गुरुवार, 3 नवंबर 2016

वन रैंक वन पेंशन : काँग्रेस का सच



OROP पर किस मुंह से सियासत कर रहे हैं राहुल गांधी
राहुल गांधी को चाहिए कि मोदी सरकार से सवाल पूछने की बजाय अपनी महान मम्मी से पूछें कि माँ, पापा और दादी ने हमारे जवानों के साथ ऐसा क्यों किया?

@piyush.dwiwedi पीयूष द्विवेदी

http://www.ichowk.in
वन रैंक वन पेंशन का मामला एक बार फिर गरमाया है. गत दिनों एक पूर्व सैनिक राम किशन ग्रेवाल ने कथित तौर पर वन रैंक वन पेंशन की अनियमितताओं के कारण आत्महत्या कर ली. बस इसके बाद से ही इस मामले पर सियासी महकमे में सरगर्मी पैदा हो गई है.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल वगैरह तमाम नेता मृतक सैनिक के परिजनों से मिलने के नाम पर संवेदना की सियासत के दांव आजमाने अस्पताल पहुँच गए. लेकिन दिल्ली पुलिस ने इनमें से किसी को भी अंदर नहीं जाने दिया. दोनों को गिरफ्तार कर बाहर ही रखा. इस पर दुनिया भर का हो-हल्ला मचाया गया, मगर विपक्षी दलों की सियासी रोटियाँ नहीं सिक सकीं.

     वैसे इस आत्महत्या को लेकर कई तरह के सवाल हैं. अब जैसा कि राम किशन के साथियों की मानें तो वे वन रैंक वन पेंशन की अनियमितताओं पर एक पत्र लेकर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर से मिलने जा रहे थे. इस दौरान  रास्ते में ही पार्क में बैठे-बैठे जहर खाकर आत्महत्या कर ली.

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वे रक्षा मंत्री से मिलने जा रहे थे, तो अचानक रास्ते में ऐसा क्या हो गया कि उन्हें आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा ?

क्यों उनके साथियों ने ऐसा करने से उन्हें रोका नहीं? यह भी बात सामने आई है कि उन्होंने आत्महत्या से पहले अपने बेटे को फोन किया था. इसका ऑडियो रिकॉर्ड सामने है, जिसमें  वह बेटे से ज़हर खाने की बात का जिक्र कर रहे हैं.

सवाल यह कि ये कैसा बेटा है जिसने अपने पिता की कॉल रिकॉर्डिंग पर लगाईं और उनके ज़हर खाने की बात जानने पर भी चुपचाप सब सुनता रहा?

निश्चित तौर पर ये सभी सवाल न केवल इस मामले में अनेक संशयों को जन्म देते हैं बल्कि किसी गहरी साजिश की तरफ भी इशारा करते हैं. क्योंकि, यह यकीन करना मुश्किल है कि हमारी बहादुर भारतीय सेना का कोई जवान ख़ुदकुशी जैसा कायरतापूर्ण  निर्णय लेगा.

वह भी तब जब वन रैंक वन पेंशन लागू है. बस कुछ छोटी-मोटी दिक्कतें हैं जिन्हें बातचीत के जरिये दूर किया जा सकता है. ऐसे में, जरूरत है कि मामले की जांच हो जिससे सच्चाई सामने आए.
इसी क्रम में यदि वन रैंक-वन पेंशन मामले को समझने का प्रयत्न करें तो इसका अर्थ यह है कि अलग-अलग समय पर सेवानिवृत हुए एक ही रैंक के जवानों को बराबर पेंशन दी जाय. उनकी पेंशन में अधिक अंतर न रहे.

फिलहाल स्थिति यह है कि जब कोई सेना का अधिकारी या जवान सेवानिवृत होता है, उन्हें पेंशन के तत्कालीन नियमों के हिसाब से पेंशन मिलती है. सेना के पेंशन के नियम कई बार बदले हैं. ब्रिटिश शासन के समय फौजियों की पेंशन उनकी तनख्वाह की 83 प्रतिशत थी.

आज़ादी के बाद सन 1957 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इसे कम कर दिया. इसके मद से सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों जिन्हें तब वेतन का ३३ फीसदी पेंशन मिलता था, की पेंशन को बढ़ा दिया. आगे 1971 की लड़ाई में हमारे सैनिकों की बहादुरी का इनाम इंदिरा गाँधी ने सन 1973 में उनकी 'वन रैंक वन पेंशन' को ख़त्म करके दिया.

