सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

संसद पर हमला :13 दिसंबर 2001: मुख्य आरोपी अफजल गुरु : जेएनयू

भारत की संसद पर हमले के आरोपी की बरसी मनाने वाले अपने आप को देश भक्त कैसे कह सकते हैं ?  कोई भी विश्व विद्यालय देश विरोधियों को अनुमति कैसे दे सकता ?? और देशविरोधी का साथ देने को सिर्फ और सिर्फ देशद्रोही  कहा जाता हे !  अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता का नाम लेकर देश से गद्दारी नही की जा सकती !!


संसद पर हमले की पूरी कहानी...

http://hindi.webdunia.com

13 दिसंबर 2001 को जैश-ए-मोहम्मद के पांच आतंकवादियों ने संसद पर हमला किया था। उस दिन एक सफेद एंबेसडर कार में आए इन आतंकवादियों ने 45 मिनट में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर को गोलियों से छलनी करके पूरे हिंदुस्तान को झकझोर दिया था 


यह पाकिस्तान की भारत के लोकतंत्र के मंदिर को नेस्तनाबूद करने की साजिद थी, लेकिन हमारे सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए इन आतंकियों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। जानिए संपूर्ण घटनाक्रम जानिए !

कैसे हुआ था हमला- तारी‍ख 13 दिसंबर, सन 2001, स्थान- भारत का संसद भवन। लोकतंत्र का मंदिर जहां जनता द्वारा चुने सांसद भारत की नीति-नियमों का निर्माण करते हैं। आम दिनों में जब संसद भवन के परिसर कोई सफेद रंग की एंबेसेडर आती है तो कोई ध्यान नहीं देता, लेकिन उस दिन उस सफेद रंग की एंबेसेडर ने कोहराम मचा दिया।

संसद भवन के परिसर में अचानक गृह मंत्रालय का कार पास लगी एक सफेद एंबेसेडर से आए 5 आतंकवादियों ने 45 मिनट तक लोकतंत्र के इस मंदिर पर गोलियों-बमों से थर्रा कर रख दिया था। आतंक के नापाक कदम उस दिन लोकतंत्र के मंदिर की दहलीज तक पहुंच गए थे। अचानक हुए हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया।

जांबाजी से किया मुकाबला : संसद परिसर के अंदर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने अचानक हुए हमले का बड़ी ही वीरता से सामना किया। लोकतंत्र के इस मंदिर में कोई आंच न आए, इसलिए उन्होंने अपनी जान की बाजी लगा दी।

सुरक्षाकर्मियों ने बड़ी ही वीरता से सभी आतंकियों को मार गिराया। आतंकियों का सामना करते हुए दिल्ली पुलिस के पांच जवान, सीआरपीएफ की एक महिला कांस्टेबल और संसद के दो गार्ड शहीद हुए। 16 जवान इस दौरान मुठभेड़ में घायल हुए।

हमले के मास्टर माइंड को फांसी: संसद पर हमले की घिनौनी साजिश रचने वाले मुख्य आरोपी अफजल गुरु को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया। संसद पर हमले की साजिश रचने के आरोप में सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त 2005 को अफजल गुरु को फांसी की सजा सुनाई थी।

कोर्ट ने आदेश दिया था कि 20 अक्टूबर 2006 को अफजल को फांसी के तख्ते पर लटका दिया जाए। तीन अक्टूबर 2006 को अफजल की पत्नी तब्बसुम ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल कर दी।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अफजल की दया याचिका खारिज कर दी और सरकार ने उसे फांसी देकर हमले में शहीद हुए बहादुरों को सही मायने में श्रद्धांजलि दी।

मामला विचाराधीन : मुंबई हमले के आरोपी अजमल कसाब को फांसी पर लटकाए जाने के बाद अफजल गुरु को फांसी देने की मांग उठने लगी। राष्ट्रपति ने इस दया याचिका पर गृह मंत्रालय से राय मांगी। मंत्रालय ने इसे दिल्ली सरकार को भेज दिया जहां दिल्ली सरकार ने इसे खारिज करके गृह मंत्रालय को वापस भेजा।

गृह मंत्रालय ने भी दया याचिका पर फैसला लेने में वक्त लगाया लेकिन मंत्रालय ने अपनी फाइल राष्ट्रपति के पास भेज दी है। फांसी पर अंतिम फैसला देश के राष्ट्रपति को ही लेना है।
----------------

