बुधवार, 16 मार्च 2016

भारत में अनिवार्य हो सैन्य प्रशिक्षण

भारत में अनिवार्य हो सैन्य प्रशिक्षण
(7 Feb)
अजीत शर्मा लेखक,
विहार विधानसभा के सदस्य हैं

 भारतीय सुरक्षा परिवेश पर नजर डाली जाए तो यह तथ्य उभर कर सामने आता है कि न तो हमारी सीमाएं सुरक्षित हैं और न ही सीमा के अंदर का कोई क्षेत्र। आज भारत के समक्ष सुरक्षा चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं। ऐसे में अधिक सजग रहने की आवश्यकता है। यह जरूरत तब तक बनी रहेगी जब तक कि दक्षिण एशिया में भारत के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी पड़ोसी देशों पाकिस्तान व चीन हथियारों की प्रतिस्पर्धा समाप्त नहीं करते, या फिर इन देशों के साथ भारत के आपसी संबंध मधुर नहीं बनते। दूसरी तरफ, देश के अंदर फैला आतंकवाद जन-जन की सुरक्षा के लिए खतरा बना हुआ है। कहने का तात्पर्य यह कि भारत का प्रत्येक नागरिक असुरक्षा की परिधि में आ चुका है और असुरक्षा की यह परिधि तभी समाप्त हो सकती है, जब भारत का हर नवयुवक सुरक्षा के लिए न सिर्फ कुशल तरीके से प्रशिक्षित हों, बल्कि अपनी व अपने देश की सुरक्षा करने में सक्षम हो। फिलहाल, सरकार इसके लिए तैयार होती दिखाई नहीं पड़ रही। विदित हो कि कुछ दिन पहले राज्य सभा सांसद अविनाश राय खन्ना ने निजी विधेयक के जरिए कहा था कि रूस और इजरायल की तर्ज पर भारत के किशोरों व युवाओं को भी अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। साथ ही, स्कूल में 10वीं के स्तर तक के पाठ्यक्रम में भी सैन्य प्रशिक्षण को शामिल किया जाना चाहिए। इस विधेयक के जवाब में रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने कहा कि यह योजना अच्छी है, लेकिन फिलहाल इस पर अमल करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि आर्थिक कारणों से देश के तकरीबन 16 करोड़ किशोरों को अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण देने की योजना को अमल में नहीं लाया जा सकेगा। हां, उन्होंने यह जरूर कहा कि सीमावर्ती इलाकों के किशोरों को सैन्य प्रशिक्षण देने का प्रयोग जरूर किया जा सकता है। वर्तमान में संसार के सभी देश अपनी सजगता का परिचय देते हुए अपनी सजगता का परिचय देते हुए अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निरंतर युद्ध की तैयारियों में प्रयत्नशील हैं और कई देशों ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति के कारण ऐसे महाविनाशक हथियारों का निर्माण कर लिया है, जिनकी मदद से समस्त धरा को क्षण भर में ही ध्वस्त किया जा सकता है। वहीं, दूसरी तरफ भारत समेत विश्व भर में आतंकवाद और अलगाववाद की जड़ें इतनी गहराई तक पहुंच चुकी हैं कि उन्हें उखाड़ फेंकना मुश्किल दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, चीन की बढ़ती सैन्य ताकत एवं बांग्लादेश में बढ़तीं भारत विरोधी गतिवधियां भारतीय सुरक्षा व्यवस्था को अधिक मजबूत बनाने की चेतावनी दे रही है। देश में फैले आतंकवाद एवं अलगाववाद से निपटने तथा भारत की आंतरिक व बाहरी सुरक्षा के लिए जरूरी यह है कि सैन्य अध्ययन एवं प्रशिक्षण को अनिवार्य करते हुए युद्धों