शनिवार, 14 जनवरी 2017

समाज का सुख संघर्ष में नहीं है अपितु सामंजस्य में है - डॉ. कृष्ण गोपाल जी



समाज का सुख संघर्ष में नहीं है अपितु सामंजस्य में है - डॉ. कृष्ण गोपाल जी


‘सामाजिक समरसता और हिन्दुत्व’ एवं ‘दत्तोपंत ठेंगड़ी जीवन दर्शन व एकात्म मानववाद – खंड 7 व 8’ नाम से तीन पुस्तकों का लोकापर्ण करते हुए डॉ. कृष्ण गोपाल जी एवं पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर



8 जनवरी, नई दिल्ली, (इंविसंके). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने आज ‘सामाजिक समरसता और हिन्दुत्व’ एवं ‘दत्तोपंत ठेंगड़ी जीवन दर्शन व एकात्म मानववाद – खंड 7 व 8’ नाम से तीन पुस्तकों का लोकापर्ण किया। नई दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इन पुस्तकों के विमोचन के अवसर पर नेशनल बुक ट्रस्ट के सहयोग से एक परिचर्चा भी आयोजित की गई. जिसमें डॉ. कृष्ण गोपाल ने संघ के तृतीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस के सामाजिक समरसता के संदर्भ में दिए गये विचारों को सबके समक्ष रखा।

उन्होंने कहा कि भारत ऋषि परम्परा का देश है.  वेद लिखने वाले ऋषियों में सभी जातियों के विद्वान थे, जिनमें महिलाएं व शूद्र वर्ण के भी अनेक ऋषि थे, जिसमें सूर्या, सावित्री, घोषा, अंबाला वहीँ पुरुषों में ऋषि महिदास इत्यादि थे जो शूद्र थे. ऋषि परंपरा एक स्थान था, ऋषि पद प्राप्त करने के लिए जन्म का कोई बंधन नहीं था, जाति भी कर्म आधारित होती थीं। कालांतर में वो व्यवस्था छीन-भिन्न हो गयी. मध्यकाल में भारत पर अनेक बाहरी आक्रमण हुए, जिनमें हारने के कारण से हिन्दुओं में अनेक कुरीतियां भी घर कर गईं.  पिछले 13-14 सौ वर्षों में हिन्दू समाज में अपने ही बंधुओं के बीच अस्पृश्यता, ऊंच-नीच भावना की कुरीतियां घर कर गईं. शायद,  उस समय की स्थिति में इसकी आवश्यकता रही होगी। लेकिन, स्वतन्त्र भारत के अन्दर समाज में इस जाति भेद की कोई आवश्यकता नहीं है, जो समाज को अपने ही बंधुओं से अलग करती हो। परन्तु देश में आज भी जाति का भेद बहुत गहरा है. जाति बदल नहीं सकती क्यों की यह एक परम्परा चल पड़ी है जो चल रही है. इस उंच-नीच, भेद-भाव को सामाजिक समरसता से है ही समाप्त किया जा सकता है.

डॉ. कृष्ण गोपाल ने भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी के बारे में बताया कि उन्होंने श्रमिकों और उद्यमियों के बीच सामंजस्य कायम करने के लिए पहल की तथा श्रमिकों को वामपंथियों के टकराव व संघर्ष वाले रास्ते से हटाकर सामंजस्य और उन्नति के पथ पर अग्रसर किया। उनका मूल सिद्धांत संघर्ष नहीं सामंजस्य स्थापित हो. उन्होंने बताया की आज मार्क्सवाद पूरे विश्व से समाप्त हो चुका है. समाज का सुख संघर्ष में नहीं है अपितु सामंजस्य में है. प्रेम से ही सुख मिलेगा. यह देश बुद्ध, महावीर, विवेकानंद, गाँधी, विनोबा भावे का है. यह देश करुणा का है. सामंजस्य, समन्यवय, शान्ति का और धर्म का है.

इस अवसर पर पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर, दीनदयाल शोध संस्थान के सचिव अतुल जैन, सुरुचि प्रकाशन के गौतम जी, भारतीय मजदूर संघ के उपाध्यक्ष श्री बी सुरेन्द्रन मंचासीन थे, कार्यक्रम का संचालन अनिल दुबे द्वारा किया गया.

मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे की बड़ी सौगात : गैंता-माखीदा उच्च स्तरीय नदी पुल


कितनी ही सरकारें आईं गई सबने माना पूल जरुरी है मगर यह अत्यंत आवश्यक पूल चंबल नदी पर दिया राजस्थान की यशस्वी मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे जी ने ! धन्यवाद माननीया वसुंधरा राजे जी !
- अरविन्द सिसोदिया , जिला महामंत्री , भाजपा कोटा शहर !  94141 80151 / 95095 59131





कल चंबल नदी पर पुल की आधारशिला रखेंगी 

सीएम राजे, 120 करोड़ में होगा तैयार

हाड़ौती अंचल के अपने दौरे के दौरान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे कोटा और बूंदी जिलों की बरसों पुरानी उम्मीदों की आधारशिला रखेंगी.
कोटा जिले के गैंता और बूंदी जिले के माखीदा गांवों को आपस में जोड़ने वाले गैंता-माखीदा पुल की रविवार को रखी नींव जाएगी. चम्बल नदी पर 120 करोड़ की लागत से बन रहे पौने दो किलोमीटर से लंबे इस पुल के निर्माण की मांग दोनों जिलों के लोग बरसों से कर रहे थे और पिछले प्रदेश बजट में ही मुख्यमंत्री ने इस पुल के निर्माण की घोषणा कर दी थी.

पुल का शिलान्यास कार्यक्रम बूंदी के माखीदा और कोटा के गैंता में नदी के दोनों तरफ होगा और दोनों ही समारोहों में बतौर मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे मौजूद रहेंगी, लेकिन राजे इस शिलान्यास समारोह से पहले रविवार को कोटा के कॉमर्स कॉलेज में श्री-श्री रविशंकर के कोचिंग छात्रों के साथ संवाद के एक कार्यक्रम में भी शरीक होगी.
सुबह 9.30 बजे के आसपास कोटा पहुंचने के बाद मुख्यमंत्री का पहले श्री श्री रविशंकर के कार्यक्रम में शरीक होने और इसके बाद कोटा एयरपोर्ट से हेलिकॉप्टर से उड़ान भरके 12.30 बजे कोटा जिले के इटावा उपखंड के गैंता में और बाद में बूंदी जिले के माखीदा में चम्बल नदी पर प्रस्तावित इस पुल का शिलान्यास समारोह में शरीक होने का कार्यक्रम हैं.
कार्यक्रम के बाद 15 जनवरी की शाम को ही मुख्यमंत्री का हेलिकॉप्टर से वापस जयपुर रवाना होने का कार्यक्रम है.



