बुधवार, 13 जनवरी 2016

किसानों के लिये वरदान साबित होगी मोदीजी की नई फसल बीमा योजना







डेढ़ से दो हजार में एक लाख की फसल बीमा

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By: शिशिर सिन्हा, बिजनेस एडिटर, एबीपी न्यूज़ | Last Updated: Wednesday, 13 January 2016

नई दिल्ली: आम लोगों को सस्ती कीमत पर जीवन व दुर्घटना बीमा सुरक्षा मुहैया कराने के बाद सरकार ने अब किसानी की सुध ली है. इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय कैबिनेट ने नयी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पर अपनी मुहर लगा दी. नयी योजना इस साल खरीफ फसलों के मौसम से शुरु की जाएगी.

योजना के तहत खरीफ फसलों (प्रमुख फसल – धान, समय – मई से सितम्बर) और रबी फसलों (प्रमुख फसल – गेहूं, समय – नवम्बर से मार्च) के लिए अलग-अलग प्रीमियम की दर होगी. पूरे देश भर में खरीफ फसलों के लिए किसानों को एक समान 2 फीसदी (बीमित रकम का), और रबी के लिए एक समान 1.5 फीसदी (बीमित रकम का) की दर से प्रीमियम चुकाना होगा. पूरे नुकसान के बराबर मुआवजा मिलेगा. एक चौथाई मुआवजा, दावा दायर करने के तुरंत बाद और बाकी नुकसान की रिपोर्ट आने के बाद दिया जाएगा. मुआवजे की रकम का भुगतान बैंक अकाउंट के जरिए होगा. एक बार प्रीमियम चुकाने पर एक फसल कवर होगा.

वैसे तो फसल बीमा योजना पहली बार 1999-2000 में लांच की गयी थी. 2010 में इसमें बदलाव किया गया. लेकिन इसमें कई तरह की कमियां रही. पहला तो ये कि देश भर में अलग-अलग इलाके मे प्रीमियम की अलग-अलग दर थी. प्रीमियम की औसत दर 15 फीसदी थी. दूसरी और नुकसान चाहे जितना भी हो, लेकिन फसल की कुल कीमत के 11 फीसदी से ज्यादा मुआवजा नहीं देने का प्रावधान था. वहीं बैंकों से कर्ज पर बीमा सुरक्षा जरूरी किए जाने से योजना में शामिल होने वालों की संख्या सीमित थी. इन्ही सब कारणों से फसल बीमा योजना ज्यादा कामयाब नहीं हो पायी और आज की तारीख में कुल खेती योग्य जोत का 23 फीसदी ही फसल बीमा के दायरे में लाया जा सका.

अब सरकार ने तय किया है कि जो किसान बैंक या वित्तीय संस्थानों से कर्ज ले या नहीं ले, सभी के लिए फसल बीमा योजना का विकल्प होगा. इसके साथ ही मुआवजे की सीमा खत्म करने और प्रीमियम की दर को कम और एक समान रख सरकार ने अगले तीन सालों में खेती योग्य जोत का कम से कम 50 फीसदी को नयी योजना के दायरे में लाने का लक्ष्य रखा है. चूंकि कुल प्रीमियम का एक हिस्सा बराबर-बराबर आधार पर केंद्र और राज्य सरकार चुकाएंगे, इसीलिए सरकार का खर्च भी बढ़ेगा. केद्र सरकार का खर्च 3,100 करोड़ रुपये से बढ़कर 8,800 करोड़ रुपये पर पहुंचेगा. इतना ही खर्च राज्य सरकारों को भी उठाना होगा.

नयी योजना में एक और बड़ा बदलाव किया गया है. पहले सिर्फ खड़ी फसल के नुकसान पर ही बीमा का फायदा मिलता था. लेकिन अब यदि बीजाई के बाद छोटे-छोटे पौधों को प्राकृतिक आपदा से नुकसान पहुंचता है या फिर काटने के बाद खेत में रखी फसल को चक्रवाती या बेमौसम बरसात से नुकसान होता है तो भी बीमा सुरक्षा का फायदा मिलेगा. एक बात और, बीमा योजना का फायदा केवल प्राकृतिक आपदा या कीड़े के हमले से नुकसान की सूरत में ही मिलेगा. इसके साथ ही बर्फबारी, जमीन धंसने या सैलाब से फसल को होने वाले नुकसान पर भी इस योजना का फायदा मिलेगा. बहरहाल, आगजनी या जानवरों के खेत में घुस जाने से फसलों को होने वाले नुकसान को इस योजना में शामिल नहीं किया गया है.

