शनिवार, 5 मार्च 2016

सावधान - सावधान : योजनापूर्वक झूठ फैलाया जा रहा !!

कांग्रेस और साम्यवादी दलों का सफाया देश की जनता ने कर दिया , ऐतिहासिक हार से तिलमिलाये ये दल राष्ट्रभक्त नरेंद्र मोदी सरकार को काम नहीं करने दो, के एजेंडे पर रोज रोज षडयंत्रों के द्वारा बाधा  उत्पन्न कर रहे हैं !




JNU का कन्हैया कुमार कैसे करता है झूठ और मक्कारी की बातें

4th March 2016 सावधान सावधान

New Delhi: कल दिल्ली की जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी का छात्र संघ का अध्यक्ष कन्हैया कुमार 14 दिन की न्यायिक हिरासत के बाद तिहाड़ जेल से रिहा हो गया। रिहाई के बाद कन्हैया कुमार ने शाम को सभी JNU छात्रों को इकठ्ठा करके लम्बा चौड़ा भाषण दिया लेकिन भाषण के दौरान उसने प्रधानमंत्री मोदी को जमकर निशाना बनाया। उसने केवल दो  साल पुरानी सरकार को देश की सभी समस्याओं के लिए जिम्मेदार बताकर JNU के एंटी मोदी अजेंडे को खुद ही एक्सपोज्ड कर दिया। खासतौर से छात्रों से राजनीतिक बयानबाजी की अपेक्षा नहीं की जाती लेकिन कन्हैया कुमार ने देश को भ्रमित करने वाली बयानबाजी करने के साथ साथ झूठ और मक्कारी का भी सहारा लिया और मोदी सरकार को पांच वर्ष में उखाड़ फेंकने की कसम खायी।

कन्हैया कुमार ने फिर से अपने पिछले भाषण को दोहराते हुए कहा की उन्हें गरीबी, भुखमरी और जातिवाद से आजादी चाहिए। कन्हैया कुमार की इस बात से देश के सभी लोग सहमत हो सकते हैं क्यूंकि ये सभी समस्याएं इस देश की सबसे बड़ी समस्याएँ हैं लेकिन कन्हैया कुमार ने अपने भाषण में यह नहीं बताया की इन समस्याओं का जिम्मेदार कौन है, किसने देश पर सबसे अधिक समय तक राज किया है। क्या वे लोग देश की गरीबी, भुखमरी और जातिवाद के जिम्मेदार नहीं हैं।

मोदी सरकार को देश में आये 2 साल भी नहीं हुए हैं। क्या देश की सभी समस्याओं के लिए मोदी सरकार ही जिम्मेदार है, इससे पहले कांग्रेस ने 10 वर्ष तक शासन किया और उसके पांच वर्ष पहले भी देश पर कांग्रेस पार्टी का ही शासन था। क्या कन्हैया कुमार और JNU के वामपंथी छात्रों की नजर में कांग्रेस इन समस्याओं की जिम्मेदार नहीं है।

ज्यादातर लोगों को पता होगा की कांग्रेस के शाशन के समय में (60-90 के दशक) देश में ब्राह्मणवाद का बोलबाला, ब्राह्मणों को चुन चुन कर नौकरी पर रखा जाता था। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु खुद अपने नाम के आगे पंडित लगाते थे, उनके राज में पंडितों को चुन चुन कर नौकरियां बांटी गयीं। इससे ना सिर्फ सामाजिक भेदभाव फैला, समाज में एक निराशात्मक माहौल भी फैला और खासकर दलितों के साथ बहुत अन्याय हुआ। उस समय में ज्यादातर नौकरियों पर ऊँची जाती वालों को रखा गया और पिछड़ी जातियों को इग्नोर किया गया, इसके बाद पिछड़ी जातियों को आरक्षण की जरूरत हुई लेकिन उन्हें आज तक सही रूप से आरक्षण नहीं मिला। आज भी कुछ राजनीतिक पार्टियाँ उन्हें आरक्षण का सपना दिखाकर सरकार चला रही हैं लेकिन ना तो गरीबों और पिछड़ों को आरक्षण दे रही हैं और ना ही राज्य से गरीबी मिटने का नाम ले रही हैं, बिहार इसका जीता जागता उदाहरण है। बिहार आज भी सबसे अधिक पिछड़ा हुआ माना जाता है और वहां की सरकारें अभी भी आरक्षण देने का सपना दिखा कर राज्य कर रही हैं अगर उन्हें सच में आरक्षण दे दिया जाता तो वहां पर इतनी गरीबी ना होती और नौजवानों को रोजगार के लिए दूसरे शहरों में भटकना ना पड़ता।