2001 में संसद पर हुए हमले की पूरी कहानी

December 13, 2013 आईबीएन-7

नई दिल्ली। कहत हैं कुछ तारीखें अपने साथ इतिहास लेकर आती हैं। 13 दिसंबर 2001 की तारीख भी इतिहास में दर्ज हो जाने के लिए आई। भारतीय लोकतंत्र को थर्रा देने के लिए आई। पूरा देश भौचक था कि आखिर संसद पर हमला कैसे हो सकता है।
गोलियों की आवाज, हाथों में एके-47 लेकर संसद परिसर में दौड़ते आतंकी, बदहवास सुरक्षाकर्मी, इधर से उधर भागते लोग, कुछ ऐसा ही नजारा था संसद भवन का। जो हो रहा था वो उस पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था। लेकिन ये भारतीय लोकतंत्र की बदकिस्मती थी कि हर तस्वीर सच थी।

सुबह 11 बजकर 20 मिनट
उस रोज उस वक्त, लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही ताबूत घोटाले पर मचे बवाल के चलते स्थगित हो चुकी थीं। वक्त था 11 बजकर 20 मिनट। इसके बाद तमाम सांसद संसद भवन से बाहर निकल गए। कुछ ऐसे थे जो सेंट्रल हॉल में बातचीत में मशगूल हो गए। कुछ लाइब्रेरी की तरफ बढ़ गए, कुल मिलाकर सियासी तनाव से अलग माहौल खुशनुमा ही था।
किसी को अंदाजा नहीं था कि आगे क्या होने जा रहा है। उधर दूर एक सफेद रंग की एंबैसेडर कार संसद मार्ग पर दौड़ी चली जा रही थी। घनघनाती हुई लाल बत्ती और सायरन की आवाज। किसी को शक की गुंजाइश ही नहीं थी। ये कार विजय चौक से बाएं घूमकर संसद की तरफ बढ़ने लगी। इस बीच संसद परिसर में मौजूद सुरक्षा कर्मियों के वायरलेस सेट पर एक आवाज गूंजी। उप राष्ट्रपति कृष्णकांत घर के लिए निकलने वाले थे, इसलिए उनकी कारों के काफिले को आदेश दिया गया कि तय जगह पर खड़ी हो जाएं। ये जगह थी संसद भवन के गेट नंबर 11 के सामने।
चंद ही सेकेंड में सारी गाड़ियां करीने से आकर गेट नंबर 11 के सामने लग गईं। उप राष्ट्रपति किसी भी वक्त बाहर आने वाले थे। तब तक सफेद एंबेसडर कार लोहे के दरवाजों को पार करते हुए गेट नंबर 12 तक पहुंच चुकी थी। इसी गेट से राज्यसभा के भीतर के लिए रास्ता जाता है। कार इस दरवाजे से उधर की ओर आगे बढ़ गई जहां उप-राष्ट्रपति की कारों का काफिला खड़ा था।
11 बजकर 35 मिनट
दिल्ली पुलिस के असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर जीतराम उप राष्ट्रपति के काफिले में एस्कॉर्ट वन कार पर तैनात थे। जीतराम को सामने से आती हुई सफेद एंबेसडर दिखाई दी। सेकेंडों में ये कार जीतराम के पास तक आ गई। उसकी कार के चलते रास्ता थोड़ा संकरा हो गया था। एंबेसेडर की रफ्तार धीमी होने के बजाय और तेज हो गई। वो कार की तरफ देखता रहा, अचानक ये कार बाईं ओर मुड़ गई।
जीतराम को कार के ड्राइवर की ये हरकत थोड़ी अजीब लगी जब कार पर लाल बत्ती है। गृह मंत्रालय का स्टीकर है तो फिर वो उससे बचकर क्यों भागी। जीतराम ने जोर से चिल्ला कर उस कार को रुकने को कहा। एएसआई की आवाज सुनकर वो कार आगे जाकर ठिठक गई। लेकिन वहीं इंतजार करने के बजाय उसके ड्राइवर ने कार पीछे करनी शुरू कर दी। अब जीतराम तेजी से उसकी तरफ भागा। इसी हड़बड़ी में वो कार उप राष्ट्रपति के काफिले की मुख्य कार से टकरा गई।
सेना की वर्दी पहनकर आए थे आतंकी
जब गाड़ी खड़ी थी तभी आतंकियों की गाड़ी ने उनकी कार में टक्कर मारी। इसके बाद विजेंदर सिंह ने गाड़ी में बैठे आतंकी का कॉलर पकड़ा और कहा कि दिखाई नहीं दे रहा, तुमने उपराष्ट्रपति की गाड़ी को टक्कर मार दी।
