सोमवार, 25 जनवरी 2016

सावधान ! जारी है माओवादी दुष्प्रचार !!

सावधान ! जारी है माओवादी दुष्प्रचार !!

तारीख: 25 Jan 2016 14:51:41


विजय क्रांति-(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और सेंटर फॉर हिमालयन एशिया स्टडीज एंड एंगेजमेंट के अध्यक्ष हैं।)
2011 के बाद के महीनों में छत्तीसगढ़ पुलिस और सुरक्षा एजंेसियों ने कुछ माओवादियों को बस्तर शहर के एक बड़े उद्योग समूह के एजेंट से 15 लाख रुपए लेते हुए रंगहाथों गिरफ्तार किया था। पुलिस द्वारा जारी विवरण के अनुसार, उनमें से एक था नौजवान लिंगाराम, जो अपने माओवादियों से जुड़ाव के चलते पहले से ही पुलिस की नजरों में था। दूसरी थी उसकी रिश्तेदार कुमारी सोनी सोरी, जो, पुलिस के अनुसार, एक भीड़भाड़ वाले हाट में भाग निकलने में कामयाब हो गई, लेकिन जल्दी ही दिल्ली में एक वामपंथी अड्डे से गिरफ्तार कर ली गई थी। जांचकर्ताओं ने पाया कि माओवादी उस उद्योग समूह से यह राशि ले रहे थे जिसको उनसे पिछले कई साल से धमकियां और हमले झेलने पड़े थे। वह भुगतान एक बड़े सौदे का हिस्सा माना जा रहा था, जो छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्रप्रदेश में शांति और आजादी से काम करने की एवज में किया गया था। जल्दी ही एक स्थानीय पत्रकार को भी बड़ी मात्रा में (करोड़ों में) पैसा लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, जो उसे कई माओवादी भूमिगत नेताओं को कथित तौर पर देने वाला था।

शुरू में सुरक्षा एजेंसियां इस बड़ी उपलब्धि पर बहुत संतोष महसूस कर रही थीं। लेकिन बहुत जल्दी उन्हें यह देखकर दंग रह जाना पड़ा  कि मामला उनके और पूरे राज्य अधिष्ठान पर ही उलटा आन पड़ा था। आने वाले कुछ महीनों के दौरान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई वामपंथी गैर सरकारी संगठनों, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार एजेंसियों, राजनीतिक नेताओं, राष्ट्रीय मीडिया और मानवाधिकार के स्वयंभू मसीहाओं और देशभर के विश्वविद्यालयांे में महिला अधिकारों के पैरोकारों द्वारा दुष्प्रचार का युद्ध इस पैमाने पर छेड़ दिया गया कि न तो राज्य सरकार और न ही उसके इस मामले से जुड़े अधिकारी उस दुष्प्रचार के हमले का सामना कर पाए।

दुष्प्रचार के इस तमाशे ने लगभग हर तरह की तरकीब अपनाई, जो वामपंथियों के अपने दुश्मनों पर हमले से जुड़ी थी। न केवल अरुंधति राय जैसे बड़े नामों और कानून के प्रशांत भूषण जैसे दिग्गजों ने उस अभियान और कानूनी कार्रवाई में खुद को शामिल किया, बल्कि कई संदिग्ध दिखने वाले अंतरराष्ट्रीय समूहों, जो संभवत: अंतरराष्ट्रीय ईसाई कन्वर्जन अधिष्ठान द्वारा प्रायोजित और पोषित थे, ने भी इस मामले को भारत की छवि को एक ऐसे समाज के तौर पर पेश किया जिसमें 'भेदभाव' किया जाता है। एक अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट-'यूनाइटेड ब्लैक अनटचेबल्स...' और एक अन्य 'इंडियन होलोकास्ट...' ने इसी तरह की अपीलें पोस्ट कीं, जो मशहूर वामपंथी दुष्प्रचाररत लेखक हिमांशु कुमार ने लिखी थीं, शीर्षक था 'द वैरी राइट ऑफ लिविंग इन दिस कंट्री हैज बीन स्नैच्ड फ्रॉम मी'। इसी तरह कुछ और समूहों ने कुछ देशों में भारतीय दूतावासों और कॉन्सुलेट पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने के लिए प्रदर्शन किया, उनका दावा था कि सोनी सोरी भारतीय 'रंगभेद' की शिकार है। सोनी के पक्ष में समर्थन पाने के लिए जो पर्चे बांटे गए उनमें से एक पर अक्खड़ अंदाज में एक भड़काऊ शीर्षक था-'हाऊ वुड यू फील इफ फाइव पुलिसमैन होल्ड यू डाउन एंड पुश्ड दिस इन टू योर एनस'।