एक बार फिर सिविल कर्मियों की पेंशन बढ़ाई गई और इसकी भरपाई सेना की पेंशन काटकर की गई.

फिर आए इंदिरा-पुत्र राजीव गाँधी जिन्होंने सेना की बेसिक सैलरी में भी कमी कर दी. जिससे सैनिकों की पेंशन और भी कम हो गई. इन्हीं चीजों के बाद हमारे जवानों को आभास हुआ कि ये लोग सिर्फ मुंह के सेना प्रेमी हैं और तभी से वन रैंक वन पेंशन का मामला उठने लगा. इसे कांग्रेस की सरकारें समिति गठन कर टालती रहीं.

सन 1971 में सेना के पेंशन के नियम यूँ थे कि सैनिक को उसके वेतन का 75 प्रतिशत जबकि सैन्य अधिकारियों को 50 प्रतिशत पेंशन मिलती थी. जिसे बाद में तीसरे वेतन आयोग ने घटाकर 50 फीसदी कर दिया. इस तरह सन 1971 में सेवानिवृत हुए फौजियों तथा उसके बाद सेवानिवृत हुए फौजियों की पेंशन में भारी अंतर है.

आगे भी जब-तब पेंशन के नियम बदले और ये अंतर भी आता गया. गौर करें तो सन 2005 और 2006 में सेवानिव्रूत हुए फौजियों की पेंशनों के बीच लगभग 15,000 रुपये तक का अंतर आ गया. स्थिति यह है कि 2006 के बाद सेवानिवृत कर्नल 2006 से पूर्व सेवानिवृत अपने से उच्च रैंक के मेजर जनरल से अधिक पेंशन पाता है.

इन विसंगतियों के मद्देनज़र फौजियों की मांग थी कि सेना में एक रैंक-एक पेंशन की व्यवस्था कर दी जाय जिसके तहत एक रैंक के अलग-अलग समय पर सेवानिवृत दो फौजियों की पेंशनों में कोई अंतर न हो.

मोदी सरकार ने इसे लागू भी किया है, लेकिन कुछेक बिन्दुओं पर असहमति थी, जिसपर सरकार ने कदम उठाने का आश्वासन दिया था. सरकार को यथाशीघ्र उन असहमतियों को दूर करना चाहिए.

लेकिन, आज जो राहुल गांधी अस्पताल के बाहर नौटंकी कर रहे हैं, उन्हें चाहिए कि मोदी सरकार से सवाल पूछने की बजाय पहले अपनी महान मम्मी जी से जाकर पूछें कि माँ, दादी और पापा ने हमारे जवानों के साथ ऐसा क्यों किया था?

उन्होंने जो किया सो किया, दस साल तो सत्ता में राहुल गांधी और उनकी मम्मी की ही चलती रही, फिर उन्होंने सैनिकों की इस समस्या को क्यों नहीं समझा? आज राम किशन ग्रेवाल की आत्महत्या पर मौजूदा सरकार पर फिजूल आरोप लगाकर निशान साधने वाले कांग्रेसी अगर एकबार अपनी गिरेबान में झांक लें तो शर्म से चेहरा लटक जाएगा.

वन रैंक वन पेंशन : जानिए क्या है

5 सितंबर को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने आज पूर्व सैनिकों की करीब 40 साल पुरानी लंबित मांग वन रैंक-वन पेंशन (OROP) का ऐलान कर दिया। रक्षा मंत्री ने कहा कि यह मांग चार दशकों से लंबित थी। सरकार इसे लागू कर रही है और इस पर 8 से 10 हजार करोड़ का सालाना खर्चा होगा। पूर्व सैनिकों को 1 जुलाई 2014 से इसका लाभ मिलेगा। सैनिकों को 4 किस्‍तों में बकाया पैसा मिलेगा। हालांकि शहीदों के परिवारों को एक किश्‍त में बकाया दे दिया जाएगा। वीआरएस लेने वाले सैनिकों को इसका लाभ नहीं मिलेगा। हर पांच साल में पेंशन की समीक्षा होगी। पॉजीटिव इंडिया देश का सैनिक ना हो तो देश सुरक्षित नहीं रह सकता है इसलिए शहीदों की शहादत को हर किसी को सलाम करना चाहिए। लेकिन अगर एक सैनिक अपने तन-मन से देशवासियों की रक्षा के लिए कुछ भी करने को तैयार रह सकता है तो देशवासियों के दिलों में उसके लिए इज्जत और सरकार के पास ऐसी योजनाएं होनी चाहिए जिसके जरिये सब को सुरक्षित करने वाले का जीवन और परिवार भी सुरक्षित हो। इसमें किसी को शक नहीं कि सरकार की ओर से उठाया गया यह कदम पॉजीटिव इंडिया की सोच का उदाहरण है। उम्मीद जताई जा सकती है कि इस कदम के बाद हमारे युवाओं का मन सेना में जाने पर घबरायेगा नहीं और वो पहले से दूने जोश में सेना में भर्ती होंगे।





