गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

स्वदेशी में भारतीय संस्कृति के मूल्य प्रतिबिंबित होते हैं : कश्मीरी लाल जी

स्वदेशी जीवनशैली में भारतीय संस्कृति के मानवीय मूल्य प्रतिबिंबित होते हैं – कश्मीरी लाल जी
December 27, 2015 In: जोधपुर

जोधपुर | स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन उम्मेद स्टेडियम से गांधी मैदान तक स्वदेशी संदेश यात्रा निकाली गई. जब भी बाजार जायेंगे, माल स्वदेशी लायेंगे, स्वदेशी अपनाओ, देश बचाओ, आदि उद्घोषों के साथ सभी प्रदेशों से आये 2000 स्वदेशी कार्यकर्ताओं ने स्टेडियम से गांधी मैदान तक स्वदेशी संदेश यात्रा निकाली. संदेश यात्रा का जगह-जगह शिक्षक संघ राष्ट्रीय, भारतीय शिक्षण मण्डल, सोजती गेट व्यापार संघ, जालोरी गेट व्यापार संघ, परम पूज्यनीय माधव गौ विज्ञान परीक्षा समिति, भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा, शास्त्रीनगर बीजेपी मण्डल, मेडिकल एसोसिएशन आदि द्वारा स्वागत किया गया. सभी प्रान्तों से आये स्वदेशी कार्यकर्ताओं का जोश देखने वाला था. पूरा मार्ग स्वदेशी नारों से गूंज गया. सरदारपुरा पर संदेश यात्रा गांधी मैदान में हुंकार सभा में परिवर्तित हो गयी.

गांधी मैदान में स्वदेशी हुंकार सभा का आयोजन किया गया. सभा में स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संयोजक अरूण ओझा ने कहा कि स्वदेशी का अर्थ मात्र घर परिवार की चारदीवारी तक ही सीमित नहीं वरन् सामाजिक अर्थव्यवस्था के अंतर्गत हमारा व्यापार, वाणिज्य, हमारा सुथार, हमारा सुनार, हमारा चर्मकार सहित मध्यम व ऊंचा व्यापार सरकारी नौकरियों में अधिकारी पद से लेकर उद्योगपतियों तक की जीवन शैली को भारतीय संस्कारों में ढाल देना ही स्वदेशी है. इन विचारों को परिलक्षित करते हुए स्वदेशी जागरण मंच पिछले 24 वर्षों से लगातार भारतीय संस्कार शैली को भारत एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर तक शोभायमान करने का उत्कृष्ट कार्य कर रहा है.

मंच के राष्ट्रीय संगठक कश्मीरी लाल जी ने कहा कि स्वदेशी अपनाकर ही हम अपने गौरवशाली अतीत को वापस ला सकते है. जहां तक सम्भव हो अपने जीवन में पहले देशी, फिर स्वदेशी और मजबूरी में विदेशी सिद्धांत को उतारना चाहिए. स्वदेशी एक जीवन शैली है, जिसके अन्तर्गत समस्त भारतीय संस्कृति के मानवीय मूल्य प्रतिबिंबित होते है. चौबीस घण्टे की दिनचर्या अर्थात सुबह उठने से लेकर रात को सोने से पहले तक एवं सोते हुए समस्त भारतीय संस्कारों का जीवन में हृदयांगम करना, जीवन में लागू करना एवं अपने कार्य, व्यवहार से भारतीय संस्कृति मूल्य को प्रतिबिंबित करना ही स्वदेशी है. हुंकार सभा के व्यवस्था प्रमुख ज्ञानेश्वर भाटी ने सभी अतिथियों व स्वदेशी कार्यकर्ताओं का हार्दिक अभिनन्दन करते हुए सभी को धन्यवाद दिया.