जिस देश में एक खास कानूनी आपराधिक मामले की कामयाबी व्यवस्था तंत्र और बचाव पक्ष के उत्साह और निष्ठा पर बहुत ज्यादा आधारित हो, गवाहों के दमखम और न्यायदाता तंत्र के साहस पर आधारित हो, वहां आश्चर्य था कि राज्य सरकार और इसकी एजेंसियांे को मामले को रफादफा होने देना ही बेहतर लगा। कहानी के अंत मंे सोनी सोरी भारतीय अधिष्ठान को तब नाक चिढ़ाती सामने आई उसने जब बस्तर में आम आदमी पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा, हालांकि वह कामयाब नहीं हुई। भारतीय वामपंथी, खासकर माओवादी भारतीय बुद्धिजीवियों के एक वर्ग की गफलत पर फलते-फूलते हैं, जो अपनी मान्यता से भले वामपंथी न हों, लेकिन भद्र और राजनीतिक नजरिये से सुभीते दिखने की इच्छा के चलते आसानी से इस दुष्प्रचार के शिकार हो जाते हैं। दिवंगत विनोद मेहता इसके एक खास उदाहरण रहे हैं, जो 'आउटलुक' पत्रिका के संस्थापक संपादक थे। हालांकि उन्होंने खुद 'बुर्जुआ' जीवनशैली ही अपनाई थी, लेकिन वे हमेशा वामपंथियों को अपनी पत्रिका का उनके सत्ता विरोधी दुष्प्रचार का हस्तक बनने देने में उत्साहित दिखते थे। एक बार उन्होंने अरुंधति राय को उनका एक कुख्यात और असाधारण रूप से लंबा निबंध (3200 शब्द से ज्यादा लंबा) प्रकाशित करने दिया जिसका शीर्षक था 'वॉकिंग विद द कामरेड्स'। निबंध न केवल भारतीय लोकतांत्रिक अधिष्ठान के बल की भर्त्सना और उसको चुनौती देता था, बल्कि माओवादियों के भारत विरोधी हिंसक अभियानों की तारीफ करता था और उसे न्यायपूर्ण ठहराता था।

मेहता ने कई मौकों पर एक और संदिग्ध माओवादी दुष्प्रचाररत दिल्ली विश्वविद्यालय की कामरेड (कुमारी) नलिनी सुंदर को 'आउटकुल' के जरिये माओवादी विचार प्रसारित करने की सहूलियत दी। ऐसे ही एक आलेख में उन्होंने न केवल जीरमघाटी में 2013 में माओवादियों द्वारा छत्तीसगढ़ के लगभग पूरे वरिष्ठ कांग्रेसी नेतृत्व की सामूहिक हत्या को न्यायसंगत बताते हुए महिमामंडित किया, बल्कि वे मशहूर जनजातीस कांग्रेसी नेता महेन्द्र कर्मा की हत्या पर भी खीसें निपोरती दिखीं जिन्होंने बस्तर के वनवासियों का सलवा जुडुम अभियान शुरू कराया था, जो माओवादियों के बेरहम संहारों और जनजातीय समाज की प्रताड़ना के खिलाफ उबरे जनाक्रोश से उपजा था। भारतीय वामपंथियों द्वारा पूरे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया को अपनी दलीलों से रिझा लेना, नारेबाजी करने वालों और न्यायतंत्र को सलवा जुडुम को 'राज्य प्रायोजित आतंकी समूह' जैसा मान लेने को तैयार कर लेना इसका एक शानदार उदाहरण हो सकता है कि लोकतंत्र में जनमत और नीति निर्माण को कैसे प्रभावित किया जाय।