कल कन्हैया कुमार ने खुद कहा कि वह सबसे पिछड़े राज्य बिहार से आता है। क्या कन्हैया कुमार को जानकारी नहीं है की बिहार के पिछड़े होने का कारण क्या है। क्या बिहार के पिछड़े होने का कारण जातिवाद नहीं है। बिहार में 35 वर्ष तक राज करने वाले लालू यादव और नीतीश कुमार ने गरीबों और पिछड़ों को आरक्षण क्यूँ नहीं दिया और क्यूँ एक जाति को दूसरी जाति से लड़ाते रहे। बिहार में क्यूँ दलित को महादलित बना दिया गया। दलित आज भी बिहार के सबसे बड़े वोटबैंक क्यूँ हैं। क्या मोदी सरकार बिहार की गरीबी के लिए जिम्मेदार है। बीजेपी और मोदी ने तो वहां पर राज भी नहीं किया। क्या कन्हैया कुमार बिहार सरकार या वहां पर जातिवाद ख़त्म करने के लिए बिगुल छेड़ेगा? नहीं छेड़ेगा। क्यूंकि नीतीश कुमार ने कन्हैया कुमार को बिहार का बेटा बताया है और बेटा अपने बाप के खिलाफ कैसे बोल सकता है।

कल कन्हैया कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी के बारे में एक झूठ बोला। उसने कहा की मोदी ने कालाधन लाकर देश के सभी लोगों के बैंक अकाउंट में 15 लाख जमा कराने का वादा किया है। वैसे तो मोदी के बारे में यही बात मोदी विरोधी नेता नीतीश कुमार, लालू यादव, राहुल गाँधी और केजरीवाल भी कहते हैं लेकिन एक छात्र होने के नाते कन्हैया कुमार से ऐसी झूठ और मक्कारी की बातें शोभा नहीं देतीं। सच यह है कि मोदी ने कभी नहीं कहा की कालेधन में से 15 लाख रुपये सभी देशवासियों के बैंक अकाउंट में डाले जाएंगे। उन्होंने कालेधन की अधिकता का अहसास कराने के लिए कहा था की विदेशों में इतना ज्यादा कालाधन है की अगर देश में वापस आ जाय तो सभी लोगों को 15-15 लाख मिल सकता है। मोदी ने पैसे देने के लिए नहीं बोला था और ना ही वादा किया था। उन्होंने ये जरूर कहा था की नौकरीपेशा लोगों को उसका कुछ भाग जरूर मिलेगा। मोदी के कहने का मतलब ये था की पैसा आने के बाद उसे देश के विकास और गरीबों के कल्याण में लगाया जाएगा लेकिन उनकी बातों को नीतीश कुमार, लालू यादव, राहुल गाँधी और केजरीवाल ने गलत प्रचारित किया और राजनीतिक फायदा लेने के लिए देशवासियों को भ्रमित किया। यही बात JNU छात्र संघ का अध्यक्ष कन्हैया कुमार कह रहा है जो उसकी झूठ और मक्कारी को दर्शाता है। अगर यह बात सच होती को आखिर 15 लाख किसे नहीं चाहिए, मुझे भी चाहिए, आपको भी चाहिए और देश के सभी गरीबों को चाहिए। लेकिन एक देशभक्त नागरिक फ्री के 15 लाख नहीं चाहता बल्कि उस पैसे को देश के विकास पर खर्च करना चाहता है।

कन्हैया कुमार समानता की बातें करता है। क्या समानता यही है की सभी लोगों को 15-15 लाख रुपये मिल जाएँ। देश में बहुत सारे अमीर हैं और बहुत सारे गरीब हैं क्या कन्हैया कुमार अमीरों को भी 15 लाख देना चाहता है। यह कैसी समानता हुई भाई। अगर गरीबों को देने की बात करो तो कुछ सही भी हो सकती है लेकिन आप तो सभी देशवासियों को 15-15 लाख देना चाहते हो। समानता यह है की कालाधन आये और योजनायें बनाकर उसे गरीबों पर खर्च किया जाय ताकि गरीबों की हालत में सुधार हो, उनके बच्चें अच्छे स्कूलों में पढ़ाई करें, उनके साथ भेदभाव ना हो और वे भी सबके बराबर में खड़े हो सकें।

प्रधानमंत्री मोदी ने गैस सब्सिडी छोडो योजना के तहत लाखों अमीरों से सब्सिडी छुडवा दी, आज उसी का नतीजा है की जो गैस सिलेंडर पहले 1300 रुपये में मिलता था आज केवल 500-600 रुपये में मिल रहा है। पहले गरीबों के पास राशन कार्ड नहीं होता था और उन्हें 1300 के अलावा भी 2-3 सौ रुपये फ़ालतू देकर 1500 रुपये में गैस सिलेंडर खरीदते पड़ते थे। आज हालत यह है की कोई भी गरीब या सामान्य आदमी केवल 500-600 रुपये में सिलेंडर खरीद सकता है, सब्सिडी के साथ यह सिलेंडर 420 के आसपास मिलता है। आज गरीब यहाँ तक कह देते हैं की कोई बात नहीं हमें बिना सब्सिडी वाला सिलेंडर ही दे दो, 100-150 से क्या फर्क पड़ जाएगा। पहले उन्हें बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर 1500 में मिलते थे और उनकी हालत पतली हो जाती है लेकिन आज उन्हें 500-600 ही सिलेंडर मिल रहे हैं।

