रविवार, 15 मई 2016

संघ बाबासाहब के ही देखे हुए सपने को पूरा करने में लगा है

बाबा साहब के जीवन को, उनके मूल्यों को जीवन में उतारने की आवश्यकता है - दुर्गादास जी
संघ बाबासाहब के ही देखे हुए सपने को पूरा करने में लगा है - डाॅ. अमीलाल भाट

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के  क्षेत्रीय प्रचारक  माननीय  दुर्गादास जी उध्बोधन देते हुए

जोधपुर १४ अप्रैल २०१६। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जोधपुर महानगर द्वारा श्रद्धेय बाबा साहब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर जी का 125वां जयंती समारोह  मेडीकल काॅलेज सभागार में आयोजित हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डाॅ. एस.एन. मेडीकल काॅलेज के प्राचार्य एवं नियंत्रक डाॅ. अमीलाल भाट  ने कहा कि संघ को लेकर समाज में अनेक भ्रांत धारणाएँ फैलायी जाती है जबकि संघ को समझने वाला व्यक्ति जानता है कि संघ बाबासाहब के ही देखे हुए सपने को पूरा करने में लगा है। इस भ्रांत धारणा को समाज से दूर करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हिन्दू धर्म सर्व समावेशी है। इस दर्शन में विश्व के सभी धर्मों और तत्वों का सार निहित है। बाबासाहब भारत रत्न नहीं वरन विश्व के रत्न है।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के  क्षेत्रीय प्रचारक  माननीय  दुर्गादास जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि श्रद्धेय बाबासाहब संपूर्ण समाज के पथ प्रदर्शक थे, किसी वर्ग, दल या जाति तक सीमित नहीं थे। किंतु यह विडम्बना है कि उनका मूल्यांकन सही नहीं हो पाया। वे एक विश्वविभूति थे जिनका जन्म दैवीय योग से विशेष प्रयोजना हेतु हुआ था।

माननीय  दुर्गादास जी ने उध्बोधन देते हुए बताया  कि तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों ने डॉ. आंबेडकर के हृदय पर गहरा आघात किया और समाज में व्याप्त विषमताओं को दूर करने हेतु वे कृतसंकल्प हो उठे। वे समाज में व्याप्त दोषों के, विषमता के विरोधी थे। किसी जाति विशेष या वर्ग विशेष के नहीं। बाबा साहब एक दूर दृष्टा थे जिन्होंने तत्कालीन विदेश नीति और विभाजन के संबंध में खुल कर विचार दिये और धारा 370 को देश के लिए खतरा बताया एवं पूर्ण जनसंख्या विनिमय को विभाजन की समस्या का एक मात्र हल बताया।

बाबा साहब संघ के सम्पर्क में आये और संघ के कार्य और लक्ष्य की मुक्त कंठ से प्रशंसा की, किंतु उनका कहना था कि संघ की कार्यगति थोड़ी धीमी है और मेरे पास इतना समय नहीं है। 1949 में संघ पर लगे प्रतिबंध को हटाने हेतु भी उन्होंने सरकार के समक्ष अपनी बात रखी। बाबा साहब कम्युनिज्म के घोर विरोधी थे और उनका कहना था कि दलित वर्ग और कम्युनिज्म के बीच मैं एक दीवार हूॅ। हिन्दू धर्म छोड़ने की घोषणा के पश्चात् ईसाइ व इस्लाम मतावलम्बियों ने उनसे खूब सम्पर्क किया किंतु उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया एवं हिन्दू धर्म के ही निकट बौद्ध धर्म को स्वीकार किया।

दुर्गादास जी ने जोर देकर कहा कि आज बाबा साहब के जीवन को, उनके मूल्यों को जीवन में उतारने की आवश्यकता है। समरस समाज के बाबा साहब के सपने को पूरा करने के लिए हम अपने-अपने स्तर पर प्रयास कर इसे मूर्त रूप अवश्य देंगे यही उनके जयंती समारोह को मनाने का सच्चा उद्देश्य होगा।

मंच पर प्रांत संघचालक श्री ललित जी शर्मा एवं विभाग संघचालक डाॅ. शान्तिलालजी चौपड़ा भी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अभिनव पुरोहित ने किया