तथा उनके परिणामों के बारे में प्रत्येक नागरिक को जानकारी होनी चाहिए। तभी मानवीय मूल्यों की रक्षा हो सकेगी और मानवता के खिलाफ जारी संघर्ष को समाप्त किया जा सकेगा। इसके लिए देश की युवा शक्ति को जागरूक व सक्रिय होने की जरूरत है, परंतु दु:ख इस बात का है कि भारत की नई पीढ़ी का एक हिस्सा दिशाहीन व दिग्भ्रमित है। इसलिए ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में सुरक्षा से जुड़ीं मुख्य बातों, युद्ध के परिणामों की जानकारी तथा विश्व शांति स्थापना में सक्रिय सहयोग देने हेतु युवाओं के लिए सैन्य प्रशिक्षण की अनिवार्यता महसूस की जाने लगी है। इन चुनौतियों एवं स्थितियों के मद्देनजर सरकार को चाहिए कि देश के समस्त महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में सैनिक प्रशिक्षण को अनिवार्य किए जाने की योजना को मूर्त रूप प्रदान करे। युवाओं को कम से कम दो साल का सैनिक प्रशिक्षण अवश्य रूप से दिया जाना चाहिए। यदि इसे संवैधानिक रूप से देखा जाए तो संविधान में उल्लेख है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है कि वह राष्ट्र सेवा व रक्षा के लिए तत्पर रहे। इस मुद्दे पर चिंतन मनन किया जाए तो यह निर्णय भारतीय सुरक्षा परिवेश को काफी मजबूत बनाएगा। वर्तमान समय में विश्व के तकरीबन सात दर्जन देशों में सैन्य अध्ययन एवं प्रशिक्षण अनिवार्य है, जिनमें ईरान, इराक, इजरायल, मिस्त्र, ताइवान, रूस, जर्मनी, सूडान, कोरिया, अंगोला एवं अल्जीरिया आदि प्रमुख हैं। सैनिक प्रतिभा के धनी, महान सैन्य विचारक, दुर्दमनीय योद्धा व महान शासक नैपोलियन ने अनिवार्य सैनिक सेवा योजना लागू करके ही अपनी सैन्य शक्ति को कई गुना ज्यादा बढ़ाकर विभिन्न प्रकार की जीतें हासिल की थीं। यही नहीं, स्वीडन के सम्राट गुस्टावस एडाल्फस ने भी अनिवार्य सैनिक भर्ती योजना लागू करके अनेक सफलताएं अर्जित कीं और सत्रहवीं शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ सैनिक अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध हुए। अब सवाल उठता है कि इस प्रशिक्षण का प्रारूप किस तरह का होना चाहिए। वितद हो कि भारत के अनेक विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में इस समय रक्षा अध्ययन, सुरक्षा अध्ययन, युद्ध अध्ययन, स्त्रातजित अध्ययन, सैन्य अध्ययन एवं सैन्य विज्ञान आदि नामों से एक ही पाठ्यक्रम की पढ़ाई जारी है। इन सभी का पाठ्यक्रम सैन्य संगठनों, शस्त्रास्त्रों के विकास, विशेषताओं व प्रयोग के अध्ययन के साथ-साथ युद्ध कला, युद्ध कौशल एवं प्रशासन से संबंधित जानकारी प्रदान करता है। इसके अलावा, इनके अध्ययन में सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, भौतिक, मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक, औद्योगिक व सांस्कृतिक आदि सभी तत्व आते हैं, और यही तत्व राष्ट्रीय चेतना व जागरूकता के मूल आधार है। इन्हीं तत्वों व मूल आधारों से युवाओं में कर्तव्य निष्ठास, नि:स्वार्थ राष्ट्र सेवा, राष्ट्र के लिए त्याग व सर्वोच्च बलिदान भावना, सामाजिक हित व प्रतिबद्धता अनुशासन, राष्ट्रीय एकता व अखंडता जेसे मूल गुणों का विकास