साल 2016 में मकर संक्रांती 15 जनवरी को : देवताओं के दिन का सूर्योदय


इस वार मकर संक्रांती 15 जनवरी को
पृथ्वी 15 जनवरी से होगी उत्तरायण 
देवताओं के  दिन का सूर्योदय  होता है उत्तरायण 
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मकर संक्रांति से जुड़ी रोचक बातें, जो शायद आप नहीं जानते
Posted by: Ajay Mohan Published: Monday, January 11, 2016

[कला, संस्कृति एवं धर्म] मकर संक्रांति ही एक ऐसा पर्व है जिसका निर्धारण सूर्य की गति के अनुसार होता है। प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं उस काल विशेष को ही संक्रांति कहते हैं। यूं तो प्रति मास ही सूर्य बारह राशियों में एक से दूसरी में प्रवेश करता रहता है। वर्ष की बारह संक्रांतियों में यह सब से महत्वपूर्ण है। साल 2016 में मकर संक्रांति स्मार्त विप्र कर्मकांड परिषद के ज्योतिष ज्योतिर्विद पंडित सोमेश्वर जोशी कहते हैं कि मकर राशि में प्रवेश करने के कारण यह पर्व मकर संक्रांति व देवदान पर्व के नाम से जाना जाता है। धर्मसिंधु के अनुसार जिस वर्ष रात्रि में संक्रांति हो तो पुण्य काल दूसरे दिन होता है, उस वर्ष मकर सक्रांति 14 जनवरी को होती है। चूंकि इस वर्ष सूर्य भारतीय समयानुसार 14 जनवरी को आधी रात 1.25 बजे मकर राशि में प्रवेश करेगा, इसलिये उसका पुण्यकाल 15 जनवरी को ही माना जाएगा। संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी को सूर्योदय से सायंकाल 5.26 मिनट तक रहेगा।

मकर सक्रांति मनाए जाने का यह क्रम हर दो साल के अन्तराल में बदलता रहता है। लीप ईयर वर्ष आने के कारण मकर संक्रांति 2017 व 2018, 2021 में वापस 14 जनवरी को व साल 2019 व 2020 में 15 जनवरी को मनाई जाएगी। यह क्रम 2030 तक चलेगा। इसके बाद तीन साल 15 जनवरी को व एक साल 14 जनवरी को सक्रांति मनाई जाएगी। 2080 से 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी।
क्यों होता है ऐसा
पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमते हुए प्रतिवर्ष 55 विकला या 72 से 90 सालों में एक अंश पीछे रह जाती है। इससे सूर्य मकर राशि में एक दिन देरी से प्रवेश करता हैं। करीब 1700 साल पहले 22 दिसम्बर को मकर संक्रांति मानी जाती थी। इसके बाद पृथ्वी के घूमने की गति के चलते यह धीरे-धीरे दिसम्बर के बजाय जनवरी में आ गयी है।

मकर संक्रांति का समय हर 80 से 100 साल में एक आगे बढ़ जाता है। 19 वी शताब्दी में कई बार मकर संक्रांति 13 और 14 जनवरी को मनाई जाती थी। पिछले तीन साल से लगातार संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी को मनाया जा रहा है। 2017 और 2018 में संक्रांति 14 जनवरी को शाम को अर्की होगी।

- पिता को तिलक लगायें सूर्य और शनि की पोजीशन इस दिन बदलती है, लिहाजा इसे पिता पुत्र पर्व के रूप में भी देखा जाता हे इस दिन पुत्र को पिता को तिलक लगाकर स्वागत करना चाहिए।
-मलमास समाप्त होता है इसी दिन मलमास भी समाप्त होने तथा शुभ माह प्राम्भ होने के कारण लोग दान पुण्य से अच्छी शुरुआत करते हैं।
-गंगाजी भागीरथ के पीछे आयी थीं मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा उनसे मिली थीं। इसीलिये इस दिन लोग गंगा स्नान भी करते हैं।
-पूर्वजों को तर्पण कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है।
-महाभारत से संबंध महाभारत काल के महान योद्धा भीष्म पितामह ने भी अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था।
-भगवान विष्णु ने किया असुरों का अंत इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी व सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।
-पोंगल इस त्यौहार को अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। मकर संक्रांति को तमिलनाडु में पोंगल के रूप में तो आंध्रप्रदेश, कर्नाटक व केरला में यह पर्व केवल संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है।
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मकर संक्रांति का महत्व
Karnika Updated on Jul 25th, 2015

