मंगलवार, 26 जनवरी 2016

आओ फिर से दिया जलाएँ : अटल बिहारी वाजपेयी

पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज जन्मदिन है। आज उनकी कवितायें पढ़ने का मन किया...।
उनकी कविताओं में उनका अनुभव झलकता है। राजनीति से कभी बेचैन दिखाई पड़ते हैं तो कभी आज के हालात पर दुखी। जीवन और मृत्यु का संघर्ष दिखाई देता है तो मौत से ठन जाने की बातें करते हैं। अदम्य साहस... ऊँचाई एकाकी होती है....

"आओ मन की गाँठें खोलें" से वे प्रेम से रहने और मन मुटाव दूर करने की सीख दे जाते हैं..शायद इसीलिये वे राजनीति में भी अपने प्रतिद्वंदियों के चहेते बने रहे...

1. आओ फिर से दिया जलाएँ

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ


2. ऊँचाई

 ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,

पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,


किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।


न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।


मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।


3. कौरव कौन, कौन पांडव


कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है|
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है|
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|



4. मौत से ठन गई।

ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।


मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

5. आओ मन की गाँठें खोलें.

यमुना तट, टीले रेतीले, घास फूस का घर डंडे पर,
गोबर से लीपे आँगन में, तुलसी का बिरवा, घंटी स्वर.
माँ के मुँह से रामायण के दोहे चौपाई रस घोलें,
आओ मन की गाँठें खोलें.
बाबा की बैठक में बिछी चटाई बाहर रखे खड़ाऊँ,
मिलने वालों के मन में असमंजस, जाऊं या ना जाऊं,
माथे तिलक, आंख पर ऐनक, पोथी खुली स्वंय से बोलें,
  
आओ मन की गाँठें खोलें.
सरस्वती की देख साधना, लक्ष्मी ने संबंध ना जोड़ा,
मिट्टी ने माथे के चंदन बनने का संकल्प ना तोड़ा,
नये वर्ष की अगवानी में, टुक रुक लें, कुछ ताजा हो लें,
आओ मन की गाँठें खोलें.

प्रतिष्ठित भारतीय कवि : भारत पर कविता

भारत पर कविताएं


यहां कुछ प्रतिष्ठित भारतीय कवियों द्वारा भारत पर कविताओं का एक छोटा सा अनूदित संग्रह दिया गया है ...
रवीन्द्रनाथ टैगोर
"मन जहां डर से परे है
और सिर जहां ऊंचा है;
ज्ञान जहां मुक्‍त है;
और जहां दुनिया को
संकीर्ण घरेलू दीवारों से
छोटे छोटे टुकड़ों में बांटा नहीं गया है;
जहां शब्‍द सच की गहराइयों से निकलते हैं;
जहां थकी हुई प्रयासरत बांहें
त्रुटि हीनता की तलाश में हैं;
जहां कारण की स्‍पष्‍ट धारा है
जो सुनसान रेतीले मृत आदत के
वीराने में अपना रास्‍ता खो नहीं चुकी है;
जहां मन हमेशा व्‍यापक होते विचार और सक्रियता में
तुम्‍हारे जरिए आगे चलता है
और आजादी के स्‍वर्ग में पहुंच जाता है
ओ पिता
मेरे देश को जागृत बनाओ"
"गीतांजलि"
- रवीन्द्रनाथ टैगोर


Swami Yogananda Paramhansa
स्‍वर्ग या तोरण पथ से बेहतर
मैं तुम्‍हें प्‍यार करता हूं, ओ मेरे भारत
और मैं उन सभी को प्‍यार करुंगा
मेरे सभी भाई जो राष्‍ट्र में रहते हैं
ईश्‍वर ने पृथ्‍वी बनाई;
मनुष्‍य ने देशों की सीमाएं बनाई
और तरह तरह की सुंदर सीमा रेखाएं खींचीं
परन्‍तु अप्राप्‍त सीमाहीन प्रेम
मैं अपने भारत देश के लिए रखता हूं
इसे दुनिया में फैलाना है
धर्मों की माँ, कमल, पवित्र सुंदरता और मनीषी
उनके विशाल द्वार खुले हैं
वे सभी आयु के ईश्‍वर के सच्‍चे पुत्रों का स्‍वागत करते हैं
जहां गंगा, काष्‍ठ, हिमालय की गुफाएं और
मनुष्‍यों के सपने में रहने वाले भगवान
मैं खोखला हूं; मेरे शरीर ने उस तृण भूमि को छुआ है
- स्‍वामी योगानंद परमहंस


