शनिवार, 9 दिसंबर 2017

बुजुर्गों की सम्पत्ति हड़पने वाले बच्चों को अब मिलेगी सजा


अंतिम अरण्य में जीवन
केपी सिंह जनसत्ता 1 अक्तूबर, 2014: महर्षि वाल्मीकि ने रामायण के लव-कुश प्रकरण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को राजधर्म का पाठ पढ़ाते हुए कहा था कि स्त्रियों, वृद्धों और बच्चों की सुरक्षा का प्रमुख दायित्व राजा पर ही होता है। भारत में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने अनेक कानून

जनसत्ता October 1, 2014

केपी सिंह
जनसत्ता 1 अक्तूबर, 2014: महर्षि वाल्मीकि ने रामायण के लव-कुश प्रकरण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को राजधर्म का पाठ पढ़ाते हुए कहा था कि स्त्रियों, वृद्धों और बच्चों की सुरक्षा का प्रमुख दायित्व राजा पर ही होता है। भारत में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने अनेक कानून बनाए हैं। सामाजिक चेतना के कारण महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार से जुड़े मसले समाचार माध्यमों के जरिए सार्वजनिक बहस का भी विषय बनते रहते हैं। पर यह हकीकत है कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण के प्रति हम उतने संवेदनशील नहीं हो सके हैं जितने होने चाहिए। देश में पैंसठ प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या पैंतीस वर्ष से कम उम्र के लोगों की है।
आज भारत सबसे युवा देश है, पर आगामी पच्चीस वर्षों बाद यहां वरिष्ठ नागरिकों की तादाद दुनिया में सबसे अधिक होगी। संविधान के इकतालीसवें अनुच्छेद में व्यवस्था है कि वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए सरकार उनके सार्वजनिक सहायता प्राप्त करने के अधिकार की रक्षा के कारगर कदम उठाएगी। बदलते राष्ट्रीय और सामाजिक परिवेश में यह जरूरी हो जाता है कि वरिष्ठ नागरिकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें समुचित कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाए। प्रतिवर्ष एक अक्तूबर को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस हमें आत्मावलोकन करने का अवसर प्रदान करता है।

जीवन भर समाज और राष्ट्र की सेवा में लगा देने के बाद, जब न शरीर साथ देता है और न ही मस्तिष्क, वरिष्ठ नागरिकों को तरह-तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता है। कोई पारिवारिक सदस्यों के दुर्व्यवहार और घेरलू हिंसा का शिकार होता है तो किसी को अपने ही घर से बाहर निकाल दिया जाता है। मथुरा की सांसद और अपने समय की प्रसिद्ध अभिनेत्री हेमामालिनी ने वृंदावन की विधवाओं और वृद्ध महिलाओं को लेकर समाज का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश की है।
अकेले रहने वाले बुजुर्ग अमूमन अपराधियों, असामाजिक तत्त्वों और घरेलू नौकरों की हिंसा के शिकार होते रहते हैं। उनकी चल-अचल संपत्ति को हड़पने की फिराक में सगे-संबंधी और रिश्तेदार ही नहीं, किराएदार और आपराधिक तत्त्व भी रहते हैं। बढ़ती उम्र के कारण वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति की देखभाल करने में असमर्थ हो जाते है। किराएदार न तो किराया देता है और न ही संपत्ति को वापस सौंपता है। जीवन की सांध्य वेला से गुजर रहे व्यक्ति में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने का हौसला नहीं होता।
सामाजिक और भावनात्मक सुरक्षा की जरूरत वरिष्ठ नागरिकों को सबसे अधिक होती है। सीमित होते जा रहे पारिवारिक दायरे में वे समाज की मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ जाते हैं। बहुत थोड़े-से संवेदनशील लोग ही उनसे मिलना-जुलना पसंद करते हैं। इस कारण अनेक वरिष्ठ नागरिक एकांत में दूसरे दर्जे का जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं। उनके एकांत-वास को तोड़ने के उपाय करना एक गंभीर चुनौती है।
हजारों की संख्या में वरिष्ठ नागरिक जेलों में बंद हैं। जेल में होने वाली कठिनाइयों को भुगतना उनके लिए सबसे बड़ी त्रासदी है। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता में बुजुर्गों की अवस्था को ध्यान में रखते हुए उनके लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं किए गए हैं। न्यायिक प्रक्रिया में वरिष्ठ नागरिक उसी प्रकार संवेदनशील नजरिये के हकदार हैं जिस प्रकार बच्चे। खूंखार अपराधियों से निपटने के लिए बनाई गई दंड प्रक्रिया संहिता वरिष्ठ नागरिकों के साथ पूरी तरह न्याय नहीं कर पाती है।
मनुष्य के जीवन की अंतिम वेला में एक पड़ाव ऐसा भी आता है जब उसे अपनी दैनिक निवृत्तियों और स्वास्थ्य संबंधी आपातकालीन समस्याओं से निपटने के लिए दूसरों के सहारे पर निर्भर रहना पड़ता है, जो हमेशा सभी को उपलब्ध नहीं होता है। इन समस्याओं से निपटने के लिए पर्याप्त व्यवस्था करने की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी सरकार की ही है।
कुछ वर्ष पहले तक भारत में औसत आयु कम होने के कारण वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बहुत थोड़ी होती थी। इसलिए उनके कल्याण के लिए कोई सक्षम व्यवस्था यहां विकसित नहीं हो पाई है। वर्ष 2050 तक भारत में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या तैंतीस करोड़ होगी। इनमें से पांच करोड़ लोग अस्सी से ज्यादा उम्र के होंगे। औसत आयु के लगातार बढ़ने से अधिक उम्र के लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इतनी बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण और पुनर्वास संबंधी जरूरतों को पूरा करने लिए उचित व्यवस्था भविष्य की सरकारों के लिए एक महत्त्वपूर्ण चुनौती बनने जा रही है।
विदेशों में, विशेषकर पश्चिमी देशों में, सरकारें वरिष्ठ नागरिकों के प्रति बहुत पहले से संवेदनशील रही हैं। वहां उनके रहन-सहन की स्थितियों और सेहत आदि को लेकर सर्वेक्षण भी होते रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उनकी जरूरतों को ध्यान में रख कर बहुत पहले मैड्रिड योजना तैयार की थी। वर्ष 2002 में संयुक्तराष्ट्र ने वरिष्ठ नागरिकों के कल्याणार्थ कुछ मूल सिद्धांत निर्धारित किए थे। उसी साल इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित ‘शंघाई कार्य-योजना’ सभी देशों के मार्गदर्शन के लिए तैयार की गई थी।
वर्ष 2007 में ‘मकाओ दस्तावेज’ के नाम से इसी विषय पर एक दिग्दर्शिका तैयार की गई थी। इन सभी दस्तावेजों में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के समुचित कदम उठाने का आह्वान किया गया है। भारत ने इन सभी दस्तावेजों पर सहमति-स्वरूप हस्ताक्षर करके इन्हें कार्यान्वित करने का वचन अंतरराष्ट्रीय समुदाय को दिया हुआ है। अत: यह हमारा नैतिक और कानूनी दायित्व है कि वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए सक्षम कार्य-योजना तैयार की जाए।
भारत में वरिष्ठ नागरिकों को उचित सम्मान देने की परंपरा रही है। बीसवीं सदी में एक कहावत प्रचलित थी कि बचपन में संरक्षण के लिए जापान, जवानी में लुत्फ उठाने के लिए पश्चिमी देश और वृदावस्था में सुरक्षा पाने लिए भारत दुनिया के सर्वोत्तम स्थान हैं। बुजुर्गों के प्रति पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी का भाव हमें विरासत में मिलता है। पर परिस्थितियां और परिवेश बदल रहे हैं। प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक इतना भाग्यशाली नहीं होता कि उसे जरूरत के समय पर्याप्त सहायता मिलने की गारंटी हो। इसी के मद््देनजर पहले वर्ष 1999 और फिर वर्ष 2011 में भारत में वरिष्ठ नागरिकों के लिए राष्ट्रीय नीति की घोषणा की गई थी। उनके कल्याण और सुरक्षा के मद््देनजर 2007 में एक कानून भी बनाया गया था।
वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण से संबंधित 2007 का कानून प्रभावकारी साबित नहीं हुआ है। इस कानून में उनके भरण-पोषण की जिम्मेदारी मुख्यतया वारिसों पर डाली गई है। इस जिम्मेदारी का कोई मतलब नहीं रह जाता जब चालीस प्रतिशत जनता खुद गरीबी की रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रही है। हमें यह बात भी याद रखनी चाहिए कि किसी को उसकी पारिवारिक, नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारियों का अहसास अकेले कानून बना कर नहीं कराया जा सकता। जरूरतमंद वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी सरकार को वहन करनी चाहिए। उनके लिए आशियाने और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार की प्राथामिकता में होना चाहिए। ऐसे हर वरिष्ठ नागरिक के लिए, जिसे कोई पेंशन नहीं मिलती, सामाजिक सुरक्षा की ऐसी योजना बनाई जाए जिसमें निर्वाह-योग्य न्यूनतम पेंशन की व्यवस्था हो।
वर्ष 2007 में बने कानून में वरिष्ठ नागरिकों से संबंधित मुद््दों पर निर्णय करने के अधिकार सब डिविजनल मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारी को दिए गए हैं। यह अधिकारी जिला प्रशासन का सबसे व्यस्त अधिकारी होता है।
वरिष्ठ नागरिकों के मामलों पर विचार करने के लिए उसके पास पर्याप्त समय ही नहीं होता। इस कानून के अंतर्गत केवल वरिष्ठ नागरिकों के रहने और खाने की व्यवस्था की तरफ ही ध्यान केंद्रित किया गया है। यह जिम्मेवारी भी मुख्य रूप से वारिसों पर ही डाली गई है। वरिष्ठ नागरिकों की सबसे मुख्य समस्या उनके साथ होने वाले घरेलू दुर्व्यवहार हैं जिनमें संपत्ति को हड़पने, मारपीट करने और घर से निकाल देने जैसे घिनौने कृत्य शामिल हैं अधिकतर वरिष्ठ नागरिक घर की इज्जत को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार की शिकायतों को लेकर किसी भी अधिकारी के पास जाना उचित नहीं समझते हैं। वर्तमान कानून भी इस प्रकार की समस्याओं से निजात नहीं दिला पाता है। यह आवश्यक है कि महिलाओं को ध्यान में रख कर बनाए गए घरेलू हिंसा अधिनियम की तर्ज पर वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक कारगर कानून बनाया जाए, जिसमें उनकी सभी समस्याओं का निदान हो।
जो वरिष्ठ नागरिक आर्थिक रूप से समर्थ हैं उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा, संपत्ति की सुरक्षा और भावनात्मक सुरक्षा की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उचित कानूनी प्रावधान किए जा सकते हैं। वर्तमान कानून में इसके लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं है। वर्ष 2007 के कानून की धारा 22 (2) में वरिष्ठ नागरिकों की जिंदगी और संपत्ति की सुरक्षा के लिए एक विस्तृत कार्य-योजना बनाने की जिम्मेदारी सरकार पर डाली गई थी। दुर्भाग्यवश इस कार्य-योजना में वरिष्ठ नागरिकों की उपरोक्तवास्तविक जरूरतों को ध्यान में रख कर पर्याप्त प्रावधान नहीं किए गए हैं। वरिष्ठ नागरिकों का एक वर्ग ऐसा भी है जो आर्थिक तंगी का शिकार है। उनके लिए अलग से सरकारी व्यवस्था करने की जरूरत है।
किसी भी कार्य-योजना को बनाने से पहले भरोसेमंद आंकड़ों की जरूरत होती है। किसी भी सरकारी संस्था के पास वरिष्ठ नागरिकों की जरूरतों के संबंध में आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। किसी को ठीक से यह नहीं पता है कि कितने वरिष्ठ नागरिकों को आश्रय चाहिए, कितनों को आर्थिक मदद, कितनों को संपत्ति की सुरक्षा की दरकार है और कितने कारावासों में बंद हैं। वर्ष 2007 के कानून को लागू करने से जुड़े आंकड़े भी किसी संस्था के पास नहीं हैं। यह बहुत जरूरी है कि इस प्रकार के सभी आंकड़ों को सरकारी तंत्र इकट्ठा करे ताकि उनका प्रयोग नीतियां बनाने में किया जा सके।
जिन नागरिकों ने अपने जीवन का बहुमूल्य समय देश और समाज के लिए लगाया है उन्हें सम्मान का जीवन व्यतीत करने के अवसर प्रदान करना हम सबकी नैतिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी है। वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए बनाए गए वर्ष 2007 के कानून से किसी का भी भला नहीं होने वाला है। इस विषय पर एक नए, अधिक सक्षम कानून बनाने के तकाजे को अब ज्यादा समय तक नहीं टाला जा सकता।