होता है। इनसे ही राष्ट्रीय कूटयोजना व समरतंत्र सशक्त बनता है। अपने विभिन्न प्रकार के पाठ्यक्रमों के तहत इस अध्ययन में नवयुवक व युवतियां इतिहास के आरंभ से अब तक के क्रम में वैदिक, रामायण, महाभारत, मौर्य, राजपूत मुगल, मराठा, सिख, तथा ब्रिटिशकालीन सैन्य व्यवस्था की जानकारी के साथ-साथ स्वतंत्र भारत के रक्षा संगठन एवं शस्त्रास्त्रों की जानकारी हासिल करते हैं। इसके अतिरिक्त, विश्व प्रसिद्ध अन्य सैन्य व्यवस्थाओं व युद्धों के अध्ययन से प्राप्त सैन्य शिक्षाओं व अनुभवों से भिज्ञ होते हैं। यही नहीं, युद्ध की परिभाषा, क्षेत्र विशेषताओं, कमियों, युद्ध के सिद्धांत, कूटयोजना, समरतंत्र आदि के अलावा भारत की रक्षा नीति, परमाणु नीति, विदेश नीति, पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की ििसति, युद्धकालीन वित्त व्यवस्था व लागत, रक्षा बजट, नागरिक-सैनिक संबंध व नागरिक प्रशासन में सैनिक सहयोग आदि की जानकारी हासिल करते हैं। इस विषय का दूसरा हिस्सा, जिसे युवा वर्ग प्रयोगात्मक रूप में पढ़ता है, भी सैन्य प्रशिक्षण ही है। शांति एवं युद्धकाल के लिए एक कमांडर व उसके दल के सैनिक अपनी क्षमता-दक्षता विकसित करने के लिए कुछ खास चीजें भी सीखते हैं। इनमें वे सैनिक सांकेतिक चिह्नों की जानकारी, मानचित्र अध्ययन, दिशाओं का विस्तृत ज्ञान, दिक्मान परिवर्तन, कम्पास व सर्विस प्रोटेक्टर के उपयोग के अलावा अंत:दृष्टि गोचरता, ढालांश, प्रावण्य, प्लाटून संगठन बटालियन सहित व उनके हथियार, फायर प्रयोग, फायर आदेश क्रम, फायर नियंत्रण आदेश, मौखिक आदेश, क्षेत्र कला, गश्ती दल व उसके कार्य, आक्रमण व प्रतिरक्षा की स्थिति में संग्राम कार्यविधि, संदेश भेजने व लिखने के तरीके, प्लाटून व सेक्शन की सामरिक संरचनाओं के साथ-साथ विभिन्न प्रकार की युद्ध व शांतिकालीन जानकारी हासिल करते हैं। इस तरह के अध्ययन के बाद नवयुवक सैन्य गुणों से परिपूर्ण व समस्त सुरक्षा चुनौतियों को समझने में सक्षम हो जाता है। यदि सरकार उपर्युक्त विषय की अध्ययनवस्तु पर गंभीरतापूर्वक विचार करे तो अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण योजना को लागू किया जा सकता है। इसके लागू हो जाने से भारत विश्व के उन देशों की सूची में सम्मिलित हो जाएगी जिनमें युवाओं के लिए सैन्य प्रशिक्षण अनिवार्य है।वैसे, रक्षा की द्वितीय पंक्ति के रूप में युवाओं के लिए नेशनल कैडेट कोर ऐच्छिक कार्यक्रम पहले से ही चल रहा है, लेकिन इसमें छात्र-छात्राएं सीमित संख्या में होते हैं, और यह खचीर्ला होने के साथ ही सीमित पाठ्यक्रम वाला कार्यक्रम है। इसलिए अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण के लिए इसकी अनिवार्यता में सफलता के अवसर कम दिखाई देते हैं। जहां तक राष्ट्रीय सेवा योजना क बात है, तो वह समाज सेवा से जुड़ा कार्यक्रम है। ऐसे में भारत के युवाओं के लिए उचित यही होगा कि सैन्य प्रशिक्षण की अनिवार्यता के लिए कम खर्चे वाले तथा आसानी से लागू हो जाने वाले विषय पर फैसला किया जाए जिससे रक्षा व अन्य चुनौतियों से निपटने वाली युवा पीढ़ी शीघ्र तैयार हो सके। ( सोमनाथ आर्य से बातचीत पर आधारित )