इसके अलवा मौजूदा बजट में करीब 5 करोड़ BPL परिवारों को फ्री गैस कनेक्शन देने की बात की गयी है और उसके लिए लम्बे चौड़े बजट की भी घोषणा की गयी है। क्या इससे करीबों का कल्याण नहीं होगा।

इसके अलावा भी अभी तक देश के 18 हजार गाँवों तक बिजली नहीं पहुँच पायी है। जहाँ बिजली पहुँच भी गयी है वहां बिजली आती ही नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2019 तक सभी 18 हजार गाँवों में बिजली पहुँचाने का वादा किया है और काम भी बहुत तेजी के साथ हो रहा है और जिस तेजी से काम हो रहा है, यह काम पूरा भी हो जाएगा और सभी देशवासियों को बिजली मिलने भी लगेगी। क्या इससे देश के गरीबों का भला नहीं होगा। क्या बिजली पहुँचने से पढने लिखने वाले छात्रों को फायदा नहीं मिलेगा। क्या बिजली आने से नौजवान अपने गाँवों में ही कोई रोजगार नहीं शुरू कर सकेंगे। आज जिस भी गाँव में बिजली है वहां दुकाने ही दुकाने खुल जाती हैं और लोग अपने गाँव में ही रोजगार खोलकर पैसे कमाते हैं।

मोदी सरकार को देश में आए केवल डेढ़ साल हुए हैं। देश में किसानों की हालत बहुत ख़राब है, बहुत सारे किसान आत्महत्या भी कर रहे है, बहुत सारे किसानों के खेतों में सिंचाई की सुविधा नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल खराब होने के बाद उन्हें समय से मुआवजा नहीं मिलता और उन्हें आत्महत्या करनी पड़ती है। क्या मोदी सरकार ही किसानो की हालत के लिए जिम्मेदार है जबकि उसे आये केवल डेढ़ साल हुए हैं। क्या कांग्रेस पार्टी किसानों की हालत की जिम्मेदार नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी कृषि सिंचाई योजना के तहत सभी किसानों के लिए सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराना चाहते हैं ताकि किसानों को खेती करना सस्ता हो सके। मनरेगा योजना के तहत सभी गाँवों में सिंचाई के लिए तालाब और कुंवे बनाने की घोषणा हुई है ताकि पानी को बर्बाद होने से बचाया जा सके और पानी को सिंचाई के लिए उपयोग किया जा सके। नयी नहरों को बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है और नदियों को जोड़कर पानी के सही इस्तेमाल की घोषणा हुई है। क्या इससे देश के किसानों का भला नहीं होगा। क्या उनके खेतों में पानी पहुँचने से खेती करना सस्ता नहीं होगा। इसके अलावा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत सभी किसानों को सस्ते बीमे की सुविधा दी जा रही है ताकि फसलों की बर्बादी के बाद उन्हें समय से और जल्दी मुआवजा मिल सके। किसानों के लिए सस्ते लोन की भी घोषणा हुई है।

मोदी भी देश से गरीबी और भुखमरी दूर करना चाहते हैं। इनके लिए उन्होंने योजनायें भी शुरू कर दी हैं लेकिन कन्हैया कुमार ने मोदी सरकार को जनविरोधी बताते हुए उन्हें पांच साल में उखाड़ फेंकने की कसम खायी। जो सरकार गरीबों और किसानों के लिए काम कर रही है कन्हैया कुमार और JNU यूनिवर्सिटी के वामपंथी छात्र उस सरकार को जन विरोधी बताकर उसे उखाड़कर वापस उसी सरकार को लाना चाहते हैं जो वास्तव में जातिवाद, गरीबी, भुखमरी और किसानों की बदहाली के लिए जिम्मेदार है।

कोई भी सरकार अगर बुरा काम कर रही है तो इसके लिए उसका विरोध करना सभी का हक है लेकिन कोई भी काम अगर सही है तो उसकी तारीफ भी करनी चाहिए। कन्हैया कुमार ने मोदी की किसी भी योजना की तारीफ नहीं की उल्टा उन्होंने मोदी सरकार को जनविरोधी बताया। क्या 5 करोड़ गरीब महिलाओं को फ्री गैस कनेक्शन देना जन विरोध है, क्या किसानो को सस्ती फसल बीमा योजना का लाभ देना जन विरोध है, क्या किसानों के खेतों में पानी पहुँचाना जन विरोध है, क्या 1300 रुपये वाले सिलेंडर को 500 रुपये में देना जन विरोध है, क्या अँधेरे गाँवों में बिजली पहुँचाना जन विरोध है, क्या पूरे देश वासियों को 24 घंटे बिजली देना और उसके लिए मिशन के तहत काम करना जन विरोध है, क्या सभी गाँवों में पक्की, अच्छी और मजबूत सड़कों का जाल बिछाना जन विरोध है।