सुरक्षाकर्मियों के हल्ला मचाने के बावजूद कार में बैठे आतंकी रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। जीतराम समेत बाकी लोग उस पर चिल्लाए कि तुम देखकर गाड़ी क्यों नहीं चला रहे हो। इस पर गाड़ी में बैठे ड्राइवर ने उसे धमकी दी कि पीछे हट जाओ वर्ना तुम्हें जान से मार देंगे। अब जीतराम को यकीन हो गया कि कार में बैठे लोगों ने भले सेना की वर्दी पहन रखी है, लेकिन वो सेना में नहीं हैं। उसने तुरंत अपनी रिवॉल्वर निकाल ली। जीतराम को रिवॉल्वर निकालता देख संसद के वॉच एंड वार्ड स्टाफ का जेपी यादव गेट नंबर 11 की तरफ भागा। एक ऐसे काम के लिए जिसके शुक्रगुजार हमारे सांसद आज भी हैं।
कार चला रहे आतंकी ने अब कार गेट नंबर 9 की तरफ मोड़ दी। इसी गेट का इस्तेमाल प्रधानमंत्री राज्यसभा में जाने के लिए करते हैं। कार चंद मीटर बढ़ी लेकिन आतंकी उस पर काबू नहीं रख पाए, कार सड़क किनारे लगे पत्थरों से टकरा कर थम गई। तब तक जीतराम भी दौड़ता हुआ कार तक पहुंच गया। उसके हाथ में रिवॉल्वर देख पांचों आतंकी तेजी से बाहर निकल आए। उतरते ही उन्होंने कार के बाहर तार बिछाना और उससे विस्फोटकों को जो़ड़ना शुरू कर दिया।
लेकिन तब तक जीतराम को यकीन हो गया कि ये आतंकवादी हैं। उसने बिना देर किए एक पर गोली दाग दी जो उसके पैर पर लगी। जवाब में उस आतंकी ने भी जीतराम पर फायर कर दिया। गोली उसके पैर में जाकर धंस गई और वो वहीं गिर गया। इस वक्त तक सरकार में ऊपर से लेकर नीचे तक किसी को अंदाजा नहीं था कि संसद की सुरक्षा में कितनी बड़ी सेंध लग चुकी है।
आतंकियों ने की ताबड़तोड़ फायरिंग
उधर, कार में धमाका कर पाने में नाकाम आतंकियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। गेट नंबर 11 पर तैनात सीआरपीएफ की कॉन्सटेबल कमलेश कुमारी भी दौ़ड़ते हुए वहां आ पहुंची। संसद के दरवाजे बंद करवाने का अलर्ट देकर जेपी यादव वहां आ गया। दोनों ने आतंकियों को रोकने की कोशिश की, लेकिन आतंकियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग करते हुए उन्हें वहीं ढेर कर दिया।
आजाद देश के सबसे बड़े आतंकी हमले की शुरुआत करने के बाद अब आतंकी गोलियां चलाते और हैंड ग्रेनेड फेंकते हुए गेट नंबर 9 की तरफ भागे।
संसद परिसर में ताबड़तोड़ गोलियां की आवाज ने सुरक्षाकर्मियों में हड़कंप मचा दिया। उस वक्त सौ से ज्यादा सांसद मेन बिल्डिंग में ही मौजूद थे। पहली फायरिंग के बाद कई सांसदों को इस बात पर हैरत थी कि आखिर कोई कैसे संसद भवन परिसर के नजदीक पटाखे फोड़ सकता है। वो इस बात से पूरी तरह बेखबर थे कि संसद पर आतंकी हमला हुआ है।
लेकिन तब तक संसद की सुरक्षा में लगे लोग पूरी तरह हरकत में आ चुके थे। गहरे नीले रंग के सूट पहने हुए ये सुरक्षाकर्मी परिसर के भीतर और बाहर फैल गए। वो सांसदों और मीडिया के लोगों को लगातार अपनी जान बचाने के लिए चिल्ला रहे थे। उस वक्त तक ये भी तय नहीं था कि आतंकी सदन के भीतर तक पहुंच गए हैं या नहीं। इसलिए तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और कैबिनेट के दिग्गज मंत्रियों को संसद भवन में ही एक खुफिया ठिकाने पर ले जाया गया।
