सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी और उपाध्यक्ष राहुल गाँधी देश से मांफी मांगे - अमित शाह



क्या यही है कांग्रेस की राष्ट्रभक्ति की नई परिभाषा ? - अमित शाह , राष्ट्रिय अध्यक्ष भाजपा

केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की सफलता से निराशा और हताश कांग्रेस गहरे अवसाद से ग्रस्त है। पार्टी और उसके नेता यह समझ नहीं पा रहे हैं कि इस अवसाद की अवस्था में वो देश के समक्ष कैसे एक जिम्मेदार राजनीतिक दल की भूमिका निभायें।

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी तो इस हताशा में देश विरोधी और देश हित का अंतर तक नहीं समझ पा रहे हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू ) में जो कुछ भी हुआ उसे कहीं से भी देश हित के दायरे में रखकर नहीं देखा जा सकता है। देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे लगें और आतंकवादियों की खुली हिमायत हो, इसे कोई भी नागरिक स्वीकार नहीं कर सकता। लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष और उनकी पार्टी के अन्य नेताओं ने जेएनयू जाकर जो बयान दिए हैं उसने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उनकी सोच में राष्ट्रहित जैसी भावना का कोई स्थान नहीं है।

जेएनयू में वामपंथी विचारधारा से प्रेरित कुछ मुट्ठीभर छात्रों ने निम्नलिखित राष्ट्रविरोधी नारे लगाए:

“पाकिस्तान जिंदाबाद”
“गो इंडिया गो बैक”
“भारत की बरबादी तक जंग रहेगी जारी”
“कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी जारी”
“अफ़ज़ल हम शर्मिन्दा है तेरे कातिल ज़िंदा हैं”
“तुम कितने अफजल मरोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा”
“अफ़ज़ल तेरे खून से इन्कलाब आयेगा”
इन छात्रों को सही ठहराकर राहुल गांधी किस लोकतांत्रिक व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं? क्या राहुल गांधी के लिए राष्ट्रभक्ति की परिभाषा यही है? देशद्रोह को छात्र क्रान्ति और देशद्रोह के खिलाफ कार्यवाही को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात का नाम देकर उन्होंने राष्ट्र की अखण्डता के प्रति संवेदनहीनता का परिचय दिया है। मैं उनसे पूंछना चाहता हूँ कि इन नारों का समर्थन करके क्या उन्होंने देश की अलगाववादी शक्तियों से हाथ मिला लिया है ? क्या वह स्वतंत्रता की अभिवक्ति की आड़ में देश में अलगाववादियों को छूट देकर देश का एक और बंटवारा करवाना चाहते हैं?

देश की राजधानी में स्थित एक अग्रणी विश्वविद्यालय के परिसर को आतंकवाद और अलगाववाद को बढ़ावा देने का केंद्र बना कर इस शिक्षा के केंद्र को बदनाम करने की साजिश की गयी। मैं राहुल गांधी से पूंछना चाहता हूँ कि क्या केंद्र सरकार का हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना राष्ट्रहित में होता? क्या आप ऐसे राष्ट्रविरोधियों के समर्थन में धरना देकर देशद्रोही शक्तियों को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं?

जेएनयू में राहुल गांधी ने वर्त्तमान भारत की तुलना हिटलर के जर्मनी से कर डाली। इतनी ओछी बात करने से पहले वह भूल जाते है कि स्वतंत्र भारत की हिटलर के जर्मनी से सबसे निकट परिकल्पना सिर्फ श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए 1975 के आपातकाल से की जा सकती है।

स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति तो दूर, आपातकाल में विरोधियों को निर्ममता के साथ जेल में ठूंस दिया गया था। वामदलों के नेता जिनकी वह आज हिमायत करते घूम रहे है, वह भी इस बर्बरता की शिकार हुए थे। हिटलरवाद सिर्फ कांग्रेस के डी.एन.ए. में है, भाजपा को राष्ट्रवाद और प्रजातंत्र के मूल्यों की शिक्षा कांग्रेस पार्टी से लेने की जरूरत नहीं है। हमारे राजनैतिक मूल्य भारतवर्ष की समृद्ध संस्कृति से प्रेरित है और भारत का संविधान हमारे लिए शासन की निर्देशिका है। मैं राहुल गांधी से जानना चाहता हूँ कि 1975 का आपातकाल क्या उनकी पार्टी के प्रजातांत्रिक मूल्यों को परिभाषित करता है और क्या वह श्रीमती इंदिरा गांधी की मानसिकता को हिटलरी मानसिकता नहीं मानते?