खोज करने पर मुझे 'तहलका' पत्रिका, जिसे खांटी कांग्रेसी समर्थक तरुण तेजपाल संपादित करते थे, में 20 से ज्यादा समाचार दिखे जो खासतौर पर सोनी सोरी को समर्पित थे। दरअसल भारतीय मीडिया में बैठे वामपंथी समर्थक आजाद भारत के इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना को आसानी से छिपा लेते हैं जिसमें माओवादियों ने 2007 में मई और जून में छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में बिजली के टावर उड़ा दिए थे। बस्तर इलाके के नागरिक, जिनमें जनजातीय और गैर जनजातीय दोनों थे, को अस्पताल और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं के बिना जीने को मजबूर कर दिया गया था।

माओवादियों के मीडिया मैनेजरों ने लोक व्यवस्था की संवेदनशीलता और राष्ट्रीय मीडिया की अकर्मण्यता को बेनकाब करके रख दिया था। ऐसी कुछ पत्रिकाओं और समाचार पत्रों के अलावा, अनेक वेबसाइट हैं जो या तो ईसाई कन्वर्जन तंत्र द्वारा सीधे शुरू की गई हैं या उससे पोषित-समर्थित हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब माओवादी नेताओं जैसे विनायक सेन, कोबाड़ घंडी, जी. एन. साईबाबा और सुधीर धवले की गिरफ्तारी हुई तो सोशल मीडिया की इस कड़ी ने भारतीय मीडिया और बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करने में प्रमुख भूमिका निभाते हुए वामपंथी दुष्प्रचार तंत्र का हस्तक बनने की हिमाकत  की थी।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत का राजनीतिक समुदाय बढ़ते माओवादी संकट के पीछे मौजूद असली संकट को समझने में नाकाम रहा है।
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वामपंथी विचारधारा का सच
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1932 में रुस में पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत हुई। समाजवादी पैटर्न के कारण हमने भी आंख मूदकर अपने यहां लागू कर लिया। खैर 1932 के पंचवर्षीय योजना में रुस ने कहा कि इसके अंत तक अर्थात 1936 तक रुस में हम सभी चर्च बंद करा देंगे। कारण कि धर्म अफीम की गोली है। 1937 में फिर से लिख दिया कि GOD WILL BE EXPELLED FROM RUSSIA. लेकिन रुस और चीन ने जो संविधान बनाया उसमें मौलिक अधिकारो में freedom of religion को शामिल कर दिया गया। कुछ साल पहले जो कैथोलिक चर्च के पोप हैं वह पोलैण्‍ड गये, पोलैण्‍ड एक कम्‍यूनिस्‍ट देश है जहां की आधी आबादी पोप साहब के दर्शन करने आई। संयाेग से होम टाउन सैंटो के निवासी पोप ने अपने ही देश और शहर में लोगों से कहा कि धर्म अफीम की गोली है और मनुष्‍य आर्थिक प्राणी है इसका मै तीब्र विरोध करता हूं। 
दूसरा state withers away राज्‍य तिरोहित हो जायेगा, दुनियां के मजदूर इक्‍टठा हो जायेगें कितना हास्‍यास्‍पद निकला जब चीन ओर रुस सीमा विवाद में फंसे रहे, यूगोस्‍लाविया और रुस लडते रहे, यूगोस्‍लाविया और वियतनाम गाली गलौज करते रहे, इसी तरह वियतनाम और कंबोडिया मारकाट मचाये रहे ये सभी वामपंथी थे और सभी राष्‍ट्रवादी हो गये अपने अपने स्‍वार्थ को लेकर। 
इनकी प्रमुख पुस्‍तक THE NEW CLASS, IMPERFECT SOCIETY में साफ कहा कि हमने पुराने वर्ग को तो नष्‍ट कर दिया लेकिन वर्गहीन समाज नहीं बना पाये बल्कि नये वर्ग बन गये जिनके प्रीवलेज पहले जैसे ही थे। यही बात आगे चलकर माओ भी कहता है कि yesterday revolutionaries are todays counter revolutionaries.. 
कुलमिलाकर इनके सभी कसमें वादे तो फर्जी निकले अब भारत में सिर्फ सरकार चाहे जिसकी हो दूसरे शब्‍दों में दूल्‍हा कोई भी हो बाराती बनने के लिये परेशान रहते हैं। ताकी सेकुलरीज्‍म पर हुंआ हुंआ करते रहें।
 ये वहीं लोग है जिनको पेट में दर्द है या दांत में दर्द है, ईलाज के लिये बिजींग और मास्‍को जाते हैं। चेयरमैन माओ, हमारा चेयरमैन कहते शरमाते नहीं।
 1962 के युद्ध में चीन का पक्ष लिया और अब रुस और चीन के कम्‍यूनिस्‍ट पार्टियों के टुकडों पर पलते हैं। कश्‍मीर में आतंकियों के मानवाधिकारों के सबसे बडे पैरोकार हैं और लाल क्रांति के नाम पर गरीब, निर्दोष किसानों वनवासियों की हत्‍याएं कराते हैं- करते हैं- ये हैं एलीट नक्‍सली।
ये वही लोग है जो पूरे देश में जब स्‍वदेशी आंदोलन अपने चरम पर था और लोग जगह जगह विदेशी कपडाे की होली जला रहे थे तो कम्‍यूनिस्‍ट नेता भरी गर्मी के दिनों में लंका शायर के मिलों में उत्‍पादित कपडें के सूट पहनकर घुमते थे ताकी भारत में स्‍वदेशी आंदोलन के कारण लंका शायर के मिल मजदूर बेरोजगार न हो। ये वही लोग है जो 1942 के अंग्रेजो भारत छोडो आंदोलन के दौरान महाम्‍मा गांधी को साम्राज्‍यवदियों को दलाल और सुभाष चंद्र बोस को तोजो का कुत्‍ता तक कहा।
ये वहीं लोग है जो अंग्रेजो के खुफिया एजेंट का काम किया। ये वही लोग है जो पाकिस्‍तान निर्माण के लिये सैद्धांतिक आधार देते हुए भारत को खंड खंड बाटने की बहुराष्‍ट्रीय योजना तैयार की।
ये वहीं लोग है जो सत्‍ता सुख भोगने के लिये कांग्रेस की दलाली करते आपात काल का समर्थन किया और जिनके लिये राष्‍ट्रवाद और देशभक्ति जैसे शब्‍द गाली होते हैं। कुछ तो शरम करते। वंदे मातरम !