वहीं जो सांसद परिसर से बाहर निकल रहे थे उन्होंने देखा कि हर तरफ अफरातफरी मच गई है। पुलिस की वर्दी पहने हुए लोग इधर से उधर भाग रहे हैं। हर तरफ से गोलियों और हेंड ग्रैनेड दागे जाने की आवाज आ रही थीं। ये वो वक्त था जब पहली बार सही मायने में लोगों को एहसास हुआ कि दरअसल हुआ क्या है। फिर तो इसके बाद गोलियों की तड़तड़ाहट में एक और आवाज गूंज उठी, आतंकवादी, आतंकवादी।
संसद परिसर में मची अफरातफरी
संसद में फायरिंग और बम धमाके की कान फाड़ देने वाली आवाज के बीच शुरुआती मिनटों में पूरे परिसर में जबरदस्त अफरातफरी मची रही। कई सांसदों को संसद के वॉच एंड वार्ड स्टाफ के लोग सुरक्षित बाहर निकालकर ले गए। संसद के भीतर मचे हड़कंप के बीच पांचों आतंकवादी अंधाधुंध गोलियां दागते हुए गेट नंबर 9 की तरफ भागे जा रहे थे। गेट नंबर 9 और उनके बीच की दूरी कुछ ही मीटर की थी, लेकिन तब तक गोलियों की आवाज सुनकर गेट नंबर 9 को बंद कर दिया गया था।
आतंकियों पर जबरदस्त जवाबी फायरिंग भी जारी थी। सुरक्षाबलों की गोली से तीन आतंकी जख्मी थे, लेकिन वो लगातार आगे बढ़ते जा रहे थे। उन्होंने एक छोटी सी दीवार फांदी और गेट नंबर 9 तक पहुंच ही गए। लेकिन वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि उसे बंद किया जा चुका है। इसके बाद वो दौड़ते हुए, बंदूकें लहराते हुए आगे बढ़ने लगे। तभी पहली मंजिल पर मौजूद एक पुलिस अफसर अपने साथियों पर चिल्लाया कि एक-एक इंच पर नजर रखो। कोई आतंकी सदन के भीतर ना पहुंचने पाए कोई आतंकी यहां से भाग ना पाए। तुरंत ही सुरक्षाकर्मियों ने उन नेताओं और पत्रकारों को संसद के भीतर धकेलना शुरू कर दिया जो इतनी फायरिंग और हैंड ग्रेनेड के धमाकों के बाद भी दरवाजों के आसपास खड़े थे।
हमला होते ही काटे गए फोन
नेताओं को सेंट्रल हॉल तक ले जाने के बाद सुरक्षाकर्मी तमाम संवाददाताओं को उस कमरे में ले गए जहां से अहम सरकारी दस्तावेज बांटे जाते थे। इस कमरे का दरवाजा बंद कर दिया गया और कमरे में पहुंचते ही संवाददाता वहां के फोन की तरफ भागे। लेकिन कमरे में लगे सभी फोन ने काम करना बंद कर दिया था। ये फोन हमला शुरू होने के तुरंत बाद ही काट दिए गए थे। मकसद ये कि कोई आतंकी संसद भवन के संचार तंत्र पर कब्जा ना कर ले।
संसद के भीतर की इस हलचल के बीच आतंकी गेट नंबर 9 से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे। 4 आतंकी गेट नंबर 5 की तरफ लपके भी, लेकिन उन 4 में से 3 को गेट नंबर 9 के पास ही मार गिराया गया। हालांकि एक आतंकवादी गेट नंबर 5 तक पहुंचने में कामयाब रहा। ये आतंकी लगातार हैंड ग्रेनेड भी फेंक रहा था। इस आतंकी को गेट नंबर पांच पर कॉन्टेबल संभीर सिंह ने गोली मारी। गोली लगते ही चौथा आतंकी भी वहीं गिर पड़ा।
पांचवां आतंकी मचाता रहा कोहराम
चार आतंकियों को मार गिराने की कार्रवाई के बीच एक आतंकी गेट नंबर 1 की तरफ बढ़ गया। ये आतंकी फायरिंग करते हुए गेट नंबर 1 की तरफ बढ़ता जा रहा था। गेट नंबर 1 से ही तमाम मंत्री, सांसद और पत्रकार संसद भवन के भीतर जाते हैं। ये आतंकी भी वहां तक पहुंच गया। फायरिंग और धमाके की आवाज सुनने के तुरंत बाद इस गेट को भी बंद कर दिया गया था। इसलिए पांचवां आतंकी गेट नंबर 1 के पास पहुंचकर रुक गया। तभी उसकी पीठ पर एक गोली आकर धंस गई। ये गोली इस आत्मघाती हमलावर की बेल्ट से टकराई। इसी बेल्ट के सहारे उसने विस्फोटक बांध रखे थे। गोली लगने के बाद पलक झपकते ही विस्फोटकों में धमाका हो गया। उस आतंकी के शरीर के निचले हिस्से की धज्जियां उड़ गईं। खून और मांस के टुकड़े संसद भवन के पोर्च की दीवारों पर चिपक गए। जले हुए बारूद और इंसानी शरीर की गंध हर तरफ फैल गई।
