सोमवार, 5 सितंबर 2016

कौन दे रहा आतंकवाद को हथियार - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

मोदी ने सख्ती से उठाया आतंकवाद का मुद्दा, 

बोले-कौन दे रहा इन्हें हथियार?Posted on: September 04, 2016 

Updated on: September 05, 2016 



http://khabar.ibnlive.com/news

हांगझोउ। भारत ने आज ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) के अन्य सदस्यों से आतंकवाद पर अंकुश के लिए सामूहिक प्रयासों को तेज करने का आह्वान किया। पाकिस्तान की ओर इशारा करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘आतंकवाद के समर्थकों और प्रायोजकों’ को अलग-थलग करने के लिए समूह द्वारा समन्वित कार्रवाई पर जोर दिया।

ब्रिक्स नेताओं की बैठक के दौरान चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए मोदी ने सख्त शब्दों में कहा कि दक्षिण एशिया या किसी अन्य क्षेत्र में आतंकवादियों के पास न तो बैंक है और न ही हथियारों का कारखाना है। इससे साफ पता चलता है कि कोई न कोई उनको पैसा और हथियार दे रहा है। मोदी ने कहा कि ब्रिक्स को आतंकवाद से लड़ने के लिए संयुक्त प्रयासों के लिए समन्वित कार्रवाई भी करनी चाहिए जिससे आतंकवाद के समर्थकों और प्रायोजकों को अलग-थलग किया जा सके।

हालांकि, उन्होंने चीन के नजदीकी सहयोगी पाकिस्तान का नाम नहीं लिया। प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय संवाद में ब्रिक्स को एक प्रभावशाली आवाज करार दिया है। उन्होंने आज कहा कि यह ब्रिक्स समूह की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वह वैश्विक एजेंडा को आकार दे, जिससे विकासशील राष्ट्रों को अपने उद्देश्यों को हासिल करने में मदद मिल सके।

उन्होंने कहा कि आतंकवाद अस्थिरता का प्रमुख स्रोत है और यह हमारे समाज और देशों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। उन्होंने कहा कि कट्टरपंथी विचारधारा का प्रचार इस खतरे का बढ़ता आयाम है।
मोदी ने ब्रिक्स नेताओं को संबोधित करते हुए कहा कि ब्रिक्स के रूप में हम अंतरराष्ट्रीय बातचीत या संवाद में एक प्रभावशाली आवाज हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय एजेंडा को आकार देना हमारी साझा जिम्मेदारी है।

पूर्वी चीन के शहर में जी-20 शिखर सम्मेलन से इतर उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय एजेंडा को हमें साझा रूप से इस प्रकार से आकार देना चाहिए जिससे विकासशील राष्ट्रों को अपने उद्देश्यों को हासिल करने में मदद मिल सके।

ब्रिक्स में पांच प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। दुनिया की आबादी का 43 प्रतिशत इन देशों में रहता है। वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में इन देशों का हिस्सा 37 प्रतिशत का है। वैश्विक कारोबार में ब्रिक्स की हिस्सेदारी 17 प्रतिशत की है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमें दायित्वपूर्ण, समावेशी और सामूहिक समाधान का निर्माण करने का विषय चुना है। जी-20 शिखर सम्मेलन में यह केंद्रीय प्राथमिकताओं में होंगे। इस बैठक में जिन चार अन्य नेताओं ने भाग लिया उनमें ब्राजील के राष्ट्रपति माइकल तेमेर, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और दक्षिणी अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा शामिल हैं।
मोदी ने अपने संक्षिप्त संबोधन में कहा कि अगले महीने हमारा शिखर सम्मेलन आपसी संबंधों को गहराई देने का अवसर ही नहीं होगा बल्कि हम भारत के बिम्सटेक के पड़ोसी देशों नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमा और थाइलैंड से भी बातचीत करेंगे, जिन्हें आउटरीच सम्मेलन में आमंत्रित किया गया है। हम अगले महीने गोवा में आप सभी का स्वागत करते हैं।

