मंगलवार, 22 अगस्त 2017

तीन तलाक की प्रथा खारिज : सुप्रीम कोर्ट

तीन तलाक: 5 धर्मों के हैं फैसला सुनाने वाले जज, पढ़ें उनकी खासियत अौर जजमेंट, national news in hindi, national news


तीन तलाक के खिलाफ पहली जंग छेड़ने वाली शायरा बानो को तलाकनाम टेलीग्राम से भेजा गया था।

नई दिल्ली. पहले 1985 और अब 2017। 32 साल में दो बार ऐसे मौके आए जब तीन तलाक की विक्टिम महिलाओं के फेवर में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया। मुस्लिमों में तीन तलाक एक ऐसी प्रथा है जिसके तहत कोई भी शख्स पत्नी को तीन बार तलाक बोलकर उसे छोड़ सकता है। इस प्रथा के खिलाफ ताजा मामले में 38 साल की शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। शायरा को उनके पति ने टेलीग्राम से तलाकनामा भेजा था। उनके दो बच्चे हैं, लेकिन वे एक साल से उन्हें देखने को तरस रही हैं। शायरा की पिटीशन पर मंगलवार को फैसला आया। बेंच ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। इससे पहले 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के फेवर में फैसला सुनाया था।


दोनों केस में क्या फर्क?    शाहबानो                               शायरा बानो केस
किसे चैलेंज       तीन तलाक के बाद कम गुजारा भत्ता तलाक-ए-बिद्दत
SC में कब पहुंचा केस 1981                                     2016
कब आया फैसला         1985                                             2017
क्या आया फैसला तीन तलाक में भी महिला गुजारे भत्ते की हकदार तीन तलाक असंवैधानिक
केंद्र सरकार का रोल कानून बनाकर फैसला पलटा नया कानून बनाना है
क्या था शाहबानो केस?
- लॉ एक्सपर्ट संदीप शर्मा ने DainikBhaskar.com को बताया- ''इंदौर की रहने वाली शाहबानो 62 साल की थीं जब उनके तीन तलाक का मामला नेशनल डिबेट बना था। शाहबानो के 5 बच्चे थे। उनके पति ने 1978 में उन्हें तलाक दिया था। पति से गुजारा भत्ता पाने का मामला 1981 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। पति का कहना था कि वह शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं है।'' 
- ''सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में सीआरपीसी की धारा-125 पर फैसला दिया। यह धारा तलाक के केस में गुजारा भत्ता तय करने से जुड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत शाहबानो को बढ़ा हुआ गुजारा भत्ता देने के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।'' 
- ''जब देश में इसका विरोध हुआ तो उस वक्त की राजीव गांधी सरकार ने 1986 में एक कानून बनाया। यह कानून द मुस्लिम वुमन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स एक्ट 1986 कहलाया। इसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को डाइल्यूट कर दिया। कानून के तहत महिलाओं को सिर्फ इद्दत (सेपरेशन के वक्त) के दौरान ही गुजारा भत्ता मांगने की इजाजत मिली। यह कानून सीआरपीसी की धारा-125 के खिलाफ था।''
32 साल बाद शायरा बानो के केस से आया बदलाव
- फरवरी 2016 में उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो (38) पहली महिला बनीं, जिन्होंने ट्रिपल तलाक, बहुविवाह (polygamy) और निकाह हलाला पर बैन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर की।
- शायरा ने DainikBhaskar.com को बताया, ''जजमेंट का स्वागत और समर्थन करती हूं। मुस्लिम महिलाओं के लिए बहुत ऐतिहासिक दिन है। कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय को बेहतर दिशा दे दी है। अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। समाज आसानी से इसे स्वीकार नहीं करेगा। अभी लड़ाई बाकी है। इस फैसले से मुस्लिम समाज की महिलाओं को प्रताड़ना, शोषण और दुखों से आजादी मिलेगी। पुरुषों को महिलाओं के हालात को देखते हुए इसे स्वीकार करना चाहिए।''
- शायरा की शादी 2002 में इलाहाबाद के एक प्रॉपर्टी डीलर से हुई थी। उनके साथ जल्द की परेशानी शुरू हो गई। ससुराल वाले उनसे फोर व्हीलर की मांग करने लगे। वे उनसे चार-पांच लाख रुपए कैश चाहते थे। उनकी माली हालत ऐसी नहीं थी कि मांग पूरी कर सकें। उनकी और भी बहनें थीं।
- शायरा के दो बच्चे हैं। 13 साल का बेटा और 11 साल की बेटी। शायरा का आरोप है कि शादी के बाद उन्हें हर दिन पीटा जाता था। पति हर दिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करता था। बहुत ज्यादा बहस करना और झगड़ना उसकी आदत में शामिल था।
- शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में निकाह हलाला की रिवाज को भी चैलेंज किया। इसके तहत मुस्लिम महिलाओं को अपने पहले पति के साथ रहने के लिए दूसरे शख्स से दोबारा शादी करनी होती है। वे मुस्लिमों में बहुविवाह को भी गैर-कानूनी बनाने की मांग कर रही हैं।
छह बार करवाया अबॉर्शन
- आरोप है कि रिजवान से शादी के बाद शायरा को गर्भनिरोधक (contraceptives) लेने को कहा गया, जिसकी वजह से वे काफी बीमार हो गईं। यह भी आरोप है कि पति ने उनका छह बार अबॉर्शन करवाया। पिछले साल अप्रैल में वे अपने पैरेंट्स के घर लौट गईं। अक्टूबर में उन्हें टेलीग्राम के जरिए तलाकनामा भेजा गया। वे एक मुफ्ती के पास गईं तो उन्होंने कहा कि टेलीग्राम से भेजा गया तलाक जायज है।
- शायरा के बच्चे रिजवान के साथ रहे हैं। वे उन्हें देखने के लिए एक साल से तरस रही हैं। शायरा का कहना है कि उन्हें बच्चों से फोन पर भी बात नहीं करने दी जाती।
- शायरा का कहना है कि वे इस जंग में पीछे हटने वाली नहीं हैं। उनका यह कदम दूसरी महिलाअों के लिए मददगार होगा।
हक की लड़ाई लड़ने वाली महिलाएं और भी हैं
1) अाफरीन रहमान
- जयपुर की रहने वाली 28 साल की अाफरीन रहमान एमबीए-ग्रेजुएट हैं। मेट्रीमोनियल वेबसाइट की मदद से 2014 में उनकी शादी इंदौर के वकील से हुई। 
- अाफरीन के मुताबिक, उनकी चार बहनें हैं और उनकी शादी के लिए भाई ने 25 लाख का लोन लिया था।
- आफरीन का आरोप है कि शादी के बाद उन्हें दहेज के लिए ससुराल में पीटा जाता था। उन्होंने इन जुल्मों के बारे में अपने मायके वालों को नहीं बताया, क्योंकि उन पर पहले से ही बैंक का कर्ज था। इससे वे और तनाव में आ जाते।
ज्वाइन किया भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन
- आफरीन को अगस्त 2015 में पति ने घर से निकाल दिया। मायके वालों की गुजारिश पर नौ दिन बाद वापस ले गया, लेकिन अगले ही महीने फिर वापस भेज दिया। 
- अक्टूबर में आफरीन की मां की बस एक्सीडेंट में मौत हो गई तो उनका पति हमदर्दी जताने के लिए कुछ दिन आया, फिर बातचीत बंद कर दी। फोन और सोशल मीडिया पर भी कोई बात नहीं करता। जनवरी में उनके पास स्पीड पोस्ट से एक लिफाफा आया। खोला तो देखकर दंग रह गई। यह तलाकनामा था। इसमें तलाक की वजह भी नहीं बताई गई थी। 
- इसके बाद आफरीन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ीं। शायरा और दूसरी सताई हुई महिलाओं से इंस्पायर होकर उन्होंने भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
2) जकिया रहमान और नूरजहां सैफिया नियाज
- ये दोनों "भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन" की फाउंडर हैं। 2007 में बनाए गए इस एनजीओ से अब तक 15 राज्यों की 30 हजार महिलाएं जुड़ चुकी हैं। 
- यह संगठन मस्जिदों और मुंबई की हाजी अली दरगाह में मुस्लिम महिलाओं की एंट्री की मांग करके चर्चा में आया। 
- इस एनजीओ ने पिछले साल देश का पहला मुस्लिम महिलाओं का सर्वे करवाया, जिसमें दावा किया गया कि देश की 92% मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक पर रोक चाहती हैं। 
- एनजीओ ने अपने इस कैम्पेन के पक्ष में चलाई गई ऑनलाइन पिटीशन पर 50 हजार लोगों ने दस्तखत किए थे। इनमें महिला और पुरुष दोनों शामिल थे। 
- इस आंदोलन के तहत "शरिया अदालतों" या शरिया पर आधारित अनौपचारिक (informal) अदालतों का आयोजन भी किया जाता है। इनमें मुस्लिम महिलाएं अपनी घरेलू दिक्कतें पुरुष काजियों (इस्लामिक जजों) के सामने रखती हैं।
3) इशरत जहां
- 30 साल की इशरत जहां वेस्ट बंगाल के हावड़ा की रहने वाली हैं। उन्होंने कोर्ट में कहा है कि उनकी शादी 2001 में हुई थी। उनके बच्चे भी हैं, जिन्हें पति ने जबर्दस्त अपने पास रखा है।
- उन्होंने अपनी पिटीशन में बच्चों को वापस दिलाने और उसे पुलिस सुरक्षा दिलाने की मांग की। इशरत ने कहा है कि उसके पति ने दूसरी शादी कर ली है। यह भी कहा कि ट्रिपल तलाक गैरकानूनी है और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन है।
4) गुलशन परवीन, अतिया साबरी
- गुलशन परवीन उत्तर प्रदेश के रामपुर की और अतिया साबरी उत्तर प्रदेश के ही सहारनपुर की रहने वाली हैं। इन्होंने भी तीन तलाक को कोर्ट में चैलेंज किया है। बता दें कि अतिया इस मामले में आखिरी पिटीशनर हैं।