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गैंता-माखीदा पुल 


January 13, 2017 8:22 pm
मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे चम्बल नदी पर राज्य राजमार्ग संख्या एक (झालावाड़ सीमा से मथुरा वाया इटावा-गैंता-माखीदा -लाखेरी-इन्द्रगढ़-सवाईमाधोपुर-गंगापुर सिटी) पर गैंता जिला कोटा व माखीदा जिला बून्दी के बीच 120 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले बहुप्रतीक्षित उच्च स्तरीय नदी पुल के निर्माण कार्य का शिलान्यास रविवार को करेंगी। इस पुल के निर्माण से कोटा, बारां, सवाईमाधोपुर व बून्दी जिलों के निवासियों के लिए दूरी कई किलोमीटर कम हो जाएगी और वर्ष पर्यन्त आवागमन सुगम हो सकेगा। इस पुल के निर्माण के लिए सार्वजनिक निर्माण विभाग के कोटा वृत्त में एक विषेष समर्पित डिविजन एवं दो सब डिविजन का गठन किया गया है।
सार्वजनिक निर्माण मंत्री यूनुस खान ने बताया कि इस नदी पुल के निर्माण से सवाई माधोपुर, लाखेरी की तरफ से इटावा, बारां, झालावाड़ एवं षिवपुरी (मध्य प्रदेश) की तरफ जाने के लिए करीब 70 किलोमीटर की दूरी कम तय करनी पडे़गी। पुल के निर्माण से बूंदी जिले के माखीदा, पीपलदा, थाग, खाखटा, बड़हावली, बगली, गोहाटा, कोटा खुर्द, लबान, पापड़ी, नयागांव, जाड़ला, खेड़ली देवजी, खरायता, डपटा, डडवाना, रामगंज और बड़ाखेड़ा की करीब 22 हजार की आबादी और कोटा जिले के गैंता, अमल्दा, कीरपुरा, नोनेरा, खरबन, खेड़ली नोनेरा, नारायणपुरा, डउवाड़ा, बमूलिया कलां, बमूलिया खुर्द, रघुनाथपुरा, राजपुरा, उम्मेदपुर, सोपुरा एवं हवाखेड़ली के करीब 16 हजार लोगों को सीधा फायदा मिलेगा। इन गांवों के अलावा इटावा व लाखेरी क्षेत्र के अन्य गांवों के ग्रामवासियाें को निर्बाध आवागमन, समय व ईधन की बचत के साथ पूरे क्षेत्र के विकास को गति मिलेगी।
कोटा जिले के गैंता के ग्रामवासियो को रेल व सडक यात्रा के लिए 55 किलोमीटर और बारां से वाया कोटा लाखेरी आने वालों को भी 62 किलोमीटर कम चलना पडे़गा। बूंदी के निवासियों को मध्यप्रदेश के लिए इटावा खातोली श्योपुर होते हुए कम दूरी तय करनी पडे़गी।
अभी गैंता के ग्रामवासियों को करीब 75 किमी दूरी तय कर कोटा रेलवे स्टेशन आना पडता है। पुल निर्माण से गैंता से लाखेरी की दूरी 20 किमी रह जायेगी। बारां से लाखेरी वाया कोटा की दूरी 150 किमी है। अब बारां से लाखेरी वाया मागरोल इटावा गैता माखीदा की दूरी 88 किमी ही रह जाएगी। इस पुल के निर्माण से समय व ईधन की बचत के साथ ही पूरे क्षेत्र मे विकास को गति मिलेगी। श्री खान ने बताया कि इस पुल के निर्माण की क्षेत्रीय निवासियों द्वारा लम्बे समय से की जा रही मांग को देखते हुए मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने अपने बजट भाषण वर्ष 2015-16 में इसकी घोषणा की थी। यह पुल मई 2018 तक बनकर तैयार हो जाएगा।
पुल निर्माण के लिए विशेष डिविजन, दो सब डिविजन का गठन
सार्वजनिक निर्माण मंत्री खान ने बताया कि चम्बल नदी पर बनाए जाने वाले पुल के निर्माण के लिए सानिवि कोटा वृत्त के अधीन एक समर्पित डिविजन एवं दो सब डिविजन का गठन किया गया है।
1563 मीटर लम्बा होगा पुल
चम्बल नदी पर इस पुल की लम्बाई 1563 मीटर होगी। गेता की तरफ 1.50 किमी व माखीदा की तरफ 0.60 किलोमीटर की 7 मीटर चैड़ी अप्रोच सड़क का निर्माण किया जाएगा। पुल के निर्माण में 37.2 मीटर लम्बाई के 42 स्पान लगाए जाएंगे।

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गैंता-माखीदा पुल निर्माण शुरू, मई 18 तक पूरा होगा
Bhaskar News Network | Nov 27, 2016,

तीसवर्ष के लंबे इंतजार के बाद अब इटावा क्षेत्र के लोगों का बड़ा सपना साकार होगा। कोटा-बूंदी के बीच गैंता-माखीदा के पास चंबल नदी पर 102 करोड़ की लागत से बनने वाले पुल का काम शुरू कर दिया गया है। शनिवार को विधायक विद्याशंकर नंदवाना ने ब्रिज कंपनी सार्वजनिक निर्माण विभाग के अधिकारियों के साथ निर्माण स्थल पर पहुंचकर जायजा लिया।

विधायक ने कहा कि मई 2018 तक तय समय में इस पुल को पूरा कराने का प्रयास होगा। विधायक के साथ उपजिला प्रमुख मनोज शर्मा, पालिका चेयरमैन धर्मेंद्र आर्य, उपाध्यक्ष भरत पारेता, शहर मंडल अध्यक्ष चैनसुख मित्तल, खातौली मंडल अध्यक्ष प्रतापसिंह, भूपेंद्रसिंह हाड़ा, गजेंद्र गोयल, शैलेंद्र सिंह हाड़ा, केएल मीणा, मंडी डायरेक्टर श्याममीणा डोरली, पवन नंदवाना, नंदबिहारी पारेता, नरेश खंडेलवाल सहित अनेक सदस्य साथ रहे।

