मंगलवार, 26 सितंबर 2017

गरबा : माँ की जीवन शक्ति के सौभाग्य की आराधना


एक नये जीवन को जन्म देने की शक्ति ताकत या व्यवस्था मात्र मां स्वरूपा स्त्री में ही हे। गरवा संम्भवतः उसी शक्ति को प्राप्त करने तथा उससे सम्पन्न बनें रहनें की उत्कट इच्छा की आराधना स्वरूप हे। 



माँ की गर्भ शक्ति की आराधना 

जानिए, सौभाग्य का प्रतीक गरबा का इतिहास

लाइफस्टाइल डेस्क। गरबा गुजरात का प्रसिद्ध लोकनृत्य है। यह नाम संस्कृत के गर्भ-द्वीप से है। गरबा सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और अश्विन मास की नवरात्रों को गरबा नृत्योत्सव के रूप में मनाया जाता है। नवरात्रों की पहली रात्रि को गरबा की स्थापना होती है। फिर उसमें चार ज्योतियां प्रज्वलित की जाती हें। फिर उसके चारों ओर ताली बजाती फेरे लगाती हैं। आईये और जानते गरबा का इतिहास....

• यह परंपरागत रूप से एक बड़ी गर्भ दीप के आसपास प्रदर्शन किया गया था, जो कि मां के गर्भ में भ्रूण के रूप में जीवन का प्रतिनिधित्व करती है। यह नृत्य रूप देवी दुर्गा की दिव्यता और शक्ति की पूजा करता है।

• गरबा के प्रतीकात्मक रूप पर एक और दृष्टिकोण यह है, कि जैसे नृतक अपने पैरों से परिपत्र बनाते हैं। यह जीवन के चक्र का प्रतिनिधित्व करता है जो जीवन से मृत्यु और पुनर्जन्म तक चलता है। केवल देवी दुर्गा को छोड़कर, अपरिवर्तनीय और अजेय, यह परिपत्र के साथ अंगूठी के रूप में किया जाता है।

• गरबा के लिए भक्त रंगीन वेशभूषा पहनते है।

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गरवा नृत्य का इतिहास 


1 गरबा की धूम
नवरात्रि के दिनों में गरबा की धूम अलग ही रौनक जमाती है। बहुत से लोग तो ऐसे हैं जो नवरात्रि का इंतजार ही इसलिए करते हैं क्योंकि इस दौरान उन्हें गरबा खेलने, रंग-बिरंगे कपड़े पहनने की अवसर मिलेगा।

2 गुजरात
भारत का पश्चिमी प्रांत, गुजरात तो वैसे ही गरबे की धूम के लिए अपनी अलग पहचान रखता है लेकिन अब तो भारत समेत पूरे विश्व में नवरात्रि के पावन दिनों में गरबा खेला जाता है।

3 गरबा खेलने की शुरुआत
ये सब तो बहुत कॉमन बातें हैं जो अमूमन सभी लोग जानते हैं। गरबा खेलना और गरबे की रौनक का आनंद उठाना तो ठीक है लेकिन क्या आप जानते हैं कि गरबा खेलने की शुरुआत कहां से हुई और नवरात्रि के दिनों में ही इसे क्यों खेला जाता है?

4 गरबा और नवरात्रि का कनेक्शन
गरबा और नवरात्रि का कनेक्शन आज से कई वर्ष पुराना है। पहले इसे केवल गुजरात और राजस्थान जैसे पारंपरिक स्थानों पर ही खेला जाता था लेकिन धीरे-धीरे इसे पूरे भारत समेत विश्व के कई देशों ने स्वीकार कर लिया।

5 शाब्दिक अर्थ
गरबा के शाब्दिक अर्थ पर गौर करें तो यह गर्भ-दीप से बना है। नवरात्रि के पहले दिन छिद्रों से लैस एक मिट्टी के घड़े को स्थापित किया जाता है जिसके अंदर दीपक प्रज्वलित किया जाता है और साथ ही चांदी का एक सिक्का रखा जाता है। इस दीपक को दीपगर्भ कहा जाता है।