शाहबानो से शायरा बानो तक तीन तलाक के खिलाफ 32 साल से जारी है लड़ाई, national news in hindi, national news



तीन तलाक के खिलाफ पहली जंग छेड़ने वाली शायरा बानो को तलाकनाम टेलीग्राम से भेजा गया था।



तीन तलाक: 5 धर्मों के हैं फैसला सुनाने वाले जज, पढ़ें उनकी खासियत अौर जजमेंट

DainikBhaskar.com | - Aug 22, 2017

1400 साल पुरानी तीन तलाक की प्रथा को खारिज कर देने का फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज अलग-अलग धर्मों के हैं।

नई दिल्ली.1400 साल पुरानी तीन तलाक की प्रथा को खारिज कर देने का फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के पांच जज पांच अलग-अलग धर्मों के हैं। 18 महीने पहले दायर हुई पिटीशन पर फैसला सुनाने वाली बेंच में चीफ जस्टिस जेएस खेहर (सिख), कुरियन जोसफ (इसाई), आरएफ नरीमन (पारसी), यूयू ललित (हिंदू) और अब्दुल नजीर (मुस्लिम) शामिल थे। बेंच ने फैसला 3:2 की मेजॉरिटी से सुनाया है। चीफ जस्टिस खेहर 27 अगस्त को रिटायर हो रहे हैं। वहीं, जस्टिस नरीमन ऐसे जज हैं जो सुप्रीम कोर्ट में वकालत भी कर चुके हैं। उनके टैलेंट को देखते हुए नियमों में बदलाव कर उन्हें सीनियर काउंसिल अप्वाइंट किया गया था। वहीं, जस्टिस कुरियन जोसफ वही जज हैं जिन्होंने जजों के सम्मान में दिए गए प्रधानमंत्री के डिनर में शामिल होने से इनकार कर दिया था।
1) चीफ जस्टिस
कौन जस्टिस जेएस खेहर?
जस्टिस खेहर का जन्म 28 अगस्त 1952 को चंडीगढ़ में हुआ। 1999 में वे पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के जज बने। 2009 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। 2010 में उन्हें कर्नाटक हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया। 2011 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया। जनवरी 2017 में वे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बने।
हिम्मतवाले जज
तीन तलाक पर 5 जजों की बेंच की अगुआई जस्टिस खेहर ही कर रहे थे। जस्टिस खेहर जजों की नियुक्ति के लिए नेशनल ज्युडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन बनाने के केंद्र के फैसले को खारिज कर चुके हैं। उन्होंने ही सहारा प्रमुख को जेल भेजने और अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन को खत्म कर कांग्रेस की सरकार बहाल करने जैसे फैसले सुनाए हैं। सहारा मामले की सुनवाई कर रही बेंच में रहे जस्टिस केएस राधाकृष्णन ने अपने रिटायरमेंट पर कहा था कि जस्टिस खेहर जैसा हिम्मतवाला जज उन्होंने नहीं देखा।
तीन तलाक पर क्या कहा?
- जस्टिस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार देने के विरोध में फैसला दिया था।
- उन्होंने कहा- ‘‘तलाक-ए-बिद्दत संविधान के आर्टिकल 14, 15, 21 और 25 का वॉयलेशन नहीं करता। सरकार छह महीने में कानून बनाए। छह महीने तक मुस्लिम तीन तलाक का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।’’
- दोनों जजों ने कहा- भारत में सती, देवदासी और बहुविवाह जैसी प्रथाएं बंद करने के पर्सनल लॉ से जुड़े सुधार कानूनी दखल के जरिए ही हुए हैं। जब दुनियाभर के मुस्लिम देशों ने सुधार के कदम उठा लिए हैं तो आजाद भारत को क्यों पीछे रहना चाहिए?