प्रदेश का सबसे लंबा होगा पुल

ब्रिजकॉरपोरेशन खंड बूंदी के अधिशासी अधिकारी आरपी शर्मा ने बताया कि गैंता-माखीदा चंबल नदी पर बनने वाला पुल अभी तक का प्रदेश का सबसे लंबा पुल होगा। पुल की लंबाई 1562.4 मीटर होगी, जो करीब डेढ़ किमी से अधिक होगी।

इसके अलावा पुल के माखीदा की ओर 600 मीटर एप्रोच सड़क गैंता की ओर डेढ़ किमी ऐप्रोच सड़क बनेगी। पुल में 42 स्पान बनेंगे जो 37.2 मीटर के होंगे। पुल की चौड़ाई 12 मीटर की होगी, जिसमें पुल अंदर से सात मीटर चौड़ी होगी।

मई2018 तक होगा पूरा

3नवंबर से कार्य शुरू हो गया है। पुल निर्माण में 102 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसके अलावा एप्रोच सड़क में कोटा बूंदी के 48 किसानों की करीब 20 हैक्टेयर भूमि आवाप्त की गई है, जिनको 1 करोड़ 37 लाख का मुआवजा दिया जा रहा है। वहीं विभाग द्वारा न्यायालय की शर्तो के अनुसार लगभग 18 करोड़ की राशि वन विभाग को स्थानांतरित की जा चुकी है।

इटावा. गेता-माखीदा पुल निर्माण कार्य का जाएजा लेते विधायक नंदवाना


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सांसद श्री नारायण पंचारिया जी ने लिया मुख्यमंत्री की सभा की तैयारियों का जायजा
  इटावा। क्षेत्र में रविवार को होने वाले 120 करोड़ की लागत से बनने वाले गैंता-माखीदा पुल के शिलान्यास व मुख्यमंत्री की सभा की तैयारियों को लेकर शुक्रवार को राज्य सभा सांसद नारायण पंचारिया व विधायक विद्याश्कर नंदवाना ने व्यवस्थाओं का जायजा लिया तथा भाजपा कार्यकर्ताओं की बैठक ली। कस्बे में सांसद पंचारिया व विधायक नंदवाना ने आस्था महाविद्यालय ग्राउंड में पहुंचकर वहां अधिकारियों के साथ हेलीपेड़ का निरीक्षण किया। इसके बाद उन्होंने मंडी परिसर में सभा स्थल का जायजा लिया और व्यवस्थाओं को लेकर वहां मौजूद अधिकारियों को दिशा निर्देश दिए।

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गेता-माखीदा चम्बल नदी पुल से घटेगी तीन जिलों की दूरी, 
120 करोड़ रुपए की लागत से तैयार होगा पुल


जयपुर, 18 सितम्बर। चम्बल नदी पर कोटा व बून्दी जिलों के बीच गैता (जिला कोटा) व माखीदा (जिला बून्दी) के बीच 120 करोड़ रुपए की लागत से उच्च स्तरीय नदी पुल के निर्माण से कोटा, बारा व बून्दी जिलों के निवासियों के लिए दूरी कई किलोमीटर कम हो जाएगी और वर्ष पर्यन्त आवागमन सुगम हो सकेगा। इस पुल के निर्माण को गति देने के लिए सार्वजनिक निर्माण विभाग के कोटा वृत्त में एक विशेष समर्पित डिविजन एवं दो सब डिविजन बनाए जाने के निर्देश जारी कर दिए हैं। फिलहाल पुल की निविदा प्रक्रिया जारी है।

सार्वजनिक निर्माण मंत्री श्री यूनुस खान ने बताया कि इस पुल के निर्माण से बून्दी जिले के लाखेरी, लबान, रामगंज, प्रतापगढ, भरवली, खकता, सुमेरगंजमण्डी व कोटा जिले के गेता, कीरपुरा, हवाखेडली, अमलदा, बम्बुलिया खुर्द, बम्बुलिया कला, रधुनाथपुरा, इटावा, पीपलदा कला, खातौली आदि गांवो को आवागमन की सीधी सुविधा मिलेगी।

कोटा जिले के इटावा (गैंता) के ग्रामवासियों को रेल व सड़क यात्रा के लिए 55 किलोमीटर और बारा से वाया कोटा लाखेरी आने वालों को भी 62 किलोमीटर कम चलना पडे़गा। बूंदी के निवासियों को मध्यप्रदेश के लिए इटावा खातोली श्योपुर होते हुए कम दूरी तय करनी पडे़गी।