सांस्कृतिक संध्या का आयोजन – राष्ट्रीय सम्मेलन में दूसरे दिन शाम को देश भर आये स्वदेशी कार्यकर्ताओं के मनोरंजन के लिए सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया. जिसमें पधारे सभी अतिथियों के सम्मुख राजस्थानी संस्कृति और कला के रंगों को बिखेरा गया. इसमें घूमर, तेहराताली, कालबेलिया, भवाई नृत्यों का प्रदर्शन कलाकारों द्वारा किया गया. साथ में योग कला के करतब भी दिखाए गये. संध्या का संचालन गजेन्द्रसिंह परिहार, पुनित मेहता, भारती वैद्य, सवाईसिंह के दल द्वारा किया.

प्रथम सत्र में पाली सांसद पीपी चौधरी ने कहा कि देश के अधिकांश लोग कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था से जुडे़ हैं. हमें गर्व है कि स्वदेशी जागरण मंच अपनी विचारधारा की सरकार होते हुए भी भूमि अधिग्रहण बिल को किसान विरोधी बताया. इसमें मजदूरों, किसानों के हितों की सुरक्षित रखने के प्रावधानों को जोड़ने की मांग की. देश की विस्तृत समृद्धि के लिए कृषि क्षेत्र में 1 से 2 प्रतिशत वृद्धि करनी पड़ेगी, जिससे गांवों का विकास तेज हो.

मंच के राष्ट्रीय सहसंयोजक डॉ.भगवती प्रकाश शर्मा ने कहा कि विगत 24 वर्षों में आर्थिक सुधारों के कारण हमारा देश आयातित वस्तुओं के बाजार में बदल गया है. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से हमारे देश के उत्पादक इकाई के दो तिहाई से अधिक अंश पर विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का स्वामित्व हो गया है. टिस्को सीमेन्ट, एसीसी, गुजरात अम्बुजा, केमलिन, थम्पअप्स जैसे प्रसिद्ध ब्रान्डों पर विदेशी लोगों का अधिकार हो गया है. वर्तमान में कुल वैश्विक उत्पादन में भारत का अंश मात्र 2.04 प्रतिशत ही है. जबकि चीन का अंश 23 प्रतिशत हो गया है. वर्ष 1991 में चीन व भारत का अंश लगभग बराबर था. अतः स्वदेशी जागरण मंच आह्वान करता है कि विभिन्न क्षेत्रों के स्वदेशी उद्यम संगठित होकर अपने उद्योग सहायता संघों में बदलें. जिससे मेड बाई  इण्डिया अभियान की गति बढे.

द्वितीय सत्र – मंच के दक्षिण क्षेत्र के संयोजक कुमार स्वामी ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन हर बीतते वर्ष के साथ बहुत तेजी से क्रूर एवं नुकसानदेह होता जा रहा है. वर्ष 2015 के अभिलेखों के अनुसार अभी तक का सबसे गर्म वर्ष था. यदि हम गत 150 वर्षों के सबसे गर्म 15 वर्षों की सूची बनाएं तो वे समस्त 15 वर्ष सन 2000 के बाद अर्थात 21वीं शताब्दी के ही वर्ष होंगे. यह तथ्य 21वीं शताब्दी में ग्लोबल वार्मिंग की समस्या की गंभीरता को दर्शाता है. भूमंडल के बढ़ते हुए तापमान से गंभीर मौसमी आपदाएं जैसे कि कुछ सीमित क्षेत्रों में तेज और भारी वर्षा, नवम्बर एवं दिसम्बर माह में चैन्नई और इसके आस पास के इलाके में देखी गयी एवं देश के बाकी हिस्सों में गंभीर सूखे की समस्या के प्रकोप में लगातार वृद्धि के आसार दिखायी दे रहे हैं. चैन्नई में आई बाढ़ ने प्रकृति के रोष के समक्ष मानव की लाचारी एवं मानवीय संस्थाओं की असफलता को हमें दृष्टिगत कराया है. अगर साल दर साल, इसी प्रकार से अनेक नगर एक साथ प्राकृतिक आपदा के कारण मुश्किल में आते हैं, तब कौन किसकी सहायता कर पायेगा? सम्पूर्ण विश्व अपनी ही गल्तियों का स्वयं ही शिकार बन चुका है.