Sarojini Naidu
क्‍या यह जरूरी है कि मेरे हाथों में
अनाज या सोने या परिधानों के महंगे उपहार हों?
ओ ! मैंने पूर्व और पश्चिम की दिशाएं छानी हैं
मेरे शरीर पर अमूल्‍य आभूषण रहे हैं
और इनसे मेरे टूटे गर्भ से अनेक बच्‍चों ने जन्‍म लिया है
कर्तव्‍य के मार्ग पर और सर्वनाश की छाया में
ये कब्रों में लगे मोतियों जैसे जमा हो गए।
वे पर्शियन तरंगों पर सोए हुए मौन हैं,
वे मिश्र की रेत पर फैले शंखों जैसे हैं,
वे पीले धनुष और बहादुर टूटे हाथों के साथ हैं
वे अचानक पैदा हो गए फूलों जैसे खिले हैं
वे फ्रांस के रक्‍त रंजित दलदलों में फंसे हैं
क्‍या मेरे आंसुओं के दर्द को तुम माप सकते हो
या मेरी घड़ी की दिशा को समझ करते हो
या मेरे हृदय की टूटन में शामिल गर्व को देख सकते हो
और उस आशा को, जो प्रार्थना की वेदना में शामिल है?
और मुझे दिखाई देने वाले दूरदराज के उदास भव्‍य दृश्‍य को
जो विजय के क्षति ग्रस्‍त लाल पर्दों पर लिखे हैं?
जब घृणा का आतंक और नाद समाप्‍त होगा
और जीवन शांति की धुरी पर एक नए रूप में चल पड़ेगा,
और तुम्‍हारा प्‍यार यादगार भरे धन्‍यवाद देगा,
उन कॉमरेड को जो बहादुरी से संघर्ष करते रहे,
मेरे शहीद बेटों के खून को याद रखना!
द गिफ्ट ऑफ इंडिया
- सरोजिनी नायडू



एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
इन जंजीरों की चर्चा में कितनों ने निज हाथ बँधाए,
कितनों ने इनको छूने के कारण कारागार बसाए,
इन्हें पकड़ने में कितनों ने लाठी खाई, कोड़े ओड़े,
और इन्हें झटके देने में कितनों ने निज प्राण गँवाए!
किंतु शहीदों की आहों से शापित लोहा, कच्चा धागा।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।

जय बोलो उस धीर व्रती की जिसने सोता देश जगाया,
जिसने मिट्टी के पुतलों को वीरों का बाना पहनाया,
जिसने आज़ादी लेने की एक निराली राह निकाली,
और स्वयं उसपर चलने में जिसने अपना शीश चढ़ाया,
घृणा मिटाने को दुनियाँ से लिखा लहू से जिसने अपने,
“जो कि तुम्हारे हित विष घोले, तुम उसके हित अमृत घोलो।”
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।

कठिन नहीं होता है बाहर की बाधा को दूर भगाना,
कठिन नहीं होता है बाहर के बंधन को काट हटाना,
ग़ैरों से कहना क्या मुश्किल अपने घर की राह सिधारें,
किंतु नहीं पहचाना जाता अपनों में बैठा बेगाना,
बाहर जब बेड़ी पड़ती है भीतर भी गाँठें लग जातीं,
बाहर के सब बंधन टूटे, भीतर के अब बंधन खोलो।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।

कटीं बेड़ियाँ औ’ हथकड़ियाँ, हर्ष मनाओ, मंगल गाओ,
किंतु यहाँ पर लक्ष्य नहीं है, आगे पथ पर पाँव बढ़ाओ,
आज़ादी वह मूर्ति नहीं है जो बैठी रहती मंदिर में,
उसकी पूजा करनी है तो नक्षत्रों से होड़ लगाओ।
हल्का फूल नहीं आज़ादी, वह है भारी ज़िम्मेदारी,
उसे उठाने को कंधों के, भुजदंडों के, बल को तोलो।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
- गणतंत्र दिवस / हरिवंशराय बच्चन

अशोक चक्र : लांस नायक शहीद मोहन नाथ गोस्वामी





अशोक चक्र पाने वाले लांस नायक मोहन नाथ ने अंतिम 11 दिनों में ढेर कर दिए थे 10 आतंकी
कर्नल एसडी गोस्वामी के मुताबिक, गोस्‍वामी ने अपनी जिंदगी के अंतिम 11 दिनों में कश्मीर घाटी में तीन आतंकवाद निरोधी अभियानों में सक्रिय भाग लिया था, जिसमें 10 आतंकवादी मारे गए थे और एक जिंदा पकड़ा गया था।

जनसत्ता ऑनलाइन,नई दिल्‍ली | January 26, 2016

राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मंगलवार को लांस नायक मोहन नाथ गोस्वामी की पत्‍नी को अशोक चक्र सम्‍मान सौंपा गया।