अभी कोटा जिले के गैंता के ग्रामवासियों को करीब 75 किमी दूरी तय कर कोटा रेलवे स्टेशन आना पडता है।  पुल निर्माण से गैंता से लाखेरी की दूरी 20 किमी रह जायेगी। बारां से लाखेरी वाया कोटा की दूरी 150 किमी है। अब बारां से लाखेरी वाया मागरोल इटावा गैता माखीदा की दूरी 88 किमी ही रह जाएगी। इस पुल के निर्माण से समय व ईधन की बचत के साथ ही पूरे क्षेत्र मे विकास को गति मिलेगी। श्री खान ने बताया कि इस पुल के निर्माण की क्षेत्रीय निवासियों द्वारा लम्बे समय से की जा रही मांग को देखते हुए मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे ने अपने बजट भाषण वर्ष 2015-16 में इसकी घोषणा की थी।

पुल निर्माण के लिए विशेष डिविजन, दो सब डिविजन का गठन
सार्वजनिक निर्माण मंत्री श्री खान ने बताया कि चम्बल नदी पर बनाए जाने वाले पुल के निर्माण के लिए सानिवि कोटा वृत्त के अधीन एक समर्पित डिविजन एवं दो स ब डिविजन का  गठन किया गया है। उन्होंने बताया कि सानिवि पीएमजीएसवाई वल्ड बैंक डिविजन अकलेरा, सक्रिल झालावाड़ को स्थानांतरित कर उसका नाम ब्रिज प्रोजेक्ट डिविजन कोटा कर दिया गया है। यह सानिवि वृत्त कोटा के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करेगा। इसी प्रकार सहायक अभियंता मनरेगा बूंदी के कार्यालय को स्थानांतरित कर इसका नाम सानिवि ब्रिज प्रोजेक्ट सब डिविजन-प्रथम  एवं  सहायक अभियंता मनरेगा झालावाड़ के कार्यालय को स्थानांतरित कर इस पद का नाम सानिवि ब्रिज प्रॉजेक्ट सब डिविजन-द्वितीय कोटा कर दिया गया है। इन दोनों सब डिविजन कार्यालयों को भी पीडब्ल्यूडी ब्रिज प्रॉजेक्ट डिविजन कोटा के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन रखा गया है।

1563 मीटर का होगा पुल
चम्बल नदी पर इस पुल की लम्बाई 1563 मीटर होगी। गेता की तरफ 1.50 किमी व माखीदा की तरफ 0.60 किलोमीटर की अप्रोच सड़़क का निर्माण किया जाएगा। पुल के निर्माण में 33 मीटर लम्बाई के 42 स्पान लगाए जाएंगे। -

गंगासागर मेले









12 लाख श्रद्धालु पहुंचे सागरदीप
By Prabhat Khabar | Updated Date: Jan 14 2017

गंगासागर से विकास गुप्ता
 में आस्था की डुबकी लगाने शुक्रवार शाम तक तकरीबन 12 लाख श्रद्धालु सागरदीप में पहुंच गये हैं. राज्य के पंचायतमंत्री सुब्रत मुखर्जी ने शुक्रवार को आधिकारिक तौर पर यह जानकारी दी.


उन्होंने बताया कि कुछ लोग रास्ते में हैं, शनिवार दोपहर तक और तीन लाख के करीब श्रद्धालु गंगासागर मेले में पहुंच जायेंगे. मौके पर सुब्रत मुखर्जी ने कहा कि मेला प्रांगण में अब तक कोई भी अनचाही घटना नहीं घटी है. सभी कार्य सुचारू रुप से चल रहा है. किसी भी श्रद्धालु के तबीयत बिगड़ने की भी खबर नहीं है. छोटे-मोटे बीमारी का प्राथमिक उपचार कर लोगों को स्वस्थ कर दिया जा रहा है. मौके पर राज्य के बिजली मंत्री शोभनदेव चटर्जी ने बताया कि मेला प्रांगण में बिजली की पर्याप्त व्यवस्था है. कहीं भी बिजली जाने की खबर नहीं है. मेला प्रांगण में स्वेच्छासेवक 24 घंटे निस्वार्थ भाव से सेवाकार्य कर रहे हैं. किसी भी स्थिति से निपटने के लिए सभी टीम को तैयार रहने को कहा गया है. किसी भी समस्या मिलने पर तुरंत उन्हें समाधान किया जा रहा है.