वन रैंक वन पेंशन : 35 साल से जारी है लड़ाई
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नई दिल्‍ली: नमस्कार मैं रवीश कुमार, वन रैंक वन पेशन के मुद्दे पर ऐसा कुछ भी नहीं बचा है जो पिछले 35 सालों में नहीं कहा गया हो। कई कमेटियों की रिपोर्ट है और 2009 में सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि इसे लागू करना चाहिए, बल्कि फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसे बिना देरी के लागू करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी को अपना चुनावी वादा भी याद दिलाया। बल्कि बीजेपी ने इसे चुनावी मुद्दा न बनाया होता तो यह मसला लंबे समय के लिए ठंडे बस्ते में चला गया होता।

गोवा में प्रधानमंत्री का उम्मीदवार चुने जाने के बाद 15 सितंबर 2013 को नरेंद्र मोदी की पहली रैली होती है हरियाणा के रेवाड़ी में। बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक और रिटायर अफसर इस रैली में नरेंद्र मोदी को सुनने गए थे। मंच पर भी पूर्व सेना प्रमुख वी.के. सिंह, राज्यवर्धन राठौर मौजूद थे। पूर्व सैनिकों की इस रैली में नरेंद्र मोदी ने बचपन में सैनिक स्कूल में पढ़ने और सेना में भर्ती न हो पाने का अफसोस भी साझा किया था।

उन्होंने कहा कि मैं कई सालों से वन रैंक वन पेंशन के बारे में सुन रहा हूं। इसमें दिक्कत क्या है। आज मैं भारत सरकार से पब्लिकली सभी आर्मी के लोगों और पूर्व सैनिकों की ओर से मांग करता हूं कि वो वन रैंक वन पेंशन स्कीम पर व्हाईट पेपर लेकर आएं। मित्रों मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर 2004 में वाजपेयी जी की सरकार बनती तो यह वन रैंक वन पेंशन का मुद्दा जटिल न होता।

वैसे प्रधानमंत्री ने मन की बात में यह नहीं बताया कि 1999 के बीजेपी के मेनिफेस्टो के राष्ट्रीय सुरक्षा के कॉलम में पेंशन से जुड़ी सभी कमियों को दूर करने का वादा किया गया था। फरवरी 2014 में जब यूपीए सरकार ने वन रैंक वन पेंशन लागू करने की घोषणा की तब भी नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यूपीए फ्रॉड कर रही है। जब हमारी सरकार आएगी तब हम लागू करेंगे।

एक साल बाद जब इसे लेकर बेचैनी बढ़ने लगी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात में भरोसा दिलाया कि सरकार के भिन्न-भिन्न विभाग इस पर काम कर रहे हैं। मैं जितना मानता था उतना सरल विषय नहीं है, पेचीदा है और चालीस साल से उसमें समस्याओं को जोड़ा गया है। मैंने सरल बनाने की दिशा में सरकार में बैठे हुए सबको रास्ते खोजने पर लगाया हुआ है। पल पल की खबर मीडिया में देना ज़रूरी नहीं होता है। मैं विश्वास दिलाता हूं कि मेरी सरकार वन रैंक वन पेंशन के मसला का हल लाकर रहेगी।