2) जस्टिस कुरियन जोसेफ
कौन हैं जस्टिस जोसेफ?
- 30 नवंबर 1953 में जन्मे जस्टिस कुरियन जोसेफ ने लॉ की पढ़ाई के बाद 1979 में केरल हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की थी।
- वे दो बार केरल हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस रहे। मार्च 2013 में सुप्रीम कोर्ट के जज बने। वे नवंबर 2018 तक सुप्रीम कोर्ट के जज रहेंगे।
इन्होंने मोदी के न्योते को नकारा था
- अप्रैल 2015 में सरकार ने जजों और चीफ मिनिस्टर्स की ज्वाइंट कॉन्फ्रेंस रखी। तीन दिन की यह कॉन्फ्रेंस उस वीकेंड पर रखी गई जब गुड फ्रायडे और ईस्टर आने वाला था। जस्टिस जोसेफ ने उस वक्त चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रहे एचएल दत्तू से इस बारे में नाराजगी जाहिर कर दी थी।
- इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी लेटर लिखकर डिनर के न्योते पर शुक्रिया अदा किया लेकिन अपनी आपत्ति जाहिर की। उन्होंने कहा कि जिन तारीखों की धार्मिक अहमियत है, उन तारीखों पर ऐसे कार्यक्रम नहीं रखे जाने चाहिए।
तीन तलाक पर क्या कहा?
- जस्टिस जोसेफ ने अपने 26 पेज के जजमेंट में कहा- मेरे लिए माननीय चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की इस बात पर राजी होना बहुत मुश्किल है कि तीन तलाक की प्रथा धर्म और पर्सनल लॉ से जुड़ी है। तीन तलाक में तो दरवाजा बंद हो जाता है। लिहाजा, यह कुरान-ए-पाक के बुनियादी फलसफों के खिलाफ है। यह शरीयत के खिलाफ है। तलाक किसी जायज वजह से होना चाहिए। इसके बाद पति-पत्नी के बीच सुलह की कोशिशें होनी चाहिए। अगर कोशिशें नाकाम हो जाएं तो तलाक होना चाहिए।
3) जस्टिस रोहिंटन एफ. नरीमन
कौन हैं जस्टिस नरीमन?
- जाने माने ज्यूरिस्ट फली एस नरीमन के बेटे जस्टिस रोहिंटन नरीमन का जन्म 13 अगस्त 1956 को हुआ।
इनके लिए बदले गए थे नियम
- लॉ से जुड़े मामलों में गजब की पकड़ और टैलेंट को देखते हुए उन्हें 37 की उम्र में ही सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट का दर्जा दे दिया गया था। उस वक्त इस ओहदे के लिए मिनिमम एज 45 थी। लेकिन तब चीफ जस्टिस रहे एमएन वेंकटचलैया ने नियमों में बदलाव कर उन्हें यह पहचान दी।
- जस्टिस नरीमन 2014 तक सुप्रीम कोर्ट के वकील थे। उन्होंने 35 साल लॉ की प्रैक्टिस की। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में वे ऐसे पांचवें वकील रहे जिन्हें सीधे बार से चुनकर जज बनाया गया।
- वे इस बेंच का हिस्सा रहे हैं, जिसने ऑनलाइन अपमानजनक टिप्पणियां पोस्ट करने के मामले में पुलिस को गिरफ्तारी का हक देते विवादास्पद साइबर लॉ को खारिज कर दिया था। जस्टिस नरीमन 2021 में रिटायर होंगे।
तीन तलाक पर क्या कहा?
- जस्टिस नरीमन ने जस्टिस यूयू ललित के साथ अपने फैसले में कहा, ‘"तीन तलाक संविधान के आर्टिकल 14 (बराबरी के हक) का वॉयलेशन करता है। तीन तलाक शादी के रिश्ते को बचाने के लिए पति-पत्नी के बीच सुलह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता। इसी वजह से यह कुरान के मुताबिक नहीं है। यह साफ है कि इस तरह का तलाक मनमौजी तरीके से दिया जाता है।''