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बुजुर्गों की सम्पत्ति हड़पने वाले बच्चों को अब मिलेगी सजा

अक्सर ऐसे बुजुर्ग मेरे पास अपनी पीड़ा व्यक्त करने आते रहते हैं जिनसे उनकी संतानों ने उनकी जमीन-जायदाद ïआदि अपने नाम लिखवा लेने के बाद उनकी ओर से आंखें फेर कर उन्हें बेसहारा छोड़ दिया है। हाल ही में 2 ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जिनसे एक बार फिर इस गलत रुझान की पुष्टि हुई। पहला मामला महाराष्ट्र के पुणे का है जहां एक सेवानिवृत्त बुजुर्ग ने दो मंजिला मकान बनवाया ताकि वह अतिरिक्त आमदनी के लिए ऊपर का हिस्सा किराए पर दे सकें परंतु बेटे ने धोखे से स्टाम्प पेपर पर उनके हस्ताक्षर लेकर उस हिस्से पर कब्जा कर लिया। इस बीच जब पिता बीमार पड़े तो बेटे ने न सिर्फ उनके इलाज में कोई सहयोग नहीं दिया बल्कि घर के निचले हिस्से पर भी कब्जा जमा लिया। इस पर पिता ने पुणे के अतिरिक्त जिलाधिकारी के पास शिकायत की तो फैसला उनके पक्ष में आने पर बेटे ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी जिस पर बम्बई हाईकोर्ट की न्यायाधीश न्यायमूर्ति साधना जाधव ने पुणे अदालत का फैसला बहाल रखते हुए पिता के घर पर अवैध रूप से कब्जा करने वाले बेटे को घर खाली करने का आदेश देते हुए कहा: ''बच्चे सिर्फ अपने माता-पिता की संपत्ति पर हक ही न जताएं, उनकी देखरेख की जिम्मेदारी भी उठाएं और यदि बेटा घर खाली नहीं करता तो माता-पिता पुलिस का भी सहयोग ले सकते हैं।'' ''यह मामला गिरते सामाजिक मूल्यों की ओर इशारा करता है, इसलिए सरकार को 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक कल्याण एवं भरण-पोषण कानून -2007' के प्रावधानों को सख्ती से लागू करना चाहिए।'' इसी प्रकार के एक अन्य मामले में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजन गुप्ता ने 29 जून को स्पष्ट किया कि: ''जायदाद अपने नाम पर हस्तांतरित करवा लेने के बाद अपने माता-पिता को वहां से बाहर निकाल देने वाली संतान के नाम पर किया गया हस्तांतरण रद्द करके उसे दंडित किया जा सकता है और उसे 3 महीने जेल एवं 5000 रुपए तक जुर्माना भी हो सकता है।'' इस मामले में एक महिला ने, जिसे उसके बेटे ने धोखे से उसका 14 मरले का मकान हड़प कर घर से निकाल दिया था, जून 2014 में अपने बेटे के पक्ष में किए गए मकान का हस्तांतरण रद्द करने के लिए धर्मकोट के एस.डी.ओ. व मैंटेनैंस ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष के समक्ष अपील की थी। इस पर उन्होंने 18 दिसम्बर 2015 को यह आवेदन स्वीकार करके याचिकाकत्र्ता के पक्ष में किया गया हस्तांतरण रद्द करने का आदेश दिया था। 'माता-पिता और वरिष्ठï नागरिक कल्याण एवं भरण-पोषण कानून -2007' की धारा 23 का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति राजन गुप्ता ने कहा, ''यदि अपने नाम सम्पत्ति हस्तांतरित करवाने वाला सम्पत्ति देने वाले को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करता तो इसे धोखे से प्राप्त सम्पत्ति माना जाएगा।'' ''इस स्थिति में कानून ने वरिष्ठ नागरिक को यह विकल्प दिया है कि वह इस हस्तांतरण को रद्द करवा सके। इस मामले में साबित हो गया है कि याचिकाकत्र्ता बेटे ने अपनी बुजुर्ग मां को गुमराह करके उसे धोखा देने के और मकान से बाहर निकालने के इरादे से ही मकान अपने नाम लिखवाया।'' न्यायमूर्ति राजन गुप्ता ने पीड़िता के बेटे की याचिका रद्द करते हुए कहा : ''आज वरिष्ठ नागरिकों को अपने जीवन की संध्या में बुनियादी सुविधाओं और उनकी शारीरिक जरूरतों से वंचित करने के लगातार बढ़ रहे मामले रोकने के लिए यह कानून बनाया गया है और ट्रिब्यूनल ने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उक्त आदेश दिया जिसे बहाल रखा जाता है।'' पहले बम्बई हाईकोर्ट और अब पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा संतानों द्वारा पीड़ित बुजुर्गों

को उनकी सम्पत्ति लौटाने के आदेश एक मार्गदर्शक हैं जिनका पालन यदि सभी संबंधित अधिकारी कठोरतापूर्वक करवाएं तो संतानों द्वारा उपेक्षित बुजुर्गों की दशा में काफी सुधार हो सकता है। भारत में जहां बुजुर्गों को अतीत में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था, आज बुजुर्गों की यह दयनीय स्थिति परेशान करने वाली एवं भारतीय संस्कृति और संस्कारों के विपरीत है। मां की गोद में आंख खुली, जग देखा बाप के कंधे चढ़ कर, सेवा बड़ी न होगी कोई, इन दोनों की सेवा से बढ़ कर। -विजय कुमार

रविवार, 26 नवंबर 2017

दुख को भूलें, सुख को भूलने न दें : प्रधानमंत्री मोदी

भारत का संविधान हमारे लोकतंत्र की आत्मा: ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री मोदी



Quoteहमारा संविधान व्यापक, सभी के लिए समानता और सभी के प्रति संवेदनशीलता इसकी विशेषता: ‘मन की बात’ में पीएम मोदी
Quoteसंविधान का मसौदा तैयार करते वक्त बाबा साहेब अंबेडकर ने समाज के हर वर्ग का कल्याण सुनिश्चित किया: प्रधानमंत्री #मनकीबात
Quoteभारत 9 साल पहले 26/11 को मुंबई में हुए उस आतंकवादी हमले को कभी नहीं भूलेगा जिसने देश को हिलाकर रख दिया था: प्रधानमंत्री मोदी #मनकीबात Quoteआतंकवाद मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इससे न केवल भारत को बल्कि पूरे विश्व को खतरा है। विश्व को इस खतरे से लड़ने के लिए एकजुट होने की जरुरत: पीएम मोदी #मनकीबात Quoteभारत भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, गुरु नानक, और महात्मा गांधी की भूमि जिसने हमेशा से विश्व भर में अहिंसा का संदेश प्रसारित किया है: प्रधानमंत्री
Quoteहमारी नदियां और समुद्र हमारे देश के लिए आर्थिक और रणनीतिक तौर पर महत्त्वपूर्ण: ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री मोदी Quoteज़रा सोचिए, क्या होगा अगर विश्व में कहीं भी उपजाऊ मिट्टी नहीं बचे? मिट्टी नहीं होगी तो न कोई पेड़ होगा, न कोई जीव-जंतु; मानव जीवन ही संभव नहीं होगा: पीएम मोदी #मनकीबात
Quoteहमारे दिव्यांग भाई- बहन दृढ़-निश्चयी, क्षमतावान, साहसी और संकल्पवान। हमें हर पल उनसे कुछ सीखने का मौका मिलता है: ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री
Quoteदेश के प्रत्येक व्यक्ति को सशक्त बनाना हमारी प्रतिबद्धता, समान एवं समावेशी समाज का निर्माण हमारा उद्देश्य: प्रधानमंत्री मोदी #मनकीबात
Quoteदेश सेना, नौसेना और वायु सेना के सैनिकों के बलिदान, उनके साहस, बहादुरी, शौर्य और पराक्रम को सलाम करता है: पीएम मोदी #मनकीबात



मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार | कुछ समय पहले, मुझे कर्नाटक के बालमित्रों के साथ परोक्ष संवाद का अवसर मिला | Times Group के   ‘ विजय कर्नाटका’ अख़बार ने बाल दिवस पर एक पहल की, जिसमें उन्होंने बच्चों से आग्रह किया कि वे देश के प्रधानमंत्री को पत्र लिखें | और फिर उन्होंने उसमें से कुछ selected पत्रों को छापा | मैंने उन पत्रों को पढ़ा, मुझे काफ़ी अच्छा लगा | ये नन्हें-मुन्हें बालक भी, देश की समस्याओं से परिचित हैं, देश में चल रही चर्चाओं से भी परिचित हैं | कई विषयों पर इन बच्चों ने लिखा| उत्तर कन्नड़ की, कीर्ति हेगड़े ने, Digital India और Smart City योजना की सराहना करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि हमें अपनी शिक्षा-व्यवस्था में बदलाव की ज़रूरत है और उन्होंने ये भी कहा कि आजकल बच्चे classroom reading करना पसंद नहीं करते, उन्हें प्रकृति के बारे में जानना अच्छा लगता है | और अगर, हम बच्चों को प्रकृति की जानकारियाँ देंगे तो शायद पर्यावरण की रक्षा में, वो आगे चल करके काम आ सकते हैं |

लक्ष्मेश्वरा से रीडा नदाफ़,उस बच्चे ने लिखा है कि वो एक फौज़ी की बेटी है और उन्हें इस बात का गर्व है | कौन हिन्दुस्तानी होगा जिसको फौज़ी पर गर्व न हो ! और आप तो फौज़ी की बेटी हो, आपको गर्व होना बहुत स्वाभाविक है | कलबुर्गी से इरफ़ाना बेग़म, उन्होंने लिखा है कि उनका स्कूल उनके गाँव से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिसकी वजह से उन्हें घर से जल्दी निकलना पड़ता है और घर वापस आने में भी बहुत देर रात हो जाती है | और, उसमें उन्होंने कहा कि मैं अपने दोस्तों के साथ समय भी नहीं बिता पाती हूँ | और उन्होंने सुझाव दिया है कि नज़दीक में कोई स्कूल होना चाहिए | लेकिन देशवासियो, मुझे अच्छा लगा कि एक अख़बार ने initiative लिया और मुझ तक ये पत्र पहुँचे और मुझे उन पत्रों को पढ़ने का अवसर मिला | मेरे लिए भी ये एक अच्छा अनुभव था |

मेरे प्यारे देशवासियो, आज 26/11 है | 26 नवम्बर, ये हमारा संविधान दिवस है | उन्नीस सौ उनचास में,1949 में आज ही के दिन, संविधान-सभा ने भारत के संविधान को स्वीकार किया था | 26 जनवरी 1950 को, संविधान लागू हुआ और इसलिए तो हम, उसको गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं | भारत का संविधान, हमारे लोकतंत्र की आत्मा है | आज का दिन, संविधान-सभा के सदस्यों के स्मरण करने का दिन है | उन्होंने भारत का संविधान बनाने के लिए लगभग तीन वर्षों तक परिश्रम किया | और जो भी उस debate को पढ़ता है, हमें गर्व होता है कि राष्ट्र को समर्पित जीवन की सोच क्या होती है ! क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि विविधताओं से भरे अपने देश का संविधान बनाने के लिए उन्होंने कितना कठोर परिश्रम किया होगा ? सूझ-बूझ, दूर-दर्शिता के दर्शन कराए होंगे और वो भी उस समय, जब देश ग़ुलामी की जंज़ीरों से मुक्त हो रहा था | इसी संविधान के प्रकाश में संविधान-निर्माताओं , उन महापुरुषों के विचारों के प्रकाश में नया भारत बनाना,ये हम सब का दायित्व है | हमारा संविधान बहुत व्यापक है| शायद जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, प्रकृति का कोई ऐसा विषय नहीं है जो उससे अछूता रह गया हो | सभी के लिए समानता और सभी के प्रति संवेदनशीलता, हमारे संविधान की पहचान है | यह हर नागरिक, ग़रीब हो या दलित, पिछड़ा हो या वंचित , आदिवासी, महिला सभी के मूलभूत अधिकारों की रक्षा करता है और उनके हितों को सुरक्षित रखता है | हमारा कर्तव्य है कि हम संविधान का अक्षरशः पालन करें | नागरिक हों या प्रशासक,संविधान की भावना के अनुरूप आगे बढ़ें | किसी को किसी भी तरह से क्षति ना पहुँचे - यही तो संविधान का संदेश है | आज, संविधान-दिवस के अवसर पर डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर की याद आना तो बहुत स्वाभाविक है | इस संविधान-सभा में महत्वपूर्ण विषयों पर 17 अलग-अलग समितियों का गठन हुआ था | इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण समितियों में से एक, drafting committee थी | और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, संविधान की उस drafting committee के अध्यक्ष थे | एक बहुत बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका का वो निर्वाह कर रहे थे | आज हम भारत के जिस संविधान पर गौरव का अनुभव करते हैं, उसके निर्माण में बाबासाहेब आंबेडकर के कुशल नेतृत्व की अमिट छाप है | उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि समाज के हर तबके का कल्याण हो | 6 दिसम्बर को उनके महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर, हम हमेशा की तरह उन्हें स्मरण और नमन करते हैं | देश को समृद्ध और शक्तिशाली बनाने में बाबासाहेब का योगदान अविस्मरणीय है | 15 दिसम्बर को सरदार वल्लभभाई पटेल की पुण्यतिथि है| किसान-पुत्र से देश के लौह-पुरुष बने सरदार पटेल ने, देश को एक सूत्र में बाँधने का बहुत असाधारण कार्य किया था | सरदार साहब भी संविधान सभा के सदस्य रहे थे | वे मूलभूत अधिकारों, fundamental rights, अल्प-संख्यकों और आदिवासियों पर बनी advisory committee के भी अध्यक्ष थे |

26/11 हमारा संविधान-दिवस है लेकिन ये देश कैसे भूल सकता हैं कि नौ साल पहले 26/11 को, आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला बोल दिया था | देश उन बहादुर नागरिकों, पुलिसकर्मी, सुरक्षाकर्मी, उन हर किसी का स्मरण करता है, उनको नमन करता है जिन्होंने अपनी जान गंवाई | यह देश कभी उनके बलिदान को नहीं भूल सकता | आतंकवाद आज विश्व के हर भू-भाग में और एक प्रकार से प्रतिदिन होने वाली घटना का, एक अति-भयंकर रूप बन गई है | हम, भारत में तो गत 40 वर्ष से आतंकवाद के कारण बहुत कुछ झेल रहे हैं | हज़ारों हमारे निर्दोष लोगों ने अपनी जान गंवाई है| लेकिन कुछ वर्ष पहले,भारत जब दुनिया के सामने आतंकवाद की  चर्चा करता था, आतंकवाद से भयंकर संकट की चर्चा करता था तो दुनिया के बहुत लोग थे, जो इसको गंभीरता से लेने के लिए तैयार नहीं थे | लेकिन जब आज, आतंकवाद उनके अपने दरवाज़ों पर दस्तक दे रहा है तब, दुनिया की हर सरकार, मानवतावाद में विश्वास करने वाले, लोकतंत्र में भरोसा करने वाली सरकारें, आतंकवाद को एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में देख रहे हैं | आतंकवाद ने विश्व की  मानवता को ललकारा है | आतंकवाद ने मानवतावाद को चुनौती दी है | वो मानवीय शक्तियों को नष्ट करने पर तुला हुआ है | और इसलिए, सिर्फ़ भारत ही नहीं, विश्व की सभी मानवतावादी शक्तियों को एकजुट होकर, आतंकवाद को पराजित करके ही रहना होगा | भगवान बुद्ध, भगवान  महावीर, गुरु नानक, महात्मा गांधी, ये ही तो ये धरती है जिसने अहिंसा और प्रेम का संदेश दुनिया को दिया है |  आतंकवाद और उग्रवाद, हमारी सामाजिक संरचना को कमज़ोर कर, उन्हें छिन्न-भिन्न करने का नापाक प्रयास करते हैं | और इसलिए, मानवतावादी शक्तियों का अधिक जागरूक होना समय की मांग है |