कन्हैया कुमार ने इन योजनाओं के लिए प्रधानमंत्री मोदी की एक बार भी तारीफ नहीं की क्यूंकि उसका अजेंडा गरीबी और भुखमरी नहीं बल्कि इन्हें दूर करने की कोशिश करने वाली मोदी सरकार को उखाड़ फेंकना और वापस उसी पार्टी की सरकार बनाना है जो वास्तव में देश में भुखमरी, गरीबी और जातिवाद के लिए जिम्मेदार है।

कन्हैया कुमार कहता है की उसके पिता गरीब किसान हैं और केवल 300 हजार रुपये में उनका घर चलता है। नीतीश कुमार कहते हैं की कन्हैया कुमार बिहार का बेटा है। कन्हैया कुमार बताएं कि बिहार में उनके परिवार की गरीबी और बदहाली के लिए कौन जिम्मेदार है। वहां तो बीजेपी और मोदी की सरकार भी नहीं है, 15 साल लालू परिवार ने और 10 साल नीतीश कुमार ने राज किया है। आज तक बिहार के गरीबों और किसानों की हालत में सुधार क्यूँ नहीं हुआ। क्यूँ मात्र 3000 रुपये में उनके परिवार को गुजर बसर करना पड़ता है। क्या कन्हैया कुमार लालू यादव या नीतीश कुमार को बिहार की गरीबी और अपने परिवार की बदहाली के लिए जिम्मेदार बताने की हिम्मत करेगा? नहीं करेगा। क्यूंकि उसका अजेंडा मोदी को रोकना है जबकि उसके गरीब किसान पिता की बदहाली के लिए मोदी कतई भी जिम्मेदार नहीं हैं।

कन्हैया कुमार को सन्देश

एक संपादक होने के नाते मै भी ये मानता हूँ देश में गरीबी, भुखमरी और जातिवाद है, इसके अलावा किसानों की हालत भी बहुत खराब है लेकिन इसके लिए केवल मोदी सरकार जिम्मेदार नहीं है, मोदी सरकार को आये हुए केवल डेढ़ साल हुए हैं, इससे पहले अगर कांग्रेस सरकार से इन समस्याओं पर ध्यान दिया होता तो अब तक देश से ये सभी समस्याएँ ख़त्म हो चुकी होतीं। कोई भी काम जादू से नहीं होता बल्कि इसके लिए योजनायें बनाकर उन्हें लागू करना होता है। आप मोदी सरकार का पांच साल भी इन्तजार नहीं कर सकते और बिना उन्हें मौका दिए उन्हें उखाड़ फेंकने की बात करते हो।

आप झूठे, दोगले और मक्कार हो क्यूंकि –

*आपने उस पार्टी को इन सब समस्याओं के लिए जिम्मेदार नहीं बताया जिस पार्टी ने देश पर 60 साल तक शासन किया।
*आप भ्रस्टाचार की बातें करते हो लेकिन उस पार्टी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलते जिसने भ्रस्टाचार को जन्म दिया है
*आप सिस्टम को खराब बताते हो लेकिन उस पार्टी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलते जिसने पूरा सिस्टम खराब कर दिया
*आपमें हिम्मत नहीं है की बिहार में फैले जातिवाद पर एक शब्द भी बोल सको।
*आप में हिम्मत नहीं है की आप जातिवाद पर आधारित आरक्षण ख़त्म करने पर एक शब्द भी बोल सको
*आपमें हिम्मत नहीं है कि आप अपने परिवार की गरीबी और केवल 3 हजार रुपये में गुजर बसर करने के हालात पैदा करने के जिम्मेदार नेताओं यानी नीतीश कुमार और लालू यादव के खिलाफ एक शब्द भी बोल सको
*आप 15 लाख रुपये बैंक अकाउंट में आने की बात को गलत तरीके से प्रचारित करते हो
*आप एक छात्र होकर झूठ और मक्कारी और दोगलेपन पर उतर आये हो
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो किसानों की हालत सुधारने का प्रयास कर रही है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो गरीबी ख़त्म करने का प्रयास कर रही है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो जातिवाद ख़त्म करने का प्रयास कर रही है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो सभी गाँवों में बिजली पहुँचाना चाहती है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो पूरे देश को 24 घंटे बिजली देना चाहती है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो सभी गाँवों तक मजबूत सड़कों का जाल बिछाकर किसानों की फसलों को आसाने से शहरों तक बेचने की सुविधा देना चाहती है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो किसानों को जागरूक करने का काम कर रही है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो किसानों की आमदनी को डबल करने का सपना देख रही है
*आप सैनिकों को सोल्युट करते हो, उन्हें किसान का बेटा और अपना भाई बताते हो और नक्सलियों द्वारा उनकी हत्या पर मिठाई बांटते हो
*आप कहते हो की सैनिकों की शहादत के लिए सरकार जिम्मेदार है क्यूंकि उन्होंने युद्ध के हालात पैदा किये हैं
*आप चाहते हो की हमारे सैनिक बॉर्डर से हट जायं और पाकिस्तान हमारे ऊपर हमला कर दे
*आप चाहते हो कि भारत कश्मीर को आजाद करके युद्ध जैसे हालातों को बदल दे
*क्या गारंटी है कि कश्मीर आजाद होने के बाद युद्ध नहीं होंगे
*क्या गारंटी है की कश्मीर से आतंकवाद ख़त्म हो जाएगा
*आतंकवाद तो पाकिस्तान में भी है जो भारत से आजाद हो चुका है
*अगर कश्मीर पाकिस्तान को देने के बाद उसकी नजर पंजाब पर पड़ गयी और फिर से युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए तो क्या आप कहोगे की पंजाब को भी पाकिस्तान को दे दो और युद्ध के हालत पैदा ही मत होने दो
अगर उसके बाद पाकिस्तान की नजर दिल्ली पर पड़ गई तो आप कहोगे की दिल्ली भी पाकिस्तान को दे दो और युद्ध के हालत पैदा ही मत होने दो
*अगर कश्मीर और पाकिस्तान की तरह देश से हिन्दुओं को मारकर भगाया जाने लगेगा तो आप कहोगे की भाग जाओ और मर जाओ, युद्ध के हालत पैदा ही मत होने दो
*मै आपको यही सुझाव दूंगा की आप कम से कम पांच साल तक इन्तजार तो कर लो, अगर सरकार ने अपने वादों को पूरा नहीं किया तो हम भी आपके साथ विरोध में शामिल हैं लेकिन अभी से झूठी, दोगली और मक्कारी वाली बातें मत करो। देश में नकारात्मकता मत फैलाओं, देश के विकास की गति मत रोको।

