मंगलवार, 22 अगस्त 2017

तीन तलाक की प्रथा खारिज : सुप्रीम कोर्ट

तीन तलाक: 5 धर्मों के हैं फैसला सुनाने वाले जज, पढ़ें उनकी खासियत अौर जजमेंट, national news in hindi, national news


तीन तलाक के खिलाफ पहली जंग छेड़ने वाली शायरा बानो को तलाकनाम टेलीग्राम से भेजा गया था।

नई दिल्ली. पहले 1985 और अब 2017। 32 साल में दो बार ऐसे मौके आए जब तीन तलाक की विक्टिम महिलाओं के फेवर में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया। मुस्लिमों में तीन तलाक एक ऐसी प्रथा है जिसके तहत कोई भी शख्स पत्नी को तीन बार तलाक बोलकर उसे छोड़ सकता है। इस प्रथा के खिलाफ ताजा मामले में 38 साल की शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। शायरा को उनके पति ने टेलीग्राम से तलाकनामा भेजा था। उनके दो बच्चे हैं, लेकिन वे एक साल से उन्हें देखने को तरस रही हैं। शायरा की पिटीशन पर मंगलवार को फैसला आया। बेंच ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। इससे पहले 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के फेवर में फैसला सुनाया था।


दोनों केस में क्या फर्क?    शाहबानो                               शायरा बानो केस
किसे चैलेंज       तीन तलाक के बाद कम गुजारा भत्ता तलाक-ए-बिद्दत
SC में कब पहुंचा केस 1981                                     2016
कब आया फैसला         1985                                             2017
क्या आया फैसला तीन तलाक में भी महिला गुजारे भत्ते की हकदार तीन तलाक असंवैधानिक
केंद्र सरकार का रोल कानून बनाकर फैसला पलटा नया कानून बनाना है
क्या था शाहबानो केस?
- लॉ एक्सपर्ट संदीप शर्मा ने DainikBhaskar.com को बताया- ''इंदौर की रहने वाली शाहबानो 62 साल की थीं जब उनके तीन तलाक का मामला नेशनल डिबेट बना था। शाहबानो के 5 बच्चे थे। उनके पति ने 1978 में उन्हें तलाक दिया था। पति से गुजारा भत्ता पाने का मामला 1981 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। पति का कहना था कि वह शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं है।'' 
- ''सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में सीआरपीसी की धारा-125 पर फैसला दिया। यह धारा तलाक के केस में गुजारा भत्ता तय करने से जुड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत शाहबानो को बढ़ा हुआ गुजारा भत्ता देने के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।'' 
- ''जब देश में इसका विरोध हुआ तो उस वक्त की राजीव गांधी सरकार ने 1986 में एक कानून बनाया। यह कानून द मुस्लिम वुमन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स एक्ट 1986 कहलाया। इसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को डाइल्यूट कर दिया। कानून के तहत महिलाओं को सिर्फ इद्दत (सेपरेशन के वक्त) के दौरान ही गुजारा भत्ता मांगने की इजाजत मिली। यह कानून सीआरपीसी की धारा-125 के खिलाफ था।''
32 साल बाद शायरा बानो के केस से आया बदलाव
- फरवरी 2016 में उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो (38) पहली महिला बनीं, जिन्होंने ट्रिपल तलाक, बहुविवाह (polygamy) और निकाह हलाला पर बैन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर की।
- शायरा ने DainikBhaskar.com को बताया, ''जजमेंट का स्वागत और समर्थन करती हूं। मुस्लिम महिलाओं के लिए बहुत ऐतिहासिक दिन है। कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय को बेहतर दिशा दे दी है। अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। समाज आसानी से इसे स्वीकार नहीं करेगा। अभी लड़ाई बाकी है। इस फैसले से मुस्लिम समाज की महिलाओं को प्रताड़ना, शोषण और दुखों से आजादी मिलेगी। पुरुषों को महिलाओं के हालात को देखते हुए इसे स्वीकार करना चाहिए।''
- शायरा की शादी 2002 में इलाहाबाद के एक प्रॉपर्टी डीलर से हुई थी। उनके साथ जल्द की परेशानी शुरू हो गई। ससुराल वाले उनसे फोर व्हीलर की मांग करने लगे। वे उनसे चार-पांच लाख रुपए कैश चाहते थे। उनकी माली हालत ऐसी नहीं थी कि मांग पूरी कर सकें। उनकी और भी बहनें थीं।
- शायरा के दो बच्चे हैं। 13 साल का बेटा और 11 साल की बेटी। शायरा का आरोप है कि शादी के बाद उन्हें हर दिन पीटा जाता था। पति हर दिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करता था। बहुत ज्यादा बहस करना और झगड़ना उसकी आदत में शामिल था।
- शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में निकाह हलाला की रिवाज को भी चैलेंज किया। इसके तहत मुस्लिम महिलाओं को अपने पहले पति के साथ रहने के लिए दूसरे शख्स से दोबारा शादी करनी होती है। वे मुस्लिमों में बहुविवाह को भी गैर-कानूनी बनाने की मांग कर रही हैं।
छह बार करवाया अबॉर्शन
- आरोप है कि रिजवान से शादी के बाद शायरा को गर्भनिरोधक (contraceptives) लेने को कहा गया, जिसकी वजह से वे काफी बीमार हो गईं। यह भी आरोप है कि पति ने उनका छह बार अबॉर्शन करवाया। पिछले साल अप्रैल में वे अपने पैरेंट्स के घर लौट गईं। अक्टूबर में उन्हें टेलीग्राम के जरिए तलाकनामा भेजा गया। वे एक मुफ्ती के पास गईं तो उन्होंने कहा कि टेलीग्राम से भेजा गया तलाक जायज है।
- शायरा के बच्चे रिजवान के साथ रहे हैं। वे उन्हें देखने के लिए एक साल से तरस रही हैं। शायरा का कहना है कि उन्हें बच्चों से फोन पर भी बात नहीं करने दी जाती।
- शायरा का कहना है कि वे इस जंग में पीछे हटने वाली नहीं हैं। उनका यह कदम दूसरी महिलाअों के लिए मददगार होगा।
हक की लड़ाई लड़ने वाली महिलाएं और भी हैं
1) अाफरीन रहमान
- जयपुर की रहने वाली 28 साल की अाफरीन रहमान एमबीए-ग्रेजुएट हैं। मेट्रीमोनियल वेबसाइट की मदद से 2014 में उनकी शादी इंदौर के वकील से हुई। 
- अाफरीन के मुताबिक, उनकी चार बहनें हैं और उनकी शादी के लिए भाई ने 25 लाख का लोन लिया था।
- आफरीन का आरोप है कि शादी के बाद उन्हें दहेज के लिए ससुराल में पीटा जाता था। उन्होंने इन जुल्मों के बारे में अपने मायके वालों को नहीं बताया, क्योंकि उन पर पहले से ही बैंक का कर्ज था। इससे वे और तनाव में आ जाते।
ज्वाइन किया भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन
- आफरीन को अगस्त 2015 में पति ने घर से निकाल दिया। मायके वालों की गुजारिश पर नौ दिन बाद वापस ले गया, लेकिन अगले ही महीने फिर वापस भेज दिया। 
- अक्टूबर में आफरीन की मां की बस एक्सीडेंट में मौत हो गई तो उनका पति हमदर्दी जताने के लिए कुछ दिन आया, फिर बातचीत बंद कर दी। फोन और सोशल मीडिया पर भी कोई बात नहीं करता। जनवरी में उनके पास स्पीड पोस्ट से एक लिफाफा आया। खोला तो देखकर दंग रह गई। यह तलाकनामा था। इसमें तलाक की वजह भी नहीं बताई गई थी। 
- इसके बाद आफरीन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ीं। शायरा और दूसरी सताई हुई महिलाओं से इंस्पायर होकर उन्होंने भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
2) जकिया रहमान और नूरजहां सैफिया नियाज
- ये दोनों "भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन" की फाउंडर हैं। 2007 में बनाए गए इस एनजीओ से अब तक 15 राज्यों की 30 हजार महिलाएं जुड़ चुकी हैं। 
- यह संगठन मस्जिदों और मुंबई की हाजी अली दरगाह में मुस्लिम महिलाओं की एंट्री की मांग करके चर्चा में आया। 
- इस एनजीओ ने पिछले साल देश का पहला मुस्लिम महिलाओं का सर्वे करवाया, जिसमें दावा किया गया कि देश की 92% मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक पर रोक चाहती हैं। 
- एनजीओ ने अपने इस कैम्पेन के पक्ष में चलाई गई ऑनलाइन पिटीशन पर 50 हजार लोगों ने दस्तखत किए थे। इनमें महिला और पुरुष दोनों शामिल थे। 
- इस आंदोलन के तहत "शरिया अदालतों" या शरिया पर आधारित अनौपचारिक (informal) अदालतों का आयोजन भी किया जाता है। इनमें मुस्लिम महिलाएं अपनी घरेलू दिक्कतें पुरुष काजियों (इस्लामिक जजों) के सामने रखती हैं।
3) इशरत जहां
- 30 साल की इशरत जहां वेस्ट बंगाल के हावड़ा की रहने वाली हैं। उन्होंने कोर्ट में कहा है कि उनकी शादी 2001 में हुई थी। उनके बच्चे भी हैं, जिन्हें पति ने जबर्दस्त अपने पास रखा है।
- उन्होंने अपनी पिटीशन में बच्चों को वापस दिलाने और उसे पुलिस सुरक्षा दिलाने की मांग की। इशरत ने कहा है कि उसके पति ने दूसरी शादी कर ली है। यह भी कहा कि ट्रिपल तलाक गैरकानूनी है और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन है।
4) गुलशन परवीन, अतिया साबरी
- गुलशन परवीन उत्तर प्रदेश के रामपुर की और अतिया साबरी उत्तर प्रदेश के ही सहारनपुर की रहने वाली हैं। इन्होंने भी तीन तलाक को कोर्ट में चैलेंज किया है। बता दें कि अतिया इस मामले में आखिरी पिटीशनर हैं।



शाहबानो से शायरा बानो तक तीन तलाक के खिलाफ 32 साल से जारी है लड़ाई, national news in hindi, national news



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तीन तलाक: 5 धर्मों के हैं फैसला सुनाने वाले जज, पढ़ें उनकी खासियत अौर जजमेंट

DainikBhaskar.com | - Aug 22, 2017

1400 साल पुरानी तीन तलाक की प्रथा को खारिज कर देने का फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज अलग-अलग धर्मों के हैं।

नई दिल्ली.1400 साल पुरानी तीन तलाक की प्रथा को खारिज कर देने का फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के पांच जज पांच अलग-अलग धर्मों के हैं। 18 महीने पहले दायर हुई पिटीशन पर फैसला सुनाने वाली बेंच में चीफ जस्टिस जेएस खेहर (सिख), कुरियन जोसफ (इसाई), आरएफ नरीमन (पारसी), यूयू ललित (हिंदू) और अब्दुल नजीर (मुस्लिम) शामिल थे। बेंच ने फैसला 3:2 की मेजॉरिटी से सुनाया है। चीफ जस्टिस खेहर 27 अगस्त को रिटायर हो रहे हैं। वहीं, जस्टिस नरीमन ऐसे जज हैं जो सुप्रीम कोर्ट में वकालत भी कर चुके हैं। उनके टैलेंट को देखते हुए नियमों में बदलाव कर उन्हें सीनियर काउंसिल अप्वाइंट किया गया था। वहीं, जस्टिस कुरियन जोसफ वही जज हैं जिन्होंने जजों के सम्मान में दिए गए प्रधानमंत्री के डिनर में शामिल होने से इनकार कर दिया था।
1) चीफ जस्टिस
कौन जस्टिस जेएस खेहर?
जस्टिस खेहर का जन्म 28 अगस्त 1952 को चंडीगढ़ में हुआ। 1999 में वे पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के जज बने। 2009 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। 2010 में उन्हें कर्नाटक हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया। 2011 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया। जनवरी 2017 में वे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बने।
हिम्मतवाले जज
तीन तलाक पर 5 जजों की बेंच की अगुआई जस्टिस खेहर ही कर रहे थे। जस्टिस खेहर जजों की नियुक्ति के लिए नेशनल ज्युडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन बनाने के केंद्र के फैसले को खारिज कर चुके हैं। उन्होंने ही सहारा प्रमुख को जेल भेजने और अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन को खत्म कर कांग्रेस की सरकार बहाल करने जैसे फैसले सुनाए हैं। सहारा मामले की सुनवाई कर रही बेंच में रहे जस्टिस केएस राधाकृष्णन ने अपने रिटायरमेंट पर कहा था कि जस्टिस खेहर जैसा हिम्मतवाला जज उन्होंने नहीं देखा।
तीन तलाक पर क्या कहा?
- जस्टिस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार देने के विरोध में फैसला दिया था।
- उन्होंने कहा- ‘‘तलाक-ए-बिद्दत संविधान के आर्टिकल 14, 15, 21 और 25 का वॉयलेशन नहीं करता। सरकार छह महीने में कानून बनाए। छह महीने तक मुस्लिम तीन तलाक का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।’’
- दोनों जजों ने कहा- भारत में सती, देवदासी और बहुविवाह जैसी प्रथाएं बंद करने के पर्सनल लॉ से जुड़े सुधार कानूनी दखल के जरिए ही हुए हैं। जब दुनियाभर के मुस्लिम देशों ने सुधार के कदम उठा लिए हैं तो आजाद भारत को क्यों पीछे रहना चाहिए?
2) जस्टिस कुरियन जोसेफ
कौन हैं जस्टिस जोसेफ?
- 30 नवंबर 1953 में जन्मे जस्टिस कुरियन जोसेफ ने लॉ की पढ़ाई के बाद 1979 में केरल हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की थी।
- वे दो बार केरल हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस रहे। मार्च 2013 में सुप्रीम कोर्ट के जज बने। वे नवंबर 2018 तक सुप्रीम कोर्ट के जज रहेंगे।
इन्होंने मोदी के न्योते को नकारा था
- अप्रैल 2015 में सरकार ने जजों और चीफ मिनिस्टर्स की ज्वाइंट कॉन्फ्रेंस रखी। तीन दिन की यह कॉन्फ्रेंस उस वीकेंड पर रखी गई जब गुड फ्रायडे और ईस्टर आने वाला था। जस्टिस जोसेफ ने उस वक्त चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रहे एचएल दत्तू से इस बारे में नाराजगी जाहिर कर दी थी।
- इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी लेटर लिखकर डिनर के न्योते पर शुक्रिया अदा किया लेकिन अपनी आपत्ति जाहिर की। उन्होंने कहा कि जिन तारीखों की धार्मिक अहमियत है, उन तारीखों पर ऐसे कार्यक्रम नहीं रखे जाने चाहिए।
तीन तलाक पर क्या कहा?
- जस्टिस जोसेफ ने अपने 26 पेज के जजमेंट में कहा- मेरे लिए माननीय चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की इस बात पर राजी होना बहुत मुश्किल है कि तीन तलाक की प्रथा धर्म और पर्सनल लॉ से जुड़ी है। तीन तलाक में तो दरवाजा बंद हो जाता है। लिहाजा, यह कुरान-ए-पाक के बुनियादी फलसफों के खिलाफ है। यह शरीयत के खिलाफ है। तलाक किसी जायज वजह से होना चाहिए। इसके बाद पति-पत्नी के बीच सुलह की कोशिशें होनी चाहिए। अगर कोशिशें नाकाम हो जाएं तो तलाक होना चाहिए।
3) जस्टिस रोहिंटन एफ. नरीमन
कौन हैं जस्टिस नरीमन?
- जाने माने ज्यूरिस्ट फली एस नरीमन के बेटे जस्टिस रोहिंटन नरीमन का जन्म 13 अगस्त 1956 को हुआ।
इनके लिए बदले गए थे नियम
- लॉ से जुड़े मामलों में गजब की पकड़ और टैलेंट को देखते हुए उन्हें 37 की उम्र में ही सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट का दर्जा दे दिया गया था। उस वक्त इस ओहदे के लिए मिनिमम एज 45 थी। लेकिन तब चीफ जस्टिस रहे एमएन वेंकटचलैया ने नियमों में बदलाव कर उन्हें यह पहचान दी।
- जस्टिस नरीमन 2014 तक सुप्रीम कोर्ट के वकील थे। उन्होंने 35 साल लॉ की प्रैक्टिस की। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में वे ऐसे पांचवें वकील रहे जिन्हें सीधे बार से चुनकर जज बनाया गया।
- वे इस बेंच का हिस्सा रहे हैं, जिसने ऑनलाइन अपमानजनक टिप्पणियां पोस्ट करने के मामले में पुलिस को गिरफ्तारी का हक देते विवादास्पद साइबर लॉ को खारिज कर दिया था। जस्टिस नरीमन 2021 में रिटायर होंगे।
तीन तलाक पर क्या कहा?
- जस्टिस नरीमन ने जस्टिस यूयू ललित के साथ अपने फैसले में कहा, ‘"तीन तलाक संविधान के आर्टिकल 14 (बराबरी के हक) का वॉयलेशन करता है। तीन तलाक शादी के रिश्ते को बचाने के लिए पति-पत्नी के बीच सुलह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता। इसी वजह से यह कुरान के मुताबिक नहीं है। यह साफ है कि इस तरह का तलाक मनमौजी तरीके से दिया जाता है।''

