मंगलवार, 12 जुलाई 2016

परमपवित्र भगवा ध्वज और समर्पण -रमेशभाई मेहता

परमपवित्र भगवा ध्वज और समर्पण
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ – भाग ११
-रमेशभाई मेहता


संघ की स्थापना हो गयी। संघकार्य को आगे कैसे बढ़ाना है, इस बारे में डॉक्टरसाहब ( संघ संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक परमपूज्य डॉ0 केशव बलीराम हेडगेवार ) स्वयंसेवकों के अभिप्राय लेते रहते थे। ‘हमें सप्ताह में एक बार नहीं, बल्कि प्रतिदिन मिलना चाहिए’ ऐसा स्वयंसेवकों का ही आग्रह था। ‘यह मुलाकात कहाँ पर और किस प्रकार करनी हैं, यहाँ पर कौन-सा कार्यक्रम करना है’ इस बारे में विचारमंथन शुरू हो गया। शुरू-शुरू में सभी स्वयंसेवक डॉक्टरसाहब के घर में ही आया करते थे। यदि इनमें कुछ लोग पढ़ाई या किसी अन्य काम के सिलसिले में अन्यत्र जाते थे, तो वहाँ पर भी संघ का कार्य शुरू कर देते थे। ‘अप्पाजी जोशी’ ये इस प्रकार से कार्य करनेवाले स्वयंसेवक थे। आप्पाजी जोशी ने १८ फ़रवरी १९२६ के दिन वर्धा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली शाखा शुरू की।

संघ की स्थापना सन १९२५ में नागपुर में हुई और एक साल के बाद संघ की जो पहली शाखा शुरू हो गयी, वह वर्धा में थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि डॉक्टरसाब कितने बड़े संघटक थे। उन्होंने आप्पाजी का अभिनंदन करके स्वयंसेवकों को संदेश दिया, ‘इसी प्रकार हमें संघकार्य को आगे बढ़ाना है।’ संघ की स्थापना से पहले डॉक्टरसाहब का स्वभाव एकदम उग्र था। कलकत्ता की सभा में टिळकजी के विरोध में बोलनेवाले वक्ता को थप्पड़ मारने वाले डॉक्टरसाहब, संघ की स्थापना के बाद एकदम मृदु स्वभाव के बन गये। संपर्क में आने वाले हर किसी को डॉक्टरसाहब आत्मीयता से, प्रेम से अपना बना लेते थे। इसलिए महज़ बुज़ुर्ग ही नहीं, बल्कि बच्चों, किशोरों एवं युवा उम्रवालों के साथ भी डॉक्टरसाहब प्रेम से बोलते थे। डॉक्टरसाहब सर्वप्रिय बन गये थे और संघ के विस्तार के लिए इन बातों का काफ़ी फ़ायदा मिला।

हर संघटना का ध्येय-नीति, तत्त्वज्ञान अभिव्यक्त करनेवाला ध्वज तो होता ही है। संघ की शाखा शुरू हो गयी, परन्तु ध्वज के बारे में कोई निर्णय नहीं हुआ था। डॉक्टरसाहब इस बारे में हर किसी से विचार-विमर्श करने लगे, हर किसी के मन की बात जानने का प्रयास करने लगे। कुछ लोगों ने ‘मठों-मंदिरों पर रहनेवाला लाल रंग का ध्वज ही ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ का ध्वज होना चाहिये’ ऐसा विचार व्यक्त किया। देश के मठ-मंदिरों ने ही प्राचीन काल से हमारा धर्म, हमारी अस्मिता संभालकर रखी है। इसीलिए यह ध्वज संघ के लिये उचित होगा, ऐसा उनका मानना था। शिवाजीमहाराज के स्वराज्य में लहराया जानेवाला ‘जरीपटका’ (जिसकी क़िनार पर ज़र है ऐसा भगवा ध्वज) यह संघ का ध्वज हो सकता है, ऐसा कुछ लोगों का कहना था। वहीं, महाराणा प्रताप को प्रिय रहनेवाले भगवे ध्वज का संघ स्वीकार करें, ऐसी कुछ लोगों की राय थी।