मेरे प्यारे देशवासियो, 4 दिसम्बर को हम सब Navy Day, नौ-सेना दिवस मनाएंगें | भारतीय नौ-सेना, हमारे समुद्र-तटों की रक्षा और सुरक्षा प्रदान करती है | मैं, नौ-सेना से जुड़े सभी लोगों का अभिनंदन करता हूँ | आप सभी जानते ही होंगे कि हमारी सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ है | चाहे वो सिन्धु हो, गंगा हो, यमुना हो, सरस्वती हो - हमारी नदियाँ और समुद्र, आर्थिक और सामरिक  strategic, दोनों purpose के लिए महत्वपूर्ण हैं | ये पूरे विश्व के लिए हमारा gateway है | इस देश का, हमारी इस भूमि का महासागरों के साथ अटूट संबंध रहा है | और जब हम, इतिहास की ओर नज़र करते हैं तो 800-900 साल पहले चोल-वंश के समय, चोल-नेवी ( Chola Navy) को सबसे शक्तिशाली नौ-सेनाओं में से एक माना जाता था | चोल-साम्राज्य के विस्तार में , उसे अपने समय का economic super power बनाने में उनकी नेवी का बहुत बड़ा हिस्सा था | चोल-नेवी की मुहीम, खोज- यात्राओं के ढ़ेरों उदाहरण, संगम-साहित्य में आज भी उपलब्ध हैं | बहुत कम लोगों को पता होगा कि विश्व में ज़्यादातर नौ-सेनाओं ने बहुत देर के बाद युद्ध-पोतों पर महिलाओं को allow किया था | लेकिन चोल-नेवी में और वो भी 800-900 साल पहले, बहुत बड़ी संख्या में महिलाओं ने प्रमुख भूमिका निभाई थी | और यहाँ तक कि महिलाएँ, लड़ाई में भी शामिल होती थीं | चोल-शासकों के पास ship building, जहाजों के निर्माण के बारे में बहुत ही समृद्ध ज्ञान था | जब हम नौ-सेना की बात करते हैं तो छत्रपति शिवाजी महाराज और नौ-सेना के उनके सामर्थ्य को कौन भूल सकता है ! कोंकण तट-क्षेत्र, जहाँ समुद्र की महत्वपूर्ण भूमिका है, शिवाजी महाराज के राज्य के अंतर्गत आता था | शिवाजी महाराज से जुड़े कई क़िले जैसे सिंधु दुर्ग, मुरुड जंजिरा,स्वर्ण दुर्ग आदि या तो समुद्र तटों पर स्थित थे या तो समुद्र से घिरे हुए थे | इन क़िलों के सुरक्षा की  ज़िम्मेदारी मराठा नौ-सेना करती थी | मराठा Navy में बड़े-बड़े जहाज़ों और छोटी-छोटी नौकाओं का combination था | उनके नौसैनिक किसी भी दुश्मन पर हमला करने और उनसे बचाव करने में अत्यंत कुशल थे | और हम मराठा नेवी की चर्चा करें और कान्होजी आंग्रे को याद न करें,ये कैसे हो सकता है ! उन्होंने मराठा नौ-सेना को एक नए स्तर पर पहुँचाया और कई स्थानों पर मराठा नौ-सैनिकों के अड्डे स्थापित किए | स्वतंत्रता के बाद हमारी भारतीय नौ-सेना ने विभिन्न अवसरों पर अपना पराक्रम दिखाया - चाहे वो गोवा के मुक्ति-संग्राम हो या 1971 का भारत-पाक युद्ध हो | जब हम नौ-सेना की बात करते हैं तो सिर्फ हमें युद्ध ही नज़र आता है लेकिन भारत की नौ-सेना, मानवता के काम में भी उतनी ही बढ़-चढ़ कर के आगे आई है | इस वर्ष जून महीने में बांग्लादेश और म्यांमार में Cyclone Mora का संकट आया था, तब हमारी नौ-सेना की Ship , INS SUMITRA ने तत्काल rescue के लिए मदद की थी और कई मछुआरों को पानी से बाहर सुरक्षित बचाकर बांग्लादेश को सौंपा था | इस वर्ष मई-जून में जब श्रीलंका में बाढ़ का भयंकर संकट आया था तब हमारी नौ-सेना के तीन जहाज़ों ने तत्काल ही वहाँ पहुँच करके वहाँ की सरकार और वहाँ की जनता को मदद पहुंचाई थी | बांग्लादेश में सितम्बर महीने में रोहिंग्या के मामले में हमारी नौ-सेना की SHIP,  INS GHADIYAL (घड़ियाल) ने मानवीय सहायता पहुंचाई थी | जून महीने में PAPUA NEW GUINEA ( पापुआ न्यू गिनी ) की सरकार ने हमें SOS सन्देश दिया था और उनके fishing boat के मछुआरों को बचाने में हमारी नौ-सेना ने सहायता की थी |   21 नवंबर को पश्चिम GULF में एक merchant vessel में PIRACY की घटना में भी, हमारा नौ-सेना जहाज़ INS TRIKAND (त्रिकंड) सहायता के लिए पहुँच गया था | FIJI तक आरोग्य सेवाएँ पहुंचानी हो, तत्काल राहत पहुँचानी हो, पड़ोसी देश को संकट के समय मानवीय मदद पहुंचानी हो, हमारी नौ-सेना हमेशा गौरवपूर्ण कार्य करती रही है | हम भारतवासी, हमारे सुरक्षा-बलों के प्रति हमेशा गौरव और आदर का भाव रखते हैं - चाहे वो Army हो, Navy हो, Air Force हो , हमारे जवानों का साहस, वीरता, शौर्य, पराक्रम, बलिदान हर देशवासी उनको सलाम करता है | सवा सौ करोड़ देशवासी सुख-चैन की ज़िन्दगी जी सकें  इसलिए वो अपनी जवानी,  देश के लिए क़ुर्बान कर देता है | हर वर्ष 7 दिसम्बर को ARMED FORCES , Flag Day मनाता है | यह देश के  ARMED FORCES के प्रति गर्व करने और सम्मान प्रकट करने का दिन है | मुझे खुशी है, इस बार रक्षा-मंत्रालय ने 1 से 7 दिसम्बर तक अभियान चलाने का निर्णय किया है - देश के नागरिकों के पास पहुँच करके ARMED FORCES के संबंध में लोगों को जानकारी देना, लोगों को जागरूक करना | पूरे सप्ताह-भर बच्चे-बड़े, हर कोई flag लगाएं | देश में सेना के प्रति सम्मान का एक आंदोलन खड़ा हो जाए | इस अवसर पर हम ARMED FORCES FLAGS distribute कर सकते हैं | अपने आस-पास में, अपनी जान-पहचान में जो ARMED FORCES से जुड़े हैं , उनके experiences को, उनके courageous act को, उससे जुड़े videos और pictures, #armedforcesflagday (hashtag armedforcesflagday) पर post कर सकते हैं | स्कूलों में, कॉलेज में, फ़ौज के लोगों को बुला करके, उनसे फ़ौज के विषय में जानकारियाँ ले सकते हैं | हमारी नई पीढ़ी को फ़ौज के संबंध में जानकारियाँ पाने का एक अच्छा अवसर बन सकता है | यह अवसर हमारे ARMED FORCES के सभी जवानों के कल्याण के लिए धनराशि संग्रह करने का होता है | यह राशि, सैनिक कल्याण बोर्ड के माध्यम से युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के परिवारजनों को, घायल सैनिकों के कल्याण के लिए उनके पुनर्वास पर खर्च की जाती है | आर्थिक योगदान देने के लिए आप विभिन्न भुगतान के बारे में जानकारी ksb.gov.in से ले सकते हैं | आप इसके लिए cashless पेमेंट भी कर सकते हैं | आइए, इस अवसर पर हम भी कुछ ऐसा करें, जिससे हमारे सशस्त्र बलों का मनोबल बढ़े | हम भी उनके कल्याण की दिशा में अपना योगदान दें |

मेरे प्यारे देशवासियो, 5 दिसम्बर को ‘World Soil Day’ है | मैं  अपने किसान भाई-बहनों से भी कुछ बाते करना चाहता हूँ | पृथ्वी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है- मिट्टी | हम जो कुछ भी खाते हैं वो इस मिट्टी से ही तो जुड़ा हुआ है | एक तरह से पूरा food chain, मिट्टी soil से जुड़ा हुआ है | ज़रा कल्पना कीजिए , अगर इस विश्व में कही भी उपजाऊ मिट्टी न हो तो क्या होगा ? सोचकर के भी डर लगता है | न मिट्टी होगी, न पेड़-पौधें उगेंगे, मानव-जीवन कहाँ संभव होगा? जीव-जंतु कहाँ संभव होगा? हमारी संस्कृति में इस पर बहुत पहले चिंता कर ली गई और यही कारण है कि हम मिट्टी के महत्व को लेकर, प्राचीन समय से जागरुक रहे हैं | हमारी संस्कृति में एक ओर खेतों के प्रति, मिट्टी के प्रति, भक्ति और आभार-भाव, लोगों में बना रहे ऐसा सहज प्रयास है तो दूसरी ओर ऐसी वैज्ञानिक पद्दतियाँ, जीवन का हिस्सा रहीं कि इस मिट्टी का पोषण होता रहा | इस देश के किसान के जीवन में, दोनों ही बातों का महत्व रहा है - अपनी मिट्टी के प्रति भक्ति और साथ-साथ वैज्ञानिक-रूप से मिट्टी को सहेजना – संवारना | हम सबको इस बात का गर्व है कि हमारे देश के किसान, परंपरा से भी जुड़े रहते हैं और आधुनिक विज्ञान की तरफ भी रूचि रखते हैं, प्रयास करते हैं, संकल्प करते हैं | मैं हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर ज़िले के टोहू गाँव, भोरंज ब्लॉक और वहां के किसानों के बारे में मैंने सुना था | यहाँ किसान पहले असंतुलित ढंग से रासायनिक उर्वरकों , fertiliser का उपयोग कर रहे थे और जिसके कारण उस धरती की सेहत बिगड़ती गई | उपज कम होती गई और उपज कम होने से आय भी कम हो गई और मिट्टी की भी उत्पादकता धीरे-धीरे-धीरे घटती जा रही थी | गाँव के कुछ जागरुक किसानों ने इस परिस्थिति की गंभीरता को समझा और इसके बाद गाँव के किसानो ने समय पर अपनी मिट्टी की जाँच करायी और जितने fertiliser, उर्वरकों, micro-nutrient और जैविक खाद का उपयोग करने के लिए उन्हें कहा गया, उन्होंने उस advice को माना, उस सलाह को माना | और आप यह परिणाम सुनकर के चौंक जाएँगे कि soil health के द्वारा किसानों को जो जानकारी मिली और उससे उनको को मार्गदर्शन मिला,उसको लागू करने का परिणाम क्या आया? रबी 2016-17 में गेंहू के उत्पादन में प्रति एकड़ तीन से चार गुना की वृद्धि हुई और आय में भी प्रति एकड़ चार हज़ार से लेकर के छह(6) हज़ार रूपये तक की वृद्धि हुई | इसके साथ-साथ मिट्टी की quality में भी सुधार आया | fertiliser का उपयोग कम होने के कारण आर्थिक बचत भी हुई | मुझे यह देख कर काफी ख़ुशी है कि मेरे किसान भाई soil health card ,मृदा–स्वास्थ्य कार्ड में दी गई सलाह पर अमल करने के लिए आगे आए हैं और जैसे-जैसे परिणाम मिल रहे हैं , उनका उत्साह भी बढ़ता जा रहा है | और अब किसान को भी लग रहा है कि अगर फसल की चिंता करनी है तो पहले धरती-माँ का ख्याल रखना होगा और अगर धरती-माँ का ख्याल हम रखेंगे तो धरती-माँ, हम सब का ख्याल रखेंगी | देश-भर में हमारे किसानों ने 10 करोड़ से अधिक soil health card बनवा लिए हैं ताकि वे अपनी मिट्टी को बेहतर ढंग से समझ सकें और उस अनुरुप, फसल भी बो सकें | हम धरती-माता की भक्ति करते हैं पर धरती-माता को यूरिया जैसे उर्वरक fertiliser से धरती-माँ के स्वास्थ्य को कितनी हानि होती है, कभी सोचा है? हर प्रकार के वैज्ञानिक तरीक़ों से यह सिद्ध हो चुका है कि धरती-माँ को आवश्यकता से अधिक यूरिया के उपयोग से गंभीर नुक़सान पहुँचता है | किसान तो धरती का पुत्र है, किसान धरती-माँ को बीमार कैसे देख सकता है? समय की माँग है, इस माँ-बेटे के संबंधों को फिर से एक बार जागृत करने की | क्या हमारे किसान, हमारे धरती के पुत्र, हमारे धरती के संतान ये संकल्प कर सकते हैं क्या कि आज वो अपने खेत में जितना यूरिया का उपयोग करता है , 2022, जब आज़ादी के 75 साल होंगे, आधा उपयोग बंद कर देगा ? एक बार अगर  माँ-धरती का पुत्र, मेरा किसान भाई, ये संकल्प कर ले तो देखिए कि धरती-माँ की सेहत सुधर जाएगी, उत्पादन बढ़ जाएगा | किसान की ज़िन्दगी में बदलाव आना शुरू हो जाएगा |            