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नई दिल्ली. 1400 साल पुरानी तीन तलाक की प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। 5 जजों की बेंच ने 3:2 की मेजॉरिटी से कहा कि तीन तलाक वॉइड (शून्य), अनकॉन्स्टिट्यूशनल (असंवैधानिक) और इलीगल (गैरकानूनी) है। बेंच में शामिल दो जजों ने कहा कि अगर सरकार तीन तलाक को खत्म करना चाहती है तो वो इस पर 6 महीने के भीतर कानून लेकर आए। मंगलवार देर शाम सरकार ने इस पर अपना स्टैंड क्लियर कर दिया। लॉ मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद ने कहा SC के फैसले में असंवैधानिक बताए जाने के बाद तीन तलाक के लिए कानून बनाने की जरूरत नहीं है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट को ये तय करना था कि तीन तलाक महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है या नहीं? यह कानूनी रूप से जायज है या नहीं और तीन तलाक इस्लाम का मूल हिस्सा है या नहीं? मई में इस मामले में छह दिन सुनवाई हुई थी। इसके बाद मंगलवार को फैसला आया।

1) चीफ जस्टिस खेहर ने तीन तलाक पर क्या कहा?
- चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा, "तीन तलाक मुस्लिम धर्म की रवायत है, इसमें ज्यूडिशियरी को दखल नहीं देना चाहिए। अगर केंद्र तीन तलाक को खत्म करना चाहता है तो 6 महीने के भीतर इस पर कानून लेकर आए और सभी पॉलिटिकल पार्टियां इसमें केंद्र का सहयोग करें।"
- बेंच ने अपने फैसले में कहा कि जब कई इस्लामिक देशों में तीन तलाक की प्रथा खत्म हो चुकी है तो आजाद भारत इससे निजात क्यों नहीं पा सकता?
2) तीन तलाक किस वजह से असंवैधानिक?
- यह बेंच पांच जजों की थी। चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर इस पक्ष में नहीं थे कि तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया जाए। वहीं, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। इन तीन जजों ने कहा कि तीन तलाक की परंपरा मर्जी से चलती दिखाई देती है, ये संविधान का उल्लंघन है। इसे खत्म होना चाहिए।
3) कानून बनाने पर केंद्र का क्या स्टैंड है?
- कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, "फैसला पढ़ने के बाद पहली नजर में ही ये साफ हो जाता है कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच में मेजॉरिटी ने तीन तलाक को असंवैधानिक और गैरकानूनी कहा है।"
- सरकार के सीनियर ऑफिशियल ने न्यूज एजेंसी से कहा, "SC के ऑर्डर के बाद अगर कोई पति तीन तलाक देता है तो इसे वैध नहीं माना जाएगा। विवाह के लिए उसकी जिम्मेदारियां बनी रहेंगी। पत्नी को भी पूरी आजादी रहेगी कि ऐसे शख्स को वो पुलिस के हवाले कर दे और उसके खिलाफ डोमेस्टिक वायलेंस या फि हैरेसमेंट का केस करे।"
- एक टीवी चैनल पर रविशंकर प्रसाद ने कहा, "अगर चर्चा के बाद ऐसा लगता है कि कहीं कोई गैप है और कुछ छूट रहा है तो उसके लिए मंच खुला है। हम विचार करेंगे।"
4) ऐसे समझें जजों का फैसला
- तीन तलाक की विक्टिम और पिटीशनर अतिया साबरी के वकील राजेश पाठक ने DainikBhaskar.com को बताया कि बेंच ने 3:2 की मेजॉरिटी से तीन तलाक को खारिज और गैर-कानूनी करार दिया।
- वहीं, वकील सैफ महमूद के मुताबिक, चीफ जस्टिस ने कहा कि पर्सनल लॉ से जुड़े मुद्दों को न तो कोई संवैधानिक अदालत छू सकती है और न ही उसकी संवैधानिकता को वह जांच-परख सकती है। वहीं, जस्टिस नरीमन ने कहा कि तीन तलाक 1934 के कानून का हिस्सा है। उसकी संवैधानिकता को जांचा जा सकता है। तीन तलाक असंवैधानिक है।
5) क्या है पिटीशनर्स और लॉ एक्सपर्ट्स की राय?
शायरा बानो
- फरवरी 2016 में उत्तराखंड की रहने वाली शायरा बानो (38) वो पहली महिला बनीं, जिन्होंने ट्रिपल तलाक, बहुविवाह (polygamy) और निकाह हलाला पर बैन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर की। शायरा को भी उनके पति ने तीन तलाक दिया था।
- शायरा ने DainikBhaskar.com से कहा, ''जजमेंट का स्वागत और समर्थन करती हूं। मुस्लिम महिलाओं के लिए बहुत ऐतिहासिक दिन है। कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय को बेहतर दिशा दे दी है। अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। समाज आसानी से इसे स्वीकार नहीं करेगा। अभी लड़ाई बाकी है। इस फैसले से मुस्लिम समाज की महिलाओं को प्रताड़ना, शोषण और दुखों से आजादी मिलेगी। पुरुषों को महिलाओं के हालात को देखते हुए इसे स्वीकार करना चाहिए।''
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
- मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा- इस मसले पर कानून लाने की जरूरत नहीं है। बोर्ड अपने कानून के हिसाब से चलता है। बोर्ड अब 10 सितंबर को भोपाल में बैठक कर आगे की रणनीति तय करेगा।
- इससे पहले बोर्ड ने माना था कि वह सभी काजियों को एडवायजरी जारी करेगा कि वे तीन तलाक पर न सिर्फ महिलाओं की राय लें, बल्कि उसे निकाहनामे में शामिल भी करें।
- वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम वुमन्स पर्सनल लॉ बोर्ड की प्रेसिडेंट शाइस्ता अंबर ने तीन तलाक को गैर-कानूनी करार देते सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जाहिर की है।
लॉ एक्सपर्ट
- लॉ एक्सपर्ट संदीप शर्मा ने DainikBhaskar.com को बताया- ''मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव की जरूरत है। शायरा बानो ने जो मुद्दा उठाया है, वह अहम है। तीन तलाक के मौजूदा प्रावधान में बदलाव होना ही चाहिए। पाकिस्तान, बांग्लादेश और यूएई जैसे देशों में तीन तलाक कानून बदल चुका है, फिर हमारे यहां क्यों नहीं? कॉमन सिविल कोड बाद की बात है, पहले पर्सनल लॉ में बदलाव तो हो। एक-एक कर बदलाव किए जा सकते हैं।''
- ''पहले हिंदुओं में भी बहुविवाह प्रथा थी। 1956 में कानून में बदलाव कर हिंदू विवाह कानून के तहत एक विवाह का नियम बनाया गया। मुस्लिम पर्सनल लॉ में भी अगर बदलाव की जरूरत है तो होनी चाहिए। महिलाएं चाहें किसी भी धर्म की हों, उन्हें सुरक्षा मुहैया कराना संवैधानिक जिम्मेदारी है। संविधान समानता की बात करता है और अगर पर्सनल लॉ इसमें आड़े आता है तो उसे भी बदला जा सकता है। शादी चाहे किसी भी तरीके से हो, उसके बाद की स्थिति, तलाक और गुजारा भत्ता का मामला एक समान होना चाहिए।''
6) तलाक-ए-बिद्दत पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
- चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने अपने फैसला में कहा कि तलाक-ए-बिद्दत सुन्नी कम्युनिटी का हिस्सा है। यह 1000 साल से कायम है। तलाक-ए-बिद्दत संविधान के आर्टिकल 14, 15, 21 और 25 का वॉयलेशन नहीं करता।
7) क्या है तलाक-ए-बिद्दत?
- तलाक-ए-बिद्दत यानी एक ही बार में तीन बार तलाक कह देना। ऐसा तलाकनामा लिखकर किया जा सकता है या फिर फोन से या टेक्स्ट मैसेज के जरिए भी किया जा सकता है। इसके बाद अगर पुरुष को यह लगता है कि उसने जल्दबाजी में ऐसा किया, तब भी तलाक को पलटा नहीं जा सकता। तलाकशुदा जोड़ा फिर हलाला के बाद ही शादी कर सकता है।
8) क्या है तीन तलाक, निकाह हलाला और इद्दत?
- ट्रिपल तलाक यानी पति तीन बार ‘तलाक’ लफ्ज बोलकर अपनी पत्नी को छोड़ सकता है। निकाह हलाला यानी पहले शौहर के पास लौटने के लिए अपनाई जाने वाली एक प्रॉसेस। इसके तहत महिला को अपने पहले पति के पास लौटने से पहले किसी और से शादी करनी होती है और उसे तलाक देना होता है।
- सेपरेशन के वक्त को इद्दत कहते हैं। बहुविवाह यानी एक से ज्यादा पत्नियां रखना। कई मामले ऐसे भी आए, जिसमें पति ने वॉट्सऐप या मैसेज भेजकर पत्नी को तीन तलाक दे दिया।
9) सुप्रीम कोर्ट में कितनी पिटीशंस दायर हुई थीं?
- मुस्लिम महिलाओं की ओर से 7 पिटीशन्स दायर की गई थीं। इनमें अलग से दायर की गई 5 रिट-पिटीशन भी थीं। इनमें दावा किया गया कि तीन तलाक अनकॉन्स्टिट्यूशनल है।
क्या है भारत में तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं की स्थिति?
- देश में मुस्लिमों की आबादी 17 करोड़ है। इनमें करीब आधी यानी 8.3 करोड़ महिलाएं हैं।
- 2011 के सेंसस पर एनजीओ 'इंडियास्पेंड' के एनालिसिस के मुताबिक, भारत में अगर एक मुस्लिम तलाकशुदा पुरुष है तो तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं की संख्या 4 है। भारत में तलाकशुदा महिलाओं में 68% हिंदू और 23.3% मुस्लिम हैं।
10) मामले में पक्ष कौन-कौन थे?
केंद्र: इस मुद्दे को मुस्लिम महिलाओं के ह्यूमन राइट्स से जुड़ा मुद्दा बताता है। ट्रिपल तलाक का सख्त विरोध करता है।
पर्सनल लॉ बाेर्ड: इसे शरीयत के मुताबिक बताते हुए कहता है कि मजहबी मामलों से अदालतों को दूर रहना चाहिए।
जमीयत-ए-इस्लामी हिंद: ये भी मजहबी मामलों में सरकार और कोर्ट की दखलन्दाजी का विरोध करता है। यानी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के साथ खड़ा है।
मुस्लिम स्कॉलर्स: इनका कहना है कि कुरान में एक बार में तीन तलाक कहने का जिक्र नहीं है।
बेंच में हर धर्म के जज थे
- बेंच में चीफ जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे। इस बेंच की खासियत यह थी कि इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी धर्म को मानने वाले जज शामिल थे।

सोमवार, 17 जुलाई 2017

माँ बाण माता : सिसोदिया वंश की कुलदेवी


सिसोदिया राजवंश सिर्फ मेवाड़ तक ही नहीं है , यह महाराष्ट्र में भोंसले और नेपाल में राणा वंस के रूप में विस्तृत है !