विवेकपूर्ण चेतना और हमारे नैतिक जगत का प्रमुख उद्देश्य शांति : राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी


गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का राष्ट्र के नाम संदेश
Posted on: January 25, 2016 Updated on: January 25, 2016 10:22 PM IST
आईबीएन-7

नई दिल्ली। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित किया। पढ़ें: उनका पूरा भाषण--
मेरे प्यारे देशवासियो,
हमारे राष्ट्र के सड़सठवें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर, मैं भारत और विदेशों में बसे आप सभी को हार्दिक बधाई देता हूं। मैं, हमारी सशस्त्र सेनाओं, अर्ध-सैनिक बलों तथा आंतरिक सुरक्षा बल के सदस्यों को अपनी विशेष बधाई देता हूं। मैं उन वीर सैनिकों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं जिन्होंने भारत की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने और विधि शासन को कायम रखने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया।
प्यारे देशवासियो,
छब्बीस जनवरी 1950 को हमारे गणतंत्र का जन्म हुआ। इस दिन हमने स्वयं को भारत का संविधान दिया। इस दिन उन नेताओं की असाधारण पीढ़ी का वीरतापूर्ण संघर्ष पराकाष्ठा पर पहुंचा था जिन्होंने दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र की स्थापना के लिए उपनिवेशवाद पर विजय प्राप्त की। उन्होंने राष्ट्रीय एकता, जो हमें यहां तक लेकर आई है, के निर्माण के लिए भारत की विस्मयकारी अनेकता को सूत्रबद्ध कर दिया। उनके द्वारा स्थापित स्थायी लोकतांत्रिक संस्थाओं ने हमें प्रगति के पथ पर अग्रसर रहने की सौगात दी है। आज भारत एक उदीयमान शक्ति है,एक ऐसा देश है जो विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवान्वेषण और स्टार्ट-अप में विश्व अग्रणी के रूप में तेजी से उभर रहा है और जिसकी आर्थिक सफलता विश्व के लिए एक कौतूहल है।
प्यारे देशवासियो,
वर्ष 2015 चुनौतियों का वर्ष रहा है। इस दौरान विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी रही। वस्तु बाजारों पर असमंजस छाया रहा। संस्थागत कार्रवाई में अनिश्चितता आई। ऐसे कठिन माहौल में किसी भी राष्ट्र के लिए तरक्की करना आसान नहीं हो सकता। भारतीय अर्थव्यवस्था को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। निवेशकों की आशंका के कारण भारत समेत अन्य उभरते बाजारों से धन वापस लिया जाने लगा जिससे भारतीय रुपये पर दबाव पड़ा। हमारा निर्यात प्रभावित हुआ। हमारे विनिर्माण क्षेत्र का अभी पूरी तरह उभरना बाकी है।
2015 में हम प्रकृति की कृपा से भी वंचित रहे। भारत के अधिकतर हिस्सों पर भीषण सूखे का असर पड़ा जबकि अन्य हिस्से विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आ गए। मौसम के असामान्य हालात ने हमारे कृषि उत्पादन को प्रभावित किया। ग्रामीण रोजगार और आमदनी के स्तर पर बुरा असर पड़ा।
प्यारे देशवासियो,
