मंगलवार, 29 नवंबर 2016

जम्मू और कश्मीर हिंदुत्व की ही बपौती




पिछले दिनों , जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नैशनल कॉन्फ्रेंस चीफ फारूक अब्दुल्ला ने पाकिस्तान अध‍िकृत कश्मीर (पीओके) पर भारत के दावे को लेकर विवादित बयान दिया है। अब्दुल्ला ने कहा कि पीओके भारत की बपौती नहीं है जिसे वह हासिल कर ले। इसके साथ ही उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार को चुनौती दी कि वह पाकिस्तान के कब्जे से पीओके को लेकर दिखाए।

      फारूक अब्दुल्ला का यह  बयान  मात्र पाकिस्तान को खुश करने वाला था , वे स्वयं जानते हैं की कश्मीर और उनके भी  पूर्वज  हिन्दू थे ! समस्त जम्बू दीप यानि कि एशिया महादीप सनातन संस्कृति था ! अफगानिस्थान से लेकर सुदूर म्यमांर मलेशिया इंडोनेशिया तक जो बड़ी बड़ी बोद्ध प्रतिमाएं है या नष्ट की हैं वे चीख चीख कर कह रहीं हैं की यह सारा का सारा प्रायदीप सनातन सभ्यता का  हैं ! इसलिये  फारूक अब्दुल्ला ये समझलें कि मानव सभ्यता के जन्म से कश्मीर हिंदुत्व की बपौती है !
- अरविन्द सिसोदिया , कोटा , राजस्थान 9414180151 / 9509559131  

मानव सभ्यता के जन्म से , जम्मू और कश्मीर हिंदुत्व की ही बपौती 


जम्मू और कश्मीर के लिए राजतरंगिणी तथा नीलम पुराण नामक दो प्रामाणिक ग्रंथों में यह आख्‍यान मिलता है कि कश्मीर की घाटी कभी बहुत बड़ी झील हुआ करती थी। इस कथा के अनुसार कश्यप ऋषि ने यहाँ से पानी निकाल लिया और इसे मनोरम प्राकृतिक स्थल में बदल दिया, किंतु भूगर्भशास्त्रियों का कहना है कि भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण खदियानयार, बारामुला में पहाड़ों के धंसने से झील का पानी बहकर निकल गया और इस तरह 'पृथ्वी पर स्वर्ग' कहलाने वाली कश्मीर की घाटी अस्तित्‍व में आई।

ऐतिहासिक उल्लेख
ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने कश्मीर में बौद्ध धर्म का प्रसार किया। बाद में कनिष्क ने इसकी जड़ें और गहरी कीं। छठी शताब्दी के आरंभ में कश्मीर पर हूणों का अधिकार हो गया। यद्यपि सन् 530 में घाटी फिर स्वतंत्र हो गई लेकिन इसके तुरंत बाद इस पर उज्जैन साम्राज्य का नियंत्रण हो गया। विक्रमादित्य राजवंश के पतन के पश्‍चात कश्‍मीर पर स्‍थानीय शासक राज करने लगे। वहां हिन्दू और बौद्ध संस्कृतियों का मिश्रित रूप विकसित हुआ। कश्मीर के हिन्दू राजाओं में ललितादित्य (सन 697 से सन् 738) सबसे प्रसिद्ध राजा हुए जिनका राज्य पूर्व में बंगाल तक, दक्षिण में कोंकण, उत्तर-पश्चिम में तुर्किस्तान, और उ‍त्तर-पूर्व में तिब्बत तक फैला था। ललितादित्य ने अनेक भव्‍य भवनों का निर्माण किया।

इस्‍लाम का आगमन

कश्मीर में इस्लाम का आगमन 13 वीं और 14वीं शताब्दी में हुआ। मुस्लिम शासको में जैन-उल-आबदीन (1420-70) सबसे प्रसिद्ध शासक हुए, जो कश्‍मीर में उस समय सत्ता में आए, जब तातरों के हमले के बाद हिन्दू राजा सिंहदेव भाग गए। बाद में चक शासकों ने जैन-उल-आवदीन के पुत्र हैदरशाह की सेना को खदेड़ दिया और सन् 1586 तक कश्मीर पर राज किया। सन् 1586 में अकबर ने कश्मीर को जीत लिया। सन् 1752 में कश्मीर तत्कालीन कमज़ोर मुग़ल शासक के हाथ से निकलकर अफ़ग़ानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली के हाथों में चला गया। 67 साल तक पठानों ने कश्मीर घाटी पर शासन किया।