इस मसले पर चंडीगढ़ के संस्करणों में काफी लेख मिले हैं। चंडीगढ़ में सेना के कई रिटायर अफसर रहते हैं इस वजह से भी हो सकता है। प्रधानमंत्री के मन की बात के बाद ट्रिब्यून में सेना के पूर्व वाइस चीफ़ रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल विजय ओबराय ने तल्ख़ी भरा लेख लिखा और कहा कि प्रधानमंत्री के इस मुद्दे को पेचीदा बताने और टाइम फ्रेम नहीं देने से यह मुद्दा घूमफिर कर अपनी जगह पर पहुंच गया है। 'हम फुटबाल नहीं है बल्कि देश और समाज के सम्मानित और निष्ठावान नागरिक हैं। यह मसला इसलिए नहीं लटका हुआ है कि जटिल है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पब्लिक में कहा था कि मैं वन रैंक वन पेंशन के हक में हूं मगर नौकरशाह ऐसा नहीं चाहते हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल ओबराय ने 2010 में बनी कोश्यारी कमेटी की याद दिलाई। इस कमेटी के अध्यक्ष बीजेपी के सांसद भगत सिंह कोश्यारी थे। कोश्यारी कमेटी ने इस मांग को जायज़ माना था। अगर इस मांग को लागू करने में 9100 करोड़ का खर्चा आता है तो क्या देश अपने जवानों और अफसरों के लिए इतना भार नहीं उठा सकता है।'

लाखों सैनिकों और अफसरों से जुड़ा मामला है ये। जो रिटायर हो चुके हैं और जो अभी सेवा में हैं दोनों के लिए। वन रैंक वन पेंशन को समझना आसान है। 1996 में कोई मेजर जनरल के पद से रिटायर होते हैं और आज कोई लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से रिटायर होता है तो हो सकता है कि रैंक में सीनियर होने के बाद भी मेजर जनरल की पेंशन लेफ्टिनेंट कर्नल से कम हो। यह अंतर कई हज़ार का होता है। इसलिए कहा जा रहा है जो जिस रैंक से रिटायर होगा उसे उसी के हिसाब से पेंशन दिया जाएगा।

सैनिकों की इस बेचैनी को रक्षा मंत्री के बयान ने और बढ़ा दिया। उन्हें लगा कि सरकार टालने के मूड में है। 29 मई को पुणे में सैनिकों के एक समारोह में कुछ रिटायर अफसरों ने रक्षा मंत्री के हाथों सम्मान लेने से मना कर दिया। पर्रिकर ने कहा कि मंत्रालय ने सारी औपचारिकता पूरी कर ली है लेकिन प्रक्रिया समय लेती है। लोगों को वित्तीय जटिलताओं का पता नहीं है। मेरे रक्षा मंत्री बने के बाद से ये स्कीम 22000 करोड़ का आंकड़ा छू गई है। 30 मई को पर्रिकर ने कह दिया कि हम कोई तारीख नहीं बता सकते कि कब लागू करेंगे। उन्होंने कहा कि हमने पांच साल के लिए वादा किया था। एक साल के लिए नहीं।

जबकि 2014 में बजट के बाद पर्रिकर ने कहा था कि अगले बजट में वन रैंक वन पेंशन लागू हो जाएगा। इस बयान से नाराज़गी इतनी बढ़ी कि प्रधानमंत्री को अपने मन की बात में सफाई देनी पड़ी। इसके बाद भी सैनिक 14 जून को अपनी इस मांग को लेकर व्यापक प्रदर्शन की योजना पर कायम हैं।

फरवरी 2014 में यूपीए ने 500 करोड़, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने पहले बजट में 1000 करोड़ और अब 8300 करोड़ दिये जाने की बात हो रही है। उन 1500 करोड़ का क्या हुआ पता नहीं है। प्रधानमंत्री ने भी मन की बात में कहा है कि हर बात की रनिंग कमेंट्री नहीं की जा सकती है। वैसे इस लड़ाई को लड़ते हुए 35 साल हो गए। सैनिकों के लिए वन रैंक वन पेंशन लागू करने वाले सुप्रीम कोर्ट को अपने जजों के लिए भी वन रैंक वन पेशन की समस्या से जूझना पड़ा था।

अप्रैल 2014 में तत्कालीन चीफ जस्टिस पी सदाशिवम ने फैसला दिया था कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के रिटायर होने के बाद सब को समान सुविधा मिलनी चाहिए। इस आधार पर अंतर नहीं होना चाहिए कि कोई नीचली अदालत से प्रमोट होकर हाईकोर्ट तक पहुंचा है। कौन कहां से चलता हुआ जज बना है इस आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। ऐसा करना संविधान की धारा 14 और 16(1) का उल्लंघन होगा। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों में वन रैंक वन पेंशन का नियम होना ही चाहिए।