आखिर इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या है? वर्तमान पश्चिमी विकास एवं जीवन शैली के मॉडल से प्रतीकात्मक एवं गड्डमड्ड समझौता विश्व को बिल्कुल भी बचाने नहीं जा रहा. हमको अधिक सौम्य और अधिक स्थायी तरीके से विकास एवं जीवनशैली के तरीके में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है. विकास एवं जीवनशैली के टिकाऊपन का एक सजीव एवं प्रमाणित उदाहरण विकास का भारतीय मॉडल है, जिसे विकास एवं जीवनशैली का स्वदेशी मॉडल भी कहा जा सकता है. स्वदेशी मॉडल इस अर्थ में सम्पूर्णता लिए हुए है कि यह जीवन (धर्म एवं मौक्ष) में भौतिकता (अर्थ, काम) एवं आध्यात्मिकता को समान महत्व देता है. यह पृथ्वी मां को उसके चेतन एवं अचेतन, समस्त स्वरुपों में अत्यन्त सम्मान एवं श्रद्धा देता है.

तृतीय सत्र – मंच के राष्ट्रीय सहसंयोजक व अर्थशास्त्र के प्रो. अश्विनी महाजन ने कहा कि हमें गर्व है कि स्वदेशी कार्यकर्ता बिना किसी पार्टी पक्ष के सभी पर्यावरणीय विरोधी नीतियों का विरोध करता है. जीएम फसलों पर बोलते हुए कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित टेक्नीकल कमेटी ने बताया कि जीएम फसलें मानव व पर्यावरण के लिये ठीक नहीं है और इससे प्राप्त लाभ सन्दिग्ध है तो फिर क्यों केन्द्र सरकार इसके खुले परीक्षण को अनुमति देती है. विज्ञान को उस मार्ग पर बढ़ना होगा, जिस पर पर्यावरण का रक्षण भी हो. अतः मंच जीएम फूड का विरोध करता है और इससे जैव विविधता को प्रभावित करने वाला कारण बताता है.

सदन में सच का अटल स्वर : अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस (25 दिसम्बर) पर विशेष