अन्य उल्लेख

जम्मू का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। हाल में अखनूर से प्राप्‍त हड़प्‍पा कालीन अवशेषों तथा मौर्य, कुषाण और गुप्त काल की कलाकृतियों से जम्मू के प्राचीन स्‍वरूप पर नया प्रकाश पड़ा है। जम्मू 22 पहाड़ी रियासतों में बंटा हुआ था। डोगरा शासक राजा मालदेव ने कई क्षेत्रों को जीतकर अपने विशाल राज्य की स्थापना की। सन् 1733 से 1782 तक राजा रंजीत देव ने जम्मू पर शासन किया किंतु उनके उत्तराधिकारी दुर्बल थे, इसलिए महाराजा रणजीत सिंह ने जम्मू को पंजाब में मिला लिया। बाद में उन्‍होंने डोगरा शाही ख़ानदान के वंशज राजा गुलाब सिंह को जम्मू राज्य सौंप दिया। 1819 में यह पंजाब के सिक्ख शासन के अंतर्गत आया और 1846 में डोगरा राजवंश के अधीन हो गया। गुलाब सिं‍ह रणजीत सिंह के गवर्नरों में सबसे शक्तिशाली बन गए और लगभग समूचे जम्मू क्षेत्र को उन्होंने अपने राज्य में मिला लिया।

वर्तमान स्वरूप
अपने वर्तमान स्वरूप में जम्मू - कश्मीर का अंचल, 1846 में रूपायित हुआ। जब प्रथम सिक्ख युद्ध के अंत में लाहौर और अमृतसर की संधियों के द्वारा जम्मू के डोगरा शासक राजा गुलाब सिंह एक विस्तृत, लेकिन अनिश्चित से हिमालय क्षेत्रीय राज्य, जिसे 'सिंधु नदी के पूर्व की ओर रावी नदी के पश्चिम की ओर' शब्दावली द्वारा परिभाषित किया गया था, के महाराजा बन गए।

अंग्रेज़ों के लिए इस संरक्षित देशी रियासत की रचना ने उनके साम्राज्य के उत्तरी भाग को सुरक्षित बना दिया था, जिससे वे 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के दौरान सिंधु नदी तक और उसके आगे बढ़ सकें। इस प्रकार यह राज्य एक जटिल राजनीतिक मध्यवर्ती क्षेत्र का भाग बन गया जिसे अंग्रेज़ों ने उत्तर में अपने भारतीय साम्राज्य और रूसी व चीनी साम्राज्य के बीच स्थापित कर दिया था। गुलाब सिंह का इस पर्वतीय अंचल पर शासनाधिकार मिल जाने से लगभग एक - चौथाई सदी से पंजाब के सिक्ख साम्राज्य की उत्तरी सीमा रेखा के पास की छोटी - छोटी रियासतों के बीच चल रही मुहिम और कूटनीतिक चर्चा का अंत हो गया।
19वीं सदी के इस अंचल की सीमा - निर्धारण के कुछ प्रयास किए गए, लेकिन सुस्पष्ट परिभाषा करने के प्रयत्न अक्सर इस भूभाग की प्रकृति और ऐसे विशाल क्षेत्रों के कारण, जो स्थायी बस्तियों से रहित थे, सफल नहीं हो पाए। उदाहरणार्थ - सुदूर उत्तर में महाराजा की सत्ता कराकोरम पर्वत श्रेणी तक फैली हुई थी। लेकिन उसके आगे तुर्किस्तान और मध्य एशिया के सिक्यांग क्षेत्रों की सीमा रेखा पर एक विवादास्पद क्षेत्र बना रहा और सीमा रेखा कभी निश्चित नहीं हो पाई। इसी प्रकार की शंकाएँ उस सीमा क्षेत्र के बारे में रही, जो उत्तर में अक्साई चिन को आस पास से घेरे हुए है और आगे जाकर तिब्बत की सुस्पष्ट सीमा रेखा से मिलता है और जो सदियों से लद्दाख क्षेत्र की पूर्वी सीमा पर बना हुआ था। पश्चिमोत्तर में सीमाओं का स्वरूप 19वीं शताब्दी के आख़िरी दशक में अधिक स्पष्ट हुआ। जब ब्रिटेन ने पामीर क्षेत्र में सीमा निर्धारण सम्बन्धी समझौते अफ़ग़ानिस्तान और रूस के साथ सम्पन्न किए। इस समय गिलगित, जो हमेशा कश्मीर का भाग समझा जाता था, रणनीतिक कारणों से 1889 में एक ब्रिटिश एजेंट के तहत एक विशेष एजेंसी के रूप में गठित किया गया। सन् 1947 में जम्मू पर डोगरा शासकों का शासन रहा। इसके बाद महाराज हरि सिंह ने 26 अक्‍तूबर, 1947 को भारतीय संघ में विलय के समझौते पर हस्‍ताक्षर कर दिये।