सभी के विचारों को ध्यानपूर्वक सुनने के बाद डॉक्टरसाहब ने इस विषय में अपना मत व्यक्त किया। भगवे ध्वज में सूर्य का तेज समाया हुआ है। यह भगवा रंग त्याग, शौर्य, आध्यात्मिकता का प्रतीक है। भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा सारथ्य किये गये अर्जुन के रथ पर भगवा ध्वज ही विराजमान था। इन सब बातों पर ग़ौर करके हम इस परमपवित्र भगवे ध्वज का ही स्वीकार करेंगें, ऐसा डॉक्टरसाहब ने सूचित किया। उनके इन विचारों का सभी लोगों ने एकमत से स्वीकार कर लिया।

संघकार्य का अधिक जोश के साथ विस्तार करने के लिए डॉक्टरसाहब ने ‘प्रचारक’ व्यवस्था शुरू की। ‘संघ के लिए अर्थात राष्ट्र के लिए जीवन समर्पित करो, उसके लिए घरगृहस्थी का त्याग करो’ ऐसा आवाहन डॉक्टरसाहब ने युवावर्ग से किया। संघ का प्रचारक बनने के लिए यह प्रमुख शर्त थी। डॉक्टरसाहब के आवाहन के बाद कई युवक ‘प्रचारक’ बनने के लिए आगे आये। ‘संघ के कार्य के लिए डॉक्टरसाहब जहाँ कहाँ भेजेंगे, वहाँ जाना है और वे जो आदेश देंगें, उसका पालन करना है’ यही इन युवकों का दृढ़निश्च य था। इसी दौरान, डॉक्टरसाहब ने देश के कुछ युवकों को साथ लेकर विभिन्न प्रांतों में प्रवास किया। यह प्रवास यानी स्वयंसेवकों के लिए मार्गदर्शन ही था। डॉक्टरसाहब ने देश की परिस्थिति उन्हें दिखायी और हिन्दू समाज को संघटित करने की आवश्यकता प्रत्यक्ष उदाहरण देकर समझा दी।

जब संघ का कार्य बढ़ रहा था, तब कई समस्याएँ भी सामने आ रही थीं। संघकार्य के लिये आवश्यक रहनेवाला चंदा कैसे इकट्ठा किया जाये, यह एक प्रश्नन ही था। इसके लिए डॉक्टरसाहब ने स्वयंसेवकों को मार्गदर्शन किया – ‘हर वर्ष गुरुपूर्णिमा के अवसर पर हम अपने गुरु को वंदन करेंगें और समर्पण के प्रतीक के तौर पर यथाशक्ति निधि अर्पण करेंगें। इस प्रकार प्राप्त होनेवाली निधि से संघ के कार्य को आगे बढ़ाया जा सकता है। हमें समाज से कुछ भी नहीं लेना है, बल्कि समाज को ही देना है, यह हमेशा ध्यान में रखो।’ डॉक्टरसाहब के ये विचार सभी स्वयंसेवकों को मन:पूर्वक मान्य हो गये। इसी के अनुसार सन १९२८ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ‘गुरुपूजन’ और ‘गुरुदक्षिणा’ उत्सव शुरू हो गया। संघ के द्वारा मनाये जाने वाले छ: प्रमुख उत्सवों में यह एक महत्त्वपूर्ण उत्सव है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टरसाहब केशव बळिराम हेडगेवार को स्वयंसेवक गुरु के समान ही मानते थे। हमें डॉक्टरसाहब का पूजन करना चाहिये, ऐसा स्वयंसेवकों को लगा होगा और डॉक्टरसाहब इसके लिये सर्वथा योग्य हैं, ऐसी उनकी धारणा रही होगी। इस उत्सव के एक दिन पहले डॉक्टरसाहब ने स्वयंसेवकों से कहा कि ‘हम कल गुरुपूजन करनेवाले हैं’। दूसरे दिन शाखा में सभी स्वयंसेवक जमा हो गये। ‘सरसंघचालक की हैसियत से मैं सर्वप्रथम गुरुपूजन करूँगा, मेरी तरह तुम्हें भी गुरुपूजन करना है’ ऐसा डॉक्टरसाहब ने घोषित किया। ‘हम गुरुस्थान पर रहनेवाले डॉक्टरसाहब की पूजा करेंगें, लेकिन डॉक्टरसाहब किसकी पूजा करेंगें? उनके गुरु कौन हैं?’ ऐसे सवाल स्वयंसेवकों के मन में उठ रहे थे।