सेना को वन रैंक वन पेंशन के करीब पहुंचते देख 6 अर्धसैनिक बल भी वन रैंक वन पेंशन की मांग करने लगे हैं। मुझे पता चला कि हाल फिलहाल तक सीआरपीएफ को कोई जवान घायल हो जाता था तो अस्पताल में भर्ती होने पर छुट्टी कट जाती थी। अब जाके इसे ड्यूटी माना गया है। लेकिन अर्धसैनिक बलों की इस मांग से सेना के कुछ हलकों में नारजगी देखी जा रही है।

2 जून के हिन्दुस्तान टाइम्स के चंडीगढ़ संस्करण में रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल हरवंत सिंह ने लिखा है कि केंद्रीय पुलिस बल खुद को अर्धसैनिक बल मानकर वन रैंक वन पेंशन की मांग करने लगे हैं। हरवंत सिंह के अनुसार भारत में असम राइफल्स और राष्ट्रीय राइफल्स, बीएसएफ सीआरपीएफ कोई अर्धसैनिक बल नहीं है। एक और अंतर बताया है कि 85 फीसदी सैनिक 35-37 साल की उम्र में रिटायर होते हैं जबकि पुलिस वाले 60 साल की उम्र में।

रिटायर लेफ्टिनेंट हरवंत सिंह ने यह भी लिखा है कि पुलिस बल के जवान इसलिए मारे जाते हैं क्योंकि उनकी ट्रेनिंग ख़राब होती है। उनके पास लड़ने के ठीक उपकरण नहीं है। बीएसएफ को बताना चाहिए कि उनके रहते तीन करोड़ बांग्लादेशी कैसे भारत में घुस आए। हरवंत सिंह ने यह भी कहा कि प्याज़ की तुलना सेब से नहीं की जानी चाहिए। कारण जो भी हो अर्धसैनिक बलों का योगदान इतना भी कम नहीं है कि उन्हें सेब की तुलना में प्याज़ बताया जाए। लेफ्टिनेंट हरवंत सिंह को इस तुलना से बचना चाहिए था।

एक सवाल तो इसी पर है कि सेना की मांग को पूरा करना सरकार के लिए आसान है या नहीं। क्या हमारे सैनिक सरकार को कुछ वक्त देने के लिए तैयार हैं। अर्ध सैनिक बलों की मांग पर भी बात करेंगे। दो ही मेहमान हैं हम आराम से बात करेंगे

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जानिए क्या है वन रैंक वन पेंशन
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Positive India: वन रैंक वन पेंशन योजना .. 

देश को ए-वन करने की कोशिश

By: Ankur Sharma Published: Monday, September 7, 2015

अंकुर शर्मा सीनियर सब-एडिटर, वनइंडिया लेखक परिचय- मैं वनइंडिया में सीनियर सब-एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। मैं बेहद सकारात्मक यानी पॉजिटिव सोच रखती हूं ओर उसी सोच से मैं अपने भारत को देखती हूं। इस कॉलम Positive India में मेरा लक्ष्य है अपने पाठकों के सामने एक सकारात्मक भारत की तस्वीर पेश करना। यह एक छोटा सा कदम है लोगों में सकारात्मक ऊर्जा को प्रवाहित करने का।

Positive India में हम आज बात करेंगें वन रैंक वन पेंशन योजना की.. जिसको लेकर पिछले दिनों देश में काफी बवाल मचा हुआ था जो कि शनिवार को सरकार के एक ऐलान के बाद खत्म हुआ है। सरकार की ओर से उठाया गया यह वो कदम है जिसका इंतजार चार दशकों से हो रहा था।

सेना में नौकरी केवल एक काम नहीं बल्कि यह एक देश सेवा है क्योंकि जब सरहद पर सैकड़ों की संख्या पर प्रहरी रात-दिन पहरा देते हैं तब कहीं जाकर हम लोग अपने घरों में बेफिक्र होकर सोते हैं जिसके कारण सेना के लोगों को देश में स्पेशल ट्रीटमेंट मिलनी चाहिए इसलिए 'वन रैंक वन पेंशन योजना' को लेकर आंदोलन किया जा रहा था।