भारत देश में हर साल 2000 से अधिक festival मनाये जाते है| इन सभी festival के पीछे महज सिर्फ परंपरा या रूढि बातें नहीं होती है, हर एक festival के पीछे छुपी होती है ज्ञान, विज्ञान, कुदरत, स्वास्थ्य और आयुर्वेद से जुड़ी तमाम बातें| हर साल 14 जनवरी को हिन्दूओं द्वारा मनाये जाना वाला festival मकरसंक्रांति को ही लें, पौष मास में सूर्य से मकर राशि में प्रवेश करने पर मनाया जाता है| वैसे तो संक्राति साल में 12 बार हर राशि में आती है लेकिन मकर और कर्क राशि में इसके प्रवेश पर विशेष महत्व है| जिसके साथ बढती गति के चलते दिन बड़ा तो रात छोटी हो जाती है| जबकि कर्क में सूर्य के प्रवेश से रात बड़ी और दिन छोटा हो जाता है|



मकर संक्रांति (Makar Sankranti)किसानों के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण होती है, इसी दिन सभी किसान अपनी फसल काटते है| मकर संक्रांति (Makar Sankranti) भारत का सिर्फ एक ऐसा festival है जो हर साल 14 जनवरी को ही मनाया जाता है| हिन्दूओं के लिए सूर्य एक रोशनी, ताकत और ज्ञान का प्रतीक होता है| मकर संक्रांति festival सभी को अँधेरे से रोशनी की तरफ बढ़ने की प्रेरणा देता है| एक नए तरीके से काम शुरू करने का प्रतीक है| मकरसंक्रांति (Makar Sankranti) के शुभ मुहूर्त में स्नान, दान, व पूण्य का विशेष महत्व है| इस दिन लोग गुड़ व तिल लगाकर किसी पावन नदी में स्नान करते है| इसके पश्चात् गुड़, तिल, कम्बल, फल दान किया जाता है| इस दिन लोग खिचड़ी बनाकर भगवान सूर्यदेव को भोग लगाते हैं, और खिचड़ी का दान तो विशेष रूप से किया जाता है| जिस कारण यह (Makar Sankranti) पर्व को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है|

भारत वर्ष में मकर संक्रांति (Makar Sankranti)हर प्रान्त में बहुत हर्षौल्लास से मनाया जाता है| लेकिन इसे सभी अलग अलग जगह में अलग नाम और परंपरा से मनाया जाता है|

• तमिलनाडु में इसे पोंगल नाम से मानते है|
• उत्तरायण नाम से इसे गुजरात और राजस्थान में मनाया जाता है| इस दिन गुजरात में पतंग उड़ाने का comptition रखा जाता है जिसमे वहां के सभी लोग बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते है| गुजरात में यह एक बहुत बड़ा festival है इस दौरान वहां 2 दिन का national holiday भी होता है|
• मकरसंक्रांति नाम से बिहार, गोवा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश, सिक्किम में मानते है|
• मगही नाम से हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में मानते है|
• पंजाब में लोहड़ी नाम से इसे मनाया जाता है जो सभी पंजाबी के लिए बहुत महत्व रखता है, इस दिन से सभी किसान अपनी फसल काटना शुरू करते है और उसकी पूजा करते है|
• माघ बिहू असम के गाँव में मनाया जाता है|
• कश्मीर में शिशुर सेंक्रांत नाम से जानते है|
• उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में इसे खिचड़ी का पर्व कहते है|
• कर्नाटक और आंधप्रदेश में मकर संक्रमामा नाम से मानते है|

भारत के अलावा मकर संक्रांति (Makar Sankranti) दुसरे देशों में भी प्रचलित है लेकिन वहां इसे किसी और नाम से जानते है|
• नेपाल में इसे माघे संक्रांति कहते है| नेपाल के ही कुछ हिस्सों में इसे मगही नाम से भी जाना जाता है|
• thailand में इसे songkran नाम से मनाते है|
• Myanmar में Thingyan नाम से जानते है|
• Cambodia में moha sangkran नाम से मनाते है|
• श्री लंका में Ulavar Thirunaal नाम से जानते है|
• Laos में Pi Ma Lao|
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