हम इन्हें चुनौतियां कह सकते हैं क्योंकि हम इनसे अवगत हैं। समस्या की पहचान करना और इसके समाधान पर ध्यान देना एक श्रेष्ठ गुण है। भारत इन समस्याओं को हल करने के लिए कार्यनीतियां बना रहा है और उनका कार्यान्वयन कर रहा है। इस वर्ष 7.3 प्रतिशत की अनुमानित विकास दर के साथ, भारत सबसे तेजी से बढ़ रही विशाल अर्थव्यवस्था बनने के मुकाम पर है। विश्व तेल कीमतों में गिरावट से बाह्य क्षेत्र को स्थिर बनाए रखने और घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिली है। बीच-बीच में रुकावटों के बावजूद इस वर्ष उद्योगों का प्रदर्शन बेहतर रहा है।
आधार 96 करोड़ लोगों तक मौजूदा पहुंच के साथ, आर्थिक रिसाव रोकते हुए और पारदर्शिता बढ़ाते हुए लाभ के सीधे अंतरण में मदद कर रहा है। प्रधान मंत्री जन धन योजना के तहत खोले गए 19 करोड़ से ज्यादा बैंक खाते वित्तीय समावेशन के मामले में विश्व की अकेली सबसे विशाल प्रक्रिया है। सांसद आदर्श ग्राम योजना का लक्ष्य आदर्श गांवों का निर्माण करना है। डिजिटल भारत कार्यक्रम डिजिटल विभाजन को समाप्त करने का एक प्रयास है। प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना का लक्ष्य किसानों की बेहतरी है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम जैसे कार्यक्रमों पर बढ़ाए गए खर्च का उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दोबारा सशक्त बनाने के लिए रोजगार में वृद्धि करना है।
भारत में निर्माण अभियान से व्यवसाय में सुगमता प्रदान करके और घरेलू उद्योग की स्पर्द्धा क्षमता बढ़ाकर विनिर्माण तेज होगा। स्टार्ट-अप इंडिया कार्यक्रम नवान्वेषण को बढ़ावा देगा और नए युग की उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करेगा। राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन में 2022 तक 30 करोड़ युवाओं को कुशल बनाने का विचार किया गया है।
हमारे बीच अकसर संदेहवादी और आलोचक होंगे। हमें शिकायत, मांग, विरोध करते रहना चाहिए। यह भी लोकतंत्र की एक विशेषता है। परंतु हमारे लोकतंत्र ने जो हासिल किया है, हमें उसकी भी सराहना करनी चाहिए। बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में निवेश से, हम और अधिक विकास दर प्राप्त करने की बेहतर स्थिति में हैं जिससे हमें अगले दस से पंद्रह वर्षों में गरीबी मिटाने में मदद मिलेगी।
प्यारे देशवासियो,
अतीत के प्रति सम्मान राष्ट्रीयता का एक आवश्यक पहलू है। हमारी उत्कृष्ट विरासत, लोकतंत्र की संस्थाएं सभी नागरिकों के लिए न्याय, समानता तथा लैंगिक और आर्थिक समता सुनिश्चित करती हैं। जब हिंसा की घृणित घटनाएं इन स्थापित आदर्शों, जो हमारी राष्ट्रीयता के मूल तत्व हैं, पर चोट करती हैं तो उन पर उसी समय ध्यान देना होगा। हमें हिंसा, असहिष्णुता और अविवेकपूर्ण ताकतों से स्वयं की रक्षा करनी होगी।
प्यारे देशवासियो:
विकास की शक्तियों को मजबूत बनाने के लिए, हमें सुधारों और प्रगतिशील विधान की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित करना विधि निर्माताओं का परम कर्तव्य है कि पूरे विचार-विमर्श और परिचर्चा के बाद ऐसा विधान लागू किया जाए। सामंजस्य, सहयोग और सर्वसम्मति बनाने की भावना निर्णय लेने का प्रमुख तरीका होना चाहिए। निर्णय और कार्यान्वयन में विलम्ब से विकास प्रक्रिया का ही नुकसान होगा।
प्यारे देशवासियो,
विवेकपूर्ण चेतना और हमारे नैतिक जगत का प्रमुख उद्देश्य शांति है। यह सभ्यता की बुनियाद और आर्थिक प्रगति की जरूरत है। परंतु हम कभी भी यह छोटा सा सवाल नहीं पूछ पाए हैं: शांति प्राप्त करना इतना दूर क्यों है? टकराव को समाप्त करने से अधिक शांति स्थापित करना इतना कठिन क्यों रहा है?
विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय क्रांति के साथ 20वीं सदी की समाप्ति पर, हमारे पास उम्मीद के कुछ कारण मौजूद थे कि 21वीं सदी एक ऐसा युग होगा जिसमें लोगों और देश की सामूहिक ऊर्जा उस बढ़ती हुई समृद्धि के लिए समर्पित होगी जो पहली बार घोर गरीबी के अभिशाप को मिटा देगी। यह उम्मीद इस शताब्दी के पहले पंद्रह वर्षों में फीकी पड़ गई है। क्षेत्रीय अस्थिरता में चिंताजनक वृद्धि के कारण व्यापक हिस्सों में अभूतपूर्व अशांति है। आतंकवाद की बुराई ने युद्ध को इसके सबसे बर्बर रूप में बदल दिया है। इस भयानक दैत्य से अब कोई भी कोना अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता है।
आतंकवाद उन्मादी उद्देश्यों से प्रेरित है, नफरत की अथाह गहराइयों से संचालित है, यह उन कठपुतलीबाजों द्वारा भड़काया जाता है जो निर्दोष लोगों के सामूहिक संहार के जरिए विध्वंस में लगे हुए हैं। यह बिना किसी सिद्धांत की लड़ाई है, यह एक कैंसर है जिसका इलाज तीखी छुरी से करना होगा। आतंकवाद अच्छा या बुरा नहीं होता; यह केवल बुराई है।
प्यारे देशवासियो,
देश हर बात से कभी सहमत नहीं होगा; परंतु वर्तमान चुनौती अस्तित्व से जुड़ी है। आतंकवादी महत्त्वपूर्ण स्थायित्व की बुनियाद, मान्यता प्राप्त सीमाओं को नकारते हुए व्यवस्था को कमजोर करना चाहते हैं। यदि अपराधी सीमाओं को तोड़ने में सफल हो जाते हैं तो हम अराजकता के युग की ओर बढ़ जाएंगे। देशों के बीच विवाद हो सकते हैं और जैसा कि सभी जानते हैं कि जितना हम पड़ोसी के निकट होंगे, विवाद की संभावना उतनी अधिक होगी। असहमति दूर करने का एक सभ्य तरीका, संवाद है, जो सही प्रकार से कायम रहना चाहिए। परंतु हम गोलियों की बौछार के बीच शांति पर चर्चा नहीं कर सकते।
भयानक खतरे के दौरान हमें अपने उपमहाद्वीप में विश्व के लिए एक पथप्रदर्शक बनने का ऐतिहासिक अवसर प्राप्त हुआ है। हमें अपने पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण वार्ता के द्वारा अपनी भावनात्मक और भू-राजनीतिक धरोहर के जटिल मुद्दों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए, और यह जानते हुए एक दूसरे की समृद्धि में विश्वास जताना चाहिए कि मानव की सर्वोत्तम परिभाषा दुर्भावनाओं से नहीं बल्कि सद्भावना से दी जाती है। मैत्री की बेहद जरूरत वाले विश्व के लिए हमारा उदाहरण अपने आप एक संदेश का कार्य कर सकता है।