सभी स्वयंसेवक उत्सुकतापूर्वक देख ही रहे थे कि तभी डॉक्टरसाहब शांति से अपने स्थान से उठे। परमपवित्र भगवे ध्वज के सामने आए और प्रणाम करके उन्होंने इस ध्वज का पूजन किया। उसके बाद दाहिने हाथ से सम्मानपूर्वक लिफ़ाफ़ा निकालकर इस भगवे ध्वज के सामने रख दिया। यह पहली गुरुदक्षिणा थी। उसके बाद डॉक्टरसाहब ने पुन: भगवे ध्वज को आदरपूर्वक प्रणाम किया और वे अपने स्थान पर आकर बै़ठ गये। ‘मेरी तरह ही तुम भी अपने गुरु की पूजा करो। यह परमपवित्र भगवा ध्वज ही हम सभी स्वयंसेवकों का गुरु है।’ ऐसा डॉक्टरसाहब ने कहा। यह सुनकर अचंभित हुए स्वयंसेवकों ने बहुत ही उत्साह के साथ डॉक्टरसाहब का अनुकरण करते हुए भगवे ध्वज का पूजन किया और यथाशक्ति गुरुदक्षिणा अर्पण की।

इसके बाद संपन्न हुए बौद्धिक में डॉक्टरसाहब ने संघ की भूमिका प्रस्तुत की। ‘संघकार्य को बढ़ाने के लिए हमें साल में एक बार गुरुदक्षिणा देनी है और इसमें से ही संघकार्य के लिए आवश्यक खर्च करना है। यह गुरुदक्षिणा कितनी होनी चाहिए यह तो हर एक को व्यक्तिगत रूप से तय करना है। परन्तु अपनी क्षमता के अनुसार गुरुदक्षिणा देते समय; हम यदि अपनी आय का उतना हिस्सा गुरुदक्षिणा के रूप में देते हैं, जिससे कि अपनी गृहस्थी चलाने मे थोड़ी तकलीफ़ महसूस हों, तो उसे त्याग के अधिष़्ठान का लाभ होगा’ ऐसा डॉक्टरसाहब का कहना था। आज नहीं तो कल, हमारा कार्य यक़ीनन बढ़ने ही वाला है। ऐसी परिस्थिति में, स्वयंसेवकों को अपनी विवेकबुद्धि का उपयोग करके संघ के लिए तन, मन, धन समर्पित करना चाहिये, ऐसा डॉक्टरसाहब का संदेश था।

‘यह परमपवित्र भगवा ध्वज ही हमारा गुरु है। किसी भी व्यक्ति को इस स्थान पर बिठाने की अपेक्षा, अनादि काल से धर्म, संस्कृति, परंपरा, त्याग एवं संन्यस्तवृत्ति का प्रतिबिंब रहनेवाले भगवे ध्वज को ही हम हमारे गुरु के रूप में स्वीकार करेंगे। यह भगवा ध्वज ही हमें सर्वोच्च प्रेरणा देगा।’ ऐसा डॉक्टरसाहब ने कहा। व्यक्ति तो आते हैं और जाते हैं, परन्तु यह ध्वज अखंडित रूप से भारतवर्ष का प्रेरणास्रोत बनकर रहा है। भविष्य में भी यह ध्वज भारतवर्ष को प्रेरणा देता रहेगा, ऐसा डॉक्टरसाहब को विश्वाोस था।