6 अपभ्रंश रूप
दीप गर्भ के स्थापित होने के बाद महिलाएं और युवतियां रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर मां शक्ति के समक्ष नृत्य कर उन्हें प्रसन्न करती हैं। गर्भ दीप स्त्री की सृजनशक्ति का प्रतीक है और गरबा इसी दीप गर्भ का अपभ्रंश रूप है।

7 डांडिया
गरबा नृत्य में महिलाएं ताली, चुटकी, डांडिया और मंजीरों का प्रयोग भी करती हैं। ताल देने के लिए महिलाएं दो या फिर चार के समूह में विभिन्न प्रकार से ताल देती हैं। इस दौरान देवी शक्ति और कृष्ण की रासलीला से संबंधित गीत गाए जाते हैं।

8 गरबा का आयोजन
गुजरात के लोगों का मानना है कि यह नृत्य मां अंबा को बहुत प्रिय है, इसलिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए गरबा का आयोजन किया जाता है।

9 ईश्वर की आराधना
हिन्दू धर्म में ईश्वर की आराधना करने के लिए भजन और आरती की जाती है जिसे सिर्फ पढ़ा नहीं बल्कि संगीत और वाद्य यंत्रों के साथ गाया भी जाता है। भक्तिरस से परिपूर्ण गरबा भी मां अंबा की भक्ति का तालियों और सुरों से लयबद्ध एक माध्यम है।

10 महत्वपूर्ण कारण
आपने देखा होगा कि जब महिलाएं समूह बनाकर गरबा खेलती हैं तो वे तीन तालियों का प्रयोग करती हैं। इसके पीछे भी एक महत्वपूर्ण कारण विद्यमान है। क्या कभी आपने सोचा है गरबे में एक-दो नहीं वरन् तीन तालियों का ही प्रयोग क्यों होता है?

11 त्रिमूर्ति
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, देवों की इस त्रिमूर्ति के आसपास ही पूरा ब्रह्मांड घूमता है। इन तीन देवों की कलाओं को एकत्र कर शक्ति का आह्वान किया जाता है।

12 गरबा
इन तीन तालियों का अर्थ अगली स्लाइड्स में उल्लिखित है।

13 पहली ताली
पहली ताली ब्रह्मा अर्थात इच्छा से संबंधित है। ब्रह्मा की इच्छा तरंगों को ब्रह्मांड के अंतर्गत जागृत किया जाता है। यह मनुष्य की भावनाओं और उसकी इच्छा का समर्थन करती है।

14 दूसरी ताली
दूसरी ताली के माध्यम से विष्णु रूपी कार्य तरंगें प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य को शक्ति प्रदान करती हैं।

15 तीसरी ताली
जबकि तीसरी ताली शिव रूपी ज्ञान तरंगों के माध्यम से मनुष्य की इच्छा पूर्ति कर उसे फल प्रदान करती है। ताली की आवाज से तेज निर्मित होता है और इस तेज की सहायता से शक्ति स्वरूप मां अंबा जागृत होती है। ताली बजाकर इसी तेज रूपी मां अंबा की आराधना की जाती है।

16 राजनीति और साहित्य
गरबा का महत्व केवल धार्मिक ना होकर इसे राजनीति और साहित्य के साथ भी जोड़ा गया है।

17 गुजरात की शान
आजादी से पहले गुजरात में नवाबों का राज था, उस समय गरबा केवल गुजरात की ही शान हुआ करता था। परंतु आजादी के बाद जब गुजरात के लोग अपने प्रदेश से बाहर निकले और अन्य स्थानों को अपना निवास बनाया तब धीरे-धीरे गरबा अन्य स्थानों पर भी आयोजित किया जाने लगा।