पांचों आतंकियों के ढेर होने के बावजूद इस वक्त तक ना तो सुरक्षाकर्मियों की पता था और ना ही मीडिया को कि आखिर संसद पर हमला कितने आतंकियों ने किया है। अफरातफरी के बीच ये अफवाह पूरे जोरों पर थी कि एक आतंकी संसद के भीतर घुस गया है। इसकी एक वजह ये भी थी कि मारे गए पांचों आतंकियों ने जो हैंड ग्रेनेड चारों तरफ फेंके थे, उनके में कुछ आतंकियों को मारे जाने के बाद फटे।
संसद के भीतर और बाहर मचे घमासान के बीच सुरक्षाकर्मियों को कुछ वक्त लगा ये तय करने में कि क्या खतरा वाकई टल गया है। आधे घंटे के भीतर सभी आतंकियों के मारे जाने के बावजूद वो कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे। तब तक सुरक्षाबल के जवान संसद और आसपास के इलाके को बाहर से भी घेर चुके थे। गोलियों की आवाज, हैंड ग्रेनेड के धमाके की जगह अब एंबुलेंस के सायरन ने ले ली थी।
हमला नाकाम करने में लगे 30 मिनट
संसद पर हमले को नाकाम करने में तीस मिनट लगे। लेकिन इन तीस मिनटों ने जो निशानी हमारे देश को दी वो आज भी मौजूद है। पांचों आतंकियों को ढेर करने के बाद कुछ वक्त ये तय करने में लगा कि सारे आतंकी मारे गए हैं। कोई सदन के भीतर नहीं पहुंचा। तब तक एक-एक करके बम निरोधी दस्ता, एनएसजी के कमांडो वहां पहुंचने लगे थे। उनकी नजर थी उस कार पर जिससे आतंकी आए थे और हरे रंग के उनके बैग जिसमें गोला-बारूद भरा हुआ था।
तलाशी के दौरान आतंकियों के बैग से खाने-पीने का सामान भी मिला, यानी वो चाहते थे कि संसद पर हमले को दौरान सासंदों को बंधक भी बनाया लिया जाए। वो ज्यादा से ज्यादा वक्त तक संसद में रुकने के लिए तैयार होकर आए थे। अब जाकर सरकार को एहसास हुआ कि अगर आतंकी भीतर घुस जाते तो उसका अंजाम कितना खतरनाक होता।
विस्फोटकों को किया नाकाम
बम निरोधक दस्ते ने वहां पहुंचने के बाद विस्फोटकों को नाकाम करना शुरू किया। उन्हें परिसर से दो जिंदा बम भी मिले थे। जिस कार से आतंकी आए थे, उसमें 30 किलो आरडीएक्स था। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अगर आतंकी इस कार में धमाका करने में कामयाब हो गए होते तो क्या होता।
सुरक्षाबलों को पूरी तरह तसल्ली करने में काफी देर लगी। वो अब किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहते थे। हर किसी की एक बार फिर जांच की गई। संसद परिसर से निकलने वाली हर कार की भी तलाशी ली जा रही थी। जिन कारों पर संसद का स्टीकर लगा था उन्हें भी पूरी छानबीन करके ही बाहर जाने की इजाजत दी जा रही थी। एक-एक आदमी का आईकार्ड चेक किया जा रहा था। जब सुरक्षा में जुटे लोग पूरी तरह संतुष्ठ हो गए कि अब खतरा नहीं है, तब संसद सांसदों और मीडिया के लोगों को एक-एक करके बाहर निकालने का काम शुरू हुआ।
दोपहर साढ़े ग्यारह बजे के करीब हुए हमले के बाद मचे हड़कंप को थमते-थमते शाम हो गई। पूरा देश अब तक इस हमले को जज्ब नहीं कर पाया था। सत्ता के गलियारों में बैठक पर बैठक पर हो रही थी कि इस हालात का मुकाबला कैसे किया जाए। उधर इतिहास में 13 दिसंबर की तारीख को हमेशा के लिए दर्ज कराकर सूरज भी धीरे-धीरे डूबने लगा था।
------------------