Global warming, Climate change अब हम सब लोग अनुभव करने लगे हैं | वो भी एक वक़्त था कि दीवाली के पहले सर्दी आ जाती थी | अब दिसम्बर दस्तक दे रहा है और सर्दी बहुत धीरे-धीरे-धीरे कदम बढ़ा रही है | लेकिन जैसे ही सर्दी शुरू हो जाती है, हम सब का अनुभव है कि रज़ाई से बाहर निकलना ज़रा अच्छा नहीं लगता है | लेकिन, ऐसे मौसम में भी सतत-जागरूक रहने वाले लोग कैसा परिणाम लाते हैं और ये उदाहरण हम सब के लिए प्रेरणा देते हैं | आपको भी सुन करके आश्चर्य होगा कि मध्यप्रदेश के एक 8 वर्षीय दिव्यांग बालक तुषार, उसने अपने गाँव को खुले में शौच से मुक्त कराने का बीड़ा उठा लिया | इतने व्यापक स्तर का काम और इतना छोटा बालक! लेकिन जज़्बा और संकल्प, उससे कई गुना बड़े थे, बृहत् थे और ताक़तवर थे | 8 वर्षीय बालक बोल नहीं सकता लेकिन उसने सीटी को अपना हथियार बनाया और सुबह 5 बजे उठ कर, अपने गाँव में घर-घर जा कर लोगों को सीटी से जगा करके, हाथ के action से खुले में शौच न करने के लिए शिक्षा देने लगा | हर दिन 30-40 घरों में जा करके स्वच्छता की सीख देने वाले इस बालक की बदौलत कुम्हारी गाँव, खुले में शौच से मुक्त हो गया | स्वच्छता को बढ़ावा देने की दिशा में उस नन्हे बालक तुषार ने प्रेरक काम किया | ये दिखाता है कि स्वच्छता की न कोई उम्र होती है, न कोई सीमा | बच्चा हो या बुज़ुर्ग, महिला हो या पुरुष, स्वच्छता सभी के लिए ज़रुरी है और स्वच्छता के लिए हर किसी को कुछ-न-कुछ करने की भी ज़रुरत है | हमारे दिव्यांग भाई-बहन दृढ़-निश्चयी हैं, सामर्थ्यवान हैं ,साहसिक और संकल्पवान हैं | हर पल हमें कुछ-न-कुछ सीखने को मिलता है | आज वे हर-एक क्षेत्र में अच्छा कर रहे हैं | चाहे खेल का क्षेत्र हो, कोई competition का हो, कोई सामाजिक पहल हो- हमारे दिव्यांग-जन भी किसी से पीछे नहीं रहते हैं | आप सब को याद होगा हमारे दिव्यांग खिलाड़ियों ने Rio Olympic में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 4 पदक जीते थे और Blind T-20 Cricket World Cup में भी champion बने थे | देशभर में अलग-अलग तरह की प्रतियोगिताएँ होती रहती हैं | पिछले दिनों उदयपुर में 17वीं National Para-swimming प्रतियोगिता आयोजित हुई | देशभर के विभिन्न हिस्सों से आए हुए हमारे युवा दिव्यांग भाई-बहनों ने इसमें भाग लिया और अपने कौशल का परिचय दिया | उन्हीं में से एक हैं गुजरात के 19 साल के जिगर ठक्कर, उनके शरीर के 80% हिस्से में मांसपेशी नहीं है लेकिन उनका साहस, संकल्प और उनकी मेहनत को देखिए ! National Para-swimming प्रतियोगिता में 19 साल के जिगर ठक्कर जिसके शरीर में 80 % मांसपेशी न हो और 11 Medal जीत जाए ! 70वीं National Para-swimming प्रतियोगिता में भी उन्होंने gold  जीता | उनके इसी कौशल का परिणाम है कि वो भारत के Sports Authority of India द्वारा 20-20 Paralympics के लिए चुने गए, 32 para तैराकों में से एक हैं जिन्हें गुजरात के गांधी नगर में  Centre for Excellences में training दी जाएगी | मैं युवा जिगर ठक्कर के जज़्बे को सलाम करता हूँ और उन्हें अपनी शुभकामनाएँ देता हूँ | आज दिव्यांगजनों के लिए accessibility और opportunity पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है | हमारा प्रयास है कि देश का हर एक व्यक्ति सशक्त हो | एक समावेशी समाज का निर्माण हो | ‘सम’ और ‘मम’ के भाव से समाज में समरसता बढ़े और सब, एक साथ मिल करके आगे बढ़ें |

कुछ दिन बाद ‘ईद-ए-मिलाद-उन-नबी’ का पर्व मनाया जाएगा | इस दिन पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब का जन्म हुआ था | मैं सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ और मुझे आशा है कि ईद का ये पर्व, समाज में शांति और सद्भावना को बढ़ाने के लिए हम सबको नयी प्रेरणा दे, नयी ऊर्जा दे, नया संकल्प करने का सामर्थ्य दे |    

(फ़ोन-कॉल)
‘नमस्ते प्रधानमंत्री जी , मैं कानपुर से नीरजा सिंह बोल रही हूँ | मेरी आपसे एक requestrequestrequest है कि इस पूरे साल में जो आपने अपनी ‘मन की बात’ में जो बातें कही हैं , उनमें से जो दस सबसे अच्छी बातें हैं उनको आप हमसे दोबारा shareshare करें | जिससे कि हमसब को पुनः उन बातों का स्मरण हो और हमें कुछ सीखने को मिले | धन्यवाद |
(फ़ोन-कॉल समाप्त)

आपकी बात सही है कि 2017 पूर्ण हो रहा है, 2018 दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है | लेकिन आपने अच्छा सुझाव दिया है | लेकिन आप ही की बात से मुझे, कुछ और उसमें जोड़ने का और परिवर्तन का मन करता है | और हमारे यहाँ तो गाँव के अंदर जो हमारे वरिष्ठ लोग होते हैं, गाँव के जो बूढ़े लोग होते हैं, बड़े-बूढ़े हमेशा कहा करते हैं- दुख को भूलो और सुख को भूलने मत दो | दुख को भूलें, सुख को भूलने न दें | मुझे लगता है, इस बात को हमे प्रचारित करना चाहिए | हम भी 2018 में शुभ का स्मरण करते हुए, शुभ का संकल्प करते हुए प्रवेश करें | हम जानते हैं कि हमारे यहाँ तो, शायद दुनिया-भर में होता है कि वर्ष के अंत में जब लेखा-जोखा करते हैं,चिंतन-मनन करते हैं , मंथन करते हैं और अगले वर्ष के लिए योजनाएँ बनाते हैं | हमारे यहाँ media में तो, बीते हुए साल की कई रोचक घटनाओं को फिर से एक बार पुनः स्मरण कराने का प्रयास होता है | उसमें positive भी होती हैं , negative भी होती हैं | लेकिन क्या आपको नहीं लगता है कि 2018 में हम प्रवेश, अच्छी चीज़ों को याद करके करें , अच्छा करने के लिए करें ? मैं आप सबको एक सुझाव देता हूँ कि आप सब 5-10 अच्छी positive बातें जो आपने सुनी हों, आपने देखी हों, आपने अनुभव की हों और जिसको अगर और लोग जाने तो उनको भी एक शुभ-भाव पैदा हो | क्या आप इसमें योगदान दे सकते हैं ? क्या इस बार हम इस वर्ष के अपने जीवन के 5 positive experience share कर सकते हैं ? चाहे वो फ़ोटो के माध्यम से हो, छोटी-सी कोई कहानी के रूप में हो, story के रूप में हो, छोटे से video के रूप में हो, मैं निमंत्रित करता हूँ कि 2018 का स्वागत हमें एक शुभ-वातावरण में करना है | शुभ-स्मृतियों के साथ करना है| Positive thinking के साथ करना है | Positive बातों को याद करके करना है |

आइए, NarendraModi App पर, MyGov पर या social media पर #PositiveIndia (हैशटैग Positive India) के साथ सकारात्मक बातों को share करें | औरों को प्रेरणा देने वाली घटनाओं का स्मरण करें | अच्छी बातों को याद करेंगे तो अच्छा करने का mood बनेगा | अच्छी चीजें, अच्छा करने के लिए ऊर्जा दे देती हैं | शुभ-भाव, शुभ-संकल्प का कारण बनता है | शुभ-संकल्प, शुभ-परिणाम के लिए आगे ले जाता है |

आइए, इस बार प्रयास करें #PositiveIndia (हैशटैग Positive India) | देखिये, हम सब मिलकर के क्या ज़बरदस्त positive vibe generate करके, आने वाले साल का स्वागत करेंगे | इस collective momentum की ताक़त और इसका impact हम सब मिल करके देखेंगे | और मैं जरुर अगले ‘मन की बात’ में आपके इन #PositiveIndia (हैशटैग Positive India) पर आई हुई चीज़ों को देशवासियों के बीच पहुँचाने का प्रयास करूँगा |

मेरे प्यारे देशवासियो, अगले महीने, अगली ‘मन की बात’ के लिए फिर आपके बीच आऊँगा | ढ़ेर सारी बातें करने का अवसर मिलेगा | बहुत-बहुत धन्यवाद !