18 मां अंबा
आजादी से पहले गरबा नृत्य में केवल शक्ति स्वरूपा मां अंबा को समर्पित गीत ही नहीं बल्कि देश भक्ति से ओतप्रोत और साम्राज्यवाद विरोधी गीत भी शामिल किए जाते थे।

19 आज का गरबा
आज का गरबा नृत्य पूरी तरह पारंपरिक रूप लिए हुए है जिसमें राजनीति का स्वरूप बिल्कुल न्यूनतम या कहें ना के बराबर है। लेकिन , आप इसके व्यवसायिक स्वरूप को भी देख सकते हैं।

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गरबा, भारत का सबसे बड़ा धार्मिक नृत्य उत्सव
गरबा, संसार का सबसे बड़ा सामूहिक धार्मिक नृत्य उत्सव है! यह गुजरात राज्य का नृत्य है, नवरात्र उत्सव यानी 9 दिनों तक देवी पांडालों और मंदिरों में गरबा नृत्य की धूम रहती है।

इन दिनों लोग मां शक्ति की आराधना करते हैं, ताकि उनके जीवन में सुख, समद्धि का समावेश हो इसलिए नवरात्र में वो गरबा खेलते हैं। गरबा नृत्य के दौरान मां अम्बे की मूर्ति को किसी बड़े मैदान में बीच में रखा जाता है। गरबा नृत्य कर रहे लोग इस मूर्ति के चारों तरफ घूमते हैं।

वो अपने हाथों में दो लकड़ी की डंडियां लिए होते हैं, जिन्हें एक बार घूमने के बाद टकराते हैं। इस दौरान भक्तिमय भजनों का सिलसिला जारी रहता है। गरबा नृत्य के दौरान लड़के और लड़कियां विशेष तरह के पारंपरिक कपड़े पहनते हैं।

गरबा सिर्फ नवरात्र में ही नहीं बल्कि गुजरात में शरद पूर्णिमा, वसंत पंचमी, होली और अन्य त्योहारों पर भी खेला जाता है। गरबा को गर्भदीप के नाम से भी जाना जाता है। वह इसलिए क्योंकि गरबा एक मां की मूर्ति के सामने जलते एक दीपक के चारों तरफ खेला जाता है।

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गरबा गुजरात, राजस्थान और मालवा प्रदेशों में प्रचलित एक लोकनृत्य जिसका मूल उद्गम गुजरात है। आजकल इसे आधुनिक नृत्यकला में स्थान प्राप्त हो गया है। इस रूप में उसका कुछ परिष्कार हुआ है फिर भी उसका लोकनृत्य का तत्व अक्षुण्ण है।

आरंभ में देवी के निकट सछिद्र घट में दीप ले जाने के क्रम में यह नृत्य होता था। इस प्रकार यह घट दीपगर्भ कहलाता था। वर्णलोप से यही शब्द गरबा बन गया। आजकल गुजरात में नवरात्रों के दिनों में लड़कियाँ कच्चे मिट्टी के सछिद्र घड़े को फूलपत्तियों से सजाकर उसके चारों ओर नृत्य करती हैं।

गरबा सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और अश्विन मास की नवरात्रों को गरबा नृत्योत्सव के रूप में मनाया जाता है। नवरात्रों की पहली रात्रि को गरबा की स्थापना होती है। फिर उसमें चार ज्योतियाँ प्रज्वलित की जाती हें। फिर उसके चारों ओर ताली बजाती फेरे लगाती हैं।

गरबा नृत्य में ताली, चुटकी, खंजरी, डंडा, मंजीरा आदि का ताल देने के लिए प्रयोग होता हैं तथा स्त्रियाँ दो अथवा चार के समूह में मिलकर विभिन्न प्रकार से आवर्तन करती हैं और देवी के गीत अथवा कृष्णलीला संबंधी गीत गाती हैं। शाक्त-शैव समाज के ये गीत गरबा और वैष्णव अर्थात्‌ राधा कृष्ण के वर्णनवाले गीत गरबा कहे जाते हैं।