कुलदेवी बाण माता


गेहलोत वंश की कुलदेवी बाण माता
भरत गेहलोत (आना,राजस्थान)
कुल के फलने और फूलने में कुलदेवता व कुलदेवी की असीम कृपा होती हैं। गेहलोत वंश की कुलदेवी श्री बाण माता, बायण माता या ब्राह्मणी माता के संक्षिप्त इतिहास से में आपको रूबरू करवा रहा हूँ हालाँकि यह इतिहास वेद् वर्णित हैं फिर भी अगर किसी भी प्रकार की त्रुटि हो तो में क्षमा प्राथी हूँ। सिसोदिया गेहलोत, गुहिल या गेहलोत वंश की कुलदेवी बाण माता का मुख्य मंदिर विश्व प्रसिद्ध दुर्ग चित्तोड़गढ़ में स्थित हैं। माताजी का पुराना स्थान गिरनार गुजरात में था पर कालान्तर में माँ बाण माता चित्तोड़ पधार गयी थी। और इसके पीछे कथा इस प्रकार हैं की वर्षो पूर्व चित्तोड़ के महाराणा ने गुजरात पर आक्रमण कर गुजरात जीत लिया।

इस पर महाराणा ने गुजरात के राजा से कहा की वह अपनी राजकुमारी का विवाह चित्तोड़ के महाराणा से करे। हालाँकि गुजरात की राजकुमारी के मन में यह इच्छा पूर्व से ही थी की वह महाराणा की रानी बने और क्योंकि राजकुमारी माँ बाण माता की भक्त थी तो माँ ने ही कुछ ऐसी लीला रचाई की राजकुमारी की शादी महाराणा से हो गयी और माँ बाण माता भी राजकुमारी के साथ चित्तौड़गढ़ पधार गयी। हालाँकि गिरनार में अभी भी माँ का मंदिर हैं। इस प्रकार यह तो हुआ की माँ किस तरह चित्तोड़ में प्रकट हुई पर अब में आपको यह बताने का भी प्रयत्न करूँगा की किस तरह माँ ने देवलोक से भूलोक पर अवतार लिया। पुराणों के अनुसार हजारों वर्षों पूर्व बाणासुर नाम का एक दैत्य ने जन्म लिया। जिसकी भारत में अनेक राजधानियाँ थी। पूर्व में सोनितपुर (वर्तमान तेजपुर, आसाम) उत्तर में बामसू (वर्तमान लमगौन्दी, उत्तराखंड) मध्यभारत में बाणपुर मध्यप्रदेश में भी बाणासुर का राज था। बाणासुर बामसू में रहता था।बाणासुर को कही कही राजा भी कहा गया है, और उसके मंदिर भी मौजूद हैं जिसको आज भी उत्तराखंड के कुछ गावों में पूजा जाता है। संभवतः प्राचीन सनातन भारत में मनुष्य जब पाप के रास्ते पर चलकर अत्यंत अत्याचारी हो जाता था तब उसे असुर की श्रेणी में रख दिया जाता था क्योंकि लोगों को यकीन हो जाता था की अब उसका काल निकट है और वह अवश्य ही प्रभु के हाथो मारा जायेगा। यही हाल रावण का भी था वह भी एक महाज्ञानी-शक्तिशाली-इश्वर भक्त राजा था, किन्तु समय के साथ वह भी अभिमानी हो गया था और उसका भी अंत एक असुर की तरह ही हुआ।

किन्तु यह भी सत्य है की रावण को आज भी बहुत से स्थानों पर पूजा जाता है। दक्षिण भारत, श्रीलंका के साथ साथ उत्तर भारत में भी उसके कई मंदिर हैं जिनमे मंदसौर(मध्यप्रदेश) में भी रावण की एक विशाल प्रतिमा है जिसकी लोग आज भी पूजा करते हैं। बाणासुर भगवान शिव का अनन्य भक्त था। शिवजी के आशीर्वाद से उसे हजारों भुजाओं की शक्ति प्राप्त थी। शिवजी ने उससे और भी कुछ मांगने को कहा तो बाणासुर ने कहा की आप मेरे किले के पहरेदार बन जाओ। यह सुन शिवजी को बडी ही ग्लानि और अपमान महसूस हुआ लेकिन उन्होंने उसको वरदान दे दिया और उसके किले के रक्षक बन गए। बाणासुर परम बलशाली होकर सम्पूर्ण भारत और पृथ्वी पर राज करने लगा और उससे सभी राजा और कुछ देवता तक भयभीत रहने लगे। बाणासुर अजेय हो चुका था, कोई उससे युद्ध करने आगे नहीं आता था। एक दिन बाणासुर को अचानक युद्ध करने की तृष्णा जागी। तब उसने स्वयं शिवजी से युद्ध करने की इच्छा की। बाणासुर के अभिमानी भाव को देख कर शिवजी ने उससे कहा की वह उससे युद्ध नहीं करना चाहते क्योंकि वह उनका शिष्य है, किन्तु शिवजी ने उससे कहा की तुम विचलित मत हो तुम्हे पराजित करने वाला व्यक्ति कृष्ण जन्म ले चुका है। यह सुन कर बाणासुर भयभीत हो गया। और उसने शिवजी की पुनः तपस्या की और अपनी हजारों भुजाओं से कई सौ मृदंग बजाये, जिससे शिवजी पुनः प्रसन्न हो गए और बाणासुर ने उनसे फिर वरदान मांग लिया की वे कृष्ण से युद्ध में उसका साथ देंगे और उसके प्राणों की रक्षा करेंगे और हमेशा की तरह उसके किले के पहरेदार बने रहेंगे। समय बीतता गया और श्री कृष्ण ने द्वारिका बसा ली थी। उधर बाणासुर के एक पुत्री थी जिसका नाम उषा था। उषा से शादी के लिए बहुत से राजा महाराजा आए किन्तु बाणासुर सबको तुच्छ समझकर उषा के विवाह के लिए मना कर देता और अभिमानपूर्वक उनका अपमान कर देता था। बाणासुर को भय था की उषा उसकी इच्छा के विपरीत किसी से विवाह न कर ले इसलिए बाणासुर ने एक शक्तिशाली महल बनवाया और उसमे उषा को कैद कर नज़रबंद कर दिया। अब इसे संयोग कहो या श्री कृष्ण की लीला, एक दिन उषा को स्वप्न में एक सुन्दर राजकुमार दिखाई दिया यह बात उषा अपनी सखी चित्रलेखा को बताई।

चित्रलेखा को सुन्दर कला-कृतियाँ बनाने का वरदान प्राप्त था, उसने अपनी माया से उषा की आँखों में देख कर उसके स्वप्न दृश्य को देख लिया और अपनी कला की शक्ति से उस राजकुमार का चित्र बना दिया। चित्र देख उषा को उससे प्रेम हो गया और उसने कहा की यदि ऐसा वर उसे मिल जाये तो ही उसे संतोष होगा। चित्रलेखा ने बताया की यह राजकुमार तो श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का है। तब चित्रलेखा ने अपनी शक्ति से अनिरुद्ध को अदृश्य कर के उषा के सामने प्रकट कर दिया और तब दोनों ने ओखिमठ नामक स्थान(केदारनाथ के पास) विवाह किया जहाँ आज भी उषा-अनिरुद्ध नाम से एक मंदिर व्याप्त है। जब यह खबर बाणासुर को मिली तो उसे बड़ा क्रोध आया और उसने अनिरुद्ध और उषा दोनों को कैद कर लिया। जब कई दिनों तक अनिरुद्ध द्वारिका में नहीं आये तो श्रीकृष्ण और बलराम व्याकुल हो उठे और उन्होंने उसकी तलाश शुरू कर दी, अंत में जब उन्हें नारदजी द्वारा सत्य का पता चला तो उन्होंने बाणासुर पर हमला करने की ठानी। भयंकर युद्ध आरंभ हुआ जिसमे दोनों ओर के महावीरों ने शौर्य का परिचय दिया। अंत में जब बाणासुर हारने लगा तो उसने शिवजी की आराधना की। भक्त के याद करने पर शिवजी प्रकट हो गए और श्री कृष्ण से युद्ध करने लगे। युद्ध कितना विनाशक था इसका ज्ञान इसी बात से हो जाता है की शिवजी अपने सभी अवतारों और साथियों रुद्राक्ष, वीरभद्र, कूपकर्ण, कुम्भंदा सहित बाणासुर के सेनापति बने उधर दूसरी तरफ श्रीकृष्ण के साथ बलराम, प्रदुम्न, सत्याकी, गदा, संबा, सर्न,उपनंदा, भद्रा अदि कई योद्धा थे। इस भयंकर युद्ध में शिवजी ने श्रीकृष्ण की सेना के असंख्य सेनिको को मौत के घाट उतार दिया और श्री कृष्ण ने भी बाणासुर के असंख्य सैनिको का नाश कर दिया। तब अंत में शिवजी ने पशुपतास्त्र से श्री कृष्ण पर वार किया तो श्रीकृष्ण ने भी नारायणास्त्र से वार किया जिसका किसी को कोई लाभ नहीं हुआ। अंततः श्रीकृष्ण ने निन्द्रास्त्र चला कर कुछ देर के लिए शिवजी को सुला दिया। इससे बाणासुर की सेना कमजोर हो गयी। दूसरी तरफ बलराम जी ने कुम्भंदा और कूपकर्ण को घायल कर दिया।

यह देख बाणासुर अपने प्राण बचा कर भागा। श्रीकृष्ण ने उसे पकड़कर उसकी भुजाएँ काटनी शुरू कर दी जिस पर वह बहुत ही अभिमान करता था। जब बाणासुर की सारी भुजाएँ कट गयी थी और केवल चार शेष रह गयी थी तब शिवजी अचानक जाग उठे और श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें निंद्रा में भेजने और बाणासुर की दशा जानकर बहुत ही क्रोधित हुए। शिवजी ने अंत में अपना सबसे भयानक शस्त्र ”शिवज्वर अग्नि” चलाया जिससे सारा ब्रह्माण अग्नि में जलने लगा और हर तरफ भयानक ज्वर बीमारिया फैलने लगी। यह देख श्री कृष्ण को न चाहते हुए भी अपना आखिरी शास्त्र ”नारायणज्वर शीत” चलाया। श्रीकृष्ण के शस्त्र से ज्वर का तो नाश हो गया किन्तु अग्नि और शीत का जब बराबर मात्र में विलय होता है तो सम्पूर्ण श्रृष्टि का नाश हो जाता है। इसके कारण पृथ्वी और ब्रह्माण्ड बिखरने लगे तब नारद मुनि और समस्त देवताओं, नव-ग्रहों, यक्ष और गन्धर्वों ने ब्रह्मा जी की आराधना की लेकिन ब्रह्मा जी ने दोनों को रोक पाने में असर्थता बताई। तब सबने मिलकर परमशक्ति भगवती माँ दुर्गाजी की आराधना की तब माँ ने दोनों पक्षों (कृष्ण और शिवजी) को शांत किया। श्रीकृष्ण ने कहा की वे तो केवल अपने पौत्र अनिरुद्ध की आज़ादी चाहते हैं और शिवजी ने भी कहा की वह भी केवल अपने वचन की रक्षा कर रहे हैं और बाणासुर का साथ दे रहे हैं और उनकी केवल यही इच्छा है की श्रीकृष्ण बाणासुर के प्राण न ले। तब श्रीकृष्ण कहा की आपकी इच्छा भी मेरा दिया हुआ वचन ही है, मेने पूर्वावतार में बाणासुर के पूर्वज बलि राजा के पूर्वज प्रहलाद को यह वरदान दिया था की दानव वंश के अंत में उसके परिवार का कोई भी सदस्य उनके (विष्णु)के अवतार के हाथो कभी नहीं मरेगा। माँ भगवती की कृपा से श्रीकृष्ण की बात सुनकर बाणासुर को आत्मग्लानी होने लगी और उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा और उसकी वजह से ही दोनों देवता लड़ने को उतारू हो गए थे। बाणासुर ने श्रीकृष्ण से माफ़ी मांग ली।

बाणासुर के माफ़ी मांगते ही शिवजी का वचन सत्य हुआ की बाणासुर श्रीकृष्ण से पराजित होगा लेकिन वो उसका साथ देंगे और उसके प्राण बचायेंगे। तत्पश्चात शिवजी और श्रीकृष्ण ने भी एक दुसरे से माफ़ी मांग ली और एक दुसरे की महिमामंडन करने लगे ।माता परमशक्ति ने दोनो को आशीर्वाद दिया और दोनों इस तरह से एक दुसरे में समा गए तब नारद जी ने प्रभु की इस लीला को देखकर सभी से कहा की आज से केवल एक इश्वर हरी-हरा हो गए हैं। फिर बाणासुर ने उषा-अनिरुद्ध का विवाह कर दिया और सब सुखी-सुखी रहने लगे। तत्पश्चात बाणासुर नर्मदा नदी के पास गया और शिवजी की फिर तपस्या करने लगा। शिवजी ने प्रकट होकर कर फिर उसकी इच्छा जाननी चाही इस पर बाणासुर ने कहा की वे उसको अपने डमरू बजाने की कला का आशीर्वाद दे और उसको अपने विशेष सेवकों में जगह भी देें तब शिवजी ने कहा की हे! बाणासुर तुम्हारे द्वारा पूजे गए शिवजी के लिंगो को बाणलिंग के नाम से जाना जायेगा और उसकी भक्ति को हमेशा याद रखा जायेगा। अब आगे की कथा इस प्रकार है की जब अनिरुद्ध और उषा का विवाह हो गया और अंत में कृष्ण-शिव एक दूसरे में समां गए लेकिन फिर भी बाणासुर की आसुरी प्रवृति नहीं बदली। बाणासुर अब और भी ज्यादा क्रूर हो गया था। बाणासुर अब जान गया था की श्रीकृष्ण कभी उसके प्राण नहीं ले सकते और शिवजी उसके किले के रक्षक हैं तो वह भी ऐसा नहीं करेंगे। राजाओं के परामर्श से ऋषि-मुनियों ने यज्ञ किया। यज्ञ की अग्नि में से माँ पार्वती जी एक छोटी सी कुंवारी कन्या के रूप में प्रकट हुयीं और उन्होंने सभी क्षत्रिय राजाओं से वर मांगने को कहा। तब सभी राजाओं ने देवी माँ से बाणासुर से रक्षा की कामना करी (जिनमे विशेषकर संभवतः सिसोदिया गेहलोत वंश के पूर्वज प्राचीन सूर्यवंशी राजा भी रहे होंगे) तब माता जी ने सभी राजाओं-ऋषि मुनियों और देवताओं को आश्वस्त किया की वे सब धैर्य रखें बाणासुर का वध समय आने पर अवश्य मेरे ही हाथो होगा। यह वचन देकर माँ वहां से निकलकर भारत के दक्षिणी छोर पर जा कर तपस्या में बैठ गयीं जहा पर त्रिवेणी संगम है। (पूर्व में बंगाल की खाड़ी-पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण में भारतीय महासागर है) बायण माता की यह लीला बाणासुर को किले से दूर लाने की थी ताकि वह शिवजी से अलग हो जाये। आज भी उस जगह पर बायणमाता को दक्षिण भारतीय लोगो द्वारा कुंवारी कन्या के नाम से पूजा जाता है और उस जगह का नाम भी कन्याकुमारी है।