बुधवार, 22 नवंबर 2017

मारवाड़ का रक्षक वीर दुर्गादास राठौड़ : जोधपुर

मारवाड़ का रक्षक वीर दुर्गादास राठौड़ : जोधपुर

ऐतिहासिक तथ्यों से परिपूर्ण लेख :-
अपनी जन्मभूमि मारवाड़ को मुक्त कराने वाले वीर दुर्गादास राठौड़ का आज 22 नवंबर को निर्वाण दिवस है। उनका जन्म जन्म 13 अगस्त, 1638 को ग्राम सालवा में हुआ था। उनके पिता जोधपुर राज्य के दीवान श्री आसकरण तथा माता नेतकँवर थीं। आसकरण की अन्य पत्नियाँ नेतकँवर से जलती थीं। अतः मजबूर होकर आसकरण ने उसे सालवा के पास लूणवा गाँव में रखवा दिया। छत्रपति शिवाजी की तरह दुर्गादास का लालन-पालन उनकी माता ने ही किया। उन्होंने दुर्गादास में वीरता के साथ-साथ देश और धर्म पर मर-मिटने के संस्कार डाले।
आसकरण जी उज्जैन की लड़ाई में धोखे से मारे गये। उस समय दुर्गादास केवल पंद्रह वर्ष के थे पर ऐसे होनहार थे कि मारवाड़ के तत्कालीन राजा जसवन्त सिंह (प्रथम) अपने बड़े बेटे पृथ्वीसिंह की तरह इन्हें भी प्यार करने लगे। एक बार महाराज के एक मुँह लगे दरबारी राईके ने कुछ उद्दण्डता की। दुर्गादास से सहा नहीं गया। उसने सबके सामने राईके को कठोर दण्ड दिया। इससे प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें निजी सेवा में रख लिया और अपने साथ अभियानों में ले जाने लगे। एक बार उन्होंने दुर्गादास को ‘मारवाड़ का भावी रक्षक’ कहा; पर वीर दुर्गादास सदा स्वयं को मारवाड़ की गद्दी का सेवक ही मानते थे।
कुछ दिनों बाद जब महाराज दक्खिन की सूबेदारी पर गये, तो पृथ्वीसिंह को राज्य का भार सौंपा और वीर दुर्गादास को सेनापति बनाकर अपने साथ कर लिया। उस समय दक्खिन में महाराज शिवाजी का साम्राज्य था।मुग़लों की उनके सामने एक न चलती थी; इसलिए औरंगजेब ने जसवन्तसिंह को भेजा था। जसवन्तसिंह के पहुंचते ही मार-काट बन्द हो गई। धीरे-धीरे शिवाजी और जसवन्तसिंह में मेल-जोल हो गया। औरंगजेब की इच्छा तो थी कि शिवाजी को परास्त किया जाये। यह इरादा पूरा न हुआ, तो उसने जसवन्तसिंह को वहां से हटा दिया, और कुछ दिनों उन्हें लाहौर में रखकर फिर काबुल भेज दिया। काबुल के मुसलमान इतनी आसानी से दबने वाले नहीं थे। भीषण संग्राम हुआ; जिसमें महाराजा के दो बेटे मारे गये। बुढ़ापे में जसवन्तसिंह को यह गहरी चोट लगी। बहुत दु:खी होकर वहां से पेशावर चले गये।
औरंगजेब की कुदृष्टि मारवाड़ के विशाल राज्य पर थी और इसीलिये उसने षड्यन्त्रपूर्वक जसवन्त सिंह को अफगानिस्तान में पठान विद्रोहियों से लड़ने भेजा था। इस अभियान के दौरान नवम्बर 1678 में जमरूद में उनकी मृत्यु हो गयी। इसी बीच उनकी रानी आदम जी ने पेशावर में एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम अजीत सिंह रखा गया। जसवन्त सिंह के मरते ही औरंगजेब ने जोधपुर रियासत पर कब्जा कर वहाँ शाही हाकिम बैठा दिया। उसने अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा घोषित करने के बहाने दिल्ली बुलाया। वस्तुतः वह उसे मुसलमान बनाना या मारना चाहता था।
इस कठिन घड़ी में दुर्गादास अजीत सिंह के साथ दिल्ली पहुंचे। एक दिन अचानक मुगल सैनिकों ने अजीत सिंह के आवास को घेर लिया। अजीत सिंह की धाय गोरा टांक ने पन्ना धाय की तरह अपने पुत्र को वहां छोड़ दिया और उन्हें लेकर गुप्त मार्ग से बाहर निकल गयी। उधर दुर्गादास ने हमला कर घेरा तोड़ दिया और वे भी जोधपुर की ओर निकल गये। उन्होेंने अजीत सिंह को सिरोही के पास कालिन्दी गाँव में पुरोहित जयदेव के घर रखवा कर मुकुनदास खीची को साधु वेश में उनकी रक्षा के लिए नियुक्त कर दिया। कई दिन बाद औरंगजेब को जब वास्तविकता पता लगी, तो उसने बालक की हत्या कर दी।
अब दुर्गादास मारवाड़ के सामन्तों के साथ छापामार शैली में मुगल सेनाओं पर हमले करने लगे। उन्होंने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह तथा मराठों को भी जोड़ना चाहा; पर इसमें उन्हें पूरी सफलता नहीं मिली। उन्होंने औरंगजेब के छोटे पुत्र अकबर को राजा बनाने का लालच देकर अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह के लिए तैयार किया; पर दुर्भाग्यवश यह योजना भी पूरी नहीं हो पायी।
अगले 30 साल तक वीर दुर्गादास इसी काम में लगे रहे। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उनके प्रयास सफल हुए। 20 मार्च, 1707 को महाराजा अजीत सिंह ने धूमधाम से जोधपुर दुर्ग में प्रवेश किया। वे जानते थे कि इसका श्रेय दुर्गादास को है, अतः उन्होंने दुर्गादास से रियासत का प्रधान पद स्वीकार करने को कहा; पर दुर्गादास ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। उनकी अवस्था भी अब इस योग्य नहीं थी। अतः वे अजीतसिंह की अनुमति लेकर उज्जैन के पास सादड़ी चले गये। इस प्रकार उन्होंने महाराजा जसवन्त सिंह द्वारा उन्हें दी गयी उपाधि ‘मारवाड़ का भावी रक्षक’ को सत्य सिद्ध कर दिखाया। वहीँ शिप्रा के किनारे 22 नवम्बर 1718 को उनका निधन हो गया और इसी के साथ अस्त हो गया राजपूतों की शान बान और बलिदान की परंपरा का एक और सूर्य।
उनकी प्रशंसा में आज भी मारवाड़ में निम्न पंक्तियाँ प्रचलित हैं -
माई ऐहडो़ पूत जण, जेहड़ो दुर्गादास ।
मार मण्डासो थामियो, बिन थाम्बा आकास ।।
वीरवर दुर्गादास को शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|
वाट्सएप पोस्ट से साभार..