आज सुबह 5.48 से स्नान का मुहूर्त : प्रमुख महंत
मकर शंक्रांति के दिन शनिवार सुबह 5.48 बजे से लेकर रविवार सुबह छह बजे तक स्नान का मुहूर्त है. कपिलमुनि मंदिर के प्रमुख महंत श्री ज्ञानदास जी महाराज ने बताया कि सूर्य शनिवार दोपहर 1.48 बजे से मकर राशि में प्रवेश करेगा. इसके कारण दोपहर 1.48 के बाद भी स्नान करने का सबसे पुण्य मुहूर्त है. जो कि रविवार सुबह छह बजे तक रहेगा. लेकिन इसके छह घंटे पहले से स्नान करने का मुहूर्त शुरु हो जाता है. उन्होंने कहा कि वह मंदिर के अन्य पुरोहित के साथ शनिवार शाम चार बजे सागरदीप में गंगा में डुबकी लगायेंगे. सागरमेले में आने वाले श्रद्धालुओं को स्वस्थ घर पहुंचने की मंगलकामना उन्होंने की.

मेला परिसर से 33 लोगों को किया गया गिरफ्तार : मेला प्रांगण से पुलिस की टीम ने गुरुवार रात से लेकर शुक्रवार शाम तक कुल 33 बदमाशों को गिरफ्तार किया है. उनके पास से 17 मोबाइल फोन व कुछ नगदी रुपये बरामद किये गये हैं. सभी मेला प्रांगण में श्रद्धालुओं से मोबाइल फोन छीनकर फरार हो जाते थे. इसके अलावा मेला प्रांगण में लापता हुए कुल 752 लोगों में से 700 लोगों को परिवार से मिला दिया गया है. बाकी को मिलाने की कोशिश जारी है. 

भीष्म पितामह के स्वर्गारोहण की तिथि है मकर संक्रांति



भीष्म पितामह के स्वर्गारोहण की तिथि है मकर संक्रांति


अशोक ‘प्रवृद्ध’