जब पार्वती जी के अवतार देवी माँ थोड़े बड़े हुए तब उनकी सुन्दरता से मंत्रमुग्ध हो कर शिवजी उनसे विवाह करने कृयरत हुए जिस पर माताजी भी राजी हो गए।विवाह की तैयारिया होने लगी। किन्तु तभी नारद मुनि यह सब देख कर चिंतित हो गए की यह विवाह अनुचित है। बायण माता तो पवित्र कुंवारी देवी हैं जो पार्वती जी का अवतार होने के बावजूत उनसे भिन्न हैं, यदि उन्होंने विवाह किया तो वे बाणासुर का वध नहीं कर पाएंगी क्यूंकि बाणासुर केवल परम सात्विकदेवी के हाथो ही मृत्यु को प्राप्त हो सकता था। तब नारद जी ने एक चाल चली क्योंकि सूर्योदय से पहले पहले शादी का मुहर्त था और शिवजी रात को कैलाश से बारात लेकर निकले थे लेकिन रास्ते में नारद मुनि मुर्गे का रूप धर के जोर जोर से बोलने लगे जिससे शिवजी को लगा की सूर्योदय होने वाला है भोर हो गयी है अब विवाह की घडी निकल चुकी है अतः शिवजी विवाह स्थल से 8-10 किलोमीटर दूर ही रुक गए। देवी माँ दक्षिण में त्रिवेणी स्थान पर शिवजी का इंतज़ार करती रह गयी। जब शिवजी नहीं आये तो माताजी क्रोद्धित हो गयीं। उन्होंने जीवन पर्यन्त सात्विक रहने का प्रण ले लिया और सदैव कुंवारी रहकर तपस्या में लीन हो गयी। जहाँ शिवजी रुक गए थे वहाँ पर आज भी कन्याकुमारी के पास में शुचीन्द्रम नामक स्थान पर उनका बहुत ही भव्य मंदिर हैं। इश्वर की लीला से कुछ वर्षो बाद बाणासुर को माताजी की माया का पता चला तब वह खुद माताजी से विवाह करने को आया किन्तु देवी माँ ने माना कर दिया। जिसपर बाणासुर क्रुद्ध हुआ वह पहले से ही अति अभिमान हो कर भारत वर्ष में क्रूरता बरसा ही रहा था। तब उसने युद्ध के बल पर देवी माँ से विवाह करने की ठानी।

जिसमे देवी माँ ने प्रचंड रूप धारण कर उसकी पूरी दैत्य सेना का नाश कर दिया और अपने चक्र से बाणासुर का सर काट के उसका वध कर दिया। मृत्यु पूर्व बाणासुर ने परा-शक्ति के प्रारूप उस देवी से अपने जीवन भर के पापों के लिए क्षमा मांगी और मोक्ष की याचना करी जिस पर देवी माता ने उसकी आत्मा को मोक्ष प्रदान कर दिया। इस प्रकार देवी माँ को बाणासुर का वध करने की वजह से बायण माता,बाण माता या ब्राह्मणी माता के नाम से भी जाना जाता है। महा-मायादेवी माँ दुर्गा की असंख्य योगिनियाँ हैं और सबकी भिन्न भिन्न निशानिया और स्वरुप होते हैं। जिनमे बायणमाता पूर्ण सात्विक और पवित्र देवी हैं जो तामसिक और कामसिक सभी तत्वों से दूर हैं। माँ पारवती जी का ही अवतार होने के बावजूद बायण माता अविवाहित देवी हैं। तथा परा-शक्ति देवी माँ दुर्गा का अंश एक योगिनी अवतारी देवी होने के बावजूद भी बायण माता तामसिक तत्वों से भी दूर हैं अर्थात इनके काली-चामुंडा माता की तरह बलिदान भी नहीं चढ़ता है। में व्यक्तिगत रूप से माँ की कृपा के कारण अपने आप को कृतघ्न मानता हूँ क्योंकि माँ सदैव मेरे आसपास ही रहती हैं।


जहाँ मेरा गांव और जन्मभूमि हैं वहा पर माँ पहले से ही सोनाणा खेतलाजी के साथ विराजित हैं। वहां पर माँ को ब्राह्मणी माँ के नाम से पूजते हैं। और जब सुदूर दक्षिण में रोजी रोटी के लिए आया हूँ तो माँ यहाँ भी पहले कन्याकुमारी रूप में विराजित हैं। वर्तमान मे भारत के दक्षिण में कन्याकुमारी ही मेरी कर्मभूमि हैं और जब मेने कन्याकुमारी का इतिहास जाना तो मुझे बहुत ही आश्चर्य हुआ। और इसी आश्चर्य ने मुझे माँ के इतिहास और अवतार के बारे में जानने के लिए प्रेरित किया। क्योंकि देवी कन्याकुमारी ने भी बाणासुर का वध किया था और माँ बाण माता ने भी बाणासुर का वध किया था और जब मेने इतिहास के पन्नों को खंगालना शुरू किया और जो भी जानकारी मुझे मिली मेने उसे आप तक पहुचाने की गुस्ताखी की हैं। इस तरह मुझे यह जानने में भी आसानी हुई की किस तरह माँ बाण माता ही दक्षिण में कन्याकुमारी के रूप में भी पूजी जाती हैं। भरत गेहलोत (आना)

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सिसोदिया राजवंश  



सन् 556 ई. में जिस 'गुहिल वंश' की स्थापना हुई, बाद में वही 'गहलौत वंश' बना और इसके बाद यह 'सिसोदिया राजवंश' के नाम से जाना गया। जिसमें कई प्रतापी राजा हुए, जिन्होंने इस वंश की मानमर्यादा, इज़्ज़त और सम्मान को न केवल बढ़ाया बल्कि इतिहास के गौरवशाली अध्याय में अपना नाम जोड़ा। महाराणा महेन्द्र तक यह वंश कई उतार-चढाव और स्वर्णिम अध्याय रचते हुए आज भी अपने गौरव और श्रेष्ठ परम्परा के लिये पहचाना जाता है। मेवाड़ अपनी समृद्धि, परम्परा, अद्भुत शौर्य एवं अनूठी कलात्मक अनुदानों के कारण संसार के परिदृश्य में देदीप्यमान है। स्वाधीनता एवं भारतीय संस्कृति की अभिरक्षा के लिए इस वंश ने जो अनुपम त्याग और अपूर्व बलिदान दिये जो सदा स्मरण किये जाते रहेंगे। मेवाड़ की वीर प्रसूता धरती में रावल बप्पा, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप जैसे शूरवीर, यशस्वी, कर्मठ, राष्ट्रभक्त व स्वतंत्रता प्रेमी विभूतियों ने जन्म लेकर न केवल मेवाड़ वरन संपूर्ण भारत को गौरान्वित किया है। स्वतन्त्रता की अलख जगाने वाले महाराणा प्रताप आज भी जन-जन के हृदय में बसे हुये, सभी स्वाभिमानियों के प्रेरक बने हुए है।

इतिहास
सन 712 ई. में अरबों ने सिंध पर आधिपत्य जमा कर भारत विजय का मार्ग प्रशस्त किया। इस काल में न तो कोई केन्द्रीय सत्ता थी और न कोई सबल शासक था जो अरबों की इस चुनौती का सामना करता। फ़लतः अरबों ने आक्रमणों की बाढ ला दी और सन 725 ई. में जैसलमेर, मारवाड़, मांडलगढ और भडौच आदि इलाकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया। ऐसे लगने लगा कि शीघ्र ही मध्य पूर्व की भांति भारत में भी इस्लाम की तूती बोलने लगेगी। ऐसे समय में दो शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। एक ओर जहां नागभाट ने जैसलमेर, मारवाड, मांडलगढ से अरबों को खदेड़कर जालौर में प्रतिहार राज्य की नींव डाली, वहां दूसरी ओर बप्पा रायडे ने चित्तौड़ के प्रसिद्ध दुर्ग पर अधिकार कर सन 734 ई. में मेवाड़ में गुहिल वंश अथवा गहलौत वंश का वर्चश्व स्थापित किया और इस प्रकार अरबों के भारत विजय के मनसूबों पर पानी फ़ेर दिया।

गुहिल वंश

मेवाड़ का गुहिल वंश संसार के प्राचीनतम राज वंशों में माना जाता है। मेवाड़ राज्य की केन्द्रीय सत्ता का उद्भव स्थल सौराष्ट्र रहा है। जिसकी राजधानी बल्लभीपुर थी और जिसके शासक सूर्यवंशी क्षत्रिय कहलाते थे। यही सत्ता विस्थापन के बाद जब ईडर में स्थापित हुई तो गहलौत मान से प्रचलित हुई। ईडर से मेवाड़ स्थापित होने पर रावल गहलौत हो गई। कालान्तर में इसकी एक शाखा सिसोदे की जागीर की स्थापना करके सिसोदिया हो गई। चूँकि यह केन्द्रीय रावल गहलौत शाखा कनिष्ठ थी। इसलिये इसे राणा की उपाधि मिली। उन दिनों राजपूताना में यह परम्परा थी कि लहुरी शाखा को राणा उपाधि से सम्बोधित किया जाता था। कुछ पीढियों बाद एक युद्ध में रावल शाखा का अन्त हो गया और मेवाड़ की केन्द्रीय सत्ता पर सिसोदिया राणा का आधिपत्य हो गया। केन्द्र और उपकेन्द्र पहचान के लिए केन्द्रीय सत्ता के राणा महाराणा हो गये। गहलौत वंश का इतिहास ही सिसोदिया वंश का इतिहास है।

मान्यताएँ

मान्यता है कि सिसोदिया क्षत्रिय भगवान राम के कनिष्ठ पुत्र लव के वंशज हैं। सूर्यवंश के आदि पुरुष की 65 वीं पीढ़ी में भगवान राम हुए 195 वीं पीढ़ी में वृहदंतक हुये। 125 वीं पीढ़ी में सुमित्र हुये। 155 वीं पीढ़ी अर्थात सुमित्र की 30 वीं पीढ़ी में गुहिल हुए जो गहलोत वंश की संस्थापक पुरुष कहलाये। गुहिल से कुछ पीढ़ी पहले कनकसेन हुए जिन्होंने सौराष्ट्र में सूर्यवंश के राज्य की स्थापना की। गुहिल का समय 540 ई. था। बटवारे में लव को श्री राम द्वारा उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र मिला जिसकी राजधानी लवकोट थी। जो वर्तमान में लाहौर है। ऐसा कहा जाता है कि कनकसेन लवकोट से ही द्वारका आये। हालांकि वो विश्वस्त प्रमाण नहीं है। टॉड मानते है कि 145 ई. में कनकसेन द्वारका आये तथा वहां अपने राज्य की परमार शासक को पराजित कर स्थापना की जिसे आज सौराष्ट्र क्षेत्र कहा जाता है। कनकसेन की चौथी पीढ़ी में पराक्रमी शासक सौराष्ट्र के विजय सेन हुए जिन्होंने विजय नगर बसाया। विजय सेन ने विदर्भ की स्थापना की थी। जिसे आज सिहोर कहते हैं। तथा राजधानी बदलकर बल्लभीपुर (वर्तमान भावनगर) बनाया। इस वंश के शासकों की सूची टॉड देते हुए कनकसेन, महामदन सेन, सदन्त सेन, विजय सेन, पद्मादित्य, सेवादित्य, हरादित्य, सूर्यादित्य, सोमादित्य और शिला दित्य बताया। 524 ई. में बल्लभी का अन्तिम शासक शिलादित्य थे। हालांकि कुछ इतिहासकार 766 ई. के बाद शिलादित्य के शासन का पतन मानते हैं। यह पतन पार्थियनों के आक्रमण से हुआ। शिलादित्य की राजधानी पुस्पावती के कोख से जन्मा पुत्र गुहादित्य की सेविका ब्रहामणी कमलावती ने लालन पालन किया। क्योंकि रानी उनके जन्म के साथ ही सती हो गई। गुहादित्य बचपन से ही होनहार था और ईडर के भील मंडालिका की हत्या करके उसके सिहांसन पर बैठ गया तथा उसके नाम से गुहिल, गिहील या गहलौत वंश चल पडा। कर्नल टॉड के अनुसार गुहादित्य की आठ पीढ़ियों ने ईडर पर शासन किया ये निम्न हैं - गुहादित्य, नागादित्य, भागादित्य, दैवादित्य, आसादित्य, कालभोज, गुहादित्य, नागादित्य।[1]

सिसोदिया गहलौत
जेम्स टॉड के अनुसार शिकार के बहाने भीलों द्वारा नागादित्य की हत्या कर दी। इस समय इसके पुत्र बप्पा की आयु मात्र तीन वर्ष की थी। बप्पा की भी एक ब्राहमणी ने संरक्षण देकर अरावली के बीहड में शरण लिया। गौरीशंकर ओझा गुहादित्य और बप्पा के बीच की वंशावली प्रस्तुत की, वह सर्वाधिक प्रमाणिक मानी गई है जो निम्न है - गुहिल, भोज, महेन्द्र, नागादित्य, शिलादित्य, अपराजित, महेन्द्र द्वितीय और कालभोज बप्पा आदि। यह एक संयोग ही है कि गुहादित्य और मेवाड राज्य में गहलोत वंश स्थापित करने वाले बप्पा का बचपन अरावली के जंगल में उन्मुक्त, स्वच्छन्द वातावरण में व्यतीत हुआ। बप्पा के एक लिंग पूजा के कारण देवी भवानी का दर्शन उन्हे मिला और बाबा गोरखनाथ का आशिर्वाद भी। बडे होने पर चित्तौड़ के राजा से मिल कर बप्पा ने अपना वंश स्थापित किया और परमार राजा ने उन्हे पूरा स्नेह दिया। इसी समय विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण को बप्पा ने विफ़ल कर चित्तोड़ से उन्हे गजनी तक खदेड कर अपने प्रथम सैन्य अभिमान में ही सफ़लता प्राप्त की। बप्पा द्वारा धारित रावल उपाधि रावल रणसिंह ( कर्ण सिंह ) 1158 ई. तक निर्वाध रुप से चलती रही। रावण रण सिंह के बाद रावल गहलोत की एक शाखा और हो गई। जो सिसोदिया के जागीर पर आसीन हुई जिसके संस्थापक माहव एवं राहप दो भाई थे। सिसोदा में बसने के कारण ये लोग सिसोदिया गहलौत कहलाये।