अनुच्छेद 370

ब्रिटिश हुकूमत की समाप्ति के साथ ही जम्मू और कश्मीर भी आज़ाद हुआ। शुरू में इसके शासक महाराज हरीसिंह ने फैसला किया कि वह भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित न होकर स्वतंत्र रहेंगे, लेकिन 20 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान समर्थक आज़ाद कश्मीर सेना ने राज्य पर आक्रमण कर दिया, जिससे महाराज हरीसिंह ने राज्य को भारत में मिलाने का फैसला लिया। उस विलय पत्र पर 26 अक्टूबर, 1947 को पण्डित जवाहरलाल नेहरू और महाराज हरीसिंह ने हस्ताक्षर किये। इस विलय पत्र के अनुसार- "राज्य केवल तीन विषयों- रक्षा, विदेशी मामले और संचार -पर अपना अधिकार नहीं रखेगा, बाकी सभी पर उसका नियंत्रण होगा। उस समय भारत सरकार ने आश्वासन दिया कि इस राज्य के लोग अपने स्वयं के संविधान द्वारा राज्य पर भारतीय संघ के अधिकार क्षेत्र को निर्धारित करेंगे। जब तक राज्य विधान सभा द्वारा भारत सरकार के फैसले पर मुहर नहीं लगाया जायेगा, तब तक भारत का संविधान राज्य के सम्बंध में केवल अंतरिम व्यवस्था कर सकता है। इसी क्रम में भारतीय संविधान में 'अनुच्छेद 370' जोड़ा गया, जिसमें बताया गया कि जम्मू-कश्मीर से सम्बंधित राज्य उपबंध केवल अस्थायी है, स्थायी नहीं।

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*** अवन्तीपुर (कश्मीर) : कश्मीर की पूर्व  राजधानी


पहलगाम  जाते हुए अवन्तीपुर जो श्रीनगर से लगभग ३० किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में है.  बहुत पहले यहीं कश्मीर की कभी राजधानी हुआ करती थी.