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यह सर्वविदित तथ्य है कि ऋतु परिवर्तन का पर्व मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव उतरायण में प्रवेश करते हैं और सूर्य के उत्तर की ओर उदय होने की अवधि अर्थात उत्तरायण में दिन बढ़ता जाता है और रात्रि घटती जाती है। सूर्य की मकर राशि की संक्रांति से अर्थात उत्तरायण में सूर्य के प्रकाश की अधिकता के कारण इसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। और यही कारण है कि देश में मकर संक्रांति के दिन को अधिक महत्व दिया जाता है। सूर्य देव के उत्तरायण में प्रवेश करने के पर्व मकर संक्रांति की महिमा का वर्णन संस्कृत साहित्य में वेद से लेकर पुराण तथा आधुनिक ग्रंथों में विशेष रूप से की गई है। वैदिक ग्रंथों में उत्तरायण को देवयान कहा गया है। हमारी संस्कृति का मुख्य ध्येय तमसो मा ज्योतिर्गमय की भावना है। अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर चलें। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में उत्तरायण के प्रथम या आरम्भ के दिन को अत्यधिक महत्व दिया जाता है और प्राचीन काल से ही इस दिवस को एक पर्व के रूप में मनाये जाने की परिपाटी है। मकर सक्रांति दिवस से पूर्व शीतकाल पूर्ण यौवन पर होता है जिससे लोगों को काफी कष्ट होता है। इस दिन व इसके बाद रात्रि काल घटने व दिवस की अवधि बढ़ने से सूर्य का प्रकाश अधिक देर तक मिलने लगता है, जिससे मनुष्यों को सुख का अनुभव होता है। इस मनोवांछित परिवर्तन के कारण अपने उत्साह को प्रकट करने के लिए भी मकर संक्रांति के दिन को एक पर्व का रूप में मनाते हुए सूर्य को अर्ध्य देने व नाम, स्मरण, पूजनादि की परम्परा है। इस काल को उतम मानने की पराकाष्ठा का ही यह परिचायक है कि लोक व्यवहार में उतरायण काल में मृत्यु की प्राप्ति होने से उत्तमलोक अर्थात बैकुण्ठलोक की प्राप्ति सहज हो जाती है। महाभारत में वर्णित प्रसंग से यह उद्घाटित होता है कि ज्ञानी लोग अपने शरीर त्याग तक की अभिलाषा इसी उत्तरायण वा देवयान में रखते हैं। लोक व्यवहार में आज भी ऐसी अभिलाषा अर्थात सूर्य के उतरायण काल में मृत्यु की इच्छा रखने वालों की कमी नहीं है। ऐसे विचार वालों का मानना होता है कि उत्तरायण में देह त्यागने से उन की आत्मा सूर्य लोक में होकर प्रकाश मार्ग से प्रयाण करेगी। महाभारत की कथा से स्पष्ट है कि आजीवन ब्रह्मचारी रहे भीष्म पितामह ने इसी उत्तरायण के आगमन तक शर-शय्या पर शयन करते हुए देहत्याग वा प्राणोत्क्रमण की प्रतीक्षा की थी। और सूर्यदेव के उतरायण होने पर अपनी इच्छा मृत्यु ग्रहण कर स्वर्गारोहण की थी। यही कारण है कि मकर संक्रांति के ऐसे प्रशस्त महत्व व उतम समय को देखते हुए भारत में प्राचीन काल से ही मकर-संक्रांति अर्थात सूर्य की उत्तरायण संक्रमण तिथि को पर्व के रूप में मनाने की परम्परा विकसित हो गयी और यही कारण है कि भारत के प्रात: सभी प्रांतों में मकर संक्रांति का पर्व चिरकाल से मनाया जाता रहा है।
महाभारत के एक कथा प्रसंगानुसार महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह अर्जुन के बाणों से बिंध जाने के बाद युद्ध करने में सर्वथा असमर्थ हो गये थे और उनके प्राणांत का समय निकट आ गया था। यह अनुभव कर भीष्म ने अपने समीपस्थ लोगों से तिथि, महीना व अयन के बारे में पूछा। इस पर उन्हें बताया गया कि उस समय सूर्य के दक्षिणायन का काल चल रहा है। दक्षिणायन काल के विद्यमान होने का तथ्य जान लेने के बाद उन्होंने कहा कि अभी प्राण त्यागने का उत्तम समय नहीं है। अत: वह उत्तरायण के प्रारम्भ होने पर ही वे प्राणों का त्याग करेंगे। यह सर्वविदित है कि भीष्म पितामह बाल ब्रह्मचारी थे। उन्होंने ब्रह्मचर्य एवं साधना द्वारा मृत्यु व प्राणों को वश में कर रखा था। कथा के अनुसार वे धनुर्धारी अर्जुन को कह शरशय्या पर चले गये और सूर्यदेव के उतरायण होने के पश्चात ही उन्होंने इच्छा मृत्यु वरन की। महाभारत में उल्लिखित उक्त प्रसंग से स्पष्ट है कि मकर संक्रांति के दिन ही भीष्म पितामह ने अपने प्राणों का त्याग किया था। इससे यह स्पष्ट है संक्रांति की तिथि भीष्म की पुण्य तिथि भी है। भारतीय इतिहास के अनुशीलन से यह स्पष्ट होता है कि अपने महापुरुषों को उनके पुण्य तिथि के आधार पर स्मरण करने की परिपाटी देश में प्रचलित नहीं हैं। हां! अपने महाप्रतापी पूर्वजों को उनके जन्म दिन पर याद करने की परम्परा देश में प्राचीन काल से ही विद्यमान है। लम्बी अवधि के काल क्रम की क्रूर पंजों में भीष्म के जन्म की तिथि तो सुरक्षित न रह सकी। अत: मकर संक्रांति को उनकी पुण्य तिथि का दिन ही उनके स्मृति दिवस के रूप में मनाये जाने की परम्परा देश में चल पड़ी है। उतरायण काल में मृत्यु को उतम माने जाने के सिद्धांत का वेदों व वैदिक साहित्य में कोई उल्लेख कहीं नहीं दिखाई देता है। खैर कारण कुछ भी रहा हो, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारत काल के दिनों में दक्षिणायन में मृत व्यक्ति की वहउत्तम गति नहीं मानी जाती थी जो कि उत्तरायण में प्राण छोड़ने पर होती है। इस कारण से भीष्म पितामह ने सूर्य के उतरायण होने पर अपनी प्राणोत्सर्ग की इच्छा व्यक्त की और सूर्य के उतरायण में प्रवेश करने पर अपनी इच्छा मृत्यु प्राप्त की। इस प्रकार मकर संक्रांति का दिन भीष्म के प्राणोत्सर्ग अर्थात स्वर्गारोहण की तिथि है।