महाराणा प्रताप
सत्ता परिवर्तन, स्थान परिवर्तन, व्यक्तिगत महत्वकांक्षा एवं राजपरिवार में संख्या वृद्धि से ही राजपूत वंशों में अनेक शाखाओं एवं उपशाखाओं ने जन्म लिया है। यह बात गहलौत वंश के साथ भी देखने को मिली है। बप्पा के शासन काल मेवाड़ राज्य के विस्तार के साथ ही उसकी प्रतिष्ठा में भी अत्यधिक वृद्धि हुई है। बप्पा के बाद गहलौत वंश की शाखाओं का निम्न विकास हुआ।

1. अहाडिया गहलौत
अहाड नामक स्थान पर बसने के कारण यह नाम हुआ।

2. असिला गहलौत
सौराष्ट्र में बप्पा के पुत्र ने असिलगढ का निर्माण अपने नाम असिल पर किया जिससे इसका नाम असिला पडा।

3. पीपरा गहलौत
बप्पा के एक पुत्र मारवाड के पीपरा पर आधिपत्य पर पीपरा गहलौत वंश चलाया।

4. मागलिक गहलौत
लोदल के शासक मंगल के नाम पर यह वंश चला।

5. नेपाल के गहलोत
रतन सिंह के भाई कुंभकरन ने नेपाल में आधिपत्य किया अतः नेपाल का राजपरिवार भी मेवाड़ की शाखा है।

6. सखनियां गहलौत
रतन सिंह के भाई श्रवण कुमार ने सौराष्ट्र में इस वंश की स्थापना की।

7. सिसौद गहलौत
कर्णसिंह के पुत्र को सिसौद की जागीर मिली और सिसौद के नाम पर सिसौदिया गहलौत कहलाया।

सिसौदिया वंश की उपशाखाएं
चन्द्रावत सिसौदिया
यह 1275 ई. में अस्तित्व में आई। चन्द्रा के नाम पर इस वंश का नाम चन्द्रावत पडा।

भोंसला सिसौदिया
इस वंश की स्थापना सज्जन सिंह ने सतारा में की थी।

चूडावत सिसौदिया
चूडा के नाम पर यह वंश चला। इसकी कुल 30 शाखाएं हैं।
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सिसोदिया वंश (गहलौत वंश) के शासक और उनका शासनकाल

शासकशासनकाल
रावल बप्पा (काल भोज)734 - 753 ई.
रावल खुमान753 - 773 ई.
मत्तट773 – 793 ई.
भर्तभट्त793 – 813 ई.
रावल सिंह813 – 828 ई.
खुमाण सिंह828 – 853 ई.
महायक853 – 878 ई.
खुमाण तृतीय878 – 903 ई.
भर्तभट्ट द्वितीय903 – 951 ई.
अल्लट951 – 971 ई.
नरवाहन971 – 973 ई.
शालिवाहन973 – 977 ई.
शक्ति कुमार977 – 993 ई.
अम्बा प्रसाद993 – 1007 ई.
शुची वरमा1007- 1021 ई.
नर वर्मा1021 – 1035 ई.
कीर्ति वर्मा1035 – 1051 ई.
योगराज1051 – 1068 ई.
वैरठ1068 – 1088 ई.
हंस पाल1088 – 1103 ई.
वैरी सिंह1103 – 1107 ई.
विजय सिंह1107 – 1127 ई.
अरि सिंह1127 – 1138 ई.
चौड सिंह1138 – 1148 ई.
विक्रम सिंह1148 – 1158 ई.
रण सिंह (कर्ण सिंह)1158 – 1168 ई.
क्षेम सिंह1168 – 1172 ई.
सामंत सिंह1172 – 1179 ई.
रतन सिंह1301-1303 ई.
राजा अजय सिंह1303 - 1326 ई.
महाराणा हमीर सिंह1326 - 1364 ई.
महाराणा क्षेत्र सिंह1364 - 1382 ई.
महाराणा लाखासिंह1382 - 1421 ई.
महाराणा मोकल1421 - 1433 ई.
महाराणा कुम्भा1433 - 1469 ई.
महाराणा उदा सिंह1468 - 1473 ई.
महाराणा रायमल1473 - 1509 ई.
महाराणा सांगा (संग्राम सिंह)1509 - 1527 ई.
महाराणा रतन सिंह1528 - 1531 ई.
महाराणा विक्रमादित्य1531 - 1534 ई.
महाराणा उदय सिंह1537 - 1572 ई.
महाराणा प्रताप1572 -1597 ई.
महाराणा अमर सिंह1597 - 1620 ई.
महाराणा कर्ण सिंह1620 - 1628 ई.
महाराणा जगत सिंह1628 - 1652 ई.
महाराणा राजसिंह1652 - 1680 ई.
महाराणा अमर सिंह द्वितीय1698 - 1710 ई.
महाराणा संग्राम सिंह1710 - 1734 ई.
महाराणा जगत सिंह द्वितीय1734 - 1751 ई.
महाराणा प्रताप सिंह द्वितीय1751 - 1754 ई.
महाराणा राजसिंह द्वितीय1754 - 1761 ई.
महाराणा हमीर सिंह द्वितीय1773 - 1778 ई.
महाराणा भीमसिंह1778 - 1828 ई.
महाराणा जवान सिंह1828 - 1838 ई.
महाराणा सरदार सिंह1838 - 1842 ई.
महाराणा स्वरुप सिंह1842 - 1861 ई.
महाराणा शंभू सिंह1861 - 1874 ई.
महाराणा सज्जन सिंह1874 - 1884 ई.
महाराणा फ़तेह सिंह1883 - 1930 ई.
महाराणा भूपाल सिंह1930 - 1955 ई.
महाराणा भगवत सिंह1955 - 1984 ई.
महाराणा महेन्द्र सिंह1984 ई.

राष्ट्रपति चुनाव : विस्तृत जानकारी





भारत में कैसे होता है राष्ट्रपति का चुनाव

नवभारत टाइम्स | Updated: Jun 7, 2017

अखिलेश प्रताप सिंह
हमारे देश में राष्ट्रपति के चुनाव का तरीका अनूठा है और एक तरह से इसे आप सर्वश्रेष्ठ संवैधानिक तरीका कह सकते हैं। इसमें विभिन्न देशों की चुनाव पद्धतियों की अच्छी बातों को चुन-चुन कर शामिल किया गया है। मसलन यहां राष्ट्रपति का चुनाव एक इलेक्टोरल कॉलेज करता है, लेकिन इसके सदस्यों का प्रतिनिधित्व आनुपातिक भी होता है। उनका सिंगल वोट ट्रांसफर होता है, पर उनकी दूसरी पसंद की भी गिनती होती है। इस चुनाव प्रणाली की खूबसूरती को समझने के लिए हमें इन बिंदुओं को समझना होगा।

इनडायरेक्ट इलेक्शन: प्रेजिडेंट का चुनाव एक निर्वाचक मंडल यानी इलेक्टोरल कॉलेज करता है। संविधान के आर्टिकल 54 में इसका उल्लेख है। यानी जनता अपने प्रेजिडेंट का चुनाव सीधे नहीं करती, बल्कि उसके वोट से चुने गए लोग करते हैं। यह है अप्रत्यक्ष निर्वाचन।

वोट देने का अधिकार: इस चुनाव में सभी प्रदेशों की विधानसभाओं के इलेक्टेड मेंबर और लोकसभा तथा राज्यसभा में चुनकर आए सांसद वोट डालते हैं। प्रेजिडेंट की ओर से संसद में नॉमिनेटेड मेंबर वोट नहीं डाल सकते। राज्यों की विधान परिषदों के सदस्यों को भी वोटिंग का अधिकार नहीं है, क्योंकि वे जनता द्वारा चुने गए सदस्य नहीं होते।

सिंगल ट्रांसफरेबल वोट: इस चुनाव में एक खास तरीके से वोटिंग होती है, जिसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम कहते हैं। यानी वोटर एक ही वोट देता है, लेकिन वह तमाम कैंडिडेट्स में से अपनी प्रायॉरिटी तय कर देता है। यानी वह बैलट पेपर पर बता देता है कि उसकी पहली पसंद कौन है और दूसरी, तीसरी कौन। यदि पहली पसंद वाले वोटों से विजेता का फैसला नहीं हो सका, तो उम्मीदवार के खाते में वोटर की दूसरी पसंद को नए सिंगल वोट की तरह ट्रांसफर किया जाता है। इसलिए इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट कहा जाता है।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था: वोट डालने वाले सांसदों और विधायकों के वोट का वेटेज अलग-अलग होता है। दो राज्यों के विधायकों के वोटों का वेटेज भी अलग होता है। यह वेटेज जिस तरह तय किया जाता है, उसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था कहते हैं। कैसे तय होता है यह वेटेज?

एमएलए के वोट का वेटेज
विधायक के मामले में जिस राज्य का विधायक हो, उसकी आबादी देखी जाती है। इसके साथ उस प्रदेश के विधानसभा सदस्यों की संख्या को भी ध्यान में रखा जाता है। वेटेज निकालने के लिए प्रदेश की पॉपुलेशन को इलेक्टेड एमएलए की संख्या से डिवाइड किया जाता है। इस तरह जो नंबर मिलता है, उसे फिर 1000 से डिवाइड किया जाता है। अब जो आंकड़ा हाथ लगता है, वही उस राज्य के एक विधायक के वोट का वेटेज होता है। 1000 से भाग देने पर अगर शेष 500 से ज्यादा हो तो वेटेज में 1 जोड़ दिया जाता है।

एमपी के वोट का वेटेज
सांसदों के मतों के वेटेज का गणित अलग है। सबसे पहले सभी राज्यों की विधानसभाओं के इलेक्टेड मेंबर्स के वोटों का वेटेज जोड़ा जाता है। अब इस सामूहिक वेटेज को राज्यसभा और लोकसभा के इलेक्टेड मेंबर्स की कुल संख्या से डिवाइड किया जाता है। इस तरह जो नंबर मिलता है, वह एक सांसद के वोट का वेटेज होता है। अगर इस तरह भाग देने पर शेष 0.5 से ज्यादा बचता हो तो वेटेज में एक का इजाफा हो जाता है।

वोटों की गिनती
प्रेजिडेंट के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट हासिल करने से ही जीत तय नहीं होती है। प्रेजिडेंट वही बनता है, जो वोटरों यानी सांसदों और विधायकों के वोटों के कुल वेटेज का आधा से ज्यादा हिस्सा हासिल करे। यानी इस चुनाव में पहले से तय होता है कि जीतने वाले को कितना वोट यानी वेटेज पाना होगा। इस समय प्रेजिडेंट इलेक्शन के लिए जो इलेक्टोरल कॉलेज है, उसके सदस्यों के वोटों का कुल वेटेज 10,98,882 है। तो जीत के लिए कैंडिडेट को हासिल करने होंगे 5,49,442 वोट। जो प्रत्याशी सबसे पहले यह कोटा हासिल करता है, वह प्रेजिडेंट चुन लिया जाता है। लेकिन सबसे पहले का मतलब क्या है?

प्रायॉरिटी का महत्व
इस सबसे पहले का मतलब समझने के लिए वोट काउंटिंग में प्रायॉरिटी पर गौर करना होगा। सांसद या विधायक वोट देते वक्त अपने मतपत्र पर बता देते हैं कि उनकी पहली पसंद वाला कैंडिडेट कौन है, दूसरी पसंद वाला कौन और तीसरी पसंद वाला कौन आदि आदि। सबसे पहले सभी मतपत्रों पर दर्ज पहली वरीयता के मत गिने जाते हैं। यदि इस पहली गिनती में ही कोई कैंडिडेट जीत के लिए जरूरी वेटेज का कोटा हासिल कर ले, तो उसकी जीत हो गई। लेकिन अगर ऐसा न हो सका, तो फिर एक और कदम उठाया जाता है।

पहले उस कैंडिडेट को रेस से बाहर किया जाता है, जिसे पहली गिनती में सबसे कम वोट मिले। लेकिन उसको मिले वोटों में से यह देखा जाता है कि उनकी दूसरी पसंद के कितने वोट किस उम्मीदवार को मिले हैं। फिर सिर्फ दूसरी पसंद के ये वोट बचे हुए उम्मीदवारों के खाते में ट्रांसफर किए जाते हैं। यदि ये वोट मिल जाने से किसी उम्मीदवार के कुल वोट तय संख्या तक पहुंच गए तो वह उम्मीदवार विजयी माना जाएगा। अन्यथा दूसरे दौर में सबसे कम वोट पाने वाला रेस से बाहर हो जाएगा और यह प्रक्रिया फिर से दोहराई जाएगी। इस तरह वोटर का सिंगल वोट ही ट्रांसफर होता है। यानी ऐसे वोटिंग सिस्टम में कोई मैजॉरिटी ग्रुप अपने दम पर जीत का फैसला नहीं कर सकता है। छोटे-छोटे दूसरे ग्रुप्स के वोट निर्णायक साबित हो सकते हैं। यानी जरूरी नहीं कि लोकसभा और राज्यसभा में जिस पार्टी का बहुमत हो, उसी का दबदबा चले। विधायकों का वोट भी अहम है।

रेस से बाहर करने का नियम
सेकंड प्रायॉरिटी के वोट ट्रांसफर होने के बाद सबसे कम वोट वाले कैंडिडेट को बाहर करने की नौबत आने पर अगर दो कैंडिडेट्स को सबसे कम वोट मिले हों, तो बाहर उसे किया जाता है, जिसके फर्स्ट प्रायॉरिटी वाले वोट कम हों।