देश की सीमाओं की रक्षा और कश्मीर में अलगाववाद को नियंत्रित करते हुए हमारे असंख्य सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं। 2001 में देश की संसद में हुए आतंकवादी हमले में दिल्ली पुलिस के 6 जवान, 2 संसद सुरक्षाकर्मी और और एक माली शहीद हुए थे। इसी आतंकी हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरू का महिमा मंडल करने वालों और कश्मीर में अलगाववाद के नारे लगाने वालों को समर्थन देकर राहुल गांधी अपनी किस राष्ट्रभक्ति का परिचय दे रहे हैं? मैं उनसे पूंछना चाहता हूँ कि अभी हाल में सियाचिन में देश की सीमा के प्रहरी 9 सैनिकों जिनमे लांस नायक हनुमंथप्पा एक थे, के बलिदान को क्या वह इस तरह की श्रद्धांजली देंगें?

भाजपा के केंद्र की सत्ता में आने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से कश्मीर में भी देश विरोधी भावनाओं को नियंत्रित करने में सफलता मिल रही है। लेकिन प्रमुख विपक्षी दल होने के बावजूद कांग्रेस इस काम में सरकार को सहयोग करने के बजाए जेएनयू में घटित शर्मनाक घटना को हवा दे रही है। प्रगतिशीलता के नाम पर वामपंथी विचारधारा का राष्ट्रविरोधी नारों को समर्थन किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मैं कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी और उपाध्यक्ष राहुल गाँधी से ऊपर उल्लेखित सवालों का 125 करोड़ देशवासियों की ओर से जवाब मांगता हूँ और यह भी मांग करता हूँ कि राहुल गाँधी अपने इस कृत्य के लिए देश से मांफी मांगे।

देशद्रोही गतिविधियों को सहन नहीं किया जा सकता : अमित शाह





भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह द्वारा दिए गए प्रेस टिप्पणी के मुख्य अंश
 देश की जमीन पर या इसके किसी भी हिस्से पर इस तरह की देशद्रोही गतिविधियों को सहन नहीं किया जा सकता: अमित शाह
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देश की जनता यह जानना चाहती है कि आखिर अभिव्यक्ति की आजादी की कांग्रेस की व्याख्या क्या है: अमित शाह
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देश की जनता यह जानना चाहती है कि कांग्रेस देश के सर्वोच्च अदालत के फैसले को मानती है या नहीं: अमित शाह
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भारतीय जनता पार्टी देश की रक्षा करने वाले शहीद जवानों और उनके परिवारों के साथ खड़ी है और हर राष्ट्रभक्त व्यक्ति एवं संस्थाओं को देश की सुरक्षा करनेवाले जवानों के संवेदनाओं की चिंता करना चाहिए: अमित शाह
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अगर कांग्रेस उपाध्यक्ष, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इन राष्ट्रविरोधी नारों कासमर्थन कर रहे हैं तो इससे बड़ा देशद्रोह का सबूत और क्या हो सकता है: अमित शाह
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आज भी कांग्रेस के प्रवक्ता आतंकी अफज़ल गुरु को अफज़ल गुरु 'जी' कहकर सम्बोधित कर रहे हैं: अमित शाह
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क्या कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी द्वारा जेएनयू परिसर में देशद्रोही नारे लगाने वालों के समर्थन में दिए गए बयानों का समर्थन करती है: अमित शाह
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कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को देशवासियों से अविलंब माफी मांगनी चाहिए: अमित शाह
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कुछ दिन पहले जवाहरलाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) परिसर में जिस तरह से राष्ट्रविरोधी नारे लगाए गए, भारतीय जनता पार्टी उसकी कड़ी निंदा करती है और इस प्रकार की गतिविधियों पर चिंता भी व्यक्त करती है। भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि देश की जमीन पर या इसके किसी भी हिस्से पर इस तरह की देशद्रोही गतिविधियों को सहन नहीं किया जा सकता। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने जेएनयू जाकर जिस तरह से इस घटना का समर्थन किया है, वह सबसे बड़ा चिंता का विषय है। भारतीय जनता पार्टी देश की रक्षा करने वाले शहीद जवानों और उनके परिवारों के साथ खड़ी है और हमारा मानना है कि हर राष्ट्रभक्त व्यक्ति एवं संस्थाओं को देश की सीमा की सुरक्षा करनेवाले जवानों के संवेदनाओं की चिंता करना चाहिए।

लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संसद पर हमला करनेवाले आतंकी अफज़ल गुरु को फांसी की सजा दी गई। उसके बाद आतंकी अफज़ल गुरु के समर्थन में देेश को तोड़ने के लिए 'पाकिस्तान जिंदाबाद', 'भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी - जंग रहेगी', 'अफज़ल हम शर्मिन्दा हैं तेरे कातिल ज़िंदा हैं', 'हर घर में अफज़ल होंगे - भारत तेरे टुकड़े होंगे', जैसे जो नारे लगाए गए, अगर कांग्रेस उपाध्यक्ष, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इसका समर्थन कर रहे हैं तो मैं कांग्रेस पार्टी से पूछना चाहता हूँ कि इससे बड़ा देशद्रोह का सबूत और क्या हो सकता है। इतना होने के बावजूद, न तो कांग्रेस अध्यक्षा, न कांग्रेस उपाध्यक्ष और न ही कांग्रेस का कोई प्रवक्ता इस घटना के लिए माफी मांगने को तैयार है। आज भी कांग्रेस के प्रवक्ता आतंकी अफज़ल गुरु को अफज़ल गुरु 'जी' कहकर सम्बोधित कर रहे हैं।

मैं कांग्रेस पार्टी से पूछना चाहता हूँ कि क्या वह राहुल गांधी द्वारा जेएनयू परिसर में देशद्रोही नारे लगाने वालों के समर्थन में दिए गए बयानों का समर्थन करती है? कांग्रेस पार्टी को इसपर जवाब देना चाहिए। मैं श्रीमान राहुल गांधी से यह भी पूछना चाहता हूँ कि क्या आपको देशद्रोही गतिविधियों का समर्थन करते वक्त देश की संसद की सुरक्षा करनेवाले शहीद जवानों और उनके परिवारों की संवेदनाओं का ख़याल नहीं आया? आखिर कब तक वोट बैंक की राजनीति की खातिर आप देश के जवानों की शहादत का मजाक उड़ाते रहेंगें? क्या आपको इस बात की चिंता है कि आप अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में देशद्रोही प्रवृत्तियों को प्रश्रय देने से भी नहीं चूक रहे? इस पूरे मामले पर कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी को अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए।

देश की जनता यह जानना चाहती है कि आखिर अभिव्यक्ति की आजादी की कांग्रेस की व्याख्या क्या है। देश की जनता यह जानना चाहती है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर छात्रों को अपनी बात कहने देने का मतलब हिन्दुस्तान को टुकड़े करना है क्या? देश की जनता यह जानना चाहती है कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब आतंकी अफज़ल गुरु का समर्थन करना है क्या? देश की जनता यह जानना चाहती है कि कांग्रेस देश के सर्वोच्च अदालत के फैसले को मानती है या नहीं? भारतीय जनता पार्टी यह मांग करती है कि कांग्रेस पार्टी को इन सब बातों का स्पष्टीकरण देना चाहिए। यदि कांग्रेस के दिल में शहीदों के परिवारों के प्रति थोड़ी सी भी संवेदना है और उसे यदि लगता है कि देशद्रोहियों का समर्थन नहीं करना चाहिए तो कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को देशवासियों से अविलंब माफी मांगनी चाहिए।