जेएनयू विवाद : इस पूरे मामले में अब तक क्या हुआ, जानें महत्वपूर्ण बातें

NDTVKhabar.com सोमवार फ़रवरी 22, 2016

देश की प्रतिष्ठित जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम और उसके बाद पनपे तीखे विवाद में दिनोंदिन नए मोड़ आ रहे हैं। अब जेएनयू के टीचर एसोसिएशन ने मांग की है कि सभी निलंबित छात्रों का निलंबन समाप्त किया जाए। वहीं स्टूडेंट्स का कहना है कि वे सरेंडर नहीं करेंगे, पुलिस उन्हें अरेस्ट कर ले। आइए जानें, इस पूरे मामले में अब तक क्या हुआ, इससे जुड़ी सिलेसिलेवार जानकारी :
०१ -9 फरवरी को लेफ़्ट विंग के कुछ छात्रों ने जेएनयू में कार्यक्रम आयोजित किया। यह कार्यक्रम कथित तौर पर अफ़ज़ल और मक़बूल भट्ट की याद में कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसे छात्रों ने कल्चरल इवेंट का नाम दिया।
०२ - एबीवीपी के विरोध के बाद JNU प्रशासन ने कार्यक्रम की इजाज़त नहीं दी। इजाज़त नहीं मिलने के बावजूद वहां कुछ छात्र जमा हुए जहां कुछ छात्रों ने देश विरोधी नारे लगाए।
०३ - नारेबाज़ी के बाद एबीवीपी और लेफ़्ट समर्थक छात्रों के बीच झड़प हो गई। 10 फ़रवरी को नारेबाज़ी का वीडियो सामने आया जिसके बाद हंगामा हो गया।
०४ - 12 फ़रवरी को देश विरोधी नारेबाज़ी के आरोप में छात्रों पर देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज
०५ - 16 लोगों को पुलिस ने आरोपी बनाया, छह को मुख्य आरोपी  बनाया
०६ - जिन छह छात्रों को मुख्य आरोपी बनाया गया, उनके नाम हैं : कन्हैया, उमर ख़ालिद, आशुतोष कुमार, रामा नागा, अनिर्बान भट्टाचार्य, अनंत प्रकाश नारायण
०७ - 12 फरवरी को जेएनयू छात्र संघ का अध्यक्ष कन्हैया गिरफ़्तार किया गया जोकि फिलहाल जेल में है।
०८ - कन्हैया कुमार की 12 फरवरी को गिरफ्तारी के बाद से बाकी मुख्य आरोपी लापता हो गए थे।
०९ - उमर खालिद समेत इन पांचों छात्रों को 21 फरवरी देर रात और फिर 22 फरवरी की सुबह यूनिवर्सिटी कैंपस में देखा गया। छात्रों ने कहा कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया बल्कि ‘डॉक्टर्ड वीडियो’ का इस्तेमाल कर उन्हें फंसाया गया।
१०  - बीच प्रशासनिक भवन के पास छात्रों की भीड़ के बीच उमर ख़ालिद ने भाषण दिया और आरएसएस व केन्द्र सरकार पर निशाना साधा। आज सुबह तक खबर आ रही थी इस विवाद के चलते देशद्रोह का आरोप झेल रहे पांच छात्र आज सरेंडर कर सकते हैं लेकिन अब खबर है कि आरोपी छात्र कह रहे हैं कि वे आत्म समर्पण नहीं करेंगे और पुलिस उन्हें गिरफ्तार करे।


साम्यवादी सोच का सच : आशुतोष मिश्र

साम्यवादी सोच का सच ( दैनिक जागरण )