प्यारे देशवासियो,
भारत में हर एक को एक स्वस्थ,खुशहाल और कामयाब जीवन जीने का अधिकार है। इस अधिकार का, विशेषकर हमारे शहरों में, उल्लंघन किया जा रहा है, जहां प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। जलवायु परिवर्तन अपने असली रूप में सामने आया जब 2015 सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया गया। विभिन्न स्तरों पर अनेक कार्यनीतियों और कार्रवाई की आवश्यकता है। शहरी योजना के नवान्वेषी समाधान, स्वच्छ ऊर्जा का प्रयोग और लोगों की मानसिकता में बदलाव के लिए सभी भागीदारों की सक्रिय हिस्सेदारी जरूरी है। लोगों द्वारा अपनाए जाने पर ही इन परिवर्तनों का स्थायित्व सुनिश्चित हो सकता है।
प्यारे देशवासियो,
अपनी मातृभूमि से प्रेम समग्र प्रगति का मूल है। शिक्षा, अपने ज्ञानवर्धक प्रभाव से, मानव प्रगति और समृद्धि पैदा करती है। यह भावनात्मक शक्तियां विकसित करने में सहायता करती है जिससे सोई उम्मीदें और भुला दिए गए मूल्य दोबारा जाग्रत हो जाते हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था, ‘‘शिक्षा का अंतिम परिणाम एक उन्मुक्त रचनाशील मनुष्य है जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक विपदाओं के विरुद्ध लड़ सकता है।’’ ‘चौथी औद्योगिक क्रांति’पैदा करने के लिए जरूरी है कि यह उन्मुक्त और रचनाशील मनुष्य उन बदलावों को आत्मसात करने के लिए परिवर्तन गति पर नियंत्रण रखे जो व्यवस्थाओं और समाजों के भीतर स्थापित होते जा रहे हैं। एक ऐसे माहौल की आवश्यकता है जो महत्त्वपूर्ण विचारशीलता को बढ़ावा दे और अध्यापन को बौद्धिक रूप से उत्साहवर्धक बनाए। इससे विद्वता प्रेरित होगी और ज्ञान एवं शिक्षकों के प्रति गहरा सम्मान बढ़ेगा। इससे महिलाओं के प्रति आदर की भावना पैदा होगी जिससे व्यक्ति जीवन पर्यन्त सामाजिक सदाचार के मार्ग पर चलेगा। इसके द्वारा गहन विचारशीलता की संस्कृति प्रोत्साहित होगी और चिंतन एवं आंतरिक शांति का वातावरण पैदा होगा। हमारी शैक्षिक संस्थाएं मन में जाग्रत विविध विचारों के प्रति उन्मुक्त दृष्टिकोण के जरिए,विश्व स्तरीय बननी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय वरीयताओं में प्रथम दो सौ में स्थान प्राप्त करने वाले दो भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों के द्वारा यह शुरुआत पहले ही हो गई है।
प्यारे देशवासियो,
पीढ़ी का परिवर्तन हो चुका है। युवा बागडोर संभालने के लिए आगे आ चुके हैं। ‘नूतन युगेर भोरे’ के टैगोर के इन शब्दों के साथ आगे कदम बढ़ाएं :
‘‘चोलाय चोलाय बाजबे जायेर भेरी-
पायेर बेगी पॉथ केटी जाय कोरिश ने आर
देरी।’’
आगे बढ़ो, नगाड़ों का स्वर तुम्हारे विजयी प्रयाण की घोषणा करता है
शान के साथ कदमों से अपना पथ बनाएं;
देर मत करो, देर मत करो, एक नया युग आरंभ हो रहा है।
धन्यवाद,