सेना के विशेष बल के कमांडो शहीद लांस नायक मोहन नाथ गोस्वामी को उनकी वीरता के लिए अशोक चक्र से सम्‍मानित‍ किया गया है। वह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उन्‍होंने जिस अदम्‍य साहस का परिचय दिया, वह कभी न भुलाने वाला है। वह पिछले साल सितंबर में शहीद हुए थे। लांस नायक गोस्‍वामी ने प्राण त्‍यागने से पहले चार आतंकियों को ढेर किया। इनमें दो को उन्‍होंने खुद मारा, जबकि गोली लगने के बाद भी दो अन्‍य मारने में साथियों की मदद की। खुद घायल होने के बाद भी वह अपने दो घायल साथियों को सुरक्षित स्‍थान लेकर आए थे। उन्‍होंने जिंदगी के आखिरी 11 दिनों में 10 आतंकियों को ढेर कर दिया था। लांस नायक गोस्‍वामी पिछले साल उत्‍तरी कश्‍मीर के कुपवाड़ा जिले में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। वह सेना के उस ऑपरेशन में भी शामिल थे, जिसमें लश्‍कर-ए-तोयबा का आतंकी सज्‍जाद अहमद जिंदा पकड़ा गया था।

कर्नल एसडी गोस्वामी के मुताबिक, गोस्‍वामी ने अपनी जिंदगी के अंतिम 11 दिनों में कश्मीर घाटी में तीन आतंकवाद निरोधी अभियानों में सक्रिय भाग लिया था, जिसमें 10 आतंकवादी मारे गए थे और एक जिंदा पकड़ा गया था। प्रवक्ता ने बताया कि लांस नायक गोस्वामी 2002 में सेना के पैरा कमांडो से जुड़े थे। उन्होंने पिछले साल मीडिया से बात करते हुए बताया था कि लांस नायक ने अपनी इकाई के सभी अभियानों में भाग लिया था। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद निरोधी कई सफल अभियानों का वह हिस्सा रहे थे। उन्होंने बताया, पहला अभियान खुरमूर, हंदवारा में 23 अगस्त को अंजाम दिया गया था। इस अभियान में पाकिस्तानी मूल के लश्कर-ए-तैयबा के तीन कट्टर आतंकवादी मारे गए थे।

उन्होंने कश्मीर के रफीयाबाद अभियान में स्वेच्छा से भाग लिया। यह अभियान दो दिनों 26 और 27 अगस्त तक चला। इस मुठभेड़ में लश्कर-ए-तैयबा के तीन और आतंकवादी मारे गए। उन्होंने बताया कि इस अभियान में पाकिस्तान के मुजफ्फरगढ़ के रहने वाले लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी सज्जाद अहमद उर्फ अबू उबैदुल्ला को जिंदा पकड़ा गया था।

लांस नायक गोस्वामी का तीसरा अभियान कुपवाड़ा के पास हफरूदा का घना जंगल था। यह उनका अंतिम अभियान साबित हुआ, लेकिन इस अभियान में चार आतंकवादियों को मार गिराया गया। लांस नायक गोस्वामी नैनीताल में हल्द्वानी के इंदिरा नगर के रहने वाले थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी भावना गोस्वामी  और सात साल की बेटी है।
-----------



नई दिल्ली : सेना की 9 पैरा स्पेशल फोर्स के कमांडो मोहन गोस्वामी आज हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन, देश उनकी वीर गाथा को हमेशा याद रखेगा. लांस नायक गोस्वामी को मरणोपरांत अशोक चक्र से नवाजा जाएगा. राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने दिवंगत की पत्नी भावना गोस्वामी को सम्मान सौंपा.
पिछले साल 2-3 सितंबर की रात सेना की टुकड़ी ने कुपवाड़ा जिले के हंदवारा के जंगल में आतंकियों को घेरा. दोनों तरफ से जबर्दस्त मुठभेड़ हुई. लांस नायक गोस्वामी आतंकियों पर टूट पड़े औऱ दो आतंकियों को तुरंत मार गिराया. इस बीच गोस्वामी के 3 साथियों को गोली लगी.
लांस नायक गोस्वामी कश्मीर में महज 11 दिन तैनात रहे लेकिन 11 दिनों की छोटी सी अवधि में उन्होंने आतंकवादियों के खिलाफ कई ऑपरेशन में हिस्सा लिया. जिसमें 10 आतंकी मारे गए. इसमें लश्कर ए तैयबा से जुड़ा बड़ा आतंकी भी शामिल था. लांस नायक मोहन गोस्वामी को ABP ऩ्यूज का सलाम.