साल 2006 में जी-आठ के सम्पर्क-विस्तार सम्मेलन के मौके पर अलग से रूस, भारत और चीन के नेताओं के बीच सेंट पीट्सबर्ग में बैठक के बाद ब्रिक की शुरआत हुई थी। न्यूयार्क में 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के मौके पर अलग से ब्रिक के विदेश मंत्रियों की औपचारिक बैठक के दौरान इस समूह को अंतिम रूप दिया गया।

पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन 16 जून, 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में हुआ। ब्रिक में सितंबर, 2010 को ब्रिक विदेश मंत्रियों की न्यूयार्क में हुई बैठक में दक्षिण अफ्रीका को शामिल किया गया। इससे यह समूह ब्रिक्स हो गया।

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के प्रेरणात्मक विचार


डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के प्रेरणात्मक विचार
बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन महान दार्शनिक, तत्ववेत्ता, धर्मशास्त्री , शिक्षाशास्त्री, एवं कुशल राजनीतिज्ञ थे । इन्होंने भारत के राष्ट्रपति जैसे पद को सुसोभित किया । इनका जन्म : 5 सितंबर, 1888  एवं अवसान : 17 अप्रैल, 1975 को हुआ ।

डॉ राधाकृष्णन का भारतीय संस्कृति के प्रति आगाध निष्ठा थी । वो भारत को शिक्षा के क्षेत्र में क्षितिज पर ले जाने को निरंतर प्रयासरत रहे । अपने जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में समर्पित करने वाले डॉ राधाकृष्णन के ह्रदय में शिक्षकों के प्रति अगाध श्रद्धा भाव था । प्रतिवर्ष 5 सितम्बर को शिक्षकों के सम्मान के रूप में शिक्षक दिवस सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है ।

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के प्रेरणात्मक विचार  INSPIRATIONAL THOUGHTS OF DR. S. RADHAKRISHNAN



Quote 1. आध्यात्मिक जीवन भारत की प्रतिभा है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 2. ज्ञान हमें शक्ति देता है, और प्रेम परिपूर्णता ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 3. धर्म के बिना इंसान बिना लगाम के घोड़े की तरह है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 4. किताब पढ़ना हमें चिंतन और सच्चे आनंद की आदत देता है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 5. धन, शक्ति और दक्षता केवल जीवन के साधन हैं खुद जीवन नहीं ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 6. मृत्यु कभी भी एक अंत या बाधा नहीं है बल्कि एक नए कदम की शुरुआत है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 7. पवित्र आत्मा वाले लोग इतिहास के बाहर खड़े हो कर भी इतिहास रच देते हैं ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 8. हर्ष और आनंद से परिपूर्ण जीवन केवल ज्ञान और विज्ञान के आधार पर  ही संभव है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 9. जीवन को एक बुराई के रूप में देखना और दुनिया को एक भ्रम मानना तुच्छ सोच है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 10. किताबें वह माध्यम है जिनके द्वारा हम दो संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 11. मानव की प्रकृति स्वभाविक रूप से अच्छी है और ज्ञान के फ़ैलाने से सभी बुराइयों का अंत हो जायेगा ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 12. शांति राजनीतिक या आर्थिक बदलाव से नहीं आ सकते बल्कि मानवीय स्वभाव में बदलाव से आ सकती है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 13. हमें मानवता की उन नैतिक जड़ों को जरुर याद करना चाहिए जिनसे अच्छी व्यवस्था और स्वतंत्रता दोनों बनी रहे ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 14. ऐसा बोला जाता है कि एक साहित्यिक प्रतिभा, सबको समान दिखती है पर उसके समान कोई नहीं दिखता है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 15. आयु या युवा समय का मापदंड नहीं है । हम जितना खुद को महसूस करते हैं हम उतने ही युवा या उतने ही बुजुर्ग हैं ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 16. लोकतंत्र कुछ विशेषाधिकार रखने वाले व्यक्तियों का ही नहीं बल्कि हर व्यक्ति की आध्यात्मिक संभावनाओं में एक विश्वास है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 17. मानव का दानव बनना उसकी हार है । मानव का महामानव बनना उसका चमत्कार है । मनुष्य का मानव बनना उसकी जीत है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 18. राष्ट्र, व्यक्तियों की तरह है, उनका निर्माण केवल इससे नहीं होता है कि उन्होंने क्या हासिल किया बल्कि इससे होता है कि उन्होंने क्या त्याग किया है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 19. हमारे सारे विश्व संगठन गलत साबित हो जायेंगे यदि वे इस सत्य से प्रेरित नहीं होंगे कि प्यार ईर्ष्या से ज्यादा मजबूत है ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Quote 20. मेरा जन्मदिन मनाने की बजाय अगर 5 सितम्बर शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जायेगा तो मैं अपने आप को गौरवान्वित अनुभव करूँगा ।

– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन


डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन – जीवनी


बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन महान दार्शनिक, तत्ववेत्ता, धर्मशास्त्री , शिक्षाशास्त्री, एवं कुशल राजनीतिज्ञ थे । इन्होंने भारत के राष्ट्रपति जैसे पद को सुसोभित किया । 1954 में इन्हें भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया।

डॉ राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को तमिलनाडु के तिरुतनी नामक गाँव में एक सामान्य ब्रह्मण परिवार में हुआ था इनके पिता का नाम ‘सर्वपल्ली वीरास्वामी’ और माता का नाम ‘सीताम्मा’ था। इन्हें बचपन से ही अध्ययन में काफी रूचि थी । इनकी प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा इसाई मशीनरी से हुई । 12 वर्ष के अवस्था में ही इन्होंने बाइबिल के सभी महत्वपूर्ण अंश याद कर लिए । इसी अवस्था में इन्होंने स्वामी विवेकानंद और वीर सावरकर जी का भी अध्ययन किया ।

प्राथमिक से उच्चतर शिक्षा प्राप्त करने के क्रम में इन्हें कई बार छात्रवृति भी मिली । मद्रास क्रिश्चयन कॉलेज से दर्शन शास्त्र में एम.ए. किये और मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में इसी विषय के सहायक प्राध्यापक का पद सम्भाले । 1931 से 1936 तक आंध्रप्रदेश विश्वविद्यालय में  । 1939 से 1948 तक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में । एवं 1953 से 1952 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में कुलपति के पद पर प्रतिष्टित हुए ।

डॉ राधाकृष्णन किसी भी विषय पर रोचक ढंग से व्याख्यान दिया करते थे छोटी- छोटी कहानियों के माध्यम से उदाहरण प्रस्तुत कर विषय को सरल बना देते थे । अपने इस गुण के कारण वो दर्शनशास्त्र जैसे जटिल विषय को वर्ग में  सरल बना देते थे । डॉ राधाकृष्णन महात्मा गाँधी और रविन्द्रनाथ टैगोर के विचारों से बहूत प्रभवित थे । उनके विचारों को आगे बढ़ाने हेतु उन्होंने 1918 में ‘रवीन्द्रनाथ टैगोर का दर्शन’ शीर्षक से एक पुस्तक प्रकाशित की ।

डॉ राधाकृष्णन चुकी इसाई मसिनरी से शिक्षा प्राप्त किये थे जिसका मूल उद्देश्य था छात्रों में पाश्चात्य सभ्यताओं का समावेश कर हिन्दू धर्म के प्रति हेय भावना का विकास । परन्तु उन्होंने हिन्दू धर्म का गहन अधयन किया । ये जानना चाहते थे कि वस्तुतः किस संस्कृति के विचारों में चेतनता है और किस संस्कृति के विचारों में जड़ता है ? अध्ययन क्रम में उन्होंने जाना भारत के दूरस्थ स्थानों पर रहने वाले ग़रीब तथा अनपढ़ व्यक्ति भी प्राचीन सत्य को जानते थे । इस कारण इहोनेन तुलनात्मक रूप से यह जान लिया कि भारतीय आध्यात्म काफ़ी समृद्ध है और क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा हिन्दुत्व की आलोचनाएँ निराधार हैं। इससे इन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि “भारतीय संस्कृति धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है जो महुष्य को जीवन का सच्चा सन्देश देती है ।” इनकी पुस्तक ‘द रीन आफ रिलीजन इन कंटेंपॅररी फिलॉस्फी’ से इन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली ।