१२ वीं सदी कश्मीर के एक महान संस्कृत कवि एवं विद्वान् “कल्‍हण”  की रचना राजतरंगिनी (राज वंशों का इतिहास) में उल्लेख है कि उत्पल राजवंश के राजाअवन्तिवर्मन के द्वारा विश्वैकसरा नामके स्थल पर अवन्तीपुर नामके नगर की स्थापना की गयी थी.  संभवतः यहाँ मृत्यु पश्चात आत्माओं के स्वर्गारोहण के लिए विशेष कर्मकांड किये जाते थे. इससे अनुमान लगता है कि अवन्तीपुर की स्थापना/नामकरण के पूर्व ही से यह कोई धार्मिक स्थल रहा है. नजदीक ही झेलम (प्राचीन नाम वितस्ता) नदी की उपस्थिति  भी अनुकूल है.  अवन्तिवर्मन मृत्यु पर्यंत एक परम वैष्णव बना रहा. ९ वीं सदी में उसी ने इस नगर में एक विष्णु का भव्य मंदिर बनवाया और गर्भगृह में  विष्णु महाराज अवन्तिस्वमिन के नाम से प्रतिष्ठित हुए. राजा का मंत्री “सुरा” शिव का आराधक था इसलिए लगभग एक किलोमीटर दूरी पर एक और भव्य मंदिर, जिसेअवन्तीश्वर कहा जाता है,  शिवजी के लिए भी बनवाया गया. अब दोनों ही अपनी अतीत की याद में आंसू बहा रहे हैं. शिव मंदिर के भग्नावशेष इतने करीब होंगे, नहीं मालूम था. अन्यथा उसे भी देख आते.
अपने आध्यात्मिक गुरु मीर सैय्यद  अली हमादानी की प्रेरणा एवं उन्हें खुश करने के लिए कश्मीर के १४ वीं सदी के शासक सुल्तान सिकंदर बुतशिकन ने पूरे कश्मीर में क्रूरता की सभी हदें पार कर दीं.  बुतशिकन का शाब्दिक अर्थ ही होता है मूर्ति भंजक. आजकल के तालिबान भी उसके सामने फीके पड़ जायेंगे.  बड़े व्यापक रूप से धर्मांतरण हुए और साथ ही कत्ले आम भी. नृत्य, संगीत, मदिरा पान पूरी तरह प्रतिबंधित थे. चुन चुन के सभी मंदिरों को धराशायी कर दिया. अवन्तिपुर का विष्णु मंदिर भी इसी कारण अन्य मंदिरों की तरह  वर्तमान अवस्था में है. लेकिन मंदिर इतना मजबूत था कि उसे तोड़ने में एक साल लग गया था. किन्तु संयोग से सिकंदर का द्वितीय पुत्र जैन-उल-अबिदीन  (१४२३ -१४७४) जो अपने बड़े भाई के मक्का रवानगी के बाद सुलतान बना था, अपने पिता के स्वभाव के विपरीत  अत्यधिक सहिष्णु था.  परन्तु उसके आते तक तो सभी हिन्दू धर्मस्थल जमींदोज़ हो चुके थे.



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हिंदू हैं शेख अबदुल्ला के पूर्वज, 

परदादा का नाम था बालमुकुंद कौल

BHASKAR NEWS | Nov 27, 2014
(शेख अब्दुल्ला)
जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में इस बार किसके सिर पर होगा ताज और किसको मिलेगा राजनीतिक वनवास। क्या यहां भी चलेगा मोदी का जादू या फिर पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस या कांग्रेस की बनेगी सरकार। आखिर कश्मीर की राजनीति में क्या है खास। dainikbhaskar.com आपको बता रहा है यहां के चुनाव से जुड़ी हर वो बात जो जानना चाहते हैं आप। इसी कड़ी में आज हम आपको बता रहे हैं शेख अब्दुल्ला के बारे में।

श्रीनगर। मुस्लिम कॉन्फ्रेंस (नेशनल कॉन्फ्रेंस) के संस्थापक शेख अब्दुल्ला कश्मीर को भारत में विलय से पहले एक मुस्लिम देश बनाना चाहते थे। शेख अब्दुल्ला के पूर्वज हिंदू (कश्मीरी पंडित) थे। शेख अब्दुल्ला ने अपनी आत्मकथा को जो किताबी रूप दिया है उसमें उन्होंने इस बारे विस्तार से बताया है। आजाद कश्मीर का सपना देखने वाले शेख अब्दुल्ला ने स्वयं अपनी आत्मकथा ‘आतिशे चीनार’ में स्वीकार किया है कि कश्मीरी मुसलमानों के पूर्वज हिंदू थे। उनके पूर्वज कश्मीरी पंडित थे और परदादा का नाम बालमुकुंद कौल था। किताब में लिखा है कि श्रीनगर के निकट सूरह नामक बस्ती में शेख़़ मुहम्मद अब्दुल्लाह का जन्म हुआ था। उनके पूर्वज मूलतः सप्रू गोत्र के कश्मीरी ब्राह्मण थे। अफग़ानों के शासनकाल में उनके एक पूर्वज रघूराम ने एक सूफी के हाथों इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। परिवार पश्मीने का व्यापार करता था और अपने छोटे से निजी कारख़ाने में शाल और दुशाले तैयार कराके बाज़ार में बेचता था।
इनके पिता शेख़़ मुहम्मद इब्राहीम ने आरंभ में एक छोटे पैमाने पर काम शुरू किया किन्तु मेहनत और लगन के कारण शीघ्र मझोले दर्जे के कारख़ानेदार की हैसियत तक पहुँच गए। शेख़़ साहब के परिवार की स्थिति एक औसत दर्जे के घराने की थी। इसके बावजूद भारत के प्रति शेख अब्दुल्ला का रवैया भारत विरोधी कैसे हो गया यह बात समझ से परे है। शेख अब्दुल्ला के पुत्र डा. फारुख अब्दुल्ला स्वयं कई बार कश्मीर के बाहर दिए गए साक्षात्कार और भाषणों में अपने पूर्वजों के हिंदू होने का जिक्र कर चुके हैं। उन्हें कई बार मंदिरों में पूजा करते हुए भी देखा गया है।