बना रहता है चांस
अगर अंत तक किसी प्रत्याशी को तय कोटा न मिले, तो भी इस प्रक्रिया में कैंडिडेट बारी-बारी से रेस से बाहर होते रहते हैं और आखिर में जो बचेगा, वही विजयी होगा।
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राष्ट्रपति चुनाव: कैसे चुनते हैं राष्ट्रपति (विस्तृत जानकारी)  
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। राष्ट्रपति का यहां सर्वोच्च संवैधानिक पद है। संवैधानिक प्रक्रिया के अंतर्गत हर 5 वर्षों में राष्ट्रपति का चुनाव किया जाता है। 
एक व्यक्ति को राष्ट्रपति बनने के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें हैं, जिनमें प्रमुख हैं:-
 
वह भारत का नागरिक हो.
उसने कम से कम 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर ली हो.
वह लोकसभा का सदस्य बनने की पात्रता रखता हो.
राष्ट्रपति बनने के बाद उम्मीदवार संसद के किसी भी सदन या राज्यों की किसी भी विधानसभा/विधान परिषद का सदस्य नहीं होना चाहिए.
वह भारत सरकार के अंतर्गत किसी भी लाभ के पद पर न हो.
भारत में राष्ट्रपति का चयन सीधे-सीधे जनता नहीं करती है, लेकिन वह अप्रत्यक्ष रूप से इस चुनाव में सम्मिलित होती है. राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को जनता का वोट उसके प्रतिनिधि यानी क्षेत्र के विधायक के ज़रिए मिलता है. राष्ट्रपति के चुनाव में लोकसभा, राज्यसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य मतदान करते हैं. राष्ट्रपति चुनाव में कोई भी पार्टी व्हिप नहीं जारी करती है यानी यह ज़रूरी नहीं है कि किसी भी पार्टी के सदस्य उस पार्टी द्वारा प्रस्तावित उम्मीदवार को ही वोट करेंगे. चूंकि राष्ट्रपति चुनाव में गुप्त मतदान होता है, इसलिए इसका खुलासा नहीं हो पाता है कि किस सांसद/विधायक ने किस उम्मीदवार को वोट दिया. देश में छह राज्य ऐसे हैं, जहां विधानसभा के साथ-साथ विधान परिषद भी है, लेकिन इस चुनाव में केवल राज्यों के निचले सदन (विधानसभा) के सदस्य ही मतदान में भाग ले सकते हैं. देश में सभी राज्यों में उच्च सदन (विधान परिषद) नहीं है. सभी राज्यों में एकरूपता और समानता बनी रहे, इसलिए केवल विधानसभा के सदस्यों को ही राष्ट्रपति के चुनाव में मत देने का प्रावधान है. विधानसभा में ऐसे विधायक, जो राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं, वे किसी क्षेत्र विशेष की जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, इसलिए राष्ट्रपति के  चुनाव में उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होता है. ठीक यही नियम लोकसभा और राज्यसभा में मनोनीत सदस्यों पर लागू होता है. राज्यसभा के वे सदस्य, जिन्हें अपने क्षेत्र में विशिष्ट पहचान और स्थान बनाने की वजह से मनोनीत किया गया है, भी राष्ट्रपति के चुनाव में अपना वोट नहीं डाल सकते. उदाहरण के तौर पर इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में राज्यसभा सदस्य क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, अभिनेत्री रेखा एवं अनु आगा अपना वोट नहीं डाल सकेंगे. इसी तरह लोकसभा में मनोनीत किए जाने वाले एंग्लो इंडियन सदस्य भी राष्ट्रपति चुनाव में मतदान नहीं कर सकते हैं.

अब यह जानते हैं कि आ़िखर राष्ट्रपति चुनाव में मतदान किस प्रकार होता है:-
 
भले ही 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1.2 अरब है, लेकिन अभी भी भारत में चुनावों के लिए 1971 की जनगणना के आंकड़ों को आधार माना जाता है. 2026 तक 1971 की जनगणना के आधार पर ही चुनाव संपन्न होंगे. राष्ट्रपति चुनाव के लिए ़खास प्रकार का फार्मूला तय किया गया है, जिससे बिना किसी पक्षपात या गड़बड़ी के यह चुनाव सही तरीक़े से संपन्न हो सके. इसके लिए यह जानना ज़रूरी है कि राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्येक मतदाता का मत एक मत के रूप में नहीं गिना जाता है. सांसदों के वोट की वैल्यू तो समान होती है, मगर हर राज्य के विधायक के वोट की वैल्यू अलग-अलग होती है. दोनों सदनों के निर्वाचित सांसदों के वोट की वैल्यू सभी राज्यों के विधायकों की कुल वोट वैल्यू के बराबर होती है.

राष्ट्रपति चुनाव में इस्तेमाल होने वाले फार्मूले के आधार पर वोट वैल्यू निकालने के तीन चरण हैं:-

सबसे पहले हर राज्य के विधायक के वोट की वैल्यू निकाली जाती है.
विधायकों की संख्या के आधार पर उस राज्य के  कुल वोटों की वैल्यू निकाली जाती है.
 देश के कुल विधायकों की संख्या और वोट वैल्यू के आधार पर लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों के वोट की वैल्यू निकाली जाती है.
इस प्रक्रिया से गुज़रते हुए राष्ट्रपति चुनाव में पड़ने वाले कुल वोटों की गणना की जाती है. चुनाव में पड़ने वाले कुल वोटों की वैल्यू निकाली जा सकती है.

राज्य के विधायक के वोट की वैल्यू यानी संख्या निकालने के लिए:- 1971 की जनगणना के अनुसार, राज्य की जनसंख्या को वहां की विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या से भाग दिया जाए, परिणाम में जो भी संख्या आए, उसे फिर से 1000 से भाग दिया जाए. इसके बाद जो परिणाम निकलेगा, वह उस राज्य के एक विधायक के वोट की वैल्यू होगी. इस तरह प्रत्येक राज्य के विधायकों के वोट की वैल्यू निकाली जाती है.
राज्य की कुल वोट वैल्यू निकालने के लिए:- राज्य के कुल विधायकों के वोटों की वैल्यू निकालने के लिए एक विधायक के वोट की वैल्यू को राज्य विधानसभा के कुल विधायकों की संख्या से गुणा किया जाए. इससे जो परिणाम आएगा, वह उस राज्य का कुल वोट होगा. इसी तरह हर राज्य अपनी भागीदारी राष्ट्रपति चुनाव में सुनिश्चित करता है.
सांसदों के वोट की वैल्यू निकालने के लिए:- सांसदों के वोट की वैल्यू निकालने के लिए संसद के निर्वाचित सदस्यों की संख्या को जोड़ते हैं. लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित सदस्यों को जोड़कर जो परिणाम आए, उससे राज्यों के कुल वोट में भाग देते हैं. इससे जो परिणाम आए, वह एक सांसद के वोट की वैल्यू होगी. कुल सांसदों के वोटों की वैल्यू निकालने के लिए कुल सांसदों की संख्या को एक सांसद के वोट की वैल्यू से गुणा करते हैं. अब राष्ट्रपति चुनाव में मतदाताओं के वोटों की वैल्यू निकालने के लिए कुल सांसदों और कुल विधायकों के वोटों की वैल्यू जोड़ेंगे, जो परिणाम आए, वह मतदान में कुल पड़ने वाले वोटों की संख्या होगी.
नियम यह है कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार व्यक्ति को चुनाव जीतने के लिए 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट पाना आवश्यक होता है. मतलब यह कि 50 प्रतिशत के अलावा 1 और वोट उम्मीदवार के पक्ष में आना ज़रूरी है. राष्ट्रपति पद का चुनाव मल्टी कैंडिडेट इलेक्शन होता है यानी इस चुनाव में दो से ज़्यादा उम्मीदवार खड़े हो सकते हैं, इसलिए ज़्यादातर यह संभव नहीं है कि किसी भी उम्मीदवार को निर्वाचन के लिए 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट मिल सकें. इसलिए ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम का प्रावधान है. देश के छठवें राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी इस मामले में अपवाद रहे हैं. वह ऐसे राष्ट्रपति हुए, जिनके खिलाफ कोई अन्य प्रत्याशी खड़ा नहीं हुआ था और इसीलिए वह निर्विरोध यानी अनअपोज्ड राष्ट्रपति बने थे. एक सही उम्मीदवार चुनने का एक खास तरीक़ा है, जिसे उदाहरण के साथ समझते हैं.
सबसे पहले यह जान लें कि राष्ट्रपति चुनाव में प्रिफ्रेंसियल सिस्टम वोटिंग होता है यानी मतदाताओं को सभी प्रत्याशियों को अपनी पसंद के क्रम के अनुसार वोट करना ज़रूरी होता है. मान लें कि 4 लोग अ, ब, स, द राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं, उन्हें सभी मतदाता अपनी इच्छा से पहली पसंद, दूसरी पसंद, तीसरी और फिर चौथी पसंद के क्रम के अनुसार वोट देंगे. मान लें कि इनमें अ को 30 प्रतिशत वोट मिले, ब को 12 प्रतिशत वोट मिले, स को 40 प्रतिशत वोट मिले और द को 18 प्रतिशत वोट मिले. ऐसे में सबसे कम वोट पाने वाले प्रत्याशी को बाहर कर दिया जाता है. बाहर किए गए उम्मीदवार को मिले वोटों को उसमें वर्णित सेकेंड प्रिफ्रेंस के आधार पर अन्य उम्मीदवारों के वोटों में शामिल कर दिया जाता है. एलिमिनेशन की यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है, जब तक किसी भी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट न मिल जाएं. 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट पाने वाले प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है. आज तक भारत में राष्ट्रपति निर्वाचन की प्रक्रिया में एक बार ही दूसरे दौर की गिनती की गई है. 1969 में हुए चुनाव में वोटों की गिनती सेकेंड प्रिफ्रेंस के हिसाब से हुई थी. इसके बाद वी वी गिरि निर्वाचित घोषित किए गए थे. यह चुनाव इस तरह अपवाद है. इसके अलावा आज तक दूसरे दौर तक वोटों की गिनती की आवश्यकता नहीं पड़ी.
 
राष्ट्रपति चुनाव में मतदाताओं के लिए कुछ विशेष प्रावधान हैं:-

यदि किसी राज्य में विधानसभा किसी भी कारणवश निलंबित हो, फिर भी उसके निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में भाग ले सकते हैं. 1967 में राजस्थान विधानसभा के निलंबित होने के बावजूद निर्वाचित सदस्यों ने अपना वोट दिया था. इसी तरह बिहार विधानसभा भी 1969 में निलंबित थी, मगर निर्वाचित सदस्यों ने राष्ट्रपति चुनाव में अपना वोट डाला था.

1950 के बाद देश के 12 राष्ट्रपति हुए हैं, जिनमें कुछ ऐसे हैं, जो विशेष प्रकार से राष्ट्रपति रहे हैं.

देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अब तक के अकेले ऐसे राष्ट्रपति हैं, जो लगातार दो बार राष्ट्रपति बने थे.
देश के दो राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन और फ़खरुद्दीन अली अहमद की मौत उनके कार्यकाल के दौरान हो गई थी, जिसके बाद तत्काल तौर पर उप राष्ट्रपति ने राष्ट्रपति का पद संभाला.
ज़ाकिर हुसैन की कार्यकाल के दूसरे वर्ष (1969) में मृत्यु के बाद तत्कालीन उप राष्ट्रपति वी वी गिरि कार्यवाहक राष्ट्रपति बने. उसके कुछ माह बाद ही राष्ट्रपति चुनाव में खड़े होने के लिए उन्होंने कार्यवाहक राष्ट्रपति के पद से इस्ती़फा दे दिया था, लेकिन चुनाव में वह हार गए और उनकी जगह मोहम्मद हिदायतुल्ला कार्यकारी राष्ट्रपति बने. फिर हुए चुनाव में वी वी गिरि खड़े हुए और उन्हें जीत मिली. इस तरह वी वी गिरि ऐसे राष्ट्रपति हुए, जो उप राष्ट्रपति रहते हुए कार्यवाहक राष्ट्रपति बने और बाद में चुनाव जीतकर राष्ट्रपति भी बने.
वी वी गिरि के बाद फ़खरुद्दीन अली अहमद राष्ट्रपति बने, लेकिन कार्यकाल के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई, तब तत्कालीन उप राष्ट्रपति बसप्पा दनप्पा जट्टी कार्यवाहक राष्ट्रपति बने थे.
वर्तमान में इस पद की शोभा बढ़ा रहीं प्रतिभा देवी सिंह पाटिल देश की पहली महिला राष्ट्रपति हैं.


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राष्ट्रपति चुनाव पर आपके हर सवाल का जवाब यहां है


बीबीसी की ख़ास पहल 'हमसे पूछिए' के तहत हमने आपसे पूछा था कि आप राष्ट्रपति चुनावों के किस पहलू के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं.
आपने कई सवाल भेजे जिसमें से इस सवाल में सबकी दिलचस्पी थी कि भारत का राष्ट्रपति कैसे चुना जाता है.
हमसे पूछिए: राष्ट्रपति चुनाव से जुड़े सवाल
जानिए राष्ट्रपति चुनाव में किसके पास कितने वोट
हम इस रिपोर्ट में ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण सवालों के जवाब दे रहे हैं.

1. राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया क्या होती है?
(भौमिक पटेल) (हर्ष प्रमेश) (मनीष कुमार) (अशोक सिंह) (मोहम्मद अलीम) (शैलेंद्र कुमार) सुशील नारायण) (लवनीत जैन) (शाहवाज) (अरविंद सिंह) (अब्दुल करीम टाक) (आर एस तिवारी) (अखिलेश यादव) सुभाष, (हरिकिशोर कुमार) (माधव शर्मा) (हेमाराम बारूपाल) (राजीव) (फैजान मलिक) (जयदेव यादव)
राष्ट्रपति का निर्वाचन इलेक्टोरल कॉलेज के द्वारा किया जाता है. इन इलेक्टोरल कॉलेज निर्वाचक मंडल के सदस्य होते हैं लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य और इसके अलावा सभी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य.
विधान परिषद् के सदस्य उसके सदस्य नहीं होते. लोकसभा और राज्यसभा के नामांकित सदस्य भी इसके सदस्य नहीं होते हैं.
लेकिन इन सभी के मतों का मूल्य अलग-अलग होता है. लोकसभा और राज्यसभा के मत का मूल्य एक होता है और विधानसभा के सदस्यों का अलग होता है. ये राज्य की जनसंख्या के आधार पर तय होता है.
इसमें मशीन का इस्तेमाल नहीं होता है.
2.क्या राष्ट्रपति चुनाव में टाई होता है और ऐसा होता है तो चुनाव कैसे किया जाता है? (मनोज ककाडे)
टाई होने के बारे में संविधान बनाने वाले ने संकल्पना नहीं की थी. इसलिए इसके बारे में जिक्र नहीं है. राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर जो 1952 का कानून है उसमें भी इसका जिक्र नहीं है. ऐसी स्थिति आज तक आई भी नहीं है और आने की संभावना भी नहीं दिखती है.
3.राष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म होने के बाद क्या उनका राजनीतिक जीवन खत्म हो जाता है. क्या वो उसके बाद चुनाव नहीं लड़ सकते. (प्रदीप बस्सी)
संविधान में स्पष्ट प्रावधान है कि राष्ट्रपति कार्यकाल समाप्त होने के बाद दोबारा राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा जा सकता है. राजनीतिक जीवन समाप्त होने का कोई सवाल नहीं उठता है. वो चाहे तो किसी भी तरह से राजनीतिक जीवन में रह सकते हैं. लेकिन देश के सर्वोच्च पद पर रहने के बाद स्वाभाविक है कि वो सांसद या विधायक या राज्यपाल बनना पसंद नहीं करेंगे. क्योंकि ये सब तो राष्ट्रपति के नीचे के पद हैं.
4.राष्ट्रपति पद का क्या महत्व है जब भारत में सारे अधिकार प्रधानमंत्री के पास होते हैं? (मनोज कुमार सिंह) (मोहम्मद जावेद अख्तर) (परमजीत सिंह) (मोहम्मद अफज़ल)
ऐसा नहीं है कि सारे अधिकार प्रधानमंत्री के पास रहते हैं. सबके अपने-अपने क्षेत्र हैं. पूरी कार्यपालिका की शक्तियां राष्ट्रपति के हाथ में होती है. राष्ट्रपति इनका प्रत्यक्ष तौर पर स्वयं या फिर अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से इस्तेमाल कर सकते हैं.
राष्ट्रपति का प्रमुख दायित्व प्रधानमंत्री को नियुक्त करना और संविधान का संरक्षण करना है. यह काम कई बार वो अपने विवेक से तय करते हैं. कोई भी अधिनियम उनकी मंजूरी के बिना पारित नहीं हो सकता. वो मनी बिल को छोड़कर किसी भी बिल को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं.
5.राष्ट्रपति का चुनाव कौन लड़ सकता है और उस व्यक्ति की योग्यता और उम्र क्या होनी चाहिए. राष्ट्रपति के कर्तव्य और अधिकार क्या हैं? (मोहम्मद इमरान खान) (अनिल कुमार) (सुरेंद्र मिश्रा)
भारत का नागरिक होना चाहिए. आयु कम से कम 35 साल होनी चाहिए. लोकसभा का सदस्य होने की पात्रता होनी चाहिए. इलेक्टोरल कॉलेज के पचास प्रस्तावक और पचास समर्थन करने वाले होने चाहिए.
राष्ट्रपति का मूल कर्तव्य संघ की कार्यकारी शक्तियों का निर्वहन करना है. फौज के प्रमुखों की नियुक्ति भी वो करते हैं.
6.राष्ट्रपति को पद से कैसे हटाया जा सकता है? (ओमप्रकाश सिंह)
राष्ट्रपति को उसके पद से महाभियोग के ज़रिये हटाया जा सकता है.
इसके लिए लोकसभा और राज्यसभा में सदस्य को चौदह दिन का नोटिस देना होता है. इस पर कम से कम एक चौथाई सदस्यों के दस्तख़त ज़रूरी होते हैं. फिर सदन उस पर विचार करता है. अगर दो-तिहाई सदस्य उसे मान लें तो फिर वो दूसरे सदन में जाएगा. दूसरा सदन उसकी जांच करेगा और उसके बाद दो-तिहाई समर्थन से वो भी पास कर देता है तो फिर राष्ट्रपति को पद से हटा हुआ माना जाएगा.
7.क्या दो ही उम्मीदवार खड़े होते हैं या ज़्यादा भी उम्मीदवार हो सकते हैं? (कृपानंद)
दो से ज्यादा भी उम्मीदवार हो सकते हैं बशर्ते कि पचास प्रस्तावक और पचास समर्थन करने वाले हो.
8.राष्ट्रपति क्षमादान के अधिकार का उपयोग अपने विवेक से करता है या मंत्रिपरिषद की सलाह पर? (नितिन गायकवाड़)
क्षमादान के अधिकार का उपयोग राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद के सलाह पर ही करता है. लेकिन मंत्रिपरिषद ने राष्ट्रपति को क्या सलाह दी है, ये अदालत में भी नहीं पूछा जा सकता है.

9.सिंगर ट्रांसफरेबल वोटिंग क्या चीज़ है. (संतोष मीणा और अब्दुल करीम टाक) (तरूण कुमार उपाध्याय)
इसमें प्रावधान यह है कि राष्ट्रपति के चुनाव में आनुपातिक प्रतिनिधित्व सिंगर ट्रांसफरेबल वोट होगा. संविधान के निर्माण के समय ये बिना किसी मीटिंग के पास हो गया था. लेकिन सवाल उठता है कि एक से ज्यादा सीटों पर अगर चुनाव हो रहा है तो आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बात होती है. एक पद के लिए नहीं.
10.क्या अब तक किसी राष्ट्रपति का चुनाव निर्विरोध हुआ है.
नीलम संजीव रेड्डी अकेले राष्ट्रपति हुए जो निर्विरोध चुने गए थे और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद अकेले राष्ट्रपति थे जो दो बार चुने गए.

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

73 प्रतिशत भारतीय अपनी सरकार और उसकी नीतियों पर भरोसा करते हैं : फोर्ब्स



इस मामले में विश्व में नंबर वन बनी मोदी सरकार, 
आसपास भी नहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

फोर्ब्स मैगजीन में छपे ओईसीडी के सर्वे के अनुसार गर्वमेंट एट ग्लांस 2017 नाम के सर्वे में ये भी बताया गया है कि पिछले कुछ सालों में अलग-अलग देशों की सरकारों में जनता का भरोसा बदला रहा है।
जनसत्ता ऑनलाइन July 14, 2017


अपने देश के नागरिकों को भरोसे में लेने के मामले में भारत सरकार विश्व में नबंर वन साबित हुई है। भारतीय नागरिकों ने विश्व में सबसे ज्यादा मोदी सरकार और उनकी नीतियों पर भरोसा जताया है। हाल ही में प्रकाशित हुई इकोनॉमिक कॉर्पोरेशन ओर्गनाईजेशन ने अपनी रिपोर्ट मे कहां कि 73 फीसदी भारतीय नागरिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर भरोसा करते हैं। ये विश्व में सबसे अधिक है। जबकि दूसरे नंबर पर कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो हैं जिनकी सरकार पर 62 फीसदी कनेडियन भरोसा करते हैं। वहीं तुर्की इसमें तीसरे पायदान पर है जहां 58 फीसदी लोग अपनी सरकार पर भरोसा करते हैं। रूस और जर्मनी चौथे और पांचवे नंबर हैं। जहां जनता ने दोनों देशों की सरकार पर 58 और 55 फीसदी भरोसा जताया है। दूसरी तरफ इस मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछड़ते हुए नजर आए। ट्रंप सरकार महज 30 फीसदी अमेरिकी नागरिकों का भरोसा हासिल करने में कामयाब हो सकी है। यूरोप के माइग्रेशन क्राइसिस, एक से ज्यादा चुनाव और बैंकों के बंद होने के चलते ग्रीस इस मामले में सबसे नीचे रहा। इस देश के केवल 13 फीसदी नागरिकों ने सरकार पर भरोसा जताया है।


वहीं हाल ही में एक भ्रष्टाचार और घोटाले के दौरान राष्ट्रपति पार्क गीन-हई के महाभियोग ने दक्षिण कोरियाई सरकार में लोगों के आत्मविश्वास को घटाकर 25 फीसदी पर ला दिया है। फोर्ब्स मैगजीन में छपे ओईसीडी के सर्वे के अनुसार गर्वमेंट एट ग्लांस 2017 नाम के सर्वे में ये भी बताया गया है कि पिछले कुछ सालों में अलग-अलग देशों की सरकारों में जनता का भरोसा बदला रहा है। सर्वे में कुल 15 देशों को जगह दी गई है। जिसमें ग्रीस सबसे नीचे तो भारत चोटी पर बना हुआ है। जानकारी के लिए बता दें कि सभी आंकड़े साल 2016 के आधार पर हैं।

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मोदी सरकार नंबर वन, भारतीयों को है उनकी कार्यशैली पर पूरा भरोसा...
पुनः संशोधित शुक्रवार, 14 जुलाई 2017  

फोर्ब्स ने दुनिया के 34 अग्रणी लोकतांत्रिक देशों में रह रहे लोगों का हवाला देते हुए एक ट्वीट कर कहा है कि दुनिया में सबसे ज्यादा 73 प्रतिशत भारतीय अपनी सरकार और उसकी नीतियों पर भरोसा करते हैं। फोर्ब्स मैगजीन में छपे ओईसीडी के सर्वे के अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा 73 प्रतिशत भारतीय अपनी सरकार और उसकी नीतियों पर भरोसा करते हैं।


गवर्नमेंट एट ग्लांस 2017 नाम की सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है पिछले कुछ सालों में अलग-अलग देशों की सरकारों में जनता का भरोसा बदलता रहा है। इस लिस्ट में कुल 15 देशों को जगह दी गई है। जहां ग्रीस सबसे कम 13 प्रतिशत के साथ नीचे है वहीं भारत 75 प्रतिशत के साथ ऊपर है। भारत के बाद कनाडा, तुर्की और रूस का नाम है। इस सूची में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान जैसे देश इस मामले में भारत  से कहीं पीछे हैं।  

सोमवार, 10 जुलाई 2017

राहुल गांधी की चीन के राजदूत से गुप्त मुलाकात क्यों ?


कांग्रेस की कभी पाकिस्तान से और कभी चीन से वार्ता करना अनुचित है। चीन से वार्ता करने में जिस तरह की गुप्तता वर्ती गई उससे दाल में काला प्रतीत हेता है। कांग्रेस की बचकानी हरकतों से देश के दुश्मनों की हिम्मत बढती है। - अरविन्द सिसौदिया, जिला महामंत्री भाजपा , कोटा ।


भारत में चीन के राजदूत लिओ झाओहुई के साथ राहुल गांधी (फोटो-Twitter/@iarunmani)


राहुल गांधी की चीन के राजदूत से हुई गुप्त मुलाकात का खुलासा 

MONDAY, JULY 10, 2017

नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच चल रहे तनाव के दौरान राहुल गांधी ने चीन के राजदूत लू झाओहुई से मुलाकात की। यह मुलाकात 8 जुलाई को हुई। चीनी दूतावास ने इसकी जानकारी अपनी बेवसाइट पर अपडेट की, फिर हटा दी। अब इसे लेकर विवाद शुरू हो गया है। कांग्रेस ने पहले ऐसी किसी भी मुलाकात से इंकार किया था अब स्वीकार कर लिया है कि मीटिंग हुई थी। लोग सवाल कर रहे हैं कि ऐसे तनाव भरे माहौल में राहुल गांधी चीन के राजदूत से क्या बात करने गए थे। इधर कांग्रेस ने कहा है कि मुद्दा यह नहीं है कि राहुल गांधी ने मुलाकात क्यों की बल्कि मुद्दा यह है कि मोदी ने चीन के राष्ट्रपति से मुलाकात के समय सीमा विवाद का मुद्दा क्यों नहीं उठाया।

पार्टी के वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला ने इसे एक शिष्टाचार भेट बताया है। कांग्रेस नेता सुरजेवाला ने न्यूज एजेंसी एएनआई से कहा, 'कई राजदूत कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से समय-समय पर शिष्टाचार भेंट करते रहते हैं। किसी को इस भेंट को लेकर सनसनी फैलाने की जरूरत नहीं है। सुरजेवाला ने कहा, 'चाहे वह चीनी राजदूत हों या फिर भूटानी राजदूत राहुल गांधी समय-समय पर इनलोगों से मिलते रहते हैं। राहुल गांधी और विपक्ष के नेता सिक्किम में भारत और चीन के बीच चल रही तनातनी से वाकिफ हैं और उन्हें राष्ट्रीय हित के बारे में जानकारी है।

गौरतलब है कि चीनी दूतावास की वेबसाइट पर बाकायदा जानकारी दी गई थी कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी चीनी राजदूत लू झाओहुई से मिले और मौजूदा द्विपक्षीय संबंधों को लेकर बात की। इस जानकारी का स्क्रीनशॉट भी मौजूद है। हालांकि चीनी दूतावास की ओर से सिर्फ जानकारी हटाई गई है, सफाई में कुछ नहीं कहा गया है। अब कांग्रेस के इस बयान के बाद स्थिति साफ हो गई है।

बता दें कि कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने पीएम नरेंद्र मोदी की G20 सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात पर सवाल खड़े किए थे। साथ ही राहुल गांधी ने भी हाल ही में ट्वीट पर कहा था कि पीएम मोदी चीन के मसले पर खामोश क्यों हैं।

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राहुल गांधी ने की चीनी राजदूत ने मुलाकात, कांग्रेस ने पहले किया इनकार, बाद में लिया यूटर्न
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि कई राजदूत और नेता शिष्टाचरवश कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से मिलते रहते हैं, खासकर जी 5 देशों और पड़ोसी देशों के राजदूत, चाहे वो चीन के राजदूत हों, भूटान के राजदूत या फिर पूर्व एनएसए शिवशंकर मेनन।

जनसत्ता ऑनलाइन July 10, 2017

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भारत में चीन के राजदूत लिओ झाओहुई से मुलाकात की है। इस खबर के मीडिया में आते ही सनसनी मच गई। मामला यहां तक पहुंचा कि कांग्रेस को दो-दो बार सफाई देनी पड़ी। राहुल गांधी और चीनी राजदूत के बीच ये मुलाकात भारत और चीन के बीच सिक्किम मुद्दे पर अभूतपूर्व तनाव के बीच हुई है। लिहाजा इस मुलाकात पर तरह तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। बता दें कि सबसे पहले चीनी दूतावास ने अपने वेबसाइट पर एक बयान जारी कर कहा कि दोनों के बीच में मुलाकात हुई है, लेकिन बाद में वेबसाइट ने इस बयान को हटा लिया, लेकिन सोशल मीडिया पर इस बयान की कॉपी मौजूद है। चीनी दूतावास ने बताया कि 8 जुलाई को राजदूत लिओ झाओहुई राहुल से मिले और दोनों के बीच भारत चीन संबंधों पर बात हुई। कांग्रेस ने भी पहले इस मुलाकात से इनकार किया लेकिन सोमवार (10 जुलाई) को दोपहर होते-होते कांग्रेस को फिर से अपने बयान से पलटना पड़ा और कांग्रेस ने बाद कहा कि कई देशों के नेता और राजदूत कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से मुलाकात करते रहते हैं।