डॉ राधाकृष्णन के ओजस्वी प्रतिभा से अविभूत होकर इन्हें सम्विधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया । 1952 में इन्हें सोवियत संघ का विशिष्ट राजदूत बनाया गया । और इसी वर्ष उपराष्ट्रपति के पद पर प्रतिष्टित हुए । 1954 में उन्हें भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मान भारतरत्न से सम्मानित किया गया । 1962 में डॉ राजेन्द्र प्रसाद का कार्यकाल समाप्त होने के बाद इन्होंने राष्ट्रपति का पद संभाला । 13 मई, 1962 को 31 तोपों की सलामी के साथ ही डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की राष्ट्रपति के पद पर प्रतिष्टित हुए ।

“यह विश्व के दर्शन शास्त्र का सम्मान है कि महान भारतीय गणराज्य ने डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को राष्ट्रपति के रूप में चुना और एक दार्शनिक होने के नाते मैं विशेषत: खुश हूँ । प्लेटो ने कहा था कि दार्शनिकों को राजा होना चाहिए और महान भारतीय गणराज्य ने एक दार्शनिक को राष्ट्रपति बनाकर प्लेटो को सच्ची श्रृद्धांजलि अर्पित की है।”  – प्रसिद्ध दार्शनिक बर्टेड रसेल

सन्‌ 1962 में जब वे राष्ट्रपति बने थे, तब कुछ शिष्य और प्रशंसक उनके पास गये और उन्होँने उनसे निवेदन किया कि वे उनके जन्म दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाना चाहते हैं । उन्होंने कहा- “मेरे जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने से निश्चय ही मैं अपने को गौरवान्वित अनुभव करूँगा।” तबसे आज तक 5 सितम्बर सारे देश में उनका जन्म दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है ।

डॉ राधाकृष्णन का भारतीय संस्कृति के प्रति आगाध निष्ठा थी । वो भारत को शिक्षा के क्षेत्र में क्षितिज पर ले जाने को निरंतर प्रयासरत रहे । अपने जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में समर्पित करने वाले डॉ राधाकृष्णन के ह्रदय में शिक्षकों के प्रति अगाध श्रद्धा भाव था । प्रतिवर्ष 5 सितम्बर को शिक्षकों के सम्मान के रूप में शिक्षक दिवस सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है ।

शिक्षा का उद्देश्य बताते हुए श्री राधाकृष्णन ने कहा कि “मात्र जानकारियाँ देना शिक्षा नहीं है । यद्यपि जानकारी का अपना महत्व है और आधुनिक युग में तकनीक की जानकारी महत्वपूर्ण भी है तथापि व्यक्ति के बौद्धिक झुकाव और उसकी लोकतान्त्रिक भावना का भी बड़ा महत्व है । ये बातें व्यक्ति को एक उत्तरदायी नागरिक बनाती हैं। शिक्षा का लक्ष्य है ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना और निरन्तर सीखते रहने की प्रवृत्ति । यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति को ज्ञान और कौशल दोनों प्रदान करती है तथा इनका जीवन में उपयोग करने का मार्ग प्रशस्त करती है । करुणा, प्रेम और श्रेष्ठ परम्पराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं ।”

अपने जीवन काल एवं मरनोपरांत डॉ राधाकृष्णन को सम्मानों से नवाजा गया । महान दार्शनिक, तत्ववेत्ता, धर्मशास्त्री , शिक्षाशास्त्री, एवं कुशल राजनीतिज्ञ डॉ राधाकृष्णन 17 अप्रैल, 1975 को प्रातःकाल पंचतत्व में विलीन हो गए । ऐसे महान दार्शनिक जिन्होंने अपने प्रतिभा से विश्व में अपना स्थान बनाये । उन्हें कोटि-कोटि नमन् ।

जय हिन्द !