काशी के बाद कश्मीर
नीलमत पुराण में कश्मीर किस तरह बसा, उसका उल्लेख है। कश्यप मुनि को इस भूमि का निर्माता माना जाता है। उनके पुत्र नील इस प्रदेश के पहले राजा थे। चौदहवीं सदी तक बौद्ध और शैव मत यहां पर बढ़ते गए। काशी के बाद कश्मीर को ज्ञान की नगरी के नाम से जाना जाता था। जब अरबों की सिंध पर विजय हुई तो सिंध के राजा दाहिर के पुत्र राजकुमार जयसिंह ने कश्मीर में शरण ली थी। राजकुमार के साथ सीरिया निवासी उसका मित्र हमीम भी था। कश्मीर की धरती पर पांव रखने वाला पहला मुस्लिम यही था। अंतिम हिंदू शासिका कोटारानी के आत्म बलिदान के बाद पर्शिया से आए मुस्लिम मत प्रचारक शाहमीर ने राजकाज संभाला और यहीं से दारूल हरब को दारूल इस्लाम में तब्दील करने का सिलसिला चल पड़ा।


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कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ :
हाँ भई हाँ फारुख अब्दुल्ला जी!
कश्मीर हमारे बाप दादाओं का ही है
By मेकिंग इंडिया ऑनलाइन डेस्क - 26th November 2016

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सिन्धु भुलाया दाहिर का
गांधारी का गंधार
कैसे मैं कश्मीर भूलाऊँ
भू का स्वर्गागार
वह कल्हण कश्मीरी था
राज तरंगिनी लिखने वाला
वो विल्हण भी कश्मीरी था
चौर पंचाशिका रचने वाला
शैवागम दर्शन जग वन्दित
जिसका आनंदवाद प्रतिपाद्य
कश्मीरी पंडित जन की देन
शिव पार्वती जिनके आराध्य
अकलुष जीवन दृष्टि की
जहाँ से निःसृत पावन धार
कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ भू का स्वर्गागार


यहीं अवस्थित तक्षशिला थी
विश्व विश्रुत था विद्यालय
थे आचार्य प्रवर कौटिल्य
साक्षी देखो खड़ा हिमालय
विविधांचल से सकल विश्व के
विद्या व्यसनी आते थे
निखिल वांग्मय की शिक्षा से
जीवन सफल बनाते थे
जहाँ गुरु को शीश झुकाने आता था संसार
कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ भू का स्वर्गागार


आतंकवाद के सहगामी हैं
आज महर्षि पाणिनि की संताने
आज खड़ी निर्ममता से
संगीने भारत माँ पर ताने
कश्यप के पुनीत वंशधर
धर्मान्तरित हो छल से बल से
इंगित करते हमें सदा ही
हारा मानव काल प्रबल से
जहाँ वर्ष हजारों से होती
धर्म सनातन की जयकार
कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ भू का स्वर्ग गार