आयकर दाताओं की कुल संख्या सिर्फ 1.25 करोड़


बड़ी आबादी और आयकर दाता
May 4, 2016
http://www.4pm.co.in/archives/16434
हमारी सरकार सालाना करीब 5.6 लाख करोड़ के घाटे में जा रही है। इस वजह से सरकार पर कुल कर्ज करीब 70 लाख करोड़ रुपए हो चुका है। इस कर्ज पर सालाना 4.6 लाख करोड़ रुपये ब्याज चुकाना होता है। इस कठिन वित्तीय स्थिति के बाद देश में जीडीपी में टैक्स का अनुपात सिर्फ 16-17 फीसदी है, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन आदि में करीब 29 फीसदी है।

देश में अमीरों को ढूंढऩा कोई ज्यादा मुश्किल भरा काम नहीं है। बढ़ते होटलों, मॉल्स और ज्वैलर्स की चमचमाती दुकानें देश में प्रगति की गवाही देती हैं। लाखों-करोड़ों रुपये के घर धड़ल्ले से खरीदे और बेचे जा रहे हैं, सडक़ों पर तेज रफ्तार और नई गाडिय़ों की भरमार है। ऐसे में इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि देश में आयकर देनेवालों की संख्या कुल आबादी का सिर्फ एक फीसदी है। हालांकि, इनमें से 5,430 लोग हर साल एक करोड़ रुपये से अधिक आयकर देते हैं। लेकिन आबादी का एक बड़ा हिस्सा आयकर देने में लापरवाही बरत रहा है।
आयकर से जुड़ा आंकड़ा चौंकाने वाला है। यह देश में कर प्रणाली की खामियों की तरफ भी इशारा करता है। यह आर्थिक समृद्धि से जुड़े दोहरेपन को दिखाता है। केंद्र सरकार ने बीते 15 वर्षों के प्रत्यक्ष कर आंकड़ों को जनता के बीच रखा है। आकलन वर्ष 2012-13 में कुल 2.87 करोड़ लोगों ने आयकर रिटर्न दाखिल किया, जिनमें 1.62 करोड़ ने कोई टैक्स नहीं दिया। इस तरह करदाताओं की कुल संख्या सिर्फ 1.25 करोड़ रही। इनमें बड़ी संख्या वेतनभोगी कर्मचारियों की है, जिनकी कंपनियां उनके वेतन से टैक्स का हिस्सा काट सरकारी खजाने में जमा कर देती है। पर, नौकरी से इतर काम करने वाले लोग अपनी आय को छिपाने के लिए कई तरह के हथकंडे इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग कर भले न चुकाते हों, विभिन्न तरीकों से अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने से नहीं हिचकते। दूसरी तरफ इन पर निगरानी रखने वालों की संपत्ति खूब फल रही है। मौजूदा वित्त वर्ष के शुरुआत का बजट पेश होने से ऐन पहले केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने कहा था कि केंद्र सरकार की तमाम करों से कमाई करीब 12 लाख करोड़ रुपए और जबकि खर्च 18 लाख करोड़ है।
इस तरह हमारी सरकार सालाना करीब 5.6 लाख करोड़ के घाटे में जा रही है। इस वजह से सरकार पर कुल कर्ज करीब 70 लाख करोड़ रुपए हो चुका है। इस कर्ज पर सालाना 4.6 लाख करोड़ रुपये ब्याज चुकाना होता है। इस कठिन वित्तीय स्थिति के बाद देश में जीडीपी में टैक्स का अनुपात सिर्फ 16-17 फीसदी है, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन आदि में करीब 29 फीसदी है।
कर चोरी जैसे मामलों से निपटने और सतत विकास के लिए आयकर संग्रह के लिए कड़े नियमों की जरूरत है। इसके लिए अधिक से अधिक लोगों को कर के दायरे में लाना जरूरी है। इतना ही निगरानी तंत्र को भी मजबूत करने जरूरत है। लेकिन, ऐसी कोई व्यवस्था तभी मुमकिन हकीकत हो सकती है जब आयकर विभाग अपने तंत्र को ईमानदारी के साथ सही तौर पर स्थापित करे।