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नई दिल्ली. 1400 साल पुरानी तीन तलाक की प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। 5 जजों की बेंच ने 3:2 की मेजॉरिटी से कहा कि तीन तलाक वॉइड (शून्य), अनकॉन्स्टिट्यूशनल (असंवैधानिक) और इलीगल (गैरकानूनी) है। बेंच में शामिल दो जजों ने कहा कि अगर सरकार तीन तलाक को खत्म करना चाहती है तो वो इस पर 6 महीने के भीतर कानून लेकर आए। मंगलवार देर शाम सरकार ने इस पर अपना स्टैंड क्लियर कर दिया। लॉ मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद ने कहा SC के फैसले में असंवैधानिक बताए जाने के बाद तीन तलाक के लिए कानून बनाने की जरूरत नहीं है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट को ये तय करना था कि तीन तलाक महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है या नहीं? यह कानूनी रूप से जायज है या नहीं और तीन तलाक इस्लाम का मूल हिस्सा है या नहीं? मई में इस मामले में छह दिन सुनवाई हुई थी। इसके बाद मंगलवार को फैसला आया।

1) चीफ जस्टिस खेहर ने तीन तलाक पर क्या कहा?
- चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा, "तीन तलाक मुस्लिम धर्म की रवायत है, इसमें ज्यूडिशियरी को दखल नहीं देना चाहिए। अगर केंद्र तीन तलाक को खत्म करना चाहता है तो 6 महीने के भीतर इस पर कानून लेकर आए और सभी पॉलिटिकल पार्टियां इसमें केंद्र का सहयोग करें।"
- बेंच ने अपने फैसले में कहा कि जब कई इस्लामिक देशों में तीन तलाक की प्रथा खत्म हो चुकी है तो आजाद भारत इससे निजात क्यों नहीं पा सकता?
2) तीन तलाक किस वजह से असंवैधानिक?
- यह बेंच पांच जजों की थी। चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर इस पक्ष में नहीं थे कि तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया जाए। वहीं, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। इन तीन जजों ने कहा कि तीन तलाक की परंपरा मर्जी से चलती दिखाई देती है, ये संविधान का उल्लंघन है। इसे खत्म होना चाहिए।
3) कानून बनाने पर केंद्र का क्या स्टैंड है?
- कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, "फैसला पढ़ने के बाद पहली नजर में ही ये साफ हो जाता है कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच में मेजॉरिटी ने तीन तलाक को असंवैधानिक और गैरकानूनी कहा है।"
- सरकार के सीनियर ऑफिशियल ने न्यूज एजेंसी से कहा, "SC के ऑर्डर के बाद अगर कोई पति तीन तलाक देता है तो इसे वैध नहीं माना जाएगा। विवाह के लिए उसकी जिम्मेदारियां बनी रहेंगी। पत्नी को भी पूरी आजादी रहेगी कि ऐसे शख्स को वो पुलिस के हवाले कर दे और उसके खिलाफ डोमेस्टिक वायलेंस या फि हैरेसमेंट का केस करे।"
- एक टीवी चैनल पर रविशंकर प्रसाद ने कहा, "अगर चर्चा के बाद ऐसा लगता है कि कहीं कोई गैप है और कुछ छूट रहा है तो उसके लिए मंच खुला है। हम विचार करेंगे।"
4) ऐसे समझें जजों का फैसला