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि कई राजदूत और नेता शिष्टाचरवश कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से मिलते रहते हैं, खासकर जी5 देशों और पड़ोसी देशों के राजदूत, चाहे वो चीन के राजदूत हों, भूटान के राजदूत या फिर पूर्व एनएसए शिवशंकर मेनन। राहुल गांधी इन सभी से मिले, इसलिए किसी को भी ऐसी सामान्य मुलाकातों को बढ़ा चढ़ा कर पेश नहीं करना चाहिए, और इसे किसी घटना की तरह पेश नहीं करना चाहिए जैसा कि विदेश मंत्रालय करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अगर आप रणदीप सुरजेवाला का 6 घंटे का पहले को ट्वीट देखे तो वो इससे एकदम अलहदा था, रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि मीडिया इस मामले पर फर्जी खबर चला रहा है। सुरजेवाला ने ट्वीट किया, भक्त बनने की कोशिश कर रहा एक चैनल केन्द्र के तीन मंत्रियों के चीन दौरे पर सवाल नहीं उठाएगा, जी 20 में  पीएम मोदी की चीनी राष्ट्पति की तारीफ पर सवाल खड़े नहीं करेगा, हां फर्जी खबर जरूर चलाएगा।
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चीन के राजदूत से मुलाक़ात पर चौतरफा घिरे राहुल गांधी, 
कांग्रेस बोली- भाजपा फैला रही झूठ

नई दिल्ली| एक तरफ सिक्किम बॉर्डर पर भारत और चीन की सेना युद्ध के लिए आमने-सामने डटी हुई है वहीं दूसरी ओर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने चीन के राजदूत से मुलाक़ात की है. हालांकि, कांग्रेस पार्टी ने इस मुलाकात को सिरे से खारिज किया था लेकिन चीनी दूतावास के WeChat अकाउंट से इस बात की पुष्टि हुई है.

भारत के चीनी दूतावास के मुताबिक़ राहुल और राजदूत लियो झाओहुई के बीच 8 जुलाई को मुलाकात हुई थी. इस मुलाकात में चीन-भारत संबंध के बारे में चर्चा हुई थी.

चीन के राजदूत से मिले राहुल!
वहीं, इस बात का खुलासा होने के बाद भी कांग्रेस पार्टी अभी तक इस बात को नकारने में लगी हुई है. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने एक साथ कई ट्वीट कर मीडीय पर अपना गुस्सा निकाला है. उनका आरोप है कि कुछ टीवी चैनल भारत में चीन के राजदूत के साथ राहुल गांधी की कथित मुलाकात की झूठी खबरें दिखा रहे हैं.

उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी के संबंध में ये खबरें विदेश मंत्रालय और खुफिया एजेंसियों के सूत्रों की मनगढ़ंत कहानी है.

कांग्रेस की सोशल मीडिया प्रमुख राम्या ने अपने ट्वीट में कहा, “अगर कांग्रेस उपाध्यक्ष ने चीनी राजदूत से मुलाकात की है तो भी मुझे यह कोई मुद्दा नहीं लगता. पर प्रधानमंत्री द्वारा निजी और सार्वजनिक तौर पर सीमा विवाद को नहीं उठाना मुद्दा जरूर है.”

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

संघ में श्री गुरुदक्षिणा पर्व



संघ में गुरू दक्षिणा पर्व 
संघ में कोई भी व्यक्ति गुरु नहीं रहेगा- परम पवित्र भगवा ध्वज ही हमारा गुरु है।
- संघ संस्थापक डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार



संघशाखा प्रारम्भ होने के बाद प्रारंभिक दो वर्षों तक तो धन की कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुई। कार्यक्रम भी सामान्य और छोटे स्वरूप के होते थे, इसलिए खर्चा भी विशेष नहीं होता था। जो कुछ थोड़ा बहुत खर्च होता उसकी पूर्ति डॉक्टरजी का मित्र-परिवार करता। उनके मित्रों को यह पूरा विश्वास था कि डॉक्टरजी निरपेक्ष देश सेवा का कार्य कर रहे हैं। इसलिए वर्ष भर में एक या दो बार वे बड़ी खुशी से संघ कार्य के लिए आर्थिक मदद देते थे। 1927 तक संघ के जिम्मेदार स्वयंसेवक डॉक्टरजी के इन विश्वासपात्र मित्रों के यहां जाकर धन ले आते थे। द्रुत गति से बढ़ने वाले संघ कार्य के लिए, कार्यक्रमों तथा प्रवास हेतु जब अधिक खर्च करना अपरिहार्य हो गया तब डॉक्टरजी ने इस संबंध में स्वयंसेवकों के साथ विचार-विमर्श प्रारंभ किया। आज तक तो धनराशि एकत्रित होती उसका पाई-पाई का हिसाब डॉक्टरजी स्वयं रखते थे और यही आदत उन्होंने स्वयंसेवकों में भी डाली। परिणम स्वरूप स्वयंसेवकों को अपने सारे कार्यक्रम सादगीपूर्ण ढंग से, कम खर्च में करने की आदत हो गई। शाखाएं तेजी से खुलने लगीं थी। नागपुर के पड़ोसी वर्धा और भंडारा जिलों में नयी शाखाएं खुलीं। इस कारण आवश्यक खर्च भी बढ़ने लगा। कुछ दिनों तक मित्रों से उधार लेने का क्रम चला। मित्र भी बड़ी आस्था से रकम उधार देते और वापसी की कोई जल्दबाजी नहीं की जाती, फिर भी उधार ली गई रकम आखिर कभी न कभी वापस करनी है- यह चिंता उन्हें अवश्य होती। फिर इस तरह उधार लेकर काम करने का क्रम आखिर कब तक चलेगा, यह चिंता स्वयंसेवकों के मन में भी उत्पन्न होने लगी और इसका कोई निदान ढूंढा जाने लगा।

एक स्वयंसेवक ने कहा, संघ कार्य हिन्दूसमाज का कार्य है। इसलिए जो आर्थिक मदद दे सकते हैं, ऐसे संघ से सहानुभूति रखने वाले लोगों से धन एकत्रित किया जाए। अन्य स्वयंसेवक ने भी इस सुझाव का समर्थन करते हुए कहा कि समाज जीवन की उन्नति हेतु चलने वाले सभी प्रकार के कार्य आखिर लोगों द्वारा दिए गए दान, अनुदान और चंदे की रकम से ही चलते हैं- अत: हमें भी इसी तरीके से धन जुटाना चाहिए। एक और स्वयंसेवक ने इस पर आपत्ति उठाते हुए कहा कि हमारा कार्य सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय कार्य है इसका लोगों का बोध कराना होगा किंतु इसके लिए उनसे आर्थिक मदद मांगना उचित नहीं होगा। इसी बात को आगग बढ़ाते हुए अन्य स्वयंसेवक ने कहा कि यदि हम इसे अपना ही कार्य कहते हैं तो संघ जैसे उदात्ता कार्य हेतु हम स्वयं ही अपना धन लगाकर खर्च की व्यवस्था क्यों न करें? डॉक्टरजी ने उसे अपना विचार अधिक स्पष्ट रूप से कहने का आग्रह किया। तब उस स्वयंसेवक ने कहा, अपने घर में कोई धार्मिक कार्य अथव विवाह आदि कार्य होते हैं। कोई अपनी लड़की के विवाह के लिए चंदा एकत्रित कर धन नहीं जुटाता। इसी प्रकार संघ कार्य पर होने वाला खर्च भी, जैसे भी संभव हो, हम सभी मिलकर वहन करें।
स्वयंसेवक खुले मन से अपने विचार व्यक्त करने लगे। एक ने शंका आशंका उपस्थित काते हुए कहा, यह धन राशि संघ के कार्य हेतु एकत्र होगी- क्या इसे हम कार्य हेतु अपना आर्थिक सहयोग माने? दान, अनुदान, चंदा आर्थिक सहयोग आदि में पूर्णतया निरपेक्ष भाव से देने का भाव प्रकट नहीं होता। अपनी घर-गृहस्थी ठीक तरह स चलाते हुए, हमें जो संभव होता है, वही हम दान, अनुदान चंदा आदि के रूप में देते हैं। कंतु हमारा संघ कार्य तो जीवन में सर्वश्रेष्ठ वरण करने योग्य कार्य है। वह अपना ही कार्य है, इसलिए हमें अपने व्यक्तिगत खर्चों में कटौती कर संघ कार्य हेतु जितना अधिक दे सकें, उतना हमें देना चाहिए- यह भावना स्वयंसेवकों में निर्माण होनी चाहिए। अपने व्यक्तिगत जीवन में भी धन-सम्पत्ति की ओर देखने का योग्य दृष्टिकोण हमें स्वीकार करना चाहिए। मुक्त चिंतन के चलते स्वयंसेवक अपने अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। डॉक्टरजी ने सबके विचारों को सुनने के बाद कहा, कृतज्ञता और निरपेक्षता की भावना से गुरुदक्षिणा समर्पण की पध्दति भारत में प्राचीनकाल में प्रचलित थी। संघ कार्य करते समय धन संबंधी हमें अपेक्षित भावना गुरुदक्षिणा की इस संकल्पना में प्रकट होती है- हमें भी वही पध्दति स्वीकार करनी चाहिए। डॉक्टरजी के इस कथन से सभी स्वयंसेवकों के विचार को एक नयी दिशा मिली और विशुध्द भावना से 'गुरुदक्षिणा' समर्पण का विचार सभी स्वयंसेवकों के हृदय में बस गया।
दो दिन बाद ही व्यास पूर्णिमा थी। गुरुपूजन और गुरुदक्षिणा समर्पण हेतु परम्परा से चला आ रहा, यह पावन दिवस सर्व दृष्टि से उचित था। इसलिए डॉक्टरजी ने कहा कि इस दिन सुबह ही स्नान आदि विधि पूर्णकर हम सारे स्वयंसेवक एकत्रित आयेंगे और श्री गुरुपूर्णिमा व श्री गुरुदक्षिणा का उत्सव मनायेंगे। डॉक्टरजी की यह सूचना सुनते ही घर लौटते समय स्वयंसेवकों के मन में विचार-चक्र घूमने लगा। परसों हम गुरु के नाते किसकी पूजा करेंगे? स्वयंसेवकों का गुरु कौन होगा? स्वाभाविकतया सबके मन में यह विचार आया कि डॉक्टरजी के सिवा हमारा गुरु कौन हो सकता है? हम परसों मनाये जाने वाले गुरुपूजन उत्सव में उन्हीं का पूजन करेंगे। कुछ स्वयंसेवकों के विचार में, राष्ट्रगुरु तो समर्थ रामदास स्वामी हैं। प्रार्थना के बाद नित्य हम उनकी जय जयकार करते हैं। अत: समर्थ रामदासजी के छायाचित्र की पूजा करना उचित रहेगा। उन्हीं दिनों अण्णा सोहनी नामक एक कार्यकर्ता शाखा में उत्ताम शारीरिक शिक्षके रूप में प्रसिध्द थे- उनकी शिक्षा से हमारी शारीरिक क्षमता और विश्वास से वृध्दि होती है, अत: क्यों न उन्हें ही गुरु के रूप में पूजा जाए? अनेक प्रकार की विचार तरंगे स्वयंसेवकों के मन में उटने लगीं।
व्याप पूर्णिमा के दिन प्रात:काल सभी स्वयंसेवक निर्धारित समय पर डॉक्टरजी के घर एकत्रित हुए। ध्वजारोहण, ध्वजप्रणाम के बाद स्वयंसेवक अपने अपने स्थान पर बैठ गए। व्यक्तिगत गीत हुआ और उसके बाद डॉक्टरजी भाषण देने के लिए उठ खड़े हुए। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि संघ किसी भी जीवित व्यक्ति को गुरु न मानते हुए अपने परम पवित्र भगवा ध्वज को ही अपना गुरु मानता है। व्यक्ति चाहे तिना ही श्रेष्ठ क्यो न हो, वह सदा अविचल-अडिग उसी स्थिति में रहेगा- इसकी कोई गारंटी नहीं। श्रेष्ठ व्यक्ति में भी कोई न कोई अपूर्णता या कमी रह सकती है। सिध्दांत ही नित्य अडिग बना रह सकता है। भगवा ध्वज ही संघ के सैध्दान्तिक विचारों का प्रतीक है- इस ध्वज की ओर देखते ही अपने राष्ट्र का उज्जवल इतिहास, अपनी श्रेष्ठ संस्कृति और दिव्य दर्शन हमारी आंखों के सामने खड़ हो जाता है। जिस ध्वज की ओर देखते ही अंत:करण में स्फूर्ति का संचार होने लगता है वही भगवा ध्वज अपने संघ कार्य के सिध्दांतों का प्रतीक है- इसलिए वह हमारा गुरु है। आज हम उसी का पूजन करें और उसे ही अपनी गुरुदक्षिणा समर्पित करें।
कार्यक्रम बड़े उत्साह से सम्पन्न हुआ और इसके साथ ही भगवा ध्वज को अपना गुरु और आदर्श मानने की पध्दति शुरु हुई। इस प्रथम गुरुपेजा उत्सव में कुल 84 रु. श्रीगुरुदक्षिणा के रूप में एकत्रित हुए। उसका तथा आगे संघ कार्य पर होने वाले खर्चे का पूरा हिसाब रखने की व्यवस्था की गई। श्रीगुरुदक्षिणा का उपयोग केवल संघ कार्य हेतु ही हो, अपने व्यक्तिगत कार्य के लिए उसमें से एक भी पैसा उपयोग में नहीं लाया जाए- इसकी चिंता स्वयं डॉक्टरजी किया करते। वही आदत स्वयंसेवकों में भी निर्माण हुई इस प्रकार आत्मनिर्भर होकर संघ कार्य करने की पध्दति संघ में प्रचलित हुई।