(इंजी. अरुण कुमार जैन)
कार्यालय सचिव

सनातन धर्म की रक्षा कर रही मोदी सरकार : अमित शाह

सनातन धर्म की रक्षा कर रही मोदी सरकार : अमित शाह
Mon, 08 Feb 2016


लखनऊ। मथुरा में धर्म के मंच से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सरकार की उपलब्धियों में धर्म और अध्यात्म को भी जोड़ दिया। सोमवार को वृंदावन में प्रियाकांतजू मंदिर के महोत्सव में पहुंचे शाह ने कहा कि मोदी सरकार दुनिया भर में भारत के वैभव का तो परचम फहरा ही रही है, यहां के अध्यात्म का प्रभावशाली संदेश देकर सनातन धर्म की रक्षा भी कर रही है।
शाह ने कहा कि गुजरात और वृंदावन के बीच अटूट नाता है। यह रिश्ता भगवान श्रीकृष्ण के जरिए बना था। वृंदावन के प्रति यह दुनिया भर के लोगों की आस्था ही है कि श्रीकृष्ण के जन्मदिवस पर बगैर किसी निमंत्रण के ही दौड़े चले आते हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया में जब भौतिकवादी रास्ते रुक जाते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण के गीता में दिए संदेश ही रास्ता दिखाते हैं।
भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि जनता के समर्थन से केंद्र में ऐसी सरकार आ गई है, जो दुनिया में अध्यात्म का संदेश भी दे रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय योग का प्रभावशाली वर्णन किया, जिससे दुनिया भर के 170 देश इसके मुरीद हो गए। संयुक्त राष्ट्र संघ को भी योग दिवस घोषित करना पड़ा। हरियाणा के राज्यपाल कप्तान ङ्क्षसह सोलंकी ने कहा कि श्रीकृष्ण की लीलास्थली वृंदावन संत-महंतों के लिए दुनियाभर में सबसे बड़ा आस्था का केंद्र है।
समारोह में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह  तोमर, सांसद हेमामालिनी, सांसद मीनाक्षी लेखी आदि भी उपस्थित रहीं। अतिथियों का स्वागत भागवताचार्य देवकीनंदन ठाकुरजी ने किया। इससे पूर्व विधि-विधान से श्रीप्रियाकांतजू मंदिर का उद्घाटन किया गया। महोत्सव 17 फरवरी तक चलेगा।

"भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महत्वपूर्ण योगदान" : ज्ञानेंद्र नाथ बरतरिया





"भारत में आरएसएस के 10  योगदान"
( ज्ञानेंद्र नाथ बरतरिया वरिष्ठ पत्रकार )