तारीख: 28 Dec 2015 11:39:48
सूर्य प्रकाश सेमवाल

सदन में सच का अटल स्वर

देश में संसद को जिस प्रकार से कुछ लोगों के लिए बना दिया गया है वह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता। छह दशक से ज्यादा संसद की गरिमा बढ़ाने में अपना योगदान देने वाले लोकप्रिय नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी निश्चित रूप से इस गतिरोध से दु:खी होते। वास्तव में आज जिस प्रकार से देश की संसद में परिपक्व बौद्धिक नेताओं का अकाल दिख रहा है, खासकर विपक्ष में वह चिंताजनक है। यदि विपक्ष के पास दूरदर्शी और जनता के हितचिंतक विवेकी जनप्रतिनिधि होते तो असहिष्णुता, राजनीतिक द्वेष और सांप्रदायिकता इत्यादि के  राग न अलापे जाते।
देश की प्रबुद्ध जनता संसद के अंदर हो रही नौटंकी और स्तरहीन हो गई, चर्चा में अनायास और सायास अटल जी को तो याद करेगी ही। चाहे देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ संसद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में साम्प्रदायिक आधार पर हुए चुनावों पर बहस का मुद्दा हो अथवा श्रीमती इंदिरा गांधी के समय देश में कई स्थानों पर हुए दंगों पर बेबाकी से सदन में अपनी राय रखने की बात। अटल जी ने सदैव देशहित में दूरदर्शितापूर्ण विधानों की वकालत की और वोटों के लिए तुष्टीकरण का विरोध। 70 के दशक में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की उपस्थिति में ही उन्होंने सारी संसद को चेता दिया था-
'सांप्रदायिकता को वोटों का खेल बना दिया गया है। मैं राजनीतिक दलों को चेतावनी देना चाहता हूं कि मुस्लिम संप्रदाय को बढ़ावा देकर अब आपको वोट भी नहीं मिलने वाले हैं'। (14 मई, 1970 को   लोकसभा में देश में सांप्रदायिक तनाव से उत्पन्न स्थिति पर चर्चा में भाग लेते हुए)।
देश में आजादी के बाद से ही दक्षिणपंथी दलों और सांस्कृतिक संगठनों पर सुनियोजित तरीके से सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगाया जाता रहा है। जब जनसंघ पर सदन में भी ऐसे निराधार आरोपों पर चर्चा हुई तो अटल जी ने बेबाक होकर तर्क के साथ अपनी बात रखी- 'भारतीय जनसंघ एक असांप्रदायिक राज्य के आदर्श में विश्वास करता है। जिन्होंने मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर लिया, वे हमारे ऊपर आक्षेप करने का दु:साहस न करें। इनकी सरकार मुस्लिम लीग के भरोसे टिकी है और हमको संप्रदायवादी बताते हैं। जो चुनाव में सांप्रदायिकता के आधार पर उम्मीदवार खड़े करते हैं वे हमको संप्रदायवादी बताते हैं। जो भारत को रब्बात के सम्मेलन में ले जा करके अपमान का विषय बनाते हैं वे हमें संप्रदायवादी बताते हैं।'(14 मई,1970)
अटल बिहारी वाजपेयी सत्तारूढ़ तंत्र के समक्ष सांप्रदायिकता और तुष्टीकरण को बार-बार तर्क के साथ उठाते रहे और देशहित में सच्चाई को बयां करने से कभी नहीं चूके। वे सांप्रदायिकता से लड़ने का ढोंग करने वाले कांग्रेसियों और वामपंथियों को उसी दौर से लताड़ने लगे थे जब साठ के दशक में देश की संसद में युवा जनप्रतिनिधि के रूप में उन्होंने प्रवेश किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने उन्हें भावी भारत का प्रधानमंत्री होने की घोषणा की थी। उदारमना अटल देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता के साथ हिन्दू-मुसलमान के साथ समान व्यवहार की पक्षधरता पर जोर देते रहे हैं- 'हम न भेदभाव चाहते हैं, न पक्षपात चाहते हैं। हमने संविधान की समान नागरिकता को स्वीकार किया है। भारतीय जनसंघ के दरवाजे भारत के सभी नागरिकों के लिए खुले हुए हैं। लेकिन अगर कोई मुसलमान जनसंघ में आता है तो दिल्ली में उसके खिलाफ पोस्टर लगाए जाते हैं कि वह एक काफिर हो गया है। जो भाषा मुस्लिम लीग बोलती थी मौलाना आजाद और अन्य राष्ट्रवादी मुसलमानों के खिलाफ, आज वही भाषा जनसंघ में आने वाले मुसलमानों के खिलाफ बोली जा रही है। सांप्रदायिकता से लड़ने का यह तरीका नहीं है।'(14 मई,1970)