शास्त्र विहित इक्यावन पीठों में
वैष्णो देवी का पावन पीठ
श्रद्धालु जनों का श्रद्धा स्थल
जिस पर लगी शत्रु की दीठ
जहाँ छड़ी मुबारक होती है
हम जाते अमरनाथ के धाम
शैव पंथ का पावन स्थल
भक्त जन करते जिन्हें प्रणाम
भारत के कोने कोने से भक्तो का जहाँ उमड़ता ज्वार
कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ भू का स्वर्गागार

तुम लूट रहे सदियों से
हम फुटपरस्ती में सोये
चीर दिया भारत की छाती
हम फुट फुट कर रोये
स्कार्दू चित्रा गिलगित रोया
रोया डेरा बाबा नानक
ढाका और कराची रोया
गाँधी अखिल राष्ट्र का नायक
संगठन का दृढ मंत्र महा
गूंजे जय भारत का महोच्चार
कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ भू का स्वर्गगार

कल रूसो बलख हमारा था
इरानो अरब हमारा था
भूतपूर्व ऐ बुतपरस्तों
कल सारा चमन हमारा था
पाते सुकून तुम चूम जिन्हें
वो मक्केश्वर शिवलिंग हमारा था
स्वत्व न छीना कभी किसी का
जग फिर भी हमसे हारा था
अरब भुलाया ईरान भुलाया
कैसे भूलूं अपना आँगन द्वार
कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ भू का स्वर्ग गार
‘उत्सर्ग’ कविता संग्रह से द्वारा डॉ श्रीराम पाण्डेय, जगदेव नगर, आरा (बिहार)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - गरीबों के हक़ की राशि का उन्हीं के कल्याण में इस्तेमाल







गरीबों से लूटी गई राशि का उन्हीं के कल्याण में इस्तेमाल करने के लिए 


PM मोदी ने BJP सांसदों-विधायकों से मांगा नोटबंदी के बाद खातों का ब्यौरा
By Kishor Joshi Publish Date:Tue, 29 Nov 2016


नई दिल्ली (एजेंसी)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी के सभी सांसदों तथा विधायकों को निर्देश दिया है कि वे 8 नवंबर से 31 दिसंबर, 2016 के बीच हुए अपने-अपने बैंक खातों के लेनदेन का पूरा ब्यौरा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को सौंपें।

भाजपा संसदीय दल की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि लोकसभा में पेश किया गया आयकर संशोधन विधेयक कालेधन को सफेद में बदलने के लिए नहीं, बल्कि गरीबों से लूटी गई राशि का उन्हीं के कल्याण में इस्तेमाल करने के लिए है।

दरअसल विपक्षी पार्टियों का आरोप था कि नोटबंदी की जानकारी भाजपा नेताओं को पहले से थी। ऐसे में गृहमंत्री ने सोमवार को कहा था कि उनकी मंशा पर शक न किया जाए। वहीं मंगलवार को पीएम ने अपनी पार्टी के सासंदों और विधायकों का बैंक खातों का ब्यौरा मांगकर विपक्षी पार्टियों को अपनी ईमानदारी का सूबूत देने की कोशिश की है। वैसे विदेशों में जमा नेताओं के कालेधन का मुद्दा काफी पुराना है। यूपीए सरकार के वक्त भी भाजपा द्वारा यह मुद्दा उठाया गया था उस वक्त भाजपा सासंदों और विधायकों ने घोषणा कर कहा था कि उनका विदेशों में कोई खाता नहीं है। ऐसे में पीएम की यह कार्रवाई पार्टी नेताओं के दावों की हकीकत जानने में मदद करेगी।

विपक्ष इसे लेकर भी पीएम की मंशा पर सवाल उठा रहा है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कहना है कि 8 नवंबर से पहले ही पैसे ठिकाने लगा दिए गए थे। पीएम को अपने सासंदों और विधायकों के 6 महीने पहले के बैंक खातों का हिसाब मांगना चाहिए, साथ ही अपने अमीर दोस्तों के भी 6 महीने के ब्यौरे भी निकालने चाहिए।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन की प्रशंसा की, 
कहा - लोग भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेंगे

भाषा की रिपोर्ट, अंतिम अपडेट: मंगलवार नवम्बर 29, 2016

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज कहा कि पिछले कुछ दिनों में लोकसभा, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन दर्शाता है कि लोग सर्वांगीण विकास चाहते हैं और वे भ्रष्टाचार एवं कुशासन बर्दाश्त नहीं करेंगे.