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 90 साल का हो चुका है. 1925 में दशहरे के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी.सांप्रदायिक हिंदूवादी, फ़ासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारे जाने वाले संगठन के तौर पर आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ को कम से कम 7-8 दशक हो चुके हैं. दुनिया में शायद ही किसी संगठन की इतनी आलोचना की गई होगी. वह भी बिना किसी आधार के. संघ के ख़िलाफ़ लगा हर आरोप आख़िर में पूरी तरह कपोल-कल्पना और झूठ साबित हुआ है.कोई शक नहीं कि आज भी कई लोग संघ को इसी नेहरूवादी दृष्टि से देखते हैं.हालांकि ख़ुद नेहरू को जीते-जी अपना दृष्टि-दोष ठीक करने का एक दुखद अवसर तब मिल गया था,जब 1962 में देश पर चीन का आक्रमण हुआ था.तब देश के बाहर पंचशील और लोकतंत्र वग़ैरह आदर्शों के मसीहा जवाहरलाल न ख़ुद को संभाल पारहे थे, न देश की सीमाओं को. लेकिन संघ अपना काम कर रहा था. संघ के कुछ
उल्लेखनीय कार्य
1) कश्मीर सीमा पर निगरानी, विभाजन पीड़ितों को आश्रय संघ के स्वयंसेवकों ने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नज़र रखी. यह काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न हरिसिंह सरकार. उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे. विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे.
2) 1962 का युद्ध सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश नेदेखा और सराहा. स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी – सैनिक आवाजाही मार्गों की कसी,प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद, और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता. जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा.परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए.निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर नेहरू ने कहा- “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्रदिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया.”
3) कश्मीर का विलय
कश्मीर के महाराजा हरि सिंह विलय का फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी, तब नेहरू सरकार तो - हम क्या करें वाली मुद्रा में - मुंह बिचकाए बैठी थी. सरदार पटेल ने गुरु गोलवलकर से मदद मांगी.गुरुजी श्रीनगर पहुंचे, महाराजा से मिले. इसके बाद महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेज दिया. क्या बाद में महाराजा हरिसिंह के प्रति देखी गई नेहरू की नफ़रत की एक जड़ यहां थी ?
4) 1965 के युद्ध में क़ानून-व्यवस्था संभाली पाकिस्तान से युद्ध के समय लालबहादुर शास्त्री को भी संघ याद आया था. शास्त्री जी ने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके. घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे. युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाई पट्टियों से बर्फ़ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था.
5) गोवा का विलय :
दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ की निर्णायक भूमिका थी. 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया,28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई. संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया. संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे. गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया,जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाए जाने में निकला. हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा आज़ाद हुआ.
6) आपातकाल
1975 से 1977 के बीच आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में संघ की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए ताज़ा है.सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रह कर आंदोलन चलाना शुरु किया. आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक र्यकर्ताओं –नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम संघ कार्यकर्ताओं ने संभाला. जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से चल सकी थीं.
7) भारतीय मज़दूर संघ
1955 में बना भारतीय मज़दूर संघ शायद विश्व का पहला ऐसा मज़दूर आंदोलन था, जो विध्वंस के बजाए निर्माण की धारणा पर चलता था. कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मज़दूर संघ ने ही शुरू किया था. आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मज़दूर संगठन है.
8) ज़मींदारी प्रथा का ख़ात्मा जहां बड़ी संख्या में ज़मींदार थे उस राजस्थान में ख़ुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं. संघ के स्वयंसेवक शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी बने. भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती,वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना. विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है. केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र- छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं. संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैं. अकेला सेवा भारती देश भर के दूरदराज़ के और दुर्गम इलाक़ों में सेवा के एक लाख से ज़्यादा काम कर रहा है. लगभग 35 हज़ार एकल विद्यालयों में 10 लाख से ज़्यादा छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं. उदाहरण के तौर पर सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को गोद लिया है जिनमें 38 मुस्लिम और 19 हिंदू बच्चे हैं.
9) सेवा कार्य
1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक - संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है. भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में...!!!

10) पूर्णतः छूआछूत रहित - संघ एक इस तरह का संगठन है जहां वास्तविक तौर पर अश्पृश्यता  छूआछूत नही हे। संघ में सभी एक दूसरे को भाई साहब कह कर सम्बोधन करते हैं वहां जाती पूछी ही नहीं जाती। एक साथ बैठ कर भोजन करना , एक साथ सोना , खेलना , उठना रहना होता हे। सम्पूर्ण समाज को एकात्म बनानें के लक्ष्य से कार्यरत यह संगठन सामाजिक समरसता के मामले में अद्वितीय है। सर्व श्रैष्ठ है।
( मुझे ज्ञानेंद्र नाथ बरतरिया वरिष्ठ पत्रकार के लेख में 10 वां नहीं मिला , संभबतः टाइपिंग मिस्टेक के कारण रह गया होगा , इस लिए 10 वां मैनें मेरे ज्ञान के आधार पर जोड़ा है । अरविन्द सिसोदिया 9414180141    / 95095 5 9131 )
पर दुख इस बात का है कि ऐसे देशभक्त संगठन को अपने ही नासमझ लोग वोट के स्वार्थ मे गाली देके जाने अनजानेे मे खुद की कब्र खोदके समाज को डुबोने का काम करते है। देश के बाहरी सीमा की रक्शा सेना करती है पर देश के अन्दर सुरक्षा व सन्तुलन का काम इनसे होता है।जिस दिन ये संघ खतम हो गया तो यहां भी मालदा,कश्मीर, सिरीया व इराक की तरह बेगुनाहों को बेघर होते समय नही लगेगा। जाती पंथ आैर वोट बेंक का बिखराव हमारा विनाश का कारण बनेगा।