देश की आजादी के बाद विभिन्न वैधानिक संस्थानों और सरकारी समितियों में किस प्रकार सत्ताधारी तंत्र ने हिन्दुत्ववादी विचारधारा के पोषक संगठनों और लोगों को दरकिनार करते हुए इन संस्थाओं के माध्यम से उन्हें निपटाने की योजना बनाई थी इससे बखूबी परिचित वाजपेयी जी ने राष्ट्रीय एकात्मता परिषद में शामिल लोगों पर भी प्रश्न खड़े किए जो सर्वथा उपयुक्त एवं प्रासंगिक थे-
'प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय एकात्मता परिषद का प्रारंभ किया था लेकिन उसे मेरे दल के विरुद्ध प्रचार करने का एक हथियार बनाया गया। मैं चाहता हूं कि राष्ट्रीय एकात्मता परिषद का विस्तार किया जाए।'(14 मई,1970)
अटल जी आगे सत्ताधारी तंत्र के एकाधिकार और स्वयं प्रधानमंत्री की कृपा पर बनने वाली राष्ट्रीय एकात्मता परिषद के लिए जीवन के विविध क्षेत्रों में कार्यरत शीर्ष व्यक्तित्वों को स्थान देने की वकालत करते हुए संसद में उस समय जारी व्यवधान पर बेबाकी से राय देते दिखाई पड़ते हैं। आंख मूंदकर मुस्लिम कट्टरवाद पर मौन और आत्मरक्षा में अपनी बात रखने वाले हिन्दू संगठनों को सांप्रदायिक घोषित करने की वोट बैंक नीति पर गंभीरता के साथ उन्होंने जो चेतावनी दी है वह आज भी प्रासंगिक और उतनी ही प्रभावशाली दिखाई पड़ती है-
'राष्ट्रीय एकात्मता परिषद में श्री एस.सी. छागला, श्री हमीद देसाई, डॉ. जिलानी और श्री अनवर देहलवी जैसे राष्ट्रवादी नेता लिए जाएं। प्रधानमंत्री किसको लें, यह प्रधानमंत्री की कृपा पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मैं पूछना चाहता हूं क्या प्रधानमंत्री मुस्लिम संप्रदायवादियों के बारे में कुछ कहने के लिए तैयार हैं। यह बात छिपी हुई नहीं है कि भिवंडी में तामीर-ए-मिल्लत ने वातावरण बिगाड़ा है लेकिन क्या किसी ने तामीर-ए-मिल्लत का नाम लिया है? शिवसेना की आलोचना हो रही है, होनी चाहिए... हमें भी लपेटा जा रहा है। लेकिन हम उसकी चिंता नहीं करते हैं। हम प्रधानमंत्री की कृपा से इस सदन में नहीं आए हैं उनके बावजूद आए हैं। इस राष्ट्र की जनता का हम भी प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन जब किसी मुस्लिम संप्रदायवादी संगठन का सवाल आता है तो मुंह में ताले पड़ जाते हैं, सांप सूंघ जाता है। जमाते-उल-उल्मा क्या कर रही है? जमाते-इस्लामी क्या कर रही है? तामीर-ए-मिल्लत ने भिवंडी में क्या किया? लेकिन है कोई बोलने वाला?' (14 मई,1970)
देश में बढ़ती सांप्रदायिकता के प्रासंगिक तत्व अटल जी ने उस जमाने में ही अर्थात इंदिरा जी के सत्तारूढ़ रहते, कांग्रेस के विभाजन के बाद संप्रदायवादियों और वामपंथियों से कांग्रेस के गठजोड़ में ढूंढ निकाले थे- 'क्या हर सवाल को राजनीति की कसौटी पर कसा जाएगा? जबसे कांग्रेस का विभाजन हुआ है देश में संप्रदायवादियों और साम्यवादियों का गठबंधन बढ़ गया है और उनको प्रधानमंत्री का वरदहस्त प्राप्त है। यह है संप्रदायवाद के बढ़ने का कारण?' (14 मई,1970) महाराष्ट्र के भिवंडी में हुए दंगों पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जनसंघ के अध्यक्ष और सदन के नेता अटल जी ने 14 मई, 1970 को संसद में एक लंबी चर्चा में निरुत्तर कर दिया था। आज संसद में असहिष्णुता के नाम पर मोदी सरकार को घेरने के बहाने जो काम कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष ने किया और दोनों ही सदनों के दो-दो सत्र होहल्ला में स्वाहा कर दिए उसकी भनक मानो अटल जी को चार दशक पूर्व से ही प्रतीत होती दिखाई पड़ रही थी। भारत के वामपंथी नेताओं और कांग्रेस पर क्षुद्र मानसिकता का पोषक होने की खुली घोषणा करते वे नहीं चूके- 'हमें देश के भीतर काम करने वाले पाकिस्तानी तत्वों पर नजर रखनी होगी और कम्युनिस्ट पार्टी के उस हिस्से पर भी नजर रखनी होगी जो चीन परस्त है और चीन परस्त होने के कारण आज पाकिस्तान परस्त हो रहा है। मुझे खेद है कि कलकत्ता के दंगों के संबंध में जो बातें कही गईं वे एक तरफा हैं और एक तरफा बातें यह बताती हैं कि हम ऐसा प्रचार करना चाहते हैं जो प्रचार न तो सत्य पर आधारित है और न राष्ट्र के हितों के लिए काम में आ सकता है। ऐसे प्रचार से हमको सावधान रहना चाहिए।'
(13 फरवरी, 1964 को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव देते हुए)


