा सिरजना के 300 वर्ष पूरे होने पर सांझीवालता का सन्देश देने के लिए भारत के विभिन्न मत सम्प्रदायों के संतों से सम्पर्क कर, श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज के जन्मस्थल पटना साहिब से राजगीर बोधगया, काशी, अयोध्या से होती हुई 300 संतों की यात्रा निकाली. यह यात्रा 24 मार्च 1999 से शुरु होकर 10 अप्रैल को श्री आनंदपुर साहिब के मुख्य आयोजन, संत समागम, में सम्मिलित हुई. इस यात्रा का हरिमंदिर साहिब, दमदमा साहब, केशगढ़ साहिब जैसे सभी प्रमुख गुरुद्वारों में सम्मान सत्कार हुआ. सरदार जी ने सन् 2000 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आयोजित मिलेनियम-2, विश्व धर्म सम्मेलन में भागीदारी की व संगठन के विस्तार के लिए इंग्लैंड व अमेरिका की यात्रा की.

इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारम्भ गुरुतेगबहादुर पब्लिक स्कूल मॉडल टाउन दिल्ली के छात्रों द्वारा शबद गायन ‘देहि शिवा वर मोहि इहे’ द्वारा किया गया. इस अवसर पर सरदार चिरंजीव सिंह जी द्वारा लिखित पुस्तक का विमोचन भी किया गया. उनको सम्मान स्वरुप 85 लाख रुपये की राशि प्रदान की गयी जो उन्होंने सिख इतिहास में शोध कार्य के लिए केशव स्मारक समिति को धरोहर स्वरूप सौंपी. जो बाद में भाई मनि सिंह गुरुमत शोध एंड अध्ययन संस्थान ट्रस्ट को हस्तांतरित कर दी गयी. इस अवसर पर संत बाबा निर्मल सिंह जी (बुड्ढा बाबा के वंशज), उत्तर क्षेत्र संघचालक डॉ. बजरंग लाल गुप्त, दिल्ली प्रान्त संघचालक भी उनके साथ मंचस्थ थे. मंच संचालन दिल्ली प्रान्त सह संघचालक आलोक जी ने किया.