इस एक बात से डॉक्टरसाहब का गगनस्पर्शी व्यक्तित्त्व हमारे सामने पूरी तरह अभिव्यक्त होता है। डॉक्टरसाहब ने संघ की स्थापना की और उन्हें गुरुस्थान पर मानकर, उनके आदेशानुसार स्वयंसेवक, उनके द्वारा बताया गया कोई भी कार्य करने के लिए तैयार थे। ऐसा होने के बावजूद भी डॉक्टरसाहब ने, ‘यह परमपवित्र भगवा ध्वज ही स्वयंसेवकों का गुरु होगा’ ऐसा घोषित किया। अर्थात इस देश की अनादि काल से चली आ रही धार्मिक, सांस्कृतिक परंपरा को डॉक्टरसाहब ने अपनी नज़र के सामने रखा था। गुरुस्थान पर भगवे ध्वज को चुनकर डॉक्टरसाहब ने एक साथ कई उद्देश्यों को प्राप्त कर लिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक के ध्येय-नीतियाँ, तत्त्वज्ञान, राष्ट्रीयता इत्यादि सारी बातें भगवे ध्वज से व्यक्त होती हैं।

‘प्रचारक व्यवस्था’ के अनुसार डॉक्टरसाहब ने कुछ स्वयंसेवकों को देश के विभिन्न भागों में भेजना शुरू किया। प्रचारक के रूप में भेजते समय डॉक्टरसाहब ने स्वयंसेवकों को एक महत्त्वपूर्ण सूचना की- ‘तुम्हारी मातृभाषा चाहे जो भी हो, लेकिन इस देश में बोली जानेवाली हर एक भाषा हमारी मातृभाषा ही होती है। अत: तुम जिस प्रांत में जा रहे हो, वहाँ की भाषा को ही मातृभाषा के रूप में स्वीकार कर लो। वहाँ की जीवनशैली आत्मसात कर लो।’

डॉक्टरसाहब के द्वारा की गयी इस सूचना का सभी स्वयंसेवकों ने हूबहू पालन किया। कोकण में जन्मे और पले-बढ़े माधवराव मुळे को डॉक्टरसाहब ने ‘प्रचारक’ के रूप में लाहोर भेजा। पंजाब के राजपाल पुरी को सिंध प्रांत में भेजा। नागपूर के बाळासाहब देवरस को बंगाल में और उनके भाई भाऊराव देवरस को लखनऊ भेजा। महाराष्ट्र के यादवराव जोशी को डॉक्टरसाहब ने दक्षिण की ज़िम्मेदारी सौंपी।

इस तरह अनेक प्रचारक विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने लगे। इनमें एकनाथजी रानडे, दत्तोपंत ठेंगडी, भास्करराव कळंबी, लक्ष्मणराव भिडे, लक्ष्मणराव इनामदार, मोरोपंत पिंगळे, वसंतराव ओक इन जैसे अनेक प्रचारक महाराष्ट्र से थे। परन्तु आगे चलकर देश के विभिन्न प्रांतो से प्रचारक आने लगे। संघ के लिए यानी देश के लिए संपूर्ण जीवन समर्पित करनेवाले इन लोगों का स्मरण होते ही आज भी मेरी आँखों में आँसू भर आते हैं। इन सबके प्रत्यक्ष मार्गदर्शन और स्नेह को मैं, मेरे जीवन में मुझे प्राप्त हुई अत्यंत अनमोल चीज़ मानता हूँ।

संघ का यह काम शुरू हुआ ही था कि तभी एक दिन डॉक्टरसाहब को नागपुर में ‘माधव’ मिले – ‘अरे, माधव! तुम कब आये? मैं कबसे तुम्हारी राह देख रहा हूँ।’

‘मैं आज ही आया हूँ। माँ की तबियत ठीक नहीं है। इसलिए उससे मिलने आया हूँ’ – माधव ने कहा।

’अब कुछ समय तक यहीं पर हो ना! तुमसे बहुत सारी बातें करनी हैं। आज शाम को शाखा में आ जाओ, शाखा का कामकाज़ ख़त्म हो जाने के बाद हम मेरे घर पर बैठेंगें।’

माधव ने डॉक्टरसाहब का कहना मान लिया। यह संघ के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना साबित हुई। क्योंकि यहीं से संघ के विस्तार एवं विकास का दूसरा पर्व आरंभ होनेवाला था।
(क्रमश:……………….)