आत्मगौरव का प्रतीक भारतीय नव वर्ष



आइये अपने पर गर्व करें, नव विक्रमी संवत की शुभकामनाएं दें

यह नव संवत् ही मेरा नववर्ष ! आपका नववर्ष !! प्रत्येक भारतीय का नववर्ष !!!
साकेन्द्र प्रताप वर्मा
http://www.vicharvimarsh.com
सोचिए 1 जनवरी तो अंग्रेजों का नववर्ष अथवा उनका नववर्ष जो अंग्रेजियत में जी रहे हैं.

जिन्हें न गुलामी का दंश पता है, न स्वतंत्रता की कीमत, जिन्हें गीता और रामायण का ध्यान  नहीं है, जिन्हें न तो हस्तिनापुर याद है, न ही दुष्यंत पुत्र भरत याद है, जिन्हें राम, कृष्ण, शिवाजी, राणाप्रताप, चन्द्रगुप्त, बुद्ध, महावीर याद नहीं तथा जिन्हें गुरू गोविन्द सिंह, शेखर, सुभाष, भगत सिंह और रानी लक्ष्मीबाई की बलिदानी परम्परा याद नहीं. उनको ही भारत याद नहीं-अपना नववर्श याद नहीं. याद है केवल इण्डिया और उसका न्यू ईयर. न्यू ईयर का अर्थ है जश्न, नृत्य, शराब से मनाया जाने वाला रात्रिकालीन हुड़दंग.

आत्मगौरव का प्रतीक भारतीय नव वर्ष
भारतीय नव वर्ष जैसा दुनिया के किसी नव वर्ष का आनन्दोत्सव न तो देखा गया न ही सुना गया, परन्तु अंग्रेजों की गुलामी से पनपी आत्मविस्मृति के कारण हम अनुभव ही नहीं करते कि यह आनन्द का पर्व हमारे नव वर्ष का शुभारम्भ है. विचार करने पर प्रश्न उठता है कि होली से राम नवमी तक भारत में जो आनन्द का उत्सव होता है उसका मर्म क्या है? रंग-गुलाल, हंसी-मजाक, नये वस़्त्रों को पहनकर नव सम्वत् का सुनना, 15 दिनों तक एक दूसरे से गले मिलना, मिठाई खाना और खिलाना भारतीय नव वर्ष के शुभारम्भ से पहले ही होली के पर्व के रूप में शुरू हो जाता है. नव वर्ष के पहले दिन से 9दिनों तक नवरात्रि का विशेष पूजन शक्ति अर्जन के लिए किया जाता है. प्रकृति भी इन 20-25 दिनों में आनन्द मनाती है,पौधों में नई-नई कोपलें और पत्तियां निकलती हैं तथा बसन्त का आनन्द होता है. भारतीय नव वर्ष का लगभग चार सप्ताह  तक चलने वाला पूजनयुक्त आनन्द पर्व हमारी श्रेष्ठता और गौरव का प्रतीक है, फिर भी भारत का दुर्भाग्य है कि अपने नव वर्ष पर गर्व करने में हमें संकोच लगता है. परन्तु एक जनवरी आते ही नाच-गाना, शराब परोसना, जश्न के आधुनिक तरीकों का वीभत्स प्रदर्शन करना तथा शुभकामनाएं भेजने का दौर शुरू हो जाता है.