शनिवार, 18 नवंबर 2017

महारानी पदमिनी और जौहर



卐 जरूर पढ़े और शेयर करे। ... महान सत्य 卐
🔘 1. *बप्पा रावल*- अरबो, तुर्को को कई हराया ओर हिन्दू धरम रक्षक की उपाधि धारण की
🔘 2. *भीम देव सोलंकी द्वितीय* - मोहम्मद गौरी को 1178 मे हराया और 2 साल तक जेल मे बंधी बनाये रखा
🔘 3. *पृथ्वीराज चौहान* - गौरी को 16 बार हराया और और गोरी बार बार कुरान की कसम खा कर छूट जाता ...17वी बार पृथ्वीराज चौहान हारे
🔘 4. *हम्मीरदेव (रणथम्बोर)* - खिलजी को 1296 मे अल्लाउदीन ख़िलजी के 20000 की सेना में से 8000 की सेना को काटा और अंत में सभी 3000 राजपूत बलिदान हुए राजपूतनियो ने जोहर कर के इज्जत बचायी ..हिनदुओ की ताकत का लोहा मनवाया
🔘 5. *कान्हड देव सोनिगरा* – 1308 जालोर मे अलाउदिन खिलजी से युद्ध किया और सोमनाथ गुजरात से लूटा शिवलिगं वापिस राजपूतो के कब्जे में लिया और युद्ध के दौरान गुप्त रूप से विश्वनीय राजपूतो , चरणो और राजपुरोहितो द्वारा गुजरात भेजवाया तथा विधि विधान सहित सोमनाथ में स्थापित करवाया
🔘 6. *राणा सागां*- बाबर को भिख दी और धोका मिला ओर युद्ध . राणा सांगा के शरीर पर छोटे-बड़े 80 घाव थे, युद्धों में घायल होने के कारण उनके एक हाथ नही था एक पैर नही था, एक आँख नहीं थी उन्होंने अपने जीवन-काल में 100 से भी अधिक युद्ध लड़े थे.
🔘 7. *राणा कुम्भा* - अपनी जिदगीँ मे 17 युदध लडे एक भी नही हारे
🔘 8. *जयमाल मेड़तिया*- ने एक ही झटके में हाथी का सिर काट डाला था। चित्तोड़ में अकबर से हुए युद्ध में *जयमाल राठौड़* पैर जख्मी होने कि वजह से *कल्ला जी* के कंधे पर बैठ कर युद्ध लड़े थे, ये देखकर सभी युद्ध-रत साथियों को चतुर्भुज भगवान की याद आयी थी, जंग में दोनों के सिर काटने के बाद भी धड़ लड़ते रहे और 8000 राजपूतो की फौज ने 48000 दुश्मन को मार गिराया ! अंत में अकबर ने उनकी वीरता से प्रभावित हो कर जयमाल मेड़तिया और पत्ता जी की मुर्तिया आगरा के किलें में लगवायी थी.
🔘 9. *मानसिहं तोमर*- महाराजा मान सिंह तोमर ने ही ग्वालियर किले का पुनरूद्धार कराया और 1510 में सिकंदर लोदी और इब्राहीमलोदी को धूल चटाई
🔘 10. *रानी दुर्गावती*- चंदेल राजवंश में जन्मी रानी दुर्गावती राजपूत राजा कीरत राय की बेटी थी। गोंडवाना की महारानी दुर्गावती ने अकबर की गुलामी करने के बजाय उससे युद्ध लड़ा 24 जून 1564 को युद्ध में रानी दुर्गावती ने गंभीर रूप से घायल होने के बाद अपने आपको मुगलों के हाथों अपमान से बचाने के लिए खंजर घोंपकर आत्महत्या कर ली।
🔘 11. *महाराणा प्रताप* - इनके बारे में तो सभी जानते ही होंगे ... महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलो था और कवच का वजन 80 किलो था और कवच, भाला, ढाल, और हाथ मे तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो था.
🔘 12. *जय सिंह जी* - जयपुर महाराजा ने जय सिंह जी ने अपनी सूझबुज से छत्रपति शिवजी को औरंगज़ेब की कैद से निकलवाया बाद में औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उनकी हत्या विष देकर करवा डाली
🔘 13. *छत्रपति शिवाजी* - मेवाड़ सिसोदिया वंशज छत्रपति शिवाजी ने औरंगज़ेब को हराया तुर्को और मुगलो को कई बार हराया
🔘 14. *रायमलोत कल्ला जी* का धड़ शीश कटने के बाद लड़ता- लड़ता घोड़े पर पत्नी रानी के पास पहुंच गया था तब रानी ने गंगाजल के छींटे डाले तब धड़ शांत हुआ उसके बाद रानी पति कि चिता पर बैठकर सती हो गयी थी.
🔘 15. सलूम्बर के नवविवाहित *रावत रतन सिंह चुण्डावत* जी ने युद्ध जाते समय मोह-वश अपनी पत्नी हाड़ा रानी की कोई निशानी मांगी तो रानी ने सोचा ठाकुर युद्ध में मेरे मोह के कारण नही लड़ेंगे तब रानी ने निशानी के तौर
पैर अपना सर काट के दे दिया था, अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृ भूमि के लिए शहीद हो गये थे.
🔘 16. औरंगज़ेब के नायक तहव्वर खान से गायो को बचाने के लिए पुष्कर में युद्ध हुआ उस युद्ध में *700 मेड़तिया राजपूत* वीरगति प्राप्त हुए और 1700 मुग़ल मरे गए पर एक भी गाय कटने न दी उनकी याद में पुष्कर में गौ घाट बना हुआ है
🔘 17. एक राजपूत वीर जुंझार जो मुगलो से लड़ते वक्त शीश कटने के बाद भी घंटो लड़ते रहे आज उनका सिर बाड़मेर में है, जहा छोटा मंदिर हैं और धड़ पाकिस्तान में है.
🔘 18. जोधपुर के *यशवंत सिंह* के 12 साल के पुत्र *पृथ्वी सिंह* ने हाथो से औरंगजेब के खूंखार भूखे जंगली शेर का जबड़ा फाड़ डाला था.
🔘 19. *करौली के जादोन राजा* अपने सिंहासन पर बैठते वक़्त अपने दोनो हाथ जिन्दा शेरो पर रखते थे.
🔘 20. हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 राजपूत सैनिक थे और अकबर की और से 85000 सैनिक थे फिर भी अकबर की मुगल सेना पर हिंदू भारी पड़े
🔘 21. राजस्थान पाली में आउवा के *ठाकुर खुशाल सिंह* 1857 में अजमेर जा कर अंग्रेज अफसर का सर काट कर ले आये थे और उसका सर अपने किले के बाहर लटकाया था तब से आज दिन तक उनकी याद में मेला लगता है
🔘22. वीर बंदा बैरागी - मुगलो के अजेय होने के भ्रम को तोडा और वजीर खान को मारकर सरहिंद पर विजय प्राप्त की ।
🔘 23. *जौहर  युद्ध के बाद अनिष्ट परिणाम और होने वाले अत्याचारों व व्यभिचारों से बचने और अपनी पवित्रता कायम रखने हेतु महिलाएं अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा कर,तुलसी के साथ गंगाजल का पानकर जलती चिताओं में प्रवेश कर अपने सूरमाओं को निर्भय करती थी कि नारी समाज की पवित्रता अब अग्नि के ताप से तपित होकर कुंदन बन गई है और राजपूतनिया जिंदा अपने इज्जत कि खातिर आग में कूद कर आपने सतीत्व कि रक्षा करती थी | पुरूष इससे चिंता मुक्त हो जाते थे कि युद्ध परिणाम का अनिष्ट अब उनके स्वजनों को ग्रसित नही कर सकेगा | महिलाओं का यह आत्मघाती कृत्य जौहर के नाम से विख्यात हुआ| सबसे ज्यादा जौहर और शाके चित्तोड़ के दुर्ग में हुए | शाका : महिलाओं को अपनी आंखों के आगे जौहर की ज्वाला में कूदते देख पुरूष कसुम्बा पान कर,केशरिया वस्त्र धारण कर दुश्मन सेना पर आत्मघाती हमला कर इस निश्चय के साथ रणक्षेत्र में उतर पड़ते थे कि या तो विजयी होकर लोटेंगे अन्यथा विजय की कामना हृदय में लिए अन्तिम दम तक शौर्यपूर्ण युद्ध करते हुए दुश्मन सेना का ज्यादा से ज्यादा नाश करते हुए रणभूमि में चिरनिंद्रा में शयन करेंगे | पुरुषों का यह आत्मघाती कदम शाका के नाम से विख्यात हुआ
""जौहर के बाद राजपूत पुरुष जौहर कि राख का तिलक कर के सफ़ेद कुर्ते पजमे में और केसरिया फेटा ,केसरिया साफा या खाकी साफा और नारियल कमर पर बांध कर तब तक लड़के जब तक उन्हें वीरगति न मिले ये एक आत्मघाती कदम होता। ....."""|
卐 *जैसलमेर* के जौहर में 24,000 राजपूतानियों ने इज्जत कि खातिर अल्लाउदीन खिलजी के हरम जाने की बजाय आग में कूद कर अपने सतीत्व के रक्षा कि ..
卐 1303 चित्तोड़ के दुर्ग में सबसे पहला जौहर चित्तोड़ की *महारानी पद्मिनी* के नेतृत्व में 16000 हजार राजपूत रमणियों ने अगस्त 1303 में किया था |
卐 चित्तोड़ के दुर्ग में दूसरे जौहर चित्तोड़ की *महारानी कर्मवती* के नेतृत्व में 8,000 हजार राजपूत रमणियों ने 1535 AD में किया था |
卐 चित्तोड़ के दुर्ग में तीसरा जौहर अकबर से हुए युद्ध के समय 11,000 हजार राजपूत नारियो ने 1567 AD में किया था |
卐 ग्वालियर व राइसिन का जोहर ये जोहर तोमर सहिवाहन पुरबिया के वक़्त हुआ ये राणा सांगा के रिशतेदार थे और खानवा युद्ध में हर के बाद ये जोहर हुआ
卐 ये जोहर अजमेर में हुआ पृथ्वीराज चौहान कि शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी से ताराइन की दूसरी लड़ाई में हार के बाद हुआ इसमें *रानी संयोगिता* ने महल उपस्थित सभी महिलाओं के साथ जौहर किया ) जालोर का जौहर ,बारमेर का जोहर आदि
""". इतिहास गवाज है हम राजपूतो की हर लड़ाई में दुश्मन सेना तिगुनी चौगनी होती थी राजस्थान मालवा और सौराष्ट्र में मुगलो ने एक भी हमला राजपूतो पर तिगुनी और चौगनी फ़ौज से कम के बिना नही नही किया पर युद्ध के अंतः में दुश्मन आधे से ऊपर मारे जाते थे ""
卐卐 तलवार से कडके बिजली, लहु से लाल हो धरती, प्रभु ऐसा वर दो मोहि, विजय मिले या वीरगति ॥ 卐卐
*|| जय एकलिंग जी की ||*
*११ जय श्री कल्याण ११*