- तीन तलाक की विक्टिम और पिटीशनर अतिया साबरी के वकील राजेश पाठक ने DainikBhaskar.com को बताया कि बेंच ने 3:2 की मेजॉरिटी से तीन तलाक को खारिज और गैर-कानूनी करार दिया।
- वहीं, वकील सैफ महमूद के मुताबिक, चीफ जस्टिस ने कहा कि पर्सनल लॉ से जुड़े मुद्दों को न तो कोई संवैधानिक अदालत छू सकती है और न ही उसकी संवैधानिकता को वह जांच-परख सकती है। वहीं, जस्टिस नरीमन ने कहा कि तीन तलाक 1934 के कानून का हिस्सा है। उसकी संवैधानिकता को जांचा जा सकता है। तीन तलाक असंवैधानिक है।
5) क्या है पिटीशनर्स और लॉ एक्सपर्ट्स की राय?
शायरा बानो
- फरवरी 2016 में उत्तराखंड की रहने वाली शायरा बानो (38) वो पहली महिला बनीं, जिन्होंने ट्रिपल तलाक, बहुविवाह (polygamy) और निकाह हलाला पर बैन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर की। शायरा को भी उनके पति ने तीन तलाक दिया था।
- शायरा ने DainikBhaskar.com से कहा, ''जजमेंट का स्वागत और समर्थन करती हूं। मुस्लिम महिलाओं के लिए बहुत ऐतिहासिक दिन है। कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय को बेहतर दिशा दे दी है। अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। समाज आसानी से इसे स्वीकार नहीं करेगा। अभी लड़ाई बाकी है। इस फैसले से मुस्लिम समाज की महिलाओं को प्रताड़ना, शोषण और दुखों से आजादी मिलेगी। पुरुषों को महिलाओं के हालात को देखते हुए इसे स्वीकार करना चाहिए।''
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
- मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा- इस मसले पर कानून लाने की जरूरत नहीं है। बोर्ड अपने कानून के हिसाब से चलता है। बोर्ड अब 10 सितंबर को भोपाल में बैठक कर आगे की रणनीति तय करेगा।
- इससे पहले बोर्ड ने माना था कि वह सभी काजियों को एडवायजरी जारी करेगा कि वे तीन तलाक पर न सिर्फ महिलाओं की राय लें, बल्कि उसे निकाहनामे में शामिल भी करें।
- वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम वुमन्स पर्सनल लॉ बोर्ड की प्रेसिडेंट शाइस्ता अंबर ने तीन तलाक को गैर-कानूनी करार देते सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जाहिर की है।
लॉ एक्सपर्ट
- लॉ एक्सपर्ट संदीप शर्मा ने DainikBhaskar.com को बताया- ''मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव की जरूरत है। शायरा बानो ने जो मुद्दा उठाया है, वह अहम है। तीन तलाक के मौजूदा प्रावधान में बदलाव होना ही चाहिए। पाकिस्तान, बांग्लादेश और यूएई जैसे देशों में तीन तलाक कानून बदल चुका है, फिर हमारे यहां क्यों नहीं? कॉमन सिविल कोड बाद की बात है, पहले पर्सनल लॉ में बदलाव तो हो। एक-एक कर बदलाव किए जा सकते हैं।''
- ''पहले हिंदुओं में भी बहुविवाह प्रथा थी। 1956 में कानून में बदलाव कर हिंदू विवाह कानून के तहत एक विवाह का नियम बनाया गया। मुस्लिम पर्सनल लॉ में भी अगर बदलाव की जरूरत है तो होनी चाहिए। महिलाएं चाहें किसी भी धर्म की हों, उन्हें सुरक्षा मुहैया कराना संवैधानिक जिम्मेदारी है। संविधान समानता की बात करता है और अगर पर्सनल लॉ इसमें आड़े आता है तो उसे भी बदला जा सकता है। शादी चाहे किसी भी तरीके से हो, उसके बाद की स्थिति, तलाक और गुजारा भत्ता का मामला एक समान होना चाहिए।''