Editor, Sampadkiya February 22, 2016

लेखक - आशुतोष मिश्र, लखनऊ विश्व विद्यालय राजनीती शास्त्र के विभागाध्यक्ष  

जेएनयू से भारत की बर्बादी तक जंग जारी रखने के ऐलान को सुनकर सारा देश सदमे में है। इस जंग को जीतने के लिए हर घर से अफजल निकलने और अफजल के हत्यारों को जिंदा न छोड़ने का संकल्प सार्वजनिक हो गया है। जेएनयू का चालीस साल पुराना छात्र होने के नाते मेरे लिए इसमें कुछ नया नहीं है। कम्युनिस्ट क्रांतिकारिता और इस्लामी कट्टरवादिता की दुस्साहसी दुरभिसंधि की कहानी उससे भी तीस साल पुरानी है जब अधिकारी थीसिस के आधार पर मार्क्‍सवादियों ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर पाकिस्तान बनाने का आंदोलन चलाया था। इसका औपचारिक आरंभ तो उससे भी पच्चीस साल पहले अगस्त 1920 में हुआ जब एमएन रॉय ने डीकॉलोनाइजेशन थीसिस के जरिये भारत के साम्यवादियों को आजादी के आंदोलन से अलग रखने की कोशिश की। आजादी के बाद दोबारा देश के कम्युनिस्ट नेताओं को मॉस्को बुलाकर स्टालिन ने फटकारा। इस वजह से मजबूरी में हमारे कम्युनिस्ट नेताओं ने माना कि भारत देश थोड़ा आजाद हुआ है और यहां थोड़ा जनतंत्र है।

जेएनयू कांड भारतीय मार्क्‍सवादियों की उसी मानसिकता की एक मिसाल मात्र है जिसमें भारत को कभी राष्ट्र ही नहीं माना गया। सौ साल से उन्होंने भारत को अधिक से अधिक राष्ट्रीयताओं का एक संघ ही माना है। इनकी पार्टियों को भारतीय होने में शर्म लगती थी इसलिए वे अपने को भारतीय नहीं, बल्कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी कहती थीं। साम्यवादियों के मन में भारत के लिए हिकारत का यह भाव बहुत आसानी से हिन्दू धर्म के लिए घृणा के भाव में दिखाई दिया। भारतीय राष्ट्र और हिन्दू धर्म को शोषक शक्ति मानने की इसी साम्यवादी सैद्धांतिक समझ ने कम्युनिस्टों की निगाह में हर भारत-विरोधी, हंिदूू-विरोधी भावना को प्रगतिशील बना दिया। जेएनयू का साबरमती ढाबा साम्यवादियों की इस सौ साल की यात्र का एक पड़ाव भर है। 1पिछले चालीस सालों में जेएनयू में केवल इतना बदलाव आया है कि पहले कम्युनिस्ट क्रांतिकारिता सीनियर सहयोगी थी, अब मुस्लिम कट्टरपंथ ने उसको अपने अधीन कर लिया है। इस धार्मिक आतंकवाद को साम्यवादियों से एक मार्क्‍सवादी मुखौटा और जेएनयू जैसी वीआइपी जगहों पर जमने का मौका मिल जाता है। साम्यवादियों के कई गुटों को मुस्लिम अलगाववाद से समस्या है, लेकिन कई वजहों से उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया है।

शायद इन साम्यवादियों को अंदाज नहीं था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस जमाने में साबरमती ढाबे जैसे आयोजन छिपाए नहीं जा सकते। भारत के किसी भी साम्यवादी दल को मुस्लिम लीग जैसे सांप्रदायिक संगठनों से समस्या नहीं है, जो भले ही मुस्लिम कट्टरपंथ की राजनीति करते हों लेकिन फिर भी कुछ पर्दादारी करते हों। आखिर साम्यवादियों के शीर्षस्थ नेता नंबूदरीपाद ने ही मुस्लिम लीग से गठबंधन की नींव रखी थी। इसके बावजूद सीपीआइ और सीपीएम को भारत की बर्बादी तक जंग जारी रखने के ऐलान से परेशानी होगी। साफ है कि वे अपने ही बनाए जाल में फंस गए हैं। कन्हैया कुमार का पितृ संगठन सीपीआइ इसकी एक मिसाल है। कम से कम इस साम्यवादी संगठन ने भारतीय राष्ट्रीय बुर्जुवा के कुछ प्रगतिशील पक्षों को स्वीकार किया था। उसे भारतीय होने में असुविधा नहीं थी। सीपीएम और माओवादियों की बात अलग है। सीपीआइ और उसके आनुषंगिकों द्वारा धार्मिक अलगाववाद की स्वीकृति बताती है कि साम्यवादियों का सारा संसार ही देश से अलग हो चुका है।