वेदांत ही एकमात्र धर्म है : सर्वपल्ली राधाकृष्णन



शिक्षक दिवस-
वेदांत कोई एक धर्म नहीं, बल्कि वेदांत ही एकमात्र धर्म है : सर्वपल्ली राधाकृष्णन
By Anand Kumar - September 5, 2016

राधाकृष्णन ने अपनी एम.ए. डिग्री के लिए जो थीसिस लिखी थी उसका विषय था “वेदांत में आचार और अध्यात्म की पूर्वमान्यताएं”. उनका इरादा अपने लेख के जरिये ऐसे लोगों को जवाब देने का था जो कहते थे वेदांत में आचारसंहिताओं जैसी कोई चीज़ नहीं थी. ये थीसिस जब छपी तो वो केवल 20 साल के थे.

अपनी इस थीसिस के बारे में खुद राधाकृष्णन कहते थे कि “इसाई आलोचकों ने मुझे हिंदुत्व के अध्ययन के लिए मजबूर कर दिया. मिशनरी संस्थानों में हिंदुत्व की जो व्याख्या होती थी, उस से, स्वामी विवेकानंद से प्रभावित मेरा मन बहुत खिन्न होता था. एक हिन्दू के तौर पर मुझे शर्मिंदगी होती थी.”

यही वजह रही कि उन्होंने जीवन भर भारतीय दर्शन और धर्म का अध्ययन किया. हिंदुत्व की ओर से “एकीकृत पश्चिमी आलोचकों” को करारा जवाब देने का काम उन्होंने जीवन भर किया.

राधाकृष्णन की दर्शनशास्त्र की पढ़ाई कोई शौकिया नहीं थी. वो एक साधनहीन छात्र थे और उनके रिश्तेदारों में से एक ने पास होने के बाद अपनी दर्शनशास्त्र की किताबें उन्हें दान कर दीं. कोई और किताबें खरीदने में असमर्थ राधाकृष्णन के लिए विषय का चुनाव भी अपने आप ही हो गया था. उनका कांग्रेस पार्टी में भी कोई इतिहास नहीं था. वो सिर्फ हिंदुत्व के लिए लड़ते रहे थे.

उन्होंने 1946-52 के दौरान UNESCO में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. 1949-52 के बीच वो सोवियत यूनियन में भारत के राजदूत थे. राधाकृष्णन संविधान सभा के भी सदस्य रहे और 1952 में उन्हें भारत का पहला उप-राष्ट्रपति चुना गया. सन 1962-67 के बीच वो भारत के दूसरे राष्ट्रपति चुने गए थे.

राधाकृष्णन अनुभव(धार्मिक अनुभूति) पर जोर देने वाले विद्वानों में से थे. उनका मानना था कि चैतन्य सोच से अनुभूति नहीं होती, अनुभूति एक अलग स्वतंत्र अनुभव है. उनका मानना था कि अनुभूति स्वतःसिद्ध, स्वसंवेद्य, और स्वयं प्रकाश है. अपनी किताब “एन आइडियलिस्ट व्यू ऑफ़ लाइफ” में अपने इस विचार के समर्थन में उन्होंने कई अच्छे तर्क प्रस्तुत किये हैं. उन्होंने पांच अलग अलग किस्म की अनुभूतियों में भी अंतर स्पष्ट किया है.

राधाकृष्णन यहीं नहीं रुके, उन्होंने पांच अलग अलग किस्म के धर्मों का भी वर्गीकरण कर डाला था. ये पांच किस्म के धर्म थे :
1. परमात्मा के उपासक
2. व्यक्तिगत देवता के उपासक
3. अवतार (राम, कृष्ण, बुद्ध) जैसों के उपासक
4. पूर्वजों, वंश के संस्थापकों, या ऋषियों के उपासक
5. भिन्न भिन्न शक्तियों और आत्मा के उपासक
अन्य सभी धर्मों को राधाकृष्णन हिंदुत्व के ही, बल्कि अद्वैत वेदांत के ही किसी छोटे अपभ्रंश रूप में देखते थे. अन्य धर्मों को अद्वैत की अपनी अपनी समझ मानते हुए राधाकृष्णन बाकी धर्मों का भी हिंदुत्विकरण कर डालते हैं.