भारतीय काल गणना का विश्व में कोई मुकाबला नहीं है क्योंकि यह काल गणना ग्रह नक्षत्रों की गति पर आधारित है.  यहां तो प्रत्येक मास की पूर्णिमा को जो नक्षत्र होता है, उसी नक्षत्र के नाम पर महीने का नाम रखा जाता है.  चित्रा नक्षत्र के आधार पर चैत्र, विशाखा नक्षत्र के आधार पर बैसाख, ज्येष्ठा नक्षत्र के आधार पर ज्येष्ठ, उत्तराषाढा नक्षत्र के आधार पर  आषाढ़, श्रवण नक्षत्र के आधार पर श्रावण, उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र के आधार पर भाद्रपद, अश्विनी नक्षत्र के आधार पर अश्विनि,कृतिका नक्षत्र के आधार पर कार्तिक, मृगशिरा नक्षत्र के आधार पर मार्गशीर्ष, पुष्य नक्षत्र के आधार पर पौष, मघा पक्षत्र के आधार पर माघ एवं उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र के आधार पर फाल्गुन मास निर्धारित है.  चन्द्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण की वर्षों पूर्व की काल गणना भारतीय पंचांग में है फिर भी विक्रमी संवत् पर गर्व करने में संकोच होता है.  कुछ वर्ष पूर्व शताब्दी का सबसे बड़ा सूर्यग्रहण हुआ.  भारतीय ज्योतिष के विद्वानों ने बहुत पहले से बताना प्रारम्भ कर दिया कि अमुक दिन, अमुक समय से सूर्यग्रहण होगा,  किन्तु यूरोपीय विद्वानों ने अविश्वास का वातारण बनाना प्रारम्भ कर दिया. नासा ने 120 करोड़ रूपये खर्च करके पता किया कि भारतीय ज्योतिष में जो कहा गया है, वही ठीक है किन्तु आगे की गणनाएं भारतीय ज्योतिष के अनुसार ठीक होंगी या नहीं इस पर अविश्वास की रेखा फिर से खींच दी.

अपनी कालगणना का हम सदैव स्मरण करते हैं, परन्तु इसका हमें ध्यान नहीं रहता है. अपने घर परिवार के समस्त शुभकार्य पंचांग की तिथि से ही देखकर आयोजित करने का स्वभाव हम सभी का है. जब हम किसी नये व्यक्ति से मिलते हैं तो उसे अपना परिचय देते हैं कि हम अमुक देश, प्रदेश या गांव के निवासी हैं तथा अमुक पिता की संतान हैं. इसी प्रकार जब हम किसी शुभ कार्य को सम्पन्न करने के लिए किसी देव शक्ति का आवाहन करते हैं तो संकल्प करते समय उसे भी अपना परिचय बताते हैं. संकल्प के समय पुरोहितगण एक मंत्र बोलते हैं, जिस पर हम ध्यान तो नहीं देते परन्तु उस संकल्प मंत्र में हमारी कालगणना का वर्णन है.  मंत्रोच्चार कुछ इस प्रकार है – ऊॅं अस्य श्री विष्णु राज्ञया प्रवत्र्य मानस व्रहमणो द्वितीय पराद्र्धे, श्वेतवाराह कल्पे, वैवस्वत मनवन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलि प्रथम चरणे, जम्बूद्वीपे भरतखण्डे अमुक नाम, अमुकगोत्र आदि….. पूजनं/आवाहनम् करिष्यामऽहे.

मंत्र में स्पष्ट है कि ब्रम्हा जी की आयु के दो परार्द्धों में से यह द्वितीय परार्द्ध है, इस समय श्वेत बाराह कल्प चल रहा है,  कल्प को ब्रम्हा जी की आयु का एक दिन माना गया है, परन्तु यह कालगणना की इकाई भी है. एक कल्प में 14 मनवन्तर, एक मनवन्तर में 71 चर्तुयुग तथा एक चर्तुयुग में 43 लाख 20 हजार वर्ष होते हैं. जिसका  भाग सतयुग, भाग त्रेता, भाग द्वापर तथा भाग कलियुग होता है.  इस समय वैवस्वत् नामक मनवन्तर का 28वां कलियुग है.  हमें स्मरण होगा कि महाभारत  का युद्ध समाप्त होने के 36 वर्षों बाद भगवान श्रीकृष्ण ने महाप्रयाण किया था. उस समय द्वापर युग समाप्त हुआ था. यह घटना ईस्वीय सन् प्रारम्भ होने से 3102 वर्ष पहले की है. मान्यता है कि श्रीकृष्ण भगवान के दिवंगत होते ही कलियुग प्रारम्भ हो गया था, इसी कारण ईस्वीय सन् में 3102 वर्ष जोड़ने पर कलि संवत् या युगाब्द की गणना होती है.