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नई दिल्‍ली: 67वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्‍या पर राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राष्‍ट्र के नाम संदेश में कहा कि इस कठिन बताए जा रहे इस दौर में भारत की आर्थिक तरक्‍की दुनिया के लिए कौतू‍हल का विषय रही।

इसके साथ ही उन्‍होंने कहा कि हमारी राष्‍ट्रीयता की मान्‍यताओं को नुकसान पहुंचाने वाली हिंसा की जघन्‍य घटनाओं का हमें संज्ञान लेना होगा। पढ़ें उनके संबोध्‍ान की 10 खास बातें...

1. हमारे लोकतंत्र ने जो हासिल किया है, हमें उसकी सराहना करना चाहिए। हमारी उत्कृष्ट विरासत, लोकतंत्र की संस्थाएं सभी नागरिकों के लिए न्याय, समानता तथा लैंगिक और आर्थिक समता सुनिश्चित करती हैं।

2. जब हिंसा की घृणित घटनाएं इन स्थापित आदर्शों, जो हमारी राष्ट्रीयता के मूल तत्व हैं, पर चोट करती हैं तो उन पर उसी समय ध्यान देना होगा।

3. हमें हिंसा, असहिष्‍णुता और अविवेकपूर्ण ताकतों से हमें खुद की रक्षा करनी होगी।

4. हमारे बीच ही कुछ शक करने वाले और लोभी किस्‍म के लोग भी होंगे।

5. हम असंतोष व्‍यक्‍त करने, मांग और विरोध करने का अपना रुख जारी रखें क्‍योंकि यही लोकतंत्र की खूबी है।

6. आज भारत एक उभरती हुई शक्ति है, एक देश जो विज्ञान, तकनीक, नवाचार और स्‍टार्ट-अप्‍स के क्षेत्र में वैश्विक नेता के रूप में तेजी से उभर रहा है।

7. इस वर्ष 7.3 प्रतिशत की अनुमानित वृद्धि दर के साथ भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍था बन जाएगा।

8. साल 2015 चुनौतियों का साल रहा। साल के दौरान अंतरराष्‍ट्रीय अर्थवयवस्‍था मंद बनी रही।

9. ऐसे परेशानी भरे माहौल में किसी भी देश के लिए तरक्‍की करना आसान नहीं हो सकता। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है।

10. 2015 में हमें कुदरत की बेरुखी का भी सामना करना पड़ा। मौसम के असामान्‍य हालात ने हमारे कृषि उत्‍पादन को प्रभावित किया है।