राइनहार्ट, वसंत कैवार और सुचेता मजूमदार जैसे कुछ लोग उनकी आलोचना में दर्शन और धर्म के राजनैतिक इस्तेमाल का जिक्र करते हैं. ऐसे विद्वानों का मानना है कि धर्म के राजनीतिकरण से राष्ट्रवाद को बल देने में सुविधा होती है. इसे सिद्ध करने के लिए वो राधाकृष्णन के वक्तव्य, “वेदांत कोई एक धर्म नहीं, बल्कि वेदांत ही एकमात्र धर्म है” पर ध्यान दिलाते हैं. ( Vedanta is not a religion but religion itself in its “most universal and deepest significance”)

स्वीटमैन जैसे विद्वानों का मत है कि अब धीरे धीरे करीब 1990 के समय से पश्चिमी विद्वान भी हिन्दुओं के प्रति दुर्भावना के साथ नहीं लिखते. अफ़सोस कि ऐसे मतों के बाद भी हमारे पास वेंडी डोनीगर जैसों की किताबें झेलनी पड़ती हैं. कमी कई बार हमारे अन्दर भी होती है, और यहाँ भी कमी काफी हद तक हमारी ही है.

सन 1962 से हम सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर “शिक्षक दिवस” तो मनाते आ रहे हैं, लेकिन उनका लिखा पढ़ने की, उस से सीखने की कोशिश कम ही की गई है. शिक्षक दिवस के मौके पर एक प्रखर हिंदुत्ववादी के लिखे को किताबों से बाहर निकाल कर आम जनता तक पहुंचा देना ही शायद सही अर्थों में शिक्षक दिवस मनाना होगा.

बाकी माल्यार्पण और अगरबत्तियां मूर्ति को दिखा कर किताबें अलमारी में ही पड़ी रहने देने का विकल्प भी है ही! हमने इस विकल्प का इस्तेमाल भी भरपूर किया है.

गणेश चतुर्थी भगवान गणेश का प्रगटोत्सव



गणेश चतुर्थी भगवान गणेश का प्रगटोत्सव !
भगवान गणेश के प्रगटोत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। यह मान्यता है कि भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार गणेश चतुर्थी का दिन अगस्त अथवा सितम्बर के महीने में आता है।
गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव, १० दिन के बाद, अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही धूम-धाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी इत्यादि में विसर्जन करते हैं।

गणपति स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्त
ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। हिन्दु दिन के विभाजन के अनुसार मध्याह्न काल, अंग्रेजी समय के अनुसार दोपहर के तुल्य होता है।

हिन्दु समय गणना के आधार पर, सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को पाँच बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। इन पाँच भागों को क्रमशः प्रातःकाल, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल के नाम से जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, गणेश स्थापना और गणेश पूजा, मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिये। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये सबसे उपयुक्त समय माना जाता है।
मध्याह्न मुहूर्त में, भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करते हैं जिसे षोडशोपचार गणपति पूजा के नाम से जाना जाता है।

गणेश चतुर्थी पर निषिद्ध चन्द्र-दर्शन
गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख के, नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है।
नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गये।

मिथ्या दोष निवारण मन्त्र
चतुर्थी तिथि के प्रारम्भ और अन्त समय के आधार पर चन्द्र-दर्शन लगातार दो दिनों के लिये वर्जित हो सकता है। धर्मसिन्धु के नियमों के अनुसार सम्पूर्ण चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र दर्शन निषेध होता है और इसी नियम के अनुसार, चतुर्थी तिथि के चन्द्रास्त के पूर्व समाप्त होने के बाद भी, चतुर्थी तिथि में उदय हुए चन्द्रमा के दर्शन चन्द्रास्त तक वर्ज्य होते हैं।

अगर भूल से गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जायें तो मिथ्या दोष से बचाव के लिये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये -
सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥

गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और गणेश चौथ के नाम से भी जाना जाता है।