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, ‘‘पिछले कुछ दिनों में हमने पूरे भारत में विभिन्न चुनावों- लोकसभा, विधानसभाओं एवं स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे देखे हैं. ’’ उन्होंने लिखा, ‘‘चाहे पूर्वोत्तर हो, या पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र या गुजरात... भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया है. मैं लोगों को धन्यवाद देता हूं. ’’ उन्होंने कहा कि देशभर के ये नतीजे दर्शाते हैं कि लोग सर्वांगीण प्रगति चाहते हैं और वे भ्रष्टाचार एवं कुशासन को बर्दाश्त नहीं करेंगे.

भाजपा ने असम और मध्यप्रदेश में एक-एक लोकसभा सीट (उपचुनाव में) जीती एवं मध्यप्रदेश, गुजरात एवं अरुणाचल प्रदेश में कई विधानसभा सीटें (उपचुनाव में) जीतीं. पार्टी महाराष्ट्र एवं गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में विजयी होकर उभरी

अपने गृह राज्य गुजरात का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया, ‘‘भाजपा में निरंतर विश्वास व्यक्त करने के लिए मैं गुजरात के लोगों को सलाम करता हूं. स्थानीय निकायों में भाजपा की बड़ी जीत विकास की राजनीति में लोगों के दृढ़ विश्वास को दर्शाती है. ’’ उन्होंने मुख्यमंत्री विजय रूपाणी, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जीतू वघानी समेत राज्य के पार्टी कार्यकर्ताओं को राज्यभर में उनके कठिन परिश्रम के लिए बधाई दी.मोदी ने महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन की कल सराहना की थी.


नोटबंदी को जनता का समर्थन : गुजरात में भी भाजपा को भारी जीत मिली

 


गुजरात: नोटबंदी को जनता का समर्थन! निकाय-पंचायत चुनाव में खिला 'कमल', कांग्रेस को झटका
By Amitabh Kumar | Updated Date: Nov 29 2016

अहमदाबाद : गुजरात में जिला पंचायत, तहसील पंचायत और नगरपालिका की 125 सीटों पर हुए उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भारी जीत मिली है. प्राप्त जानकारी के अनुसार 125 सीटों में से भाजपा ने 109 पर कब्जा जमाकर सभी को आश्‍चर्यचकित कर दिया है. इससे पहले 125 में से 64 के करीब भाजपा के पास सीटें थीं. 64 से सीधे 109 सीटों पर आ जाना भाजपा के लिए बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है. इसके उलट कांग्रेस को इस चुनाव  में  125 सीटों में से मात्र 16 सटें मिलीं हैं. इससे पहले कांग्रेस की करीब 52 सीटें थीं.
उल्लेखनीय है कि नोटबंदी के फैसले के बाद अनुमान लगाया जा रहा था कि भाजपा को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है , लेकिन महाराष्ट्र और गुजरात के नतीजों से सारे अनुमान और राजनीति के जानकारों की बातें खोखली साबित होती नजर आ रही है. दरअसल नोटबंदी को लेकर विपक्ष का आरोप है कि जनता को खासी दिक्कत हो रही है और जनता चुनावों में भाजपा को सबक सिखाएगी.

यहां बताते चलें कि नोटबंदी को लेकर देशभर में चल रहे अफरा-तफरी के बीच महाराष्ट्र नगर परिषद के चुनाव हुए जिसमें भी भाजपा ने अपनी ताकत दिखाकर साबित कर दिया कि जनता उसके साथ है. चुनाव के नतीजे कल सामने आए जिसमें 2501 सीटों में भाजपा ने 610 सीटों पर कब्जा जमाया. वहीं शिवसेना 402 सीट, एनसीपी 482 सीट, कांग्रेस 408, मनसे 12 व बीएसपी 4 सीटों  में जीत दर्ज की. अन्य दलों के हिस्से में 583 सीटें आयी. इस जीत के बाद पीएम मोदी ने कहा कि मुझे लगता है निकाय चुनाव में महाराष्ट्र के लोगों ने भाजपा पर विश्वास जताया है. यह जीत गरीब के हित और विकास की जीत है.