इस पतन की पराकाष्ठा की एक मिसाल और है। जेएनयू में इस संगठन के एक पुराने छात्र नेता और अब शिक्षक नेता को पाकिस्तानी आइएसआइ के आतिथ्य में अमेरिका जाने में भी कोई संकोच नहीं हुआ। अमेरिका में आइएसआइ एजेंट गुलाम नबी फई की गिरफ्तारी से इसका पर्दाफाश हुआ। 1जेएनयू कांड से सबसे बड़ा सवाल यह सामने आया है कि आखिर किन वजहों से हंिदूुस्तान के लगभग सभी कम्युनिस्ट संगठन मुस्लिम अलगाववाद के ही नहीं, बल्कि आतंकवाद तक के इतने सक्रिय समर्थक बन गए। इसकी पहली वजह यह है कि 1980 के दशक में चीन के पूंजीवादी बनने और 1990 में सोवियत साम्यवाद के समापन के बाद कम्युनिस्ट पार्टियों के संसाधन और शक्ति का संप्रभु स्नोत सूख गया। आधी दुनिया से साम्यवाद साफ हो गया। इसी सहारे से अब तक कम्युनिस्ट पार्टियों का भारतीय राजनीति पर असर बना हुआ था। एक समय में सीपीआइ और सीपीएम को क्रमश: कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंदिरा और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ मोरारजी कहा जाता था।

कुमारमंगलम थीसिस लेकर कांग्रेस में घुसे कम्युनिस्ट पहले से ही वैभव-विलासिता के आदी हो चुके थे। सीपीआइ को सरकारी ट्रेड यूनियन से थोड़ी ऑक्सीजन मिली। इन संगठनों को सबसे बड़ा लाभ उन भीमकाय शासकीय शैक्षिक-बौद्धिक-सांस्कृतिक संगठनों से मिला जिन्हें इंदिरा गांधी के समय से ही इन साम्यवादियों को सौंप दिया गया था। इंदिरा गांधी ने इसी पैकेज में जेएनयू को साम्यवादियों को गिफ्ट किया था। जेएनयू के एक विशेष प्रावधान का दुरुपयोग कर के भारी संख्या में अर्हता न रखने वाले कामरेडों की नियुक्ति कर दी गई। इस गिफ्ट के बदले उपकृत हुए ज्यादातर साम्यवादी बुद्धिजीवी सरकारी दरबारी बन गए। इस सरकारी सुविधावादिता की वजह से दोनों बड़े साम्यवादी दल समाप्त होते गए। 1यह संयोग था कि साम्यवादियों के पराभव के समय ही पश्चिमी साम्राज्यवादी देश एनजीओ का तंत्र खड़ा कर रहे थे। नाटो देशों ने इस एनजीओ तंत्र के सहारे तीसरी दुनिया पर नकेल कसने की योजना बना रखी थी। भारत में एनजीओ के इस खतरनाक खेल को सबसे पहले सीपीएम ने समझा। इसके बावजूद सुख-सुविधा को सुरक्षित करने के लिए कम्युनिस्टों की एक बड़ी फौज इस एनजीओ तंत्र में शामिल हो गई।

कम्युनिस्टों का अमेरिकी साम्राज्यवाद से रिश्ता पक्का हो गया। एक शीर्ष कम्युनिस्ट नेता ने अमेरिका से मोदी को वीजा न देने का निवेदन किया। कम्युनिस्टों और पश्चिमी साम्राज्यवादी एनजीओ के इस महामिलन से माओवाद का जन्म हुआ। पश्चिमी साम्राज्यवादी संरक्षण की वजह से माओवादी युवा संगठनों ने जेएनयू कांड में भाग ही नहीं लिया, बल्कि इसका पूरा नेतृत्व किया। माओवादियों ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या करके बता दिया है कि उन्हें ईसाई मिशनरियों के लिए स्वामी की हत्या करने और जेएनयू में मुस्लिम आतंकवाद के लिए भारत तेरे टुकड़े होंगे का रणघोष करने में कोई परेशानी नहीं है। इस मामले में तिरुपति से पशुपति का माओवादी संकल्प बहुत कल्पनिक नहीं लगता है। आखिर नेपाल में भी माओवादियों ने ईसाई धर्मातरण तथा मुस्लिम उग्रवाद को पूरा प्रोत्साहन दिया है। यह भी संयोग नहीं है कि नेपाल के शीर्ष माओवादी नेता और दो भारतीय मध्यस्थ जेएनयू के ही हैं। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि तमाम विखंडनवादी विध्वंसक गतिविधियों के सूत्र जेएनयू से जुड़े हुए दिखते हैं।