आईये इस मुद्दे पर बात करने से पहले जानते हैं कि आखिर क्या था 'वन रैंक वन पेंशन' का पूरा बवाल मोदी सरकार ने चुनाव से पहले सेना के लोगों को 'वन रैंक वन पेंशन' देने का वादा किया था इस कारण इसको लेकर मोदी सरकार से बहुत सारी उम्मीदें थी इसलिए सरकार के सामने यह एक कठिन परीक्षा थी जिसे कि उसने सफलता पूर्वक पार कर ली है। दरअसल जब दो फौजी एक पद पर, एक समय तक सर्विस कर के रिटायर होते हैं। पर उनके रिटायरमेंट में कुछ सालों का अंतर होता है और इस बीच नया वेतन आयोग भी आ जाता है, तो बाद में रिटायर होने वाले की पेंशन नए वेतन आयोग के अनुसार बढ़ जाती है। लेकिन पहले रिटायर हो चुके फौजी की पेंशन उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाती। जिसे लेकर पूर्व सैन्य अधिकारी और लोग दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे थे। फौजियों और सिविलियन में अंतर फौजियों की पेंशन की तुलना सामान्य सरकारी कर्मचारियों से नहीं की जा सकती क्योंकि एक ओर जहाँ सामान्य सरकारी कर्मचारी को 60 साल तक तनख्वाह लेने की सुविधा मिलती है। तो वहीं फौजियों को 33 साल में ही रिटायर होना पड़ता है। अंग्रेजों के समय में फौजियों की पेंशन तनख्वाह की करीब 80 प्रतिशत होती थी जबकि सामान्य सरकारी कर्मचारी की 33 प्रतिशत हुआ करती थी। भारत सरकार ने इसे सही नहीं माना और 1957 के बाद से फौजियों की पेंशन को कम की और अन्य क्षेत्रों की पेंशन बढ़ानी शुरू की। इसलिए फौजियों ने पेंशन की मांग की है। क्या थी फौजियों की मांग? फौजियों की मांग है कि 1 अप्रैल 2014 से ये योजना छठे वेतन आयोग की सिफरिशों के साथ लागू हो। फौजियों का कहना था कि असली संतुलन लाना है तो हमें भी 60 साल पर रिटायर किया जाय। हमें तो 33 साल पे ही रिटायर कर दिया जाता है और उसके बाद सारा जीवन हम पेंशन से ही गुजारते हैं जबकि अन्य कर्मचारी 60 साल तक पूरी तनख्वाह पाते हैं। ऐसे में हमारी पेंशन के प्रतिशत को कम नहीं करना चाहिए। सरकार ने सुनी सारी बातें और लिया अहम फैसला

5 सितंबर को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने आज पूर्व सैनिकों की करीब 40 साल पुरानी लंबित मांग वन रैंक-वन पेंशन (OROP) का ऐलान कर दिया। रक्षा मंत्री ने कहा कि यह मांग चार दशकों से लंबित थी। सरकार इसे लागू कर रही है और इस पर 8 से 10 हजार करोड़ का सालाना खर्चा होगा। पूर्व सैनिकों को 1 जुलाई 2014 से इसका लाभ मिलेगा। सैनिकों को 4 किस्‍तों में बकाया पैसा मिलेगा। हालांकि शहीदों के परिवारों को एक किश्‍त में बकाया दे दिया जाएगा। वीआरएस लेने वाले सैनिकों को इसका लाभ नहीं मिलेगा। हर पांच साल में पेंशन की समीक्षा होगी। पॉजीटिव इंडिया देश का सैनिक ना हो तो देश सुरक्षित नहीं रह सकता है इसलिए शहीदों की शहादत को हर किसी को सलाम करना चाहिए। लेकिन अगर एक सैनिक अपने तन-मन से देशवासियों की रक्षा के लिए कुछ भी करने को तैयार रह सकता है तो देशवासियों के दिलों में उसके लिए इज्जत और सरकार के पास ऐसी योजनाएं होनी चाहिए जिसके जरिये सब को सुरक्षित करने वाले का जीवन और परिवार भी सुरक्षित हो। इसमें किसी को शक नहीं कि सरकार की ओर से उठाया गया यह कदम पॉजीटिव इंडिया की सोच का उदाहरण है। उम्मीद जताई जा सकती है कि इस कदम के बाद हमारे युवाओं का मन सेना में जाने पर घबरायेगा नहीं और वो पहले से दूने जोश में सेना में भर्ती होंगे।