भारतीय लोकतंत्र की विडंबना देखिए जहां एकतरफा बातों और दुष्प्रचार से कुछ लोगों के इशारों पर पूरे देश की संसद को बाधित कर दिया जाता है और तथाकथित अभिव्यक्ति के खतरे के साथ-साथ असहिष्णुता के माहौल को रचने में सारी ऊर्जा लगा दी जाती है। देश की जनता के हितों का हनन कर विपक्ष से जनता को छलावा और धोखा ही मिलता है। आजादी के बाद से ही शुरू हुई सत्ता में बैठे रहने की इस लालसा पर अटल जी मानों कटाक्ष करते दीखते हैं-
'हमें इन दंगों को पार्टी का चश्मा उतारकर देखना होगा और मैं चाहता हूं कि कामरेड डांगे चश्मे को उतारकर इन दंगों को देखें। मुझे खुशी है कि उन्होंने अपना चश्मा उतार लिया- दलगत स्वार्थों को अलग रखकर इस पर विचार करना होगा, वोटों की चिंता को छोड़कर राष्ट्र को बचाने की चिंता करनी होगी।' (14 मई,1970) सांप्रदायिकता को अलग-अलग रूप से व्याख्यायित करने वालों को उलाहना देते हुए अटल जी इसे भावी पीढि़यों के लिए नुकसानदायक बताते हुए सदन में जनता की अपेक्षा पर खरी उतरने वाली भूमिका निभाने का आह्वान करते हैं- क्या 'हम देश की एकता का विचार करके नहीं चल सकते? यह विवाद इस बात को स्वीकार करेगा कि यह सदन, इस सदन में जिन दलों को प्रतिनिधित्व मिला है वे दल और उन दलों के प्रवक्ता इस महत्वपूर्ण समस्या पर कैसा दृष्टिकोण अपनाते हैं। हमें सच्चाई का सामना करना होगा। सच्चाई कितनी भी कठोर हो, कितनी भी भयानक हो, उसका उद्घाटन करना पड़ेगा। आज लाग-लपेट से काम नहीं चलेगा, किसी के पाप के ऊपर पर्दा डालने की आवश्यकता नहीं है।'(14 मई,1970)

कुल मिलाकर देश की संसद के अंदर और जनता के हृदय में छह दशक से ज्यादा राज करने वाले लोकप्रिय नेता पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी बखूबी समझते थे। पं. नेहरू से लेकर इंदिरा, राजीव और सोनिया गांधी की कांग्रेस तक के कालखण्ड में 60 वर्ष तक विपक्ष के नायक रहने वाले अटल जी का आचरण, उनका व्यवहार और उनके भाषण एवं विचार एक दीर्घकालिक लोकतांत्रिक दर्शन का जीवंत उदस्तावेज कहे जा सकते हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के संसद की महत्ता को प्रमाणित करने, गरिमा बढ़ाने वाले इन विचारों को यदि आज का विपक्ष थोड़ा भी आत्मसात कर ले तो देश की जनता का भी भला होगा और इन सत्तालोलुप दलों को अपने पुराने कृत्यों के पश्चाताप का अवसर भी मिल जाएगा।