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PLEASE READ !! * * *
( जौहर ) यह शब्द एसा शब्द है जिसे सुनकर , पढ़कर या सोचकर मेरा मन आज भी उतना ही भयबीत हो जाता है जितना पहली बार इसके बारे मे समझकर हुआ था , आज बहुत से लोग इस प्रथा के बारे में नही जांते और जान्ने का प्रयत्न भी नही करते वैसे तो आप में से कई सारे भाइ बहनों नें इस प्रथा का नाम सुना होगा और कई सारे इस प्रथा के बारे में अच्छी तरह समझते भी होंगे ।
जौहर राजपूतों की एक प्रथा रही है जब कोई भी बाहरी इस्लामिक सेना राजपूत सामराज्यों पर आक्रमण करतीं थी तब युद्ध के दौरान इस समारंभ की तैयारीयाँ करवाई जाती थी , पौराणिक काल से चली आ रही यह प्रथा कब से शुरू हुई यह किसी को नहीं पता लेकिन कहते हैं की जौहर प्रथा बनाने का मुख्य कारण इस्लामिक आक्रमण थे । पौराणिक काल से ही इस्लामिक लुटेरे भारत पर उत्तर पूर्वी और उत्तर पश्चिमी छोर से आक्रमण करने का प्रयत्न करते थे और असफल हो जाते थे
उनकी सैना इतनी भयबीत हो चुकी थी की भारत पर आक्रमण करने के बारे में सोचना भी बंद कर दिया था , तब आक्रमणकर्ताओं को एक नई युक्ती सूझी और उन ने अपनी सेना को हिन्दू रानीयों और उनकी सुंदर दासीयों का लालच देकर भारत पर आक्रमण करने का मन बनाया । जब राजपुताने में यह खबर लगी तब जौहर प्रथा का निर्माण हुआ
यह प्रथा सती प्रथा से बिलकुल अलग होती थी सती प्रथा में किसी पुरूष के मरने के बाद उसकी विदवा औरत को सती होना पड़ता था और कई बार तो जबरन भी आग में फेंक दिया जाता था लेकिन जौहर प्रथा इस से बिल्कुल अलग होती थी जौहर प्रथा में राजपुतानीयों पर किसी तरह का दवाब नही होता था अथवा यह राजघराने की औरतों और उनकी दासीयों के आत्मसम्मान को बचाने के लिये यह प्रथा बनाई गई थी ।जब इस्लामिक आक्रमणकर्तओं को कोई भी औरत हाथ ना लगती तो वे अन्य हिन्दू जाती की औरतों को अपना शिकार बनाते और उनका धर्म परिवर्तन भी करवाते थे इस तरह इनकी सेना की जंसंख्या मे भी बड़ोतरी होती थी ।
जौहर प्रथा का समारंग निम्नलिखित स्थितियों में करवाया जाता था :-
1- जब सेना किसी इस्लामिक आक्रमणकर्ताओं से लड़ रही हो ।
2- सेना को यह स्मरण हो जाए की
जीत अनिश्चित है और दुश्मन की सेना जंसंख्या में अधिक बड़ी है ।
3- जब सेना को यह पता लग जाए की दुश्मन अमानवीय है और बच्चो तथा औरतों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाएगा ।
जौहर में राजपुतानी तब ही अग्नी कुण्ड में छलांग लगातीं थी जब युद्ध से कोई बड़ा शोक संदेश आया हो और इस प्रथा को सभी राजपुतीनीयाँ अपने विवाह के वस्त्र पहन कर करतीं थीं । जोहर प्रथा एक तरह से राजपूतों को अंतिम सांस तक लड़ने के लिये प्रोत्साहित करती थी क्योकी हर राजपूत युद्ध में स्वयं के लिये नहीं बल्की अपने परिवार और मात्रभूमी की रक्षा के लिये लड़ता था और यही वजह थी की हर राजपूत नपुंसक इस्लामिकों की चौगुना बड़ी फौज पर भारी पड़ता था ।जब किले के रक्षकों को यह प्रतीत हो जाता था की अब वह किले की रक्षा नहीं कर पाएंगे और बचने का भी कोई साधन नहीं बचता था तब सैनिक यह समाचार रानीयों तक पहुँचा देते थे अंत: सभी राजपुतानीयाँ बाहरी आक्रमणकर्ताओं के हाथ लगने से पूर्व ही अग्नी कुण्ड में छलांग लगाकर अग्नी को समर्पित हो जातीं थी और किले की बाकी राजपुतानीयाँ भी यही करतीं थी ।
इस दौरान गर्भवती महिला को जौहर नहीं करवाया जाता था अत: उनको किले पर मौजूद अन्य बच्चों के साथ सुरंगों के रास्ते किसी गुप्त स्थान या फिर किसी दूसरे राज्य में भेज दिया जाता था ।राजपुताने में सबसे ज्यादा जौहर मेवाड़ के इतिहास में दर्ज हैं और इतिहास में लगभग सभी जौहर इस्लामिक आक्रमणों के दौरान ही हुए हैं जिसमें अकबर और ओरंगजेब के दौरान सबसे ज्यादा हुए हैं ।
note- जब राजपुतानियाँ युद्ध खत्म होने से पहले ही पुन: अनुमान लगाकर जौहर कर लेतीं थीं तो राजपूत अपनी अंतिम सांस तक लड़ते थे जिसे साका कहते थे इस पूरी प्रथा को जौहर-साका कहते हैं ।।
राजपुताने के इतिहास में एसे कइ बड़े बलिदान दर्ज हैं ।
1- प्रथ्वीराज चौहान की पत्नी समयुक्ता ने अफगानी मुल्लो के समय आत्मसमर्पण करने से मना कर दिया था और किले की सभी राजपुतानीयों के साथ जोहर किया था ।
2- राजा विजयपाल की पत्नी बयाना ने जोहर किया था ।
3-ग्वालियर के राजा शिलादित्य की माँ दुर्गावती और उन्की पत्नी ने आत्मसमर्पण ना करके जोहर किया, ग्यात हो कि दुर्गावती ने मुघलों से रणभूमी में युद्ध भी लड़ा था । जब की राजपूत कभी औरतों पर अपनी शस्त्र विद्या नहीं आजमाते थे ।
4- जैसलमेर की भाटी राजपुतीनीयों ने और मांडोरगढ़ की प्रतिहार राजपुतानियों ने जौहर किया । इस जौहर में 12000 राजपूतानी आग की लप्टों मे कूदीं ।
5- रावल रतन सिंह की पत्नी महारानी पदमिनी ने जौहर किया ।इस जौहर में राजपुतानींयों ने जौहर किया
6- राना संगा की खंडवा युद्ध में वीरगती को प्राप्त होने के बाद चित्तौड़गढ़ और मेवाड़ की लगाम महारानी करनावती के हाथों आ गई जो की राणा उदय सिंह की माँ थीं
उन्होने हुमायू को राखी भेजी थी लेकिन हुमायूँ ने धोका दिया । रानी कर्णावती ने बाकी राजपुतानीयों के साथ जोहर किया
( March 8, 1535 A.D.)
7- चित्तौड़ का तीसरा जौहर
जिसमे जयमल जो कि मेड़तिया रियासत के राजा थे उन्होंने राणा उदय सिंह की मदत की तब तक राणा उदय सिंह गोगंडा उदयपुर में अरावली के पहाड़ो पर नया किला बनवा चुके थे सुरक्षा कारणों से और युद्ध नीती के तहत उन्होने एसा किया और जयमल ने चित्तौड़ की लगाम संभाली जयमल और पट्टा-फत्ता
( Fateh Singh Sisodiya ) ने संभाली इस युद्ध में भी अकबर ने युद्ध विराम के दौरान धोका दिया और अपनी बन्दूक से गोली मारी जो जयमल की जांघ पर लगी । चित्तौड़ गढ़ का किला पूरी तरह से घिर चुका था
अंत: 8000 राजपुतानींयों ने जौहर की आग में छलांग लगा दी ।अगले दिन किले का द्वार खुला सभी राजपूत केसरिया बाना पहन कर घोड़ों पर सवार हाथों में तलवार अकबर की सेना पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़े
यह युद्ध इतना भयानक था की अकबर की एक तिहाई 1/3 सेना समाप्त हो गईं ।. . . . . . .
अंत में बस यही कहुंगा की अपना मूल्य समझो तुम क्षत्रीय की संतान हो । यह सब होने की 3 प्रमुख वजह थी
1 मुल्लों में औरतों का लालच
2 मुघलों की सत्ता की भूख
3 हम में एकता की कमीं
यह पोस्ट करने की कई वजह हैं
1 अन्य जाती समुदायों के लोग राजपूत ठाकुरों को अत्याचारी वाली छवी से देखते हैं ! भाइयों माना की कहीं कहीं अत्याचार हुए लेकिन बलिदान भी सबसे ज्यादा इसी कौम ने दिये और भारतीय सेना में आज भी दे रहे हैं ।
2 - कुछ अन्य जाती के लोगो को मैंने राजपूत पेजेस पर गालियाँ देते देखा था और राजपूत भी वहाँ धड़ाधड़ गालियां दे रहे थे । एसे Pages के ADMINS को मैं यह राय दूंगा की भाइ पहले प्यार से समझाइये कि यह झूठा इतिहास सरकार ने राजनितिक लाभ और हिन्दुत्व को बाँटने के लिये बनाया है
इसलिये चाहे कुछ हो जये एकता बनाये रखें ।
3- हमारे पूर्वजों ने कई बलिदान दिये सिर्फ राजपूत ही नहीं सभी जाति समुदायों ने बलिदान दिये वक्त बदल गया हम बदल गये लेकिन ये मुल्ले नहीं बदले और ना ही बदलेंगे आप सभी बहनों से मेरी प्रार्थना है लव जिहाद का शिकार मत बनिये वरना आपके पूर्वजों की कुर्बानी व्यर्थ जायेगी ।।
14 NOV को में एक महत्वपूर्ण पोस्ट करूंगा आप से आग्रह है की अपने ज्यादा से ज्यादा दोस्तों को हम से जोड़ें ।
पोस्ट अच्छा लगे तो अपनी राय जरूर दें "धन्यवाद"
VIA - K ρ δiηgh





















मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

देवउठनी एकादशी















ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु अपनी शेष शय्या से योगनिद्रा से जाग जाते हैं। इसी दिन से सभी मंगल कार्य शुरू हो जाते हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी देवउठनी एकादशी के नाम से पूजनीय मानी जाती है।

शास्त्रों में इस एकादशी को अनेक नामों से संबोधित किया गया है, जिसमें प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी, देवठान एकादशी आदि प्रमुख रूप से उल्लेखित है। आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुरूप यह विश्वास किया जाता है कि आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की हरिशयनी एकादशी को शयन प्रारंभ करने वाले भगवान विष्णु प्रबोधिनी एकादशी को जागृत हो जाते हैं।

वास्तव में देव सोने और देव जागने का अंतरंग संबंध सूर्य वंदना से है। आज भी सृष्टि की क्रियाशीलता सूर्य पर निर्भर है और हमारी दैनिक व्यवस्थाएं सूर्योदय से निर्धारित होती हैं। प्रकाश पुंज होने के नाते सूर्य देवता को भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना गया है क्योंकि प्रकाश ही परमेश्वर है। इसलिए देवउठनी एकादशी पर विष्णु सूर्य के रूप में पूजे जाते हैं। यह प्रकाश और ज्ञान की पूजा है। वेद माता गायत्री भी तो प्रकाश की ही प्रार्थना है।

प्रबोधिनी एकादशी असल में उसी विश्व स्वरूप की आराधना है जो भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करने के बाद दिखाया था। यह परमात्मा के अखंड तेजोमय स्वरूप की आराधना है क्योंकि परमात्मा ने जब सृष्टि का सृजन किया तब उनके पास कोई सामान नहीं था। जब शरद ऋतु आती है तब बादल छंट जाते हैं, आसमान साफ हो जाता है, सूर्य भगवान नियमित दर्शन देने लगते हैं। इस तरह इन्हें प्रबोधित, चैतन्य व जागृत माना जाता है और कार्तिक शुक्ल एकादशी को देव उठने का पर्व मनाया जाता है। यह समस्त मंगल कार्यों की शुरुआत का दिन माना जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पूरे देव वर्ग का नाम आदित्य या सूर्य था जिसके प्रमुख देव भगवान विष्णु थे।

पुराणों में सूर्योपासना का उल्लेख मिलता है और बारह आदित्यों के नाम भी उल्लेखित हैं जो इस प्रकार हैं : इंद्र, धातृ, भग, त्वष्ट, मित्र, वरुण, अयर्मन, विवस्वत, सवितृ, पूलन, अंशुमत और विष्णु। चूंकि चराचर जगत हरिमय है इसलिए ग्यारह आदित्य भी विष्णु के ही रूप हैं। इसलिए आदित्य व्रत करने की अनुशंसा की गई है।

यह व्रत रविवार को किया जाता है और प्रत्येक रविवार को एक वर्ष तक सूर्य पूजन किया जाता है। एकादशी व्रत अपने आप में विष्णु को समर्पित है। सूर्य के प्रकाश का मानव की पाचन शक्ति से भी संबंध है। चातुर्मास में सूर्य का प्रकाश नियमित न होने से पाचन शक्ति गड़बड़ा जाती है। इसलिए अनेक भक्तगण चातुर्मास में एक बार ही भोजन करते हैं। फिर देवउठनी एकादशी से सूर्य के नियमित प्रकाश से पाचन क्रिया पुनः उत्तेजित हो जाती है। सूर्य आयुष और आरोग्य के अधिष्ठाता भी माने गए हैं।