बृह्मपुराण में यह भी लिखा गया है कि बृह्माजी ने सृष्टि की रचना भी इसी दिन की है –

“चैत्रमासे जगदब्रह्मा ससर्ज पृथमेऽहनि, शुक्ल पक्षे समग्रन्तु तदा सूर्योदये गति”

इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने श्रेष्ठ राज्य की स्थापना की थी. जिनके कारण न्याय के आसन को आज भी विक्रमादित्य का सिंहासन कहा जाता है.  विक्रम संवत् भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही प्रारम्भ होता है. इसी की भारत में सर्वाधिक स्वीकार्यता है . चैत्रशुक्ल प्रतिपदा जिस दिन (वार) को होती है. वही संवत् का राजा होता है तथा जिस वार को सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, वह संवत् का मंत्री होता है. सूर्य की अन्य संक्रान्तियों द्वारा वर्ष की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक स्थितियों का निर्धारण होता है.  भारत में होली के बाद संवत् सुनने की परम्परा को गंगा स्नान  के समान फलदायी माना गया है. इसी कारण यह संवत् भारतीय समाज व्यवस्था में समस्त संस्कारों, पर्वों एवं त्योहारों की रीढ़ है.  विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या अन्य किसी कालगणना में इतनी सूक्ष्म व्याख्या है? सारी श्रेष्ठताओं के बाद भी विक्रमी संवत् भारत का राष्ट्रीय पंचांग नहीं बना यह स्वाभाविक कौतूहल का विषय है. आजादी के बाद पंडित नेहरू के द्वारा बनायी गयी पंचांग सुधार समिति इसके लिये जिम्मेदार मानी जा सकती है, परन्तु आजादी के सात दशक भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं.

अपना देश 1947 में अंग्रेजों की गुलामी से एक सीमा तक मुक्त हुआ.  स्वाधीनता के बाद हमने देश से अंग्रेजियत के सारे प्रतीक मिटाने का संकल्प लिया.  कुछ भवनों और सड़कों के नाम भी बदले गये परन्तु आधुनिक समय में किंगजार्ज मेडिकल कालेज का नाम बदलने पर एक नई बहस शुरू हो गयी. यह सब कुछ इस कारण हुआ कि संविधान की प्रथम पंक्ति में हमने अंग्रेजियत को स्वीकार करके ’’इण्डिया दैट इज भारत’’ का शब्द प्रयोग करके भारतीयता को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया. वैसे तो अंग्रेजों ने बड़ी चतुराई से हमसे यह काम करवा लिया, जिसे हम समझ भी नहीं पाये. इसके पीछे वही भावना काम कर रही थी, जिसका उल्लेख मैकाले ने 12 अक्तूबर 1836 को अपने पिता को लिखे एक पत्र में किया था कि आगामी 100 साल बाद भारत के लोग रूप और रंग में तो भारतीय दिखेंगे, किन्तु वाणी, विचार और व्यवहार  में अंग्रेज हो जायेंगे.  सचमुच ही आज के समाज जीवन में वेशभूषा और भाषा ही नहीं जन्मदिन, पर्व-त्योहार, विवाह संस्कार आदि समारोहों को मनाने के तौर तरीकों में भारतीयता पर अंग्रेजियत हावी हो गयी.  अपने वित्तीय वर्ष के प्रथम दिन 0 1 अप्रैल को हम मूर्ख दिवस मानने लगे,  ईसा के जन्मदिन को बड़ा दिन मानने लगे, वैलेन्टाइन डे और शादी की वर्षगांठ हमारे जीवन में उतर आये, परन्तु श्राद्ध पर्व भूल गया.  इसी का परिणाम है कि अंग्रेजी नववर्ष तो याद रहा, परन्तु अपना नववर्ष भी भूल गये.

गुलामी की मानसिकता से हम कहां तक दबे रहे कि सन् 1996 तक संसद में आम बजट भी अंग्रेजों की घड़ी के अनुसार प्रस्तुत करते थे.  सरकारी कार्यालय बन्द होने के लिये निर्धारित  सायं 5 बजे के समय पर बजट इसलिए प्रस्तुत किया जाता था कि इंग्लैण्ड में उस समय दिन के साढ़े ग्यारह बजे होते थे. ऐतिहासिक शब्दावली में ईसा से पूर्व (बीसी) तथा ईसा के बाद (एडी) जैसे शब्दों का प्रयोग  किया जाने लगा अर्थात् हमारी कालगणना के आधार भी ईसामसीह बन गये.   आजादी के प्रथम दिन से राष्ट्रभक्ति के भाव में कुछ कमी होने के कारण हमने स्वतंत्र भारत का पहला गर्वनर जनरल माउण्टवेटेन को बना दिया. उन्होंने ही हमारी ओर से प्रथम राष्ट्राध्यक्ष के रूप में किंगजार्ज के प्रति वफादारी की शपथ ली, इसी कारण14/15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को असंख्य शहीदों के बलिदानों को धूलधूसरित करके व्रिटिश झण्डा सलामी देकर सम्मान पूर्वक उतारा गया.  अंग्रेजियत में रचे बसे और माउण्टवेटेन के प्रिय पात्र जवाहर लाल नेहरू के हाथ में देश की बागडोर तो आ गयी, किन्तु इण्डियावादी दृष्टि से भारत को मुक्ति नहीं मिल सकी. उसी का परिणाम था कि जब 1952 में प्रो मेघनाद साहा की अध्यक्षता में पंचांग सुधार समिति बनी तो उसने भी भारतीयता को आगे बढ़ने से रोक दिया.  भले ही प्रो साहा ने पंचांग का निर्धारण करते समय कहा था कि वर्ष का आरम्भ किसी खगोलीय घटना से होना चाहिए. उन्होंने ग्रेगेरियन कैलेण्डर के विभिन्न महीनों में दिनों की संख्या में असंगतता पर सवाल भी उठाये थे, किन्तु जब पंचांग सुधार समिति की रिपोर्ट देश के सामने आयी तो पता चला कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उपयुक्त मानकर नितांन्त  अवैज्ञानिक शकसंवत को राष्ट्रीय पंचांग तथा ग्रेगेरियन कैलेण्डर को अन्तर्राराष्ट्रीय कैलेण्डर की मान्यता दे दी गयी.  वस्तुतः यह सब कुछ अंग्रेजो को बड़ा दिखाने  के लिए किया गया, क्योंकि शकसंवत् ग्रेगेरियन कैलेण्डर से 79 वर्ष छोटा है, जबकि विक्रम संवत्  57 वर्ष बड़ा है.  ऐसी स्थिति में यदि विक्रमी संवत् को समिति राष्ट्रीय पंचांग बना देती तो अंग्रेज आकाओं के नाराज होने का खतरा था.