6) तलाक-ए-बिद्दत पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
- चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने अपने फैसला में कहा कि तलाक-ए-बिद्दत सुन्नी कम्युनिटी का हिस्सा है। यह 1000 साल से कायम है। तलाक-ए-बिद्दत संविधान के आर्टिकल 14, 15, 21 और 25 का वॉयलेशन नहीं करता।
7) क्या है तलाक-ए-बिद्दत?
- तलाक-ए-बिद्दत यानी एक ही बार में तीन बार तलाक कह देना। ऐसा तलाकनामा लिखकर किया जा सकता है या फिर फोन से या टेक्स्ट मैसेज के जरिए भी किया जा सकता है। इसके बाद अगर पुरुष को यह लगता है कि उसने जल्दबाजी में ऐसा किया, तब भी तलाक को पलटा नहीं जा सकता। तलाकशुदा जोड़ा फिर हलाला के बाद ही शादी कर सकता है।
8) क्या है तीन तलाक, निकाह हलाला और इद्दत?
- ट्रिपल तलाक यानी पति तीन बार ‘तलाक’ लफ्ज बोलकर अपनी पत्नी को छोड़ सकता है। निकाह हलाला यानी पहले शौहर के पास लौटने के लिए अपनाई जाने वाली एक प्रॉसेस। इसके तहत महिला को अपने पहले पति के पास लौटने से पहले किसी और से शादी करनी होती है और उसे तलाक देना होता है।
- सेपरेशन के वक्त को इद्दत कहते हैं। बहुविवाह यानी एक से ज्यादा पत्नियां रखना। कई मामले ऐसे भी आए, जिसमें पति ने वॉट्सऐप या मैसेज भेजकर पत्नी को तीन तलाक दे दिया।
9) सुप्रीम कोर्ट में कितनी पिटीशंस दायर हुई थीं?
- मुस्लिम महिलाओं की ओर से 7 पिटीशन्स दायर की गई थीं। इनमें अलग से दायर की गई 5 रिट-पिटीशन भी थीं। इनमें दावा किया गया कि तीन तलाक अनकॉन्स्टिट्यूशनल है।
क्या है भारत में तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं की स्थिति?
- देश में मुस्लिमों की आबादी 17 करोड़ है। इनमें करीब आधी यानी 8.3 करोड़ महिलाएं हैं।
- 2011 के सेंसस पर एनजीओ 'इंडियास्पेंड' के एनालिसिस के मुताबिक, भारत में अगर एक मुस्लिम तलाकशुदा पुरुष है तो तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं की संख्या 4 है। भारत में तलाकशुदा महिलाओं में 68% हिंदू और 23.3% मुस्लिम हैं।
10) मामले में पक्ष कौन-कौन थे?
केंद्र: इस मुद्दे को मुस्लिम महिलाओं के ह्यूमन राइट्स से जुड़ा मुद्दा बताता है। ट्रिपल तलाक का सख्त विरोध करता है।
पर्सनल लॉ बाेर्ड: इसे शरीयत के मुताबिक बताते हुए कहता है कि मजहबी मामलों से अदालतों को दूर रहना चाहिए।
जमीयत-ए-इस्लामी हिंद: ये भी मजहबी मामलों में सरकार और कोर्ट की दखलन्दाजी का विरोध करता है। यानी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के साथ खड़ा है।
मुस्लिम स्कॉलर्स: इनका कहना है कि कुरान में एक बार में तीन तलाक कहने का जिक्र नहीं है।
बेंच में हर धर्म के जज थे
- बेंच में चीफ जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे। इस बेंच की खासियत यह थी कि इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी धर्म को मानने वाले जज शामिल थे।