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने इस जीत पर कहा कि चुनाव के नतीजे साफ तौर पर बताते हैं कि पीएम मोदी के कड़े फैसलों का असर हुआ है. वहीं केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडे़कर ने कहा कि गुजरात और महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी की दमदार जीत बताती है कि लोग काले धन के खिलाफ लड़ाई में सरकार के साथ हैं.

भारतबंद बुरी तरह विफल हुआ - अरविन्द सिसोदिया





भारतबंद बुरी तरह विफल हुआ है। किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता में यह दम नहीुं हुआ कि वे दुकानें बंद करवानें निकल सकें। बंगाल में मामूली असर सिर्फ केरल और त्रिपुरा में रहा बांकी सिर्फ फोटो खिचवाई और न्यूज बनवाई तक ही सीमित रहा बंद । कुल मिलाकर बुरी तरह से फैल हुआ भारत बंद । 
- अरविन्द सिसोदिया, जिला महामंत्री, भाजपा कोटा, राजस्थान 94141 80151 


नोटबंदी: विपक्ष का देश भर में विरोध प्रदर्शन, भाजपा बोली, फ्लॉप शो
एजेंसी/ नई दिल्लीUpdated Tue, 29 Nov 2016
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नोटबंदी के फैसले के खिलाफ विपक्षी दलों ने सोमवार को देश भर में विरोध प्रदर्शन किया। यूपी, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा समेत अन्य राज्यों में कांग्रेस, लेफ्ट, तृणमूल कांग्रेस व अन्य कई विपक्षी दलों के नेता सड़कों पर उतरे और नोटबंदी के लिए मोदी सरकार की आलोचना की। हालांकि वामदल शासित केरल और त्रिपुरा के बंद को छोड़कर ज्यादातर जगहों पर आम जनजीवन सामान्य रहा।

वामदलों ने सोमवार को 12 घंटे के बंद के आह्वान किया था, जिसके चलते केरल और त्रिपुरा में जनजीवन ठप रहा। जबकि कांग्रेस, तृणमूल और अन्य कई दलों ने आक्रोश दिवस के तहत सिर्फ विरोध प्रदर्शन किए। जदयू और बीजद ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लिया। भाजपा ने विपक्ष के विरोध और बंद को फ्लॉप शो करार दिया और कहा कि विपक्षी दलों की अपील को जनता ने खारिज कर दिया। जनता ने बता दिया है कि उसे बंद और विरोध प्रदर्शन की अपील करने वाले दागी दलों में कोई भरोसा नहीं है।

कांग्रेस और आप समेत अन्य दलों ने दिल्ली में विरोध प्रदर्शन किया और नोटबंदी से लोगों को हो रही परेशानी को लेकर सरकार पर जोरदार हमला बोला। यूपी के लखनऊ समेत तमाम शहरों में कांग्रेस, वामदलों और आप ने सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन किया। मध्यप्रदेश के ग्वालियर में आक्रोश दिवस रैली के दौरान शहर कांग्रेस अध्यक्ष दर्शन सिंह की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई।

कमिश्नर को ज्ञापन देने के बाद वह अचानक गिर पड़े। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, मगर उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। बिहार में बंद का मिलाजुला असर देखने को मिला। वाम दलों ने कई जगहों पर जोरदार प्रदर्शन किया। कई जिलों में सड़क मार्ग जाम कर दिया, तो कहीं रेल के परिचालन को ही रोक दिया। तमिलनाडु में एमके स्टालिन समेत द्रमुक कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन के बाद गिरफ्तारी दी। महाराष्ट्र में भी कांग्रेस और एनसीपी ने विरोध प्रदर्शन किए।

वामपंथी दलों की बंद की अपील का पश्चिम बंगाल में कोई खास असर नहीं नजर आया। यहां सुबह से ही ट्रेनें, बसों, और ट्रामों का संचालन सामान्य रहा। तमाम दफ्तर भी खुले रहे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस बंद का विरोध किया था।