कितना हास्यास्पद है कि शकसंवत् में प्रथम दिन का निर्धारण करने के लिए ही ग्रेगेरियन कैलेण्डर का सहारा लिया गया है, क्योंकि शकसंवत् में वर्ष का आरम्भ ही 22 मार्च से होता है, परन्तु लीप वर्ष में वर्ष का आरम्भ 21 मार्च से ही माना जाता है.  वर्ष में कुल 365 दिन होते हैं, जबकि लीप ईयर में 366 दिन होते हैं .यही व्यवस्था ग्रेगेरियन कैलेण्डर में भी है .  शकसंवत् में चैत्र 30 दिन तथा उसके बाद के 5 महीने 31 दिन और अन्त के 6 महीने 30-30 दिनों के होते हैं, जबकि लीप वर्ष में चैत्र भी31 दिन का ही होता है. लगभग यही स्थित ग्रेगेरियन कैलेण्डर की है. इन दोनों पंचांगों में 365 दिन 6 घण्टे का हिसाब तो है जबकि पृथ्वी अपनी धुरी पर 365 दिन 6 घंण्टे 9 मिनट और 11 सेकेण्ड में सूर्य का एक चक्कर लगाती है यही वास्तविक वर्ष होता है. इन पंचांगों में 9 मिनट 11 सेकेण्ड को कोई हिसाब नहीं है. ग्रेगेरियन कैलेण्डर इससे भी अधिक हास्यास्पद है उसका मुख्य आधार रोमन कैलेण्डर है जो ईसा से 753 साल पहले प्रारम्भ हुआ था. उसमें 10 माह तथा 304 दिन थे उसी के आधार पर सितम्बर सातवां, अक्तूबर 8वां, नवम्बर 9वां तथा दिसम्बर 10वां महीना था. 53 साल बाद वहां के शासक नूमापाम्पीसियस ने जनवरी और फरवरी जोड़कर 12 महीने तथा 355 दिनों का रोमन वर्ष बना दिया.  जिसमें सितम्बर 9वां,अक्तूबर 10वां, नवम्बर 11वां, और दिसम्बर 12वां महीना हो गया.  ईसा के जन्म से 46 साल पहले जूलियस सीजर ने रोमन वर्ष 365 दिनों का कर दिया. 1582 ई0 में पोपग्रेगरी ने आदेश करके 4 अक्तूबर को 14 अक्तूबर कर दिया.  मासों में दिनों का निर्धारण भी मनमाने तरीके से बिना किसी क्रमवद्धता का ध्यान रखते हुए कर दिया गया, किन्तु इन सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन्हीं पंचांगों को हमने स्वतंत्र भारत में गणना का आधार मानकर भारतीय पंचांग की उपेक्षा कर डाली.

जरूरत इस बात की है कि भारत अपने आत्मगौरव को पहचाने तथा अपने नववर्ष को धूमधाम से सामाजिक और राजकीय स्तर पर मनाये जाने का प्रबन्ध हो.  यह सीधे-सीधे राष्ट्र की अस्मिता   से जुड़ा हुआ प्रश्न है.  हमें ध्यान रखना चाहिए कि 2001 में कुछ लोगों ने ईरान में अंग्रेजी नववर्ष मनाने का प्रयास किया था, जिसके कारण उन्हें 50-50 कोड़े मारने की सजा दी गयी थी.  भारत इस प्रकार का देश तो नहीं है कि किसी को कोड़े मारकर ठीक किया जा सके.  परन्तु चेतना का जागरण आवश्यक है. दुनिया के देश अपने-अपने नववर्ष पर गर्व करते हैं फिर हम उधार के नववर्ष पर क्यों गर्व करें इसका विचार करने की जरूरत है.

आइये अपने पर गर्व करें – नवरात्रि के प्रथम दिन नववर